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मेरी मां एक संवेदनशील,सृजनात्मक व्यक्तित्व की महिला थीं। वह अपने आपको कई विधाओं के माध्यम से अभिव्यक्त करतीं थीं, जिसमें कविता भी एक था।
कविता उन्होंने कभी भी यह सोच कर नहीं लिखा कि इसे प्रकाशित कराना है। उनकी बहुत कम कविताऐं 'पब्लिक डोमेन' में है। सच तो यह है कि उनकी अधिकतर कविताओं की जानकारी मुझे भी नहीं थी।
उनकी कविता उनके लिए जीवन के उतार चढ़ाव में उठने वाले भावनाओं के बवंडर को कलम के रास्ते कागज़ पर उतार कर मन को सुकून देने का एक जरिया था।
कुछ परिजनों एवं मित्रों के अपनी कविताओं को प्रकाशित करवाने के सुझाव से उनका मन इस ओर गया और वे इन्हें पुस्तक के रूप में प्रकाशित कराने का मन बना लीं। प्रारम्भ में तो कमजोर स्वास्थ्य के कारण यह विचार, विचार तक ही रहा, परन्तु जब उनका स्वास्थ्य कुछ ठीक रहने लगा तो वो अपनी कविताओं को प्रकाशन के दृष्टि से संशोधित करने का काम कर रहीं थीं। कुछ छोटी छोटी नयी कविताऐं भी लिख रहीं थीं, जिनका नाम उन्होंने दिया था 'क्षणिकायें'। लेकिन अचानक उनकी मौत से यह काम रुक गया ।
अब हमलोग उनकी काब्य संग्रह प्रकाशित करवाने के लिए उन कविताओं को एक जगह व्यवस्थित रूप से संयोजित कर रहे हैं। उनकी कुछ कविताऐं तो उनके फेसबुक के वाॅल पर उपलब्ध है और कुछ , उनकी कविताओं वाली फाइल में मिली। अब तक 120 से अधिक कविताऐं हमलोग सूचीबद्ध कर चुके हैं और अब उनके नज़र से देखने की कोशिश कर रहे हैं कि अगर वो जीवित होतीं तो अपनी किन-किन कविताओं को अपने प्रकाशित काव्य-संग्रह में शामिल करना चाहतीं । यह काम कठीन है ; क्योंकि न तो उनकी जैसी दृष्टि हमलोगों के पास है, न उन भावनात्मक सोंच की वैसी समझ जिसने इन कविताओं को जन्म दिया होगा । फिर भी चुॅंकि उनकी इच्छा थी कि उनका कविता संग्रह प्रकाशित हो तो अब हमलोगों का यह परम कर्तव्य है कि उनके अधूरे काम को पूरा करें। मैं और मेरा भाई सहर्ष इसे पूरा करने में लगे हैं।
सहर्ष उनका एक वेबसाइट भी बना रहा है जिसमें उनकी कविताऐं, लेख, यात्रा वृत्तांत, यूट्यूब पर डाले गए पकवान का विडियो तथा उनके बारे में औरौं की टिप्पणी एवं विचार शामिल होगा। यह वेबसाइट अगले दस-पंद्रह दिनों में एक्टिव हो जायेगा।
सम्भवतः इस वर्ष के अन्त तक उनका काव्य-संग्रह भी पुस्तक के रूप में आपके सामने होगा।
उनकी कविताओं का फलक विस्तार काफी अधिक है। उन्होंने जीवन के कई संवेदनशील पहलुओं को अपनी रचनाओं में छुआ है । इसमें रिश्ते की गहराई से मृत्यु के यथार्थ, विपरीत परिस्थितियों से संघर्ष का संकल्प, प्रकृति प्रेम से समन्दर और पहाड़ों से संवाद, गरीबी, वेवशी, उत्पीड़न, लाचारी को रेखांकित करतीं कविताऐं भी , महुआ चुनतीं अबोध बाला के माध्यम से उत्पीड़न की मानसिकता की ओर इशारा , तो टुटते पारिवारिक सामाजिक व्यवस्था का दर्द भी उनकी कई कविताओं में परिलक्षित है।
ज़िन्दगी को उन्होंने जैसा देखा, जैसा महसूस किया , वैसा लिख गयीं। सरल भाषा , सहज शैली और विषय आम जिंदगी से । यही उनकी लेखनी का मर्म है। उन्होंने कई कविताओं में तो सीधे अपनी बात कहीं हैं और कई में इशारों में बहुत कुछ कह गयी हैं जो पढ़ने में तो सीधा सपाट लगता है पर अन्तर्तनीहित भाव गहरा है। उनकी कई कविताऐं व्यक्तिगत हैं और यह स्वाभाविक ही था क्योंकि
वो एक पारिवारिक व्यक्ति थीं और रिश्ते उनके लिए बहुत मायने रखता था। जब वो लिखती हैं :
'' मैं मौत से क्यों डरूं मैं मौत पे सवार हूं, कर रही मैं मौत से रोज़ आर-पार हूं, परिजन मेरे कवच-कुंडल, मैं परिजनों पे निसार हूं " तो यह उनके परिवार रुपी संस्था और उसकी असीम शक्ति में गहरे विश्वास को दर्शाता है।
उनकी एक कविता है 'साथ साथ'। इस कविता को पढ़ कर दो बातें बहुत प्रमुखता से ज़हन में आती है।
पहला यह कि उन्हें यकीन था कि वो इस दुनिया से मेरे पिता से पहले जायेंगी और दुसरा कि वो इस संसार से जाने बाद भी उनके आसपास, उनके साथ साथ रहेंगी। यह कविता, कविता से अधिक मेरे पिता के लिए एक पत्र, मृत्यु उपरांत भी साथ नहीं छोड़ने का एक आश्वासन है।
'साथ -साथ' कविता में उन्होंने क्या कहा है और कैसे कहा यह जानने की आपकी जिज्ञासा हो सकती है, इसलिए वह कविता मैं यहां उद्धृत कर रही हूॅं।
लिपटी रहूंगी तुम्हारे चारो ओर
मेरी हंसी सुनाई देगी तुम्हें
हम मिल कर हंसेंगे साथ साथ ,
जब कभी सर पर कड़ी धूप महसूस करो
तब अपने उपर का आसमान देखना
मिलूंगी तुम्हें बारिशों में
हम मिल कर भीगेंगें साथ साथ ,
जब कभी मेरी कमी महसूस करो
फ़िज़ा में गूंजेंगे हमारे अफ़साने