अपने जीवन में माला सिन्हा ने कई देशों की यात्राएं की जिसमें नेपाल से अमेरिका तक शामिल है । उन्होंने अपने फेसबुक पर इन यात्राओं में से तीन यात्रा का संस्मरण पोस्ट किया थाl वेबसाइट का यह भाग उन्हीं तीन यात्रा वर्णन को समर्पित है।

यायावरी - अमेरिका

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यूँ तो तकनीकी क्रांति के कारण दुनियां वैसे ही बहुत छोटी हो गई है, बाकी रही सही कसर गूगल एवं यू-ट्यूब ने पूरी कर दी है । एक कहावत पचास वर्ष पहले जो चलती थी "दिल्ली दूर है" का अब कोई महत्व ही नहीं रहा।दुनिया के किसी भी कोने में घटी घटनाएँ हों, या किसी भी तरह की कोई जानकारी चाहिए, तो वह इंटरनेट के माध्यम से मिनटों में उपलब्ध है । फिर भी सुनने में या प्रत्यक्ष देख कर उसे महसूस करने में ,फर्क तो पड़ता ही है।इसी संदर्भ में अपनी अमेरिकी यात्रा के अनुभव साझा करने की मेरी एक कोशिश.....

हमने अमेरिका के लिए अपनी यात्रा शुरू की थी, बैंगलोर से 10 अप्रैल 2017 को।सहर्ष, मेरा बेटा पांच सालों से वहां औरेगौन राज्य के पोर्टलैंड शहर में था और अब तक परिस्थितियां ऐसी रहीं कि हम वहां नहीं जा पाए थे; हालांकि, अब वह पिछले छः महीने से कैलिफोर्निया आ गया है। लेकिन मै पिछले साल की बात कर रही हूं, जब वह वहां पर था। पोर्टलैंड बहुत पुराना शहर है जहां नवंबर महीने से अप्रैल तक बर्फ पड़ती है, बाकी के दिनों में यहां बारिश भी खूब होती है जिस कारण काफी ठंड रहती है।आखिरकार उसके बहुत आग्रह पर हमने अपना कार्यक्रम बना लिया। सुहानी छुट्टी पर ही थी कि उसने अपनी छुट्टियां बढ़ा ली, एवं पांच महीने की श्रीका को लेकर हम अमेरिका के लिए रवाना हुए। औरेगौन राज्य का पोर्टलैंड शहर,उत्तरी अमेरिका में पड़ता है।रास्ते में दो जगह हमें फिर फ्लाइट बदलनी थी। हमारा पहला पड़ाव लंदन का हीथ्रो एयरपोर्ट था जहां हमने आगे के लिए अपनी फ्लाइट बदली एवं दूसरा पड़ाव अमेरिका का सैनफ्रान्सिसको शहर था जहाँ से हम फिर फ्लाइट बदलना था। सैनफ्रान्सिसको एयरपोर्ट पर हमें अपना लगेज लेना था एवं अगली यात्रा के लिए उसे दूसरे एयरलाइंस के काउंटर पर जमा करना था ,वह इसलिए कि अभी तक हमने जिन दो उड़ानों से यात्रा की थी वह इंटरनेशनल एयरलाइंस की थी और अब डोमेस्टिक फ्लाइट से आगे जाना था। विमान में वहां का लोकल समय बताया गया, जिसके अनुसार हमने अपनी घड़ियों में समय मिला लिया था। खैर विमान से उतरने के बाद हम लगेज बेल्ट के पास अपने सामान आने का इंतजार करते रहे...यात्री एक एक कर अपना सामान उठा निकलते रहे, किंतु हमारा सामान बेल्ट पर नहीं पहुंचा। हमनें वहां पर रिकार्ड चेक करवाया।आखिरकार, बहुत इंतजार एवं पूछताछ के बाद पता चला कि हमारा सामान सैनफ्रासिसको एयरपोर्ट पर उतरा ही नहीं है।अंत में आगे की घरेलू उड़ान का समय बिल्कुल हो गया तो एयरपोर्ट के अधिकारियों के लिखित आश्वासन पर, कि सामान का पता लगा कर अगली उड़ान से पोर्टलैंड भेज दिया जाएगा, हम ने केबिन में लाए गए सामान के साथ अपनी आगे की यात्रा शुरू की। करीब तीन घंटे के बाद विमान पोर्टलैंड पहुंचा।

