माला सिन्हा के शुभचिंतकों एवं मित्रों ने समय-समय पर उनके व्यक्तित्व, रचनात्मकता एवं लेखन पर अपने विचार व्यक्त किए थे । वेबसाइट का यह भाग उन्हीं विचारों एवं टिप्पणियों का संकलन है।

Today, I took out sometime and went through the entire website. Read it, and now I have been navigated to a different world full of Love, Life, Talent , Courage & Wisdom.

Such was "Our Sanjhli Mummy"❤️

Her life is a true inspiration for all of us, and the depth of her thought process is just Ethereal.

I have always admired any and every "Zinda dil" person in my life and I can definitely say She was one of them.

Long live her Legacy ❤️

We miss you🙏

--Shanu

20.08.2026

यूं तो मेरी पहचान माला आंटी से फेसबुक के माध्यम से हुई थी और यह कोई 7-8 बरस पुरानी बात है लेकिन कभी सोचूं तो लगता है कि यह इस जन्म का नहीं बल्कि उस जन्म का रिश्ता है जिसकी डोर ने हमें आज़ तक बांधे हुए रखा है। फेसबुक पर उनके संस्मरण,उनकी कविताएं पढ़ना मुझे बहुत अच्छा लगता था। मेरी अपनी पोस्ट पर उनकी आत्मीय प्रतिक्रियाएं मेरा दिन बना देती थीं। धीरे-धीरे यह दोस्ती और प्रगाढ़ हुई और फिर फोन नंबर का आदान-प्रदान हुआ। हम ख़ूब सारी बातें करते थे। इसमें अपने घर-परिवार की बातों के अलावा फेसबुक पर लिखने वाले बहुत से मित्रों की लेखन संबंधी बातें भी होती । कभी मौसम की बातें होती तो कभी फिल्मों की। कभी वह मुझे बता देतीं कि तुम फलानी पिक्चर देखना और कभी मैं उनसे कहती कि अभी हाल फिलहाल मैंने यह फिल्म देखी है आप भी जरूर देखिएगा। जब कभी वह बिहार में बिताए अपने पुराने दिनों की बात बताती तो मैं मंत्रमुग्ध होकर सुनती रहती । मेरी बातों से आंटी इतना तो समझ ही गई थीं कि इस लड़की को बिहार से बहुत लगाव है इसलिए छठ के मौके पर बेंगलुरु से मुझे ठेकुआ पार्सल करके भेजती साथ में उसमें मेरे लिए चूड़ी, बिंदी, मेहंदी सिंदूर और परफ्यूम वगैरह भी होता । दो-बार उन्होंने मेरे लिए पर्स भी भेजे। उसमें से एक पर सुनहरे धागों से मेरा नाम लिखा हुआ था 'प्रतिभा' । उन धागों से उठ रही अपनेपन की खुशबू ने मुझे बांध लिया। जीवन में पहली बार मुझे अपना नाम इतना अच्छा लगा। मुझे लगता था कि यह सफर ऐसे ही चलता रहेगा मैं और माला आंटी हमेशा इसी तरह बात करते रहेंगे एक-दूसरे को पढ़ते रहेंगे। मगर फिर अचानक एक दिन मुझे उनके बचपन की सहेली किरण आंटी के माध्यम से पता चला कि कल रात माला आंटी नहीं रही। वह उनके ही नहीं बल्कि मेरे लिए भी एक बहुत अच्छे रिश्ते के अवसान का दिन था। उनके बाद फिर कहां मुझे कोई इतनी स्नेहिल, इतनी ममतामयी आंटी मिलने वाली हैं। जिन दिनों उनकी तबियत बहुत ज्यादा ख़राब थी तो मैंने उनको कहा था कि आप जल्दी से ठीक हो जाइए फिर मैं आपको बद्री-केदार की यात्रा कराऊंगी मुझे कहां पता था कि वह इससे पहले ही अनंत में विलीन हो जाएंगी और एक शून्यता हमारे लिए छोड़ जाएंगी ।

-- प्रतिभा नैथानि

18.08.2026

फेसबुक के पेजों पर आदरणीय ' रेणू' जी के बारे में किसी के लेखन पर अपने विचारों के आदान- प्रदान के दौरान मेरा उनसे परिचय एवं मित्रता हुईं जो बहुत ही अल्प समय के लिए साबित हुई, क्योंकि कुछ ही दिनों बाद उनका स्वर्गवास हो गया। उनका अवसान मेरे लिए बहुत कष्ट कारी रहा। उनसे इसी फेसबुक पर मालूम हुआ कि कभी मैं उनके पड़ोस में ही रहता था ( रोड नम्बर 10A, राजेन्द्र नगर, पटना, जस्टिस अनंत सिंह के मकान में किरायेदार के रूप में, सन्1969 -1973 तक। मैं वहां पढ़ रहा था)। क्या ही संयोग था कि यह बात यहां बंगलोर में रहते हुए मालूम हुई। और फिर, मेरा दुर्भाग्य कि उनकी मृत्यु बंगलोर में हुई और इस बात की खबर भी मुझे नहीं थी कि वे बंगलोर में रह रहीं थीं। जानकारी रही होती तो उनसे कम से कम एक बार मिल लेने का सुख हासिल कर पाया होता। बहुत अफसोस हुआ था उनके इस तरह इतने पास से गुजर जाने का।

-- बिनोद मिश्रा

17.08.2026

To Aunty

आपकी जीवन की नाव भले ही अब उस पार पहुँच गई हो,

लेकिन आपकी द्वारा दी हुई प्रेरणा की लहरें हमारे भीतर हमेशा उठती रहेंगी।

Aunty सचमुच नियति का प्रतिकार थी और हमेशा रहेंगी।

शत शत नमन 🙏

धीरज सिन्हा

१६ अगस्त २०२६

(20250804)_Shrika

अपनी नानी के लिए श्रीका की सोंच, श्रीका की ख्वाहिश , श्रीका की भावना, श्रीका का सपना, श्रीका की कविता - 'नानी मेरा एक सपना'।

- श्रीका

04 August, 2025

हमारी माला दीदी

( 19.09.1958 - 10.06.2025 )

हम पांच भाई-बहनों में सबसे बड़ी, हम सभी पुरे परिवार की शान, पहचान और अभिमान हमारी माला दीदी, हम सबों के बीच अब नहीं रहीं।

गंभीर बीमारियों से जूझते हुए 9 और 10 जून की मध्य रात्रि में मणिपाल हास्पिटल, बंगलोर में उनका निधन हो गया।

पीछले कुछ वर्षों से वह भिन्न प्रकार की गंभीर बीमारियों से जूझ रहीं थीं।

उनका पुरा परिवार उनको बचाने के लिए भगीरथी प्रयास कर रहा था।

मगर ईश्वर को शायद कुछ और ही मंजूर था?

मेरे पिता की तो वह सबसे प्यारी, दुलारी गुड़िया थी।

बचपन के दिनों में जब हमारा परिवार, वित्तीय संसाधनों से जूझ रहा होता था, तब भी हमारे पिता, उनके जन्म दिन के अवसर पर कुछ विशेष आयोजन जरूर करतें थे, मसलन कठपुतली का नाच इत्यादि..

उनका इस तरह से असमय जाना हम सब परिवार के लिए अत्यंत ही दुखद और अवसाद पूर्ण है।

ईश्वर उन्हें अपने श्री चरणों में स्थान दें।

- नीरज सिन्हा

10 June, 2025

मंदिरों में माला ईश्वर का चढ़ावा बनती

पत्नी के गले में मंगल सूत्र बनती

शादी में यही माला जय माल बन जाती

सोने कि माला ऐश्वर्य से दमकती

एक माला हम सब ने

संजो के रखी है

जो सोने से भी ज़्यादा

हर वक्त चमक रही है

फूलों कि लड़ी है

हम सब कि बड़ी बहन है

मीठे बोल उसके मिश्री कि डली है

हर काम में निपुण है

लिखती बड़ी उत्कृष्ट है

हम सब कि बड़ी बहना

परिवार का है गहना

इसी तरह से हरदम

तुम प्यार बाँटती रहना

- शशि शंकर

जनवरी ७, २०२2

मैं विश्वास करती हूँ और पहले भी लिख चुकी हूँ कि मेरी माँ एक ही व्यक्तित्व में समाई हुई अनेक भूमिकाओं और गुणों का अद्भुत संगम थीं। जब मैं उनकी स्मृतियों में कुछ लिखने बैठती हूँ, तो समझ नहीं पाती कि कहाँ से शुरु करूँ, किस बारे में लिखूँ, क्या छोड़ दूँ, और उनकी यादों को उचित सम्मान कैसे दूँ।

आज उनकी पहली पुण्यतिथि के अवसर पर हमने उनकी स्मृति में पूजा का आयोजन किया और प्रसाद अर्पित किया। यह दिन केवल उन्हें याद करने का नहीं, बल्कि उनके प्रेम, उनकी सीख और उनके द्वारा हमारे जीवन में छोड़ी गई अमिट छाप को श्रद्धापूर्वक नमन करने का अवसर है और हम ऐसा ही करने की कोशिश कर रहे हैँ।

- सुहानी

10 June, 2026

मेरी मॉं

पार्ट 1

आज अपनी मां के बारे में कुछ लिखने बैठी हूं तो उनसे जुड़ी हजारों यादों का सैलाबआंखों के सामने आ कर ठहर सा गया है और मैं भावुक हो रही हूं। तब समझ नहीं आता था, अब समझ आता है कि साधारण सी दिखने वाली जमीन से जुड़ी मेरी मां कितनी संवेदनशील और असाधारण थीं - बहुमुखी प्रतिभा की स्वामिनी। अनायास ही पूज्य महादेवी वर्मा की याद आ गई।