25-26 घंटे का सफर बिना किसी परेशानी के अच्छी तरह बीत गया, जिसमें सब से ज्यादा सकारात्मक बात यह रही कि पूरी यात्रा के दौरान श्रीका, जिसके लिए हम काफी डरे हुए थे कि इस नन्ही सी जान को इस लंबी हवाई यात्रा में कोई तकलीफ न होने पाए, उसने एवं विमानकर्मियों ने काफी सहयोग किया। जहां और भी छोटे बच्चे जो उस यात्रा में थे ,उन्हें हवा का दबाव घटने- बढ़ने से काफी परेशानी हो रही थी जिस कारण वे बहुत रो रहे थे, हमें यह एहसास नहीं हुआ कि हम इस छोटी जान के संग यात्रा पर हैं....हालाँकि श्रीका की यह पहली हवाई यात्रा नहीं थी, इस से पहले वह पटना एवं मुंबई घूम आई थी।

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हम पोर्टलैंड जब पहुंचे तो वहां के समय से रात के दो बज रहे थे। अमेरिका में ट्रैफिक के नियम कानून बहुत सख्त है, खास कर छोटे बच्चों की सुरक्षा को लेकर तो नियम कानून इतने कड़े हैं कि एक शिकायत पर माता- पिता तक को जेल हो सकती है। आठ साल से छोटे बच्चों को "कार-सीट" के बिना आप गाड़ी में नहीं बैठा सकते हैं। ऐसा नहीं होने से आपको कानूनी कार्रवाई से गुजरना पड़ सकता है।हमारे पास तो चार लोगों के लिए साथ में, हांथ का सामान जितना था, उसके लिए सहर्ष की स्पोर्ट्स कार में जाने का प्रश्न ही नहीं था, अतः एक नयी कार-सीट जो उसने बुक कर पहले ही मंगवा कर रखा था उसको साथ ले कर किराये की बड़ी गाड़ी लेकर आया था।

गाड़ी में सामान रख कर लदे फदे हम एयरपोर्ट से बाहर निकले। बेटे का अपार्टमेंट,एक पाॅश इलाका , डाउन टाउन में, पोर्टलैंड युनिवर्सिटी एरिया में था। घर पहुंचने पर रात होने के कारण ज्यादा कुछ तो समझ में नहीं आया किंतु अपार्टमेंट का रख रखाव देख कर खुशी हुई। हम ऊपर पहुंचे...फ्लैट भी साफ सुथरा सजा संवारा मिला। हमारा प्रवास वहां तीन महीने का था ।

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हमारे कुछ रिश्तेदार वहां अलग अलग क्षेत्रों में

बसे हुए हैं, और चुकि यह हमारी अमेरिका की पहली यात्रा थी अतः सभी लोगों के आग्रह पर, सभी के यहां घुमाने का कार्यक्रम उनके साथ मिल कर बेटे ने बना लिया था।

कार्यक्रम थोड़ा पेचीदा लग रहा था, क्योंकि कुछ लोग उत्तरी अमेरिका में थे, तो कुछ दक्षिण अमेरिका में, न्यूयॉर्क की तरफ।.हालाँकि इन दोनो कार्यक्रम के दौरान एक महीने का अंतराल था...।फिर भी पूरे प्लान की स्पष्टता नहीं समझ पाने के कारण कुछ लोगों से मिलना नहीं हो पाया, क्योंकि जगह की समझ नहीं होने के कारण, मुझे नहीं पता चल रहा था कि कब कहाँ रहना है।

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खैर यह तो आगे होने वाली बात थी। फिलहाल, तो हम पोर्टलैंड की बात करते हैं। घर पहुंच कर अगली सुबह हमें सामान पहुंचने की उम्मीद जो थी, वह पूरे दिन नहीं पहुंचा। वह दिन किसी तरह बीता। हम अगली सुबह पूरे दिन सामान का पता लगाने की कोशिश फोन के जरिए करते रहे। लेकिन एयरपोर्ट के अधिकारी कुछ भी बता पाने में असमर्थ थे, दरअसल हम जिस तीसरी फ्लाइट की एयरलाइंस से पोर्टलैंड पहुंचे थे, उसके रिकार्ड में हमारा सामान कहीं दर्ज ही नहीं हुआ था, और ना ही ब्रिटिश एयरवेज, जिससे हमने भारत से सैनफ्रान्सिसको तक यात्रा की थी, उसके अधिकारी कुछ बता पा रहे थे। खासी परेशानी हो रही थी हमें सामान के बिना, खैरियत यही थी कि श्रीका का सब सामान साथ में हम ले कर चले थे। यह भी चिंता थी कि, आखिर सामान गया कहां ? यह दूसरा दिन था। खैर शाम होने पर सहर्ष ऑफिस से लौटा तो हम उसके साथ जा कर जरूरत की कुछ चीजें खरीद लाए।तीसरे दिन हमें मेल आया कि हमारा सामान डेल्टा के लगेज गोदाम में पड़ा था, जो आज किसी समय पहुंच जाएगा। खबर पा कर ही हम निश्चित हुए और हमारी चिंता थोड़ी कम हुई।