पापा के घर जाती हूं तो हर जगह मां के उपस्थिति का एहसास होता है। जैसे कह रहीं हों, मैं कहीं गई नहीं, यहीं हूं। उनकी एक कविता है " मैं चली जाऊंगी, फिर भी थोड़ी-थोड़ी रह जाउंगी..." कितना सही लिखा था उन्होंने। दो महीने बीत जाने के बाद भी यकिन नहीं होता कि वो नहीं हैं। मैं जब भी अपने घर से पापा के घर जाने लगती हूं तो लगता है मां वहां सोई -बैठी या किचन में कुछ करते मिलेंगी या मेरे भाई सहर्ष के लाए रीकलायनिंग सोफा पर आराम से बैठी यूट्यूब पर अपलोड करने के लिए कोई ताजा वीडियो का एडिटिंग कर रही होंगी। पहले उन्हें वीडियो एडिट करने का हुनर नहीं था लेकिन बाद में उन्होंने बड़े लगन‌ से सहर्ष के मदद से इसे सीखा और इस मामले में स्वावलंबी हो गयीं।

उनके फोटो के नीचे छोटे दिवान पर पीले रंग का चादर और कुशन लगा है जिस पर वर्षों पहले उन्होंने काले रंग के पैच वर्क कर के उसे विषेश बना दिया था - बहुत आकर्षक । साड़ियों पर बनाई उनकी मधुबनी पेंटिंग, बरसों पहले बनाई उनका सलमा-सितारा का काम, उनके कविता, संस्मरण लेखों की फाइल, उनके बनाए स्केच, विदेश यात्राओं के दौरान उनके द्वारा खिंचे गयी तस्वीरें, उनका खाना बनाने और खिलाने का शौक , उनका प्रकृति प्रेम, बागवानी का शौक, पुराने गाने सुनने का शौक , देश विदेश घूमने का शौक, क़रीने से गमले में लगाए फूल के पौधे - क्या क्या नहीं करने का शौक था उन्हें। कोई आने वाला हो तो तैयारियां में लग जातीं। आवभगत में कोई कमी न रह जाए इसका विषेश ख्याल रखतीं।

गम्भीर स्वास्थ्य समस्याओं के बाबजूद भी सीखना उन्होंने कभी नहीं छोड़ा। जिस चीज में उनकी रूचि होती उसे सीखने और करने में उनका लगन देखने लायक होता। कोई एक वर्ष पहले उन्होंने Aroma of mala's kitchen नाम से अपना यूट्यूब चैनल शुरू किया और निस्वार्थ भाव से अन्त तक पूरे कमीटमेन्ट के साथ उस में लगी रहीं ।

उनमें लोगों को अपना बना लेने की अद्भुत क्षमता थी। इसका कारण उनका सच्चा-सरल स्वभाव और सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार था। वो जिस तरह छोटे से छोटे व्यक्ति का भी ख्याल रखतीं थीं,वह अनुकरणीय है।इसीलिए उनकी मृत्यू पर आंसू बहाने वालों में अस्पताल के वे कर्मचारी भी थे जो डायलिसिस के दौरान उनका देख भाल करते थे ।

उनमें प्रबल इच्छाशक्ति थी। वो एक फाइटर थीं। जिस हिम्मत और धैर्य से उन्होंने अपनी बीमारियों का मुकाबला किया वह सब के बस की बात नहीं।

न तो उनकी बीमारी, न ही मृत्यु का डर उन्हें मानसिक रूप से कमजोर कर सका। कमजोर स्वास्थ्य एवं डायलीसिस पर होने के बाबजूद भी न तो उनकी लेखनी रुकी, न यूट्यूब चैनल, न ही अपनों के लिए उनकी चिंता और साकारात्मक सोच। ब्रेन हेमरेज होने के एक मिनिट पहले तक वह कुछ लिख रहीं थीं। अपना काम खत्म करके जैसे खड़ी हुईं ब्रेन हेमरेज हो गया और वो लड़खड़ा कर वहीं जमीन पर बैठ गयीं। अपने पैर पर खड़े होने की उनकी ताकत जाती रही। इससे पहले भी कई बार उनकी तबीयत बिगड़ी थी और ICU में भर्ती करवाना पड़ा था लेकिन कभी ऐसा नहीं लगा था कि वो सही सलामत घर नहीं लौट पाएंगी। इस बार बात अलग थी। ब्रेन हेमरेज वाला अटैक उनके जीवन के अन्त का प्रारंभ है, इसका अंदाज तब न तो उनको थी, न हमलोगों को। वह होश में थीं और बात कर पा रही थीं, फिर ऐसा क्या हुआ कि उनकी स्थिति तेजी से ख़राब होने लगी ?

- सुहानी

9 August, 2025

पार्ट 2

10 अगस्त वाले पोस्ट में मैंने लिखा था कि ब्रेन हेमरेज के बाद भी मेरी मां होश में थीं और कठिनाई से ही सही, पर बोल पा रहीं थीं। अस्पताल जाने के बात पर उनका कहना था कि अस्पताल क्यों जाना है, हम ठीक हो जायेंगे। ऐसा लगता है, उस वक्त न तो उन्हें कोई तकलीफ़ की अनुभूति हो रही थी, न हीं बिगड़ते शारीरिक स्थिति का आभास।

लेकिन हमलोग समझ रहे थे कि स्थिति बहुत गंभीर है। उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाया गया; लेकिन अस्पताल पहुंचते पहुंचते उनकी तबीयत काफी बिगड़ गई।

सम्भवतः मस्तिष्क के अन्दर खून के अत्यधिक रिसाव से मस्तिष्क धीरे धीरे निष्क्रिय होने लगा था , पर शायद उन्हें किसी तरह के दर्द या तकलीफ़ का एहसास अब भी नहीं हो रहा था। पूछने पर उन्होंने गर्दन हिला कर बताया कि ठीक हैं, लेकिन ऐसा था नहीं। वो अस्पताल पहुंचने के 10-15 मिनट के अन्दर ही अचेत हो गयीं थीं या शायद उन्हें दिये गये सेडेटिव दवा के कारण बिल्कुल शांत हो गई थीं।

उनकी हालत देखते देखते इतनी बिगड़ गई कि उनको वेंटिलेटर पर रखना पड़ा और उनकी जान बचाने के लिए उसी वक्त ब्रेन सर्जरी की गई। लेकिन आपरेशन के बाद भी हालत में कोई सुधार नहीं हुआ और पांच दिन अचेतावस्था में रहने के बाद 9 -10 जून की रात वो हम सब को छोड़ कर इस दुनिया से चली गईं।

अपनी मां के जीवन में पीछे मुड़कर देखती हूं तो मानस पटल पर उस दिन की कल्पना उभरती है जब उनका जन्म हुआ था।

मां के जीवन का पहला दिन- 19 सितंबर,1958।

हर नवजात शिशु की तरह जन्म के बाद वो रोयी होंगी और उनके रोने की आवाज सुन कर सभी के चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गई होगी‌‌ क्योंकि उनका यह पहला क्रंदन परिवार में उनके आने का उदघोष रहा होगा। मेरी नानी उन्हें अपने सीने से लगा ली होंगी।

और आज 10 जून 2025 - जीवन का अन्तिम दिन।

सब खत्म हो चुका था। उन्हें अस्पताल से ला कर घर में पराम्परा के अनुसार उत्तर-दक्षिण दिशा में जमीन पर लिटा दिया गया था। परिवार के लोग, पहचान के लोग और अपार्टमेंट के लोग, मां के अचानक चले जाने के खबर से आने लगे थे। घर से कारिडोर तक लोग स्तब्ध , गमगीन खड़े थे। मां को अन्तिम विदाई देने की प्रक्रिया पूरी की जा रही थी।

मेरे दोनों बच्चे अपनी नानी को इस हाल में देख कर हतप्रभ और बहुत उदास थे। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि यह क्या हो गया।

मेरा मन भी बहुत अशांत और व्याकुल था। लग रहा था मां किसी तरह आंखें खोल दें। लेकिन ऐसा ना तो होना था, ना ऐसा हुआ।

जिस मां का जरा सा तकलीफ़ देखा नहीं जाता था उन्हें अब अग्नि को समर्पित करना था। यह कितना कठीन, निष्ठुर और ह्रदय को छलनी कर देने वाला घड़ी था।

जिस तरह पिछले एक साल में मां के स्वास्थ्य में सुधार हो रहा था उससे बहुत आस जगी थी। जुलाई में किडनी ट्रांसप्लांट का भी प्लान था ऐसे में यह दिन देखना पड़ेगा, इसकी दूर दूर तक कोई परिकल्पना नहीं थी।

मां को ब्रेन हेमरेज वाला अटैक 4 जून को करीब पौने दस बजे रात में हुआ था। ब्रेन हेमरेज के पहले वो काफी सही मानसिक और शारीरिक स्थिति में थीं। इस स्थिति में पहुंचने के लिए उन्होंने संघर्ष और परिश्रम किया था। लेकिन ब्रेन हेमरेज ने जैसे सब किये करायें पर पानी फेर दिया था।

पूरे होशो-हवास में बिताया उनके जीवन का अन्तिम दिन था 4 जून। वह दिन सुबह से शाम तक उनके लिए कैसा था ? यह जिज्ञासा उनके शुभचिंतको को हो सकती है।

अगले भाग में मैं इसी बात को बताने की कोशिश करुंगी।

- सुहानी

17 August, 2025

पार्ट 3

मृत्यु अटल सत्य है। लेकिन यह अटल सत्य कितना गहरा जख्म दे जाता है जब कोई अपना चला जाता है। माँ का जाना मन कहां कभी स्वीकार कर पाता है? कहां मन का टीस शान्त होता है? कहां आंखों के आंसू रुकते हैं? कहां मन की कचोट जाती है? कहां यादों के समन्दर में उठ रहा ज्वार-भाटा चित् को सहज होने देता है? कहां उनकी कही कोई बात पूरी नहीं कर पाने का मलाल पीछा छोड़ता है?