पोर्टलैंड को " सिटी आफ रोज़ेज़ " अर्थात गुलाबों का शहर कहा जाता है। औरेगौन राज्य का यह शहर निहायत ही खूबसूरत शहरों में एक है या यूं कहें कि यह अमेरिका का छोटा सा स्विट्जरलैंड भी कहा जाता है। यहां की जीवन शैली काफी सुसंस्कृत है। अमेरिका के उत्तरी-पश्चिमी क्षेत्र में स्थित होने के साथ ही, यह कोलंबिया नदी के किनारे बसा हुआ है। यहां पहले कभी पोर्ट हुआ करता था, जिस कारण इसका नाम पोर्टलैंड पड़ा। कोलंबिया नदी के उपर पूरे शहर में इतने ज्यादा पुल हैं ,कि इसे ब्रिजटाऊन भी कहा जाता है। चारो तरफ "कैसकेड" पर्वत श्रृंखलाओं से घिरा यह शहर, स्वच्छता की मिसाल है।

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बेटे का घर "पोर्टलैंड स्टेट युनिवर्सिटी" एरिया में था जिस कारण वहां दुनिया के अन्य हिस्सों से आए विद्यार्थीयों की काफी चहल पहल रहती थी। चारो ओर उंची उंची अलग अलग संकायों की इमारतें, साफ सुथरे छात्रावासों का परिसर, मन को मोहते थे। सड़क की एक तरफ विश्वविद्यालय की इमारतें थी, तो दूसरी ओर रिहायशी इमारतें, जिनकी देख रेख एवं संचालन, निजी कंपनियों के द्वारा किया जाता है। ये सारी इमारतें थीं तो डेढ़-दो सौ साल पुरानी, क्योंकि इनके मुख्य द्वार के ऊपर ही उनके निर्माण का साल खुदा होता था, लेकिन इनका रख रखाव ऐसा था कि लगता था, जैसे अभी अभी इन्हें बनाया गया हो। बड़े बड़े लाल पत्थरों को जोड़ कर खड़ी की गई दिवारें, स्थापत्य कला की बानगी लगती थी। यहां के लोग बहुत सफाई पसंद , सुसंस्कृत , एवं खाने पीने के बहुत शौकीन दिखे।

आमतौर पर सप्ताह के पांच दिनों की हमारी रोज की दिनचर्या सामान्य ही होती। सहर्ष के आफिस जाने के बाद मैं और सुहानी श्रीका को लेकर घर के आस पास के इलाकों में पैदल ही घूमते। आस पास में बहुत से शापिंग मॉल, चर्च, थे।माॅल में हम विंडो शॉपिंग करते श्रीका के लिए कार-सीट के अलावा एक प्रैम (बच्चा गाड़ी) भी सुहानी ने चुकि पहले ही वहां आनलाइन आर्डर कर के मंगवा लिया था इसलिये हमें पैदल घूमने में वहां सुविधा होती थी। हमारे फ्लैट से करीब आठ सौ मीटर की दूरी पर कोलंबिया नदी बहती थी।जिसके किनारे किनारे दूर तक पार्क बना हुआ था। जहां अक्सर हम लोग चले जाते ,और घंटो धूप में बेंच पर बैठ कर नदी में घूम रही फेरियों एवं क्रूज देखा करते। क्रूज के द्वारा कोलंबिया नदी में शहर की सैर कराई जाती, जिसका टिकट खरीदना होता।