माँ तो माँ हैं। माँ मौत के आगोश में जा कर मौन होने को मजबूर हो सकती हैं, पर अपने बच्चों के दिलो-दिमाग से कभी दूर नहीं हो सकतीं। वह थीं तब भी और जब वो नहीं रही तब भी, वो हमारे जीवन की एक प्रबल सार्थक यथार्थ हैं और हमेशा रहेंगी।

खैर, यह भावनाओं की बातें हैं, जो मैं लिख गयी अन्यथा मुझे तो आज उनके अन्तिम दिन की बात करनी थी।

मेरी माँ के जीवन का होशो-हवास में बिताया अन्तिम दिन 4 जून 2025 उनके लिए कैसा रहा? अगर दो शब्दों में कहूं तो - अच्छा था।

मैं सुबह करीब 7:00 बजे पापा के घर गयी तो माँ सो रही थीं। अक्सर उन्हें रात में नींद देर से आती थी, इसलिए देर से उठना एक सामान्य बात थी। मैं पापा से बात कर लौट गई और फिर एक घंटे के बाद उनके घर गयी तो माँ जाग चुकी थीं और सुबह की चाय पी रही थीं। वह सहज और सामान्य दिख रही थीं। मैं उन्हें अपने मौसेरे भाई आकाश के पत्नी के बैंगलोर आने के बारे में बतायी। आकाश की शादी कुछ महीने पहले ही हुई थी जिसमें वो डायलीसिस पर होने के कारण शामिल नहीं हो पाई थीं। उनकी इच्छा थी कि आकाश और उसकी पत्नी को घर बुला कर आशीर्वाद दे। इसके लिए उनको जो तैयारी या खरीददारी करनी थी उस पर बात हुई। 5 जून उनके डायलिसिस का दिन था। इसलिए, विचार बना कि पापा 6 जून को उनको बाजार ले जायेंगे ताकि वो अपने पसंद से खरीदारी कर सकें।

11 जून को दिल्ली से हमारी फुआ नानी, दीदी और कौस्तुभ के आने का प्रोग्राम था जिसका विचार कर माँ काफी खुश और उत्साहित थीं। उनको फुआ नानी के आने का बेसब्री से इंतजार था। जहां तक मुझे मालुम है माँ फुआ नानी के बहुत करीब थीं। उनसे एक लम्बे अरसे के बाद मिलने का अवसर उन्हें आह्लादित कर रहा था। यह उनके बातों से साफ झलक रहा था।

करीब 11:00 बजे माँ मेरे घर आयीं। उनसे कई विषयों पर बात हुई। कल डायलिसिस के लिए जायेंगी तो टिफिन में क्या ले जायेंगी , यह भी उससे पुछे थे। क्या पता था कि अब वो कभी डायलिसिस के लिए जा ही नहीं पायेंगी।

करीब घंटे भर मेरे और बच्चों के साथ बात करती रहीं। फिर उन्हें नींद आने लगी तो ‌वहीं एक कुशन सर के नीचे रख कर सोफे पर लेट गयीं। बच्चे अपनी नानी के आस-पास ही खेलते रहे। अक्सर दोपहर में एक आध घंटे की नींद वो लेती थीं। उठने के बाद कुछ देर और बैठीं। फिर, पापा अकेले हैं बोल कर, अपने घर चली गईं।

मेरा और पापा का फ्लैट एक ही अपार्टमेंट में एक ही फ्लोर पर करीब करीब आमने-सामने है। इसलिए हमलोगों का दोनों घरों में आना जाना लगा रहता है।

माँ ने मुझे शाम करीब 5:00 बजे फोन किया। उस वक्त मैं दोनों बच्चों के साथ अपार्टमेंट के नीचे प्ले एरिया में थी। माँ यह जान कर कि हमलोग नीचे हैं, वो भी नीचे आ गयीं। बच्चों से उन्हें बहुत लगाव था। बच्चों को खेलते देखना उन्हें अच्छा लगता था। बच्चों का स्कूल बंद था तो उस दिन काफी समय उन्हें बच्चों के साथ बिताने का मौका मिला।यह उनके लिए बहुत सुखद रहा होगा।

हमारे अपार्टमेंट में स्विमिंग पूल से सटे खुले में शाम को कुछ कुर्सी टेबल लगा दिया जाता है ताकि सीनियर महिलाएं बाहर बैठना चाहें तो बैठ सकें। अक्सर 10-12 आंटी शाम में वहां बैठ कर गपशप करते दिख जाती हैं । 4 जून के शाम भी 8-10 आंटी वहां बैठी थीं । मां भी उन लोगों के बीच थोड़ी देर के लिए बातें करने बैठ गयीं। इस तरह वह समय भी उनका अच्छा बीता।

माँ जब भी शाम में नीचे जाती थीं तो थोड़ा टहल भी लेती थीं। उस दिन भी माँ आंटी लोगों के बीच से उठने के बाद हमारे साथ थोड़ी देर टहलीं। उस दिन संयोगवश हम दोनों ने करीब करीब एक ही रंग का सुट पहना था, जिस पर कई आंटी का ध्यान गया और उन्होंने साथ में फोटो खींचाने का सुझाव दिया पर यह लगा ही नहीं था कि वह उनके साथ हमारा आखिरी दिन होगा। लगा था कि आगे ऐसे कई मौके आते रहेंगे क्योंकि मेरी माँ तो ठीक हो रही थीं। अगर उस दिन फोटो लेते तो हम मां-बेटी का बेतकल्लुफ़ अन्दाज में वह यादगार फोटो होता।