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क्रमशः

माला सिन्हा

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16.4.2017

अगले शनिवार को हम टुलिप फेस्टिवल देखने चल पड़े ...,टुलिप फूलों का मौसम खत्म ही होने को था, अतः हमारा पहला प्लान वही का बना।हमारे घर से दो घंटे की ड्राइव थी । शहर से बाहर निकलने पर रास्ते में सड़क के दोनों ओर दूर दूर तक फैले हुए हरे भरे खेतों के बीच से गुजरना...लकड़ी के बने हुए सुंदर घरों का छोटे छोटे समूह, घरौंदे की तरह दिखाई दे रहे थे, बहुत करीने से व्यवस्थित, फूलों की क्यारियों से सजी फुलवारी , खेती करने के लिए जरूरी हर तरह की मशीनें, एवं जल विहार के लिए एक-दो नावें, एकाध ट्रक एवं कारों का होना उन गांवों की संपन्नता का संकेत दे रहीं थीं।

एक बात पर हमारा ध्यान खास करके गया, कि हर घर के सामने अमेरिका का राष्ट्रीय ध्वज लगा हुआ था, जो उनके राष्ट्रीय प्रेम का परिचायक था....यह सब देखकर आनंद की अनुभूति होती रही।पूरे रास्ते हमें ऐसे ही दृश्य देखने को मिले।अंत में हम अपनी मंजिल तक पहुंच गए।खुली वादियों के बीच पहुंच कर हमने एक जगह गाड़ी रोकी जहां से टिकट खरीद कर आगे हम आगे बढ़े.....बहुत सारे कर्मचारी भीड़ को नियंत्रित कर रहे थे ....पूरी व्यवस्था इतनी अच्छी तरह अनुशासित थी, कि भीड़ होने के बावजूद वातावरण में शांति थी।आगे बढ़ने पर दूर से ही टुलिप के फूलों की कतारें रंगीन गलीचे का आभास देती दिखाई दे रही थी....मन ताजगी से भर उठा...।यह टुलिप की खेती वहां का एक परिवार कई पीढ़ियों से करता चला आ रहा है, जिसकी देख भाल इतने वृहद पैमाने पर की जाती है कि सैलानियों के आकर्षण का केंद्र एवं, उस परिवार के लिए अच्छी खासी आमदनी का जरिया बन चुका है।

वहीं से दूर कैसकेड पर्वत श्रृंखला की, ओरेगन में सब से ऊंची चोटी "माउंट हुड" बर्फ से ढकी दिखाई दे रही थी, दोपहर का समय था, जिस कारण धूप पड़ने से माउंट हुड सोने की तरह चमक रहा था।अप्रैल महीना आधा बीत चुका था एवं पहाड़ों पर जमी बर्फ पिघलने लगी थी अतः अगले हफ्ते हमारा माउंट हुड घूमने का प्लान बना।माउंट हुड की चोटी शहर से करीब सौ माईल दूर होने के बावजूद किसी भी हिस्से से , मौसम साफ होने पर दूर से ही चमकती दिखाई दे जाती थी।

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पोर्टलैंड में बेरी फलों की खेती बहुतायत में होती है।जहां से हर तरह की बेरी की बेहतरीन किस्में, ब्लैक बेरी, स्ट्रॉबेरी, ब्लू बेरी, रास्पबेरी बाहर एक्सपोर्ट की जाती हैं। वहां खेतों में जा कर अपने हाथों बेरी तोड़ने का आनंद ही कुछ और है। टुलिप फेस्टिवल से लौटते हुए हमें बेरी के बाग मिले। दिन का उजाला था ही अतः हमनें उसका फायदा उठा कर वहां पर रूकना मुनासिब समझा । वैसे भी औरेगौन में सूर्यास्त देर से होता है, रात नौ बजे तक भी आसमान में उजाला रहता है।वहां से घर पहुंचते रात हो चुकी थी।आने वाले दिनों में सब कुछ वैसे ही सामान्य रहा।हम दिन में घूमते और शाम में सहर्ष के आफिस से लौटने पर माॅल जा कर खरीदारी करते या जरूरत के मुताबिक, भारतीय स्टोर से कुछ छोटी मोटी चीजें खरीदते।

22.4.2017

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देखते देखते हफ्ता बीता और हम शनिवार की सुबह दस बजे को लंच पैक कर के माउंट हुड के लिए, घर से निकले।

करीब चार घंटे की ड्राइव का रास्ता था....मौसम बहुत सुहावना...वहां की सपाट सड़कों पर मीलों मील चले जाने के बावजूद हमें थकान बिल्कुल महसूस नहीं होती थी...इसका एक महत्वपूर्ण कारण वहां की अनुशासित ड्राईविंग है.....क्या मजाल किसी की, कि ट्रैफिक के नियमों के रत्ती भर भी खिलाफ चले। अमूमन तो ऐसा होता नहीं है, .और अंजाने में अगर किसी से ऐसी गलती हो भी गई तो वह, वहां के सर्किट कैमरों में रिकॉर्ड हो कर पुलिस की नज़रों में आ जाता है।फिर चालान कटना तो निश्चितहै।

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अलग अलग वाहनों के मुताबिक, यहां तक कि पैदल चलने वालों एवं साइकिल चलाने वालों के लिए भी अलग अलग चार पांच लेन वाली सड़कें हैं,एवं हर लेन की अपनी गति सीमा निर्धारित है, गाड़ी की रफ्तार, तय मानक से जरा भी कम या ज्यादा हुई तो रिमाइंडर बजने लगता है जो चालक को चौकन्ना करने के लिए काफी है, जिस कारण न तो कहीं जाम लगता है, और ना ही कोई किसी को जबरन ओवरटेक कर सकता है।

पैदल चलने वालों को इतनी अहमियत दी जाती है, कि जहां ट्रैफिक सिग्नल नहीं है वहां सड़क पार करने के लिए, वे रूक कर गाड़ियों के गुजर जाने का इंतजार नहीं करते, बल्कि चल रही गाड़ियां रूक जाती हैं उन्हें सड़क पार कराने के लिए।यह बात शुरू में मुझे हजम नहीं हो रही थी...क्यों कि यहां सड़कों पर ट्रैफिक की जो हालत है वह सब को पता है....लेकिन धीरे धीरे मैं इन बातों की आदी हो गई।

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विकलांग या शारीरिक रूप से असमर्थ बुजुर्गो के लिए सरकार की तरफ से मिलने वाली सुविधाएं इस कदर हैं कि वे अपने परिवार से अलग रह कर भी बिना किसी सहारे के अपनी जिंदगी आत्मसम्मान के साथ जी लेते हैं।सरकारी भत्ता के अलावा शापिंग मॉल, मेट्रो रेलवे ,होटल, या किसी सार्वजनिक स्थानों ,पर घूमने या अपना काम खुद करने के लिए उन्हें मोटराइज्ड स्वचालित व्हील चेयर की सुविधा मुहैया कराई जाती है। यह सब सुविधाएं देख देख कर मुझे अपने देश के बेसहारा बुजुर्गों की याद आती रहती। भले ही वहां पर इनके लिए पारिवारिक स्थिति कमजोर हो, किंतु सरकारी मदद से ये सम्मान पूर्वक अपना जीवन जीते हैं। मन ही मन मैं दोनों देशों की कमी एवं खूबियों को तौलती रहती। सड़क पर जरा सी गंदगी का नामोनिशान नहीं था, लोग कुत्ते बिल्लियाँ पालने के इतने शौकीन हैं कि हर तीसरा व्यक्ति अपने पालतू जानवर के साथ दिखाई देगा, लेकिन कहीं इनकी गंदगी सड़क पर नहीं दिखती कारण कि वे स्वयं इसे साफ कर, कचरे के डिब्बे में डाल देते....तब मुझे अपने देश का "स्वच्छता अभियान" याद आता। हां वहां किसी को भी, रास्ते में या कहीं भी घूर कर देखना बहुत बुरा मानते हैं, ऐसा होने पर आपको टोका भी जा सकता है, जिसके लिए ख़ास ताकीद थी बेटे से, अतः कुछ भी हो, दुबारा किसी को देखने से रोक लेती जबरन, खुद को.....गलती से नज़र उठ भी गई अगर, तो बेटा तुरंत फुसफुसा कर मना करता 'मम्मी उधर मत देखो' । लेकिन आमने सामने पड़ जाने से वे मुस्कुरा कर अभिवादन जरूर करेंगे। कभी वहां के जीवन मूल्यों की तुलना अपने देश से करती तो बहुत ज्यादा अंतर दिखाई देता । वहां पर तलाक दर अधिक है...बच्चों की सामाजिक स्थिति अत्यंत महत्वपूर्ण है।