माँ घर लौटना चाह रही थीं मगर बच्चे कुछ देर और खेलना चाहते थे। इसलिए हम बच्चों के साथ प्ले एरिया में रुक गये और माँ घर लौट गयीं।

करीब 7:00 बजे मैं भी श्रीका और आरिश को लेकर अपने घर लौट आयी। आधे घंटे बाद अपने बालकनी में गयी तो एक कैक्टस के पौधे में बहुत सुंदर फूल खिला दिखा। माँ को फूल पौधों का बहुत शौक था। इसलिए मैंने फोन कर के उनको कैक्टस का फूल देखने बुलाया। वो तुरंत पापा को साथ लेकर आईं। फूल देख कर माँ बहुत खुश हुयीं। फूल का कई ऐंगल से फोटो लीं और करीब 8 बजे माँ पापा अपने घर चले गये। घर जा कर माँ अपने बिस्तर पर लेट कर फेसबुक या यूट्यूब पर डालने के लिए मोबाइल पर कुछ लिखने लगीं। लिखना पूरी कर के करीब पौने दस बजे जैसे खड़ी हुईं, ब्रेन हेमरेज हो गया और चीज़ें अवांक्षित दिशा में बहुत तेजी से बदलने लगी।

इस तरह देखें तो सुबह से ब्रेन हेमरेज के पहले तक उनका दिन बहुत अच्छे से बीता था l फूआ नानी के आने के प्रोग्राम और आकाश की बहू को बुलाने के विचार से वे अन्दर से बहुत आनंदित थीं।

उनका स्वास्थ्य पिछले पांच वर्षों में सबसे अधिक सुधरे हालात में लग रहा था। वे सामान्य जिंदगी के बहुत करीब का जीवन जीने लगी थीं। उनकी सोच आगे की ओर देखने लगी थी और कल , परसों या भविष्य में क्या करना है उसकी प्लानिंग भी करते रहती थीं। उन्हें अपनी जिंदगी पर पूरा भरोसा था और वे मौत से बेखौफ थीं । उनकी दो कविताएं --

"मैं मौत से क्यों डरूं, मैं मौत पे सवार हूं " और " ऐ मौत मुझे अब तुमसे डर नहीं लगता " उनकी मनःस्थिति का दर्पण है। उन्हें लिखना अच्छा लगता था और अन्त समय भी वह वही कर रही थीं जो उन्हें अच्छा लगता था।

यह एक संयोग था या नसीब, पता नहीं, लेकिन उस दिन सुबह से शाम तक उनके लिए सुखद स्थिति ही बनती रही, उस एक दुर्घटना को छोड़ कर जिसने उनकी जान ले ली।

- सुहानी

25 August, 2025

पार्ट 4

मेरी मां का जन्म 19, सितंबर 1958 को हुआ था। मेरे नाना 8 भाई बहन थे और मेरी नानी 4 भाई बहन । इन 12 परिवार इकाइयों के बीच मेरी मां अपनी पीढ़ी में जन्म लेने वाली पहली संतान थीं। यानी अपने , चचेरे, फुफेरे,ममेरे , मौसेरे 37 भाई बहनों में सबसे बड़ी। यह स्थिति तब उनको विशेष बना गया था और उन्हें स्वाभाविक रूप से बहुत लाड़ प्यार मिलता रहा था। बाद में उन्होंने अपने कर्मों से वह स्थान ताउम्र बनाए रखा तथा अपने बड़ों का स्नेह और छोटों का सम्मान स्वाभाविक रूप से पाने में सफल रहीं। यह उनका स्वभाव था, व्यक्तित्व था या परिस्थितियों से समायोजन की विशेष क्षमता - इसका आकलन मेरे लिए मुश्किल है। पर जो भी था, उनको बहुतों से अलग कर जाता था।

आज उनका जन्मदिन है। वो जीवित होतीं तो केक काट कर उनके साथ उनका जन्मदिन मना रहे होते। आज जब वो नहीं हैं तो हमलोग उन्हें दिल की गहराई से उनके साथ जिए लहमों को याद कर उस शून्यता को कुछ पल के लिए भूलने की कोशिश कर रहे हैं जो हमारे जीवन में उनके नहीं रहने से पैदा हुई है।

- सुहानी

18 September, 2025

पार्ट 5

मेरी मॉं और उनकी कविताऐं

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मेरी मां एक संवेदनशील,सृजनात्मक व्यक्तित्व की महिला थीं। वह अपने आपको कई विधाओं के माध्यम से अभिव्यक्त करतीं थीं, जिसमें कविता भी एक था।

कविता उन्होंने कभी भी यह सोच कर नहीं लिखा कि इसे प्रकाशित कराना है। उनकी बहुत कम कविताऐं 'पब्लिक डोमेन' में है। सच तो यह है कि उनकी अधिकतर कविताओं की जानकारी मुझे भी नहीं थी।