हम माउंट हुड की बात कर रहे थे....जहाँ के रास्ते में हमें दूर दूर तक बर्फ ही बर्फ बिछी मिली, सीजन खतम होने को था बर्फ पिघलने लगी थी, इसलिए कई जगहों पर स्कीइंग सेंटर बंद हो चुका था। सहर्ष वहां पहले भी दो तीन बार आ चुका था, उसने बताया कि बताया कि सीजन में यहां कार पार्किंग नहीं मिलती है।हमने गाड़ी माउंट हुड के नीचे बिल्कुल पास में रोकी।वहां इक्का दुक्का सैलानियों की गाड़ियां लगी थी।वहां पर स्कीइंग सेंटर खुला हुआ था, जहां कुछ बच्चे कर रहे थे लेकिन वैसे कोई ज्यादा भीड़ भाड़ नहीं थी।उपर जहां तक नजर जा रही थी बर्फ से ढकी माउंट हुड की चोटी का थोड़ा सा हिस्सा दिखाई दे रहा था ।यह अमेरिका की दुसरी सब से ऊंची पर्वतीय चोटी औरेगौन राज्य में है, जो समुद्र की सतह से 11250 , फीट की ऊंचाई पर है । जहाँ हम हम 4500 फीट की ऊंचाई तक गए ।चोटी तक जाने के कई रास्ते हैं, वहां औरेगौन वन बिभाग की देख रेख में पर्वतारोहण भी होता है। उपर देखने पर जहां तक, जिस उंचाई तक नजर जाती थी, बर्फ ही बर्फ दिख रही थी ।

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कुछ समय वहां बिता कर हमने वापसी का रूख किया।शाम के चार बज रहे थे.... कुछ आगे बढ़ने पर हमें वहां से माउंट हुड बिल्कुल स्पष्ट दिखाई देने लगा....हमने गाड़ी रोक कर वहां की खूबसूरती को कैमरे में कैद किया...नजरें भर कर उस अद्भुत नजारे को निहारा......सूर्य देव चोटी के पीछे जा चुके थे ..... बर्फ से ढकी चोटी के पीछे से सूरज की किरणें छन कर आ रही थी ,जिनके प्रभाव में माउंट हुड, स्वर्ण पर्वत की तरह चमक रहा था....वे सुनहरी किरणें चोटी से ही फूटती प्रतीत हो रहीं थीं, वैसे तो हमारा दिशा ज्ञान काम करना बंद कर चुका था, लेकिन हमनें अनुमान लगाया कि कुछ समय बाद सूर्यास्त होगा, तो उधर ही पूरब होना चाहिए।वहां से हमें निकलने की इच्छा नहीं हो रही थी, लेकिन शाम होने को थी, और हमें मीलों दूर तक बर्फ से ढके रास्ते पर घंटो जाना था अतः हमने माउंट हुड को अलविदा कहा, और आगे चल पड़े।रास्ते में लौटते हुए एक पैनोरमा पॉइंट पर गाड़ी रोकी, जहां से माउंट हुड का पूरा क्षेत्र, कैसकेड पर्वत श्रृंखलाओं के साथ अपनी सुंदरता बिखेरे, मुस्कुराता हुआ महसूस हुआ।प्रकृति की इस कारीगरी को देख हम मुग्ध हुए जा रहे थे।वहां से निकल कर ढलान वाले रास्ते पर हमारी गाड़ी आगे बढ़ी।

पर्वत श्रृंखलाओं एवं बर्फ से ढके जंगलो के बीच से गुजरना रोमांचकारी लग रहा था....जैसे जैसे हम नीचे की तरफ उतरने लगे, जंगलो से पिघलती हुई बर्फ देखने को मिली, आगे बढ़ने के साथ ही बर्फ दिखना कम होता गया।अंत में हम उन इलाकों से निकल कर सीधे कोलंबिया रिवर हाईवे पर चलने लगे जहां सड़क के बायीं ओर उंचे ऊंचे पहाड़, तो दायीं तरफ कोलंबिया नदी बह रही थी.....नदी के बाद ही घने जंगल दिख रहे थे।बीच में सड़क पर हम चले जा रहे थे.... सड़क से सटी हुई रेलवे लाइन थी, जिससे मालगाड़ी को हमने गुजरते देखा...सारे घटनाक्रम कुल मिलाकर एक कुछ अनुपम दृश्य प्रस्तुत कर रहे थे।

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सूर्यास्त होने को था,आसमान अपनी लालिमा एवं रंगो की छटा बिखेरने की तैयारी में था.... अंधेरा होने से पहले मेरा हिंदुस्तानी मन उस इलाके से निकल जाना चाहता था...गाडि़यों की आवाजाही चल रही थी....सहर्ष बिल्कुल निश्चित हो कर गाड़ी चला रहा था । वह पहले भी कई बार हजारों मील की ड्राइविंग कर चुका था, इसलिए उसे शाम या रात होने से कोई ज्यादा फर्क नहीं पड़ता था । अभी तक श्रीका भी सहयोग करती रही थी, लेकिन हमें उसकी चिंता थी कि पूरे दिन की परेशानी के बाद उसे जल्द बिस्तर का आराम मिलना चाहिए।यहीं रास्ते में मल्टीनोमाह फाॅल था,जो सड़क से दिखाई दे रहा था, जहां हमें अगले सप्ताहांत में आना था।