उनकी कविता उनके लिए जीवन के उतार चढ़ाव में उठने वाले भावनाओं के बवंडर को कलम के रास्ते कागज़ पर उतार कर मन को सुकून देने का एक जरिया था।

कुछ परिजनों एवं मित्रों के अपनी कविताओं को प्रकाशित करवाने के सुझाव से उनका मन इस ओर गया और वे इन्हें पुस्तक के रूप में प्रकाशित कराने का मन बना लीं। प्रारम्भ में तो कमजोर स्वास्थ्य के कारण यह विचार, विचार तक ही रहा, परन्तु जब उनका स्वास्थ्य कुछ ठीक रहने लगा तो वो अपनी कविताओं को प्रकाशन के दृष्टि से संशोधित करने का काम कर रहीं थीं। कुछ छोटी छोटी नयी कविताऐं भी लिख रहीं थीं, जिनका नाम उन्होंने दिया था 'क्षणिकायें'। लेकिन अचानक उनकी मौत से यह काम रुक गया ।

अब हमलोग उनकी काब्य संग्रह प्रकाशित करवाने के लिए उन कविताओं को एक जगह व्यवस्थित रूप से संयोजित कर रहे हैं। उनकी कुछ कविताऐं तो उनके फेसबुक के वाॅल पर उपलब्ध है और कुछ , उनकी कविताओं वाली फाइल में मिली। अब तक 120 से अधिक कविताऐं हमलोग सूचीबद्ध कर चुके हैं और अब उनके नज़र से देखने की कोशिश कर रहे हैं कि अगर वो जीवित होतीं तो अपनी किन-किन कविताओं को अपने प्रकाशित काव्य-संग्रह में शामिल करना चाहतीं । यह काम कठीन है ; क्योंकि न तो उनकी जैसी दृष्टि हमलोगों के पास है, न उन भावनात्मक सोंच की वैसी समझ जिसने इन कविताओं को जन्म दिया होगा । फिर भी चुॅंकि उनकी इच्छा थी कि उनका कविता संग्रह प्रकाशित हो तो अब हमलोगों का यह परम कर्तव्य है कि उनके अधूरे काम को पूरा करें। मैं और मेरा भाई सहर्ष इसे पूरा करने में लगे हैं।

सहर्ष उनका एक वेबसाइट भी बना रहा है जिसमें उनकी कविताऐं, लेख, यात्रा वृत्तांत, यूट्यूब पर डाले गए पकवान का विडियो तथा उनके बारे में औरौं की टिप्पणी एवं विचार शामिल होगा। यह वेबसाइट अगले दस-पंद्रह दिनों में एक्टिव हो जायेगा।

सम्भवतः इस वर्ष के अन्त तक उनका काव्य-संग्रह भी पुस्तक के रूप में आपके सामने होगा।

उनकी कविताओं का फलक विस्तार काफी अधिक है। उन्होंने जीवन के कई संवेदनशील पहलुओं को अपनी रचनाओं में छुआ है । इसमें रिश्ते की गहराई से मृत्यु के यथार्थ, विपरीत परिस्थितियों से संघर्ष का संकल्प, प्रकृति प्रेम से समन्दर और पहाड़ों से संवाद, गरीबी, वेवशी, उत्पीड़न, लाचारी को रेखांकित करतीं कविताऐं भी , महुआ चुनतीं अबोध बाला के माध्यम से उत्पीड़न की मानसिकता की ओर इशारा , तो टुटते पारिवारिक सामाजिक व्यवस्था का दर्द भी उनकी कई कविताओं में परिलक्षित है।

ज़िन्दगी को उन्होंने जैसा देखा, जैसा महसूस किया , वैसा लिख गयीं। सरल भाषा , सहज शैली और विषय आम जिंदगी से । यही उनकी लेखनी का मर्म है। उन्होंने कई कविताओं में तो सीधे अपनी बात कहीं हैं और कई में इशारों में बहुत कुछ कह गयी हैं जो पढ़ने में तो सीधा सपाट लगता है पर अन्तर्तनीहित भाव गहरा है। उनकी कई कविताऐं व्यक्तिगत हैं और यह स्वाभाविक ही था क्योंकि

वो एक पारिवारिक व्यक्ति थीं और रिश्ते उनके लिए बहुत मायने रखता था। जब वो लिखती हैं :

'' मैं मौत से क्यों डरूं मैं मौत पे सवार हूं, कर रही मैं मौत से रोज़ आर-पार हूं, परिजन मेरे कवच-कुंडल, मैं परिजनों पे निसार हूं " तो यह उनके परिवार रुपी संस्था और उसकी असीम शक्ति में गहरे विश्वास को दर्शाता है।

उनकी एक कविता है 'साथ साथ'। इस कविता को पढ़ कर दो बातें बहुत प्रमुखता से ज़हन में आती है।

पहला यह कि उन्हें यकीन था कि वो इस दुनिया से मेरे पिता से पहले जायेंगी और दुसरा कि वो इस संसार से जाने बाद भी उनके आसपास, उनके साथ साथ रहेंगी। यह कविता, कविता से अधिक मेरे पिता के लिए एक पत्र, मृत्यु उपरांत भी साथ नहीं छोड़ने का एक आश्वासन है।