रास्ते में सूर्यास्त हो गया..सूर्यास्त का दृश्य हमेशा ही मेरे लिए एक आकर्षण रहा है.....किंतु ऐसा रंगीन सूर्यास्त, वह भी साक्षात् अपनी आंखों से शायद पहली बार मैं देख रही थी......पहाड़ एवं जंगल के बीच नदी में डूबते सूरज की छटा....किसी चित्रकार की उत्कृष्ट तैलचित्र की याद दिला रहे थे।जी तो चाह रहा था कि रास्ते में थोड़ी देर रूक जाऊँ, किंतु घर पहुंचना ज्यादा जरूरी था ,सो मन को समझा लिया । शहर आते आते सड़कों पर चहल पहल बढ़ी, एवं हमें डाऊन टाउन की ऊंची उंची इमारतें नजर आने लगी ।आगे हम उस रास्ते पर हो लिए, जो हमारे घर को जाता था।

क्रम  2

क्रमशः

माला सिन्हा

क्रम 3

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अगली सुबह रविवार को हम लोग थोड़े आराम के मूड में थे, अतः कहीं दूर घूमने जाने का सहर्ष का प्रस्ताव आगे कभी के लिए टाल दिया, एवं उसका आफिस देखने चल पड़े, जो वहां से बीस बाईस मील की दूरी पर था। "इनटेल यू एस कारपोरेशन" का मुख्य आफिस पोर्टलैंड में ही है, जहां का लंबा चौड़ा विस्तृत परिसर देख कर खुशी हुई।पोर्टलैंड की आबादी, अमेरिका के अन्य बड़े शहरों की तुलना में उन्नीसवें नंबर पर है, उस ख्याल से देखा जाए तो खुली खुली सी वादियों के बीच उंची नीची, सपाट सड़कें...सड़क के दोनों ओर ऊंचे ऊंचे ,लंबे लंबे पेड़ों की कतारें, बर्फ पिघलने के बाद जिन पर अब छोटी छोटी पत्तियां आनी शुरू हो गई थीं....रंग बिरंगे फूलों से लदे हुए पेड़ पौधे, नजरों को बरबस खींच लेते थे....जैसे अचानक ही बसंत,पोर्टलैंड के आंगन में उतर आया हो....उपर खुले आसमान में तैरते बादलों की बारात ......कुल मिलाकर कर खुशनुमा समां बांधते।

30.4.2017

यह हमारा तीसरा हफ्ता बीत रहा था और शनिवार आते ही हम पुनः हम उन्हीं रास्तों पर चल पड़े, जो हमें मल्टीनोमाह फाॅल पहुंचाता...जिसकी एक झलक भर हमने पिछले हफ्ते माउंट हुड से लौटते हुए देखी थी।यह अमेरिका का दुसरा सबसे ऊंचा "वाटर फाॅल" है, जहां पानी कैसकेड की चोटियों के ऊपर 620 फीट की ऊंचाई से झरने के रूप में गिरता है, एवं जिसे औरेगौन के सात आश्चर्यजनक दर्शनीय स्थलों में एक माना जाता है।

इतना वृहद जलप्रपात ...,जहां उपर तक जाने का कच्चा रास्ता बना हुआ था, लोग आ जा रहे थे । ऊपर झरने की आधी उंचाई पर दो पहाड़ों के बीच से जहां से पानी गिर रहा वहां पर एक पुल बना कर दोनो पहाड़ों को जोड़ा गया है एवं उस पुल को पार करने के बाद ही आगे उस वाटर फाॅल के साथ उद्गग्म तक पहुंचने का रास्ता होगा शायद।श्रिका के साथ मै एवं मेरे पति तो नीचे ही रूके रहे किंतु सुहानी एवं सहर्ष ऊपर पुल तक चले गए। हमारे साथ ही बहुत सारे लोग अपने बच्चों का इंतजार कर रहे थे, जो ऊपर तक गए थे।पर्यटकों की अच्छी खासी भीड़ वहां थी।चुकि माउंट हुड के रास्ते में पड़ता था, इसलिए बहुत सैलानी दोनो जगहों को एक ही साथ देखने आए थे।पानी की बौछारें हमें नीचे दूर तक भिगो रहीं थीं, जिन से बचने के लिए काफी हाउस ,जो वहां पर था, वहां बैठ कर हमने बच्चों का इंतजार किया।उस क्षेत्र में इतनी अधिक बारिश होती है, एवं वाटर फाॅल की उड़ती बौछारों के कारण वहाँ के वातावरण में एक नमी है, जिस कारण वहां के ऊंचे ऊंचे पेड़ों पर काई की मोटी परत बैठ चुकी थी, और वे काई की चादर में लिपटे हुए लग रहे थे।