'साथ -साथ' कविता में उन्होंने क्या कहा है और कैसे कहा यह जानने की आपकी जिज्ञासा हो सकती है, इसलिए वह कविता मैं यहां उद्धृत कर रही हूॅं।

- सुहानी

28 October, 2025

साथ साथ

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जब कभी अकेला महसूस करो

पाओगे मुझे अपने आस पास ,

हवा की सरसराहट हो कर

लिपटी रहूंगी तुम्हारे चारो ओर

हरसिंगार की खुशबू बन हम

महका करेंगे साथ साथ ,

जब कभी किसी बात से

दुखी होगे तुम

सर उठा कर देखना

चिड़ियों के कलरव में

मेरी हंसी सुनाई देगी तुम्हें

एक दूजे का हाथ थामे

हम मिल कर हंसेंगे साथ साथ ,

ज़िंदगी की मुश्किलों से

जोड़ तोड़ बिठाते

जब कभी सर पर कड़ी धूप महसूस करो

तब अपने उपर का आसमान देखना

मैं वहीं किसी कोने में

एक टुकड़ा बादल बन कर

मिलूंगी तुम्हें बारिशों में

हम मिल कर भीगेंगें साथ साथ ,

जब कभी मेरी कमी महसूस करो

किसी नदी के किनारे

खड़े हो कर आवाज़ लगाना

उसकी लहरों के शोर में

सुनोगे तुम मेरी भी आवाज़

हम साथ साथ गुनगुनाएंगे

फ़िज़ा में गूंजेंगे हमारे अफ़साने

हम साथ मिल कर

नई इबारतें लिख जाएंगे !!

-- माला सिन्हा

पार्ट 6

मेरी मॉं मेरी स्मृति में

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मेरी माँ मेरी स्मृति में हर रोज़ हैं और उनके व्यक्तित्व का कोई ना कोई पहलू मेरी नजर के सामने किसी चित्रपट की तरह गुज़रता ही रेहता है।

आज जब उनके घर गई और उनके रसोई को खाली पड़ा देखा तो उनके बनाए पकवानों की याद ताज़ी हो गई।

मेरी माँ को खाना बनाना सिर्फ़ पसंद नहीं था, वह उनके व्यक्तित्व का एक हिस्सा था। यह उनका प्यार जताने का सबसे ख़ास तरीका था। हमारे लिए बनाया गया हर भोजन उनके स्नेह, उनकी देखभाल और उनकी उपस्थिति का विस्तार होता था। जब हम उनके हाथ का बना खाना चाव से खाते थे, तो उनके चेहरे पर जो संतोष और खुशी झलकती थी, वही उनकी सबसे बड़ी प्रशंसा होती थी।

उनकी वजह से घर हमेशा जीवंत लगता था। रसोई से उठती मसालों और ताज़े पकवानों की खुशबू पूरे घर में फैल जाती थी, जैसे हर कोना उनके प्रेम से भर गया हो।

उन्हें मेन्यू सोचने में, नई रेसिपियों पर प्रयोग करने में और अपने बनाए व्यंजनों की तस्वीरें संजोने में अपार आनंद मिलता था।

बीमारी और इलाज के लंबे, थकाऊ और कठिन दिनों में भी यही जुनून उन्हें ऊर्जा देता रहा। जब बहुत कुछ उनसे छिन रहा था, तब भी यह एक चीज़ थी जो उन्हें अपने आप से जोड़े रखती थी।

आज उस रसोई में उनके हाथों की वह जादुई महक बिखरे हुए पूरे एक साल हो गया है।

2025, आज के ही दिन —उन्होंने आख़िरी बार खाना बनाया था। आख़िरी बार मुझसे बात की थी। आख़िरी बार मेरे साथ चली थीं। आख़िरी बार मेरे सिर पर प्यार से हाथ फेरा था। आख़िरी बार मेरा हाथ थामा था।

तब मुझे नहीं पता था कि साधारण-से लगने वाले वे पल मेरी स्मृतियों के सबसे अनमोल ख़ज़ाने बन जाएंगे।

एक साल बीत गया है।

समय आगे बढ़ गया है, मौसम बदल गए हैं, जीवन अपनी रफ़्तार से चलता रहा है। लेकिन कुछ खालीपन ऐसे होते हैं जिन्हें समय भर नहीं पाता। उनकी रसोई आज भी वहीं है, बर्तन भी वहीं हैं, रेसिपियाँ भी सुरक्षित हैं—बस वह नहीं हैं, जिनकी मौजूदगी से यह सब अर्थ पाता था।

और फिर भी, कभी-कभी किसी परिचित खुशबू के झोंके में, किसी पुराने व्यंजन के स्वाद में, या किसी भूली-बिसरी रेसिपी के पन्नों में, मुझे लगता है कि माँ अभी भी यहीं कहीं हैं — अपने उसी प्यार के साथ, जिसे उन्होंने हर भोजन में हमारे लिए परोसा था।

- सुहानी

04 June, 2026