कुछ देर वहां ठहर कर हम आगे बढ़े।थोड़ी दूर बढ़ने के बाद हमें दुसरा वाटर फाॅल मिला, जो मल्टीनोमा फाॅल की तुलना में बहुत छोटा था जिसका नाम हाॅर्सटेल फाल था ,शायद घोड़े की पूंछ के जैसा दिखने के कारण उसका यह नाम पड़ा हो।भीड़ बहुत कम थी वहां पर।हमने एक दो तस्वीरें गाड़ी से ही खींची, और वहां बिना ठहरे फिर से आगे चल

दिए। लौटने के लिए सहर्ष ने दूसरा रास्ता चुना जो वाशिंगटन राज्य की सीमा से होता हुआ ऑरेगाॅन की सीमा में मिलता था, हम कोलंबिया नदी के किनारे के रास्ते पर चले जा रहे थे। चुकि हम वीकेंड में ही निकलते थे, और वहां की पश्चिमी सभ्यता में वीकेंड कल्चर की बहुत अहमियत है, इसलिए हमें रास्ते में अनगिनत आर वी (रिक्रियेशनल वैन) बगल से गुजरती दिखाई देती रही।यह एक चलता फिरता घर की तरह होता है, जिसमें जरूरत की हर चीज के साथ बेड, किचन एवं बाथरूम भी होता है।इन सब के साथ नदी की लहरों की अठखेलियां देखते हुए हम पोर्टलैंड पहुंच गए।

यहां पर कई कई जगहों के एक ही नाम सुनने को मिले जिससे हमें प्रारंभ में तो बहुत गलतफहमी हुई जैसे ऑरेगॅन मे वाशिंगटन एवं वर्जीनिया में वाशिंगटन।लेकिन बाद में धीरे धीरे रहते हुए हम यह समझने लगे थे।एक समस्या, जो यहाँ देखने में आई, वह थी घर विहिन लोगों की, जिन्हें वहां "होमलेस पिपुल" कहते हैं, जो जहां तहां सड़कों के किनारे दिख जाएगें और इनका एक दो गठरी भर का सारा सामान, इनके साथ ही होता है......जो दूसरों की मदद पर ही जीवन यापन करते हैं, सरकार की तरफ से इनके लिए कोई कदम नहीं उठाया गया है।

6.5.2017

आने वाला पूरा हफ्ता हमने आराम किया।शनिवार को फिर हमारी प्लानिंग, न्यूपोर्ट कोस्ट एक्वेरियम जाने की थी। तय प्रोग्राम के तहत हम निकले...चार घंटे लगे हमें पहुंचने में।समुद्र के अंदर बहुत ही बड़ा एक्वेरियम है यह...बहुत तरह की मछलियों के अलावा कितनी ही जाति के जल जन्तु हमने वहाँ पर देखे....जिन्हें बिल्कुल प्राकृतिक माहौल में वहां पर रखा गया था....श्रिका तो बहुत ही खुश हुई।समुद्र में डूब गए जहाज का रूप बीस वर्षों के बाद समुद्री जीव जंतुओं के द्वारा किस तरह बदल दिया जाता है, उसका अवशेष हमने देखा, जो वहाँ पर संग्रहालय में सुरक्षित रखा गया था।कुछ समय वहां बिता कर हम वापस लौट चले.....वापसी में ...लौटने के लिए सहर्ष ने औरेगाॅन कोस्ट हाइवे को चुना।रास्ते में हमने न्यूपोर्ट बीच पर गाड़ी रोक कर कुछ देर वहां गुजारा....काफी ठंडा पानी था समुद्र का....उपर से कंपकंपी जगाती हवा...बहुत देर वहां नहीं रूका जा सकता था...फिर हमें चार घंटे का रास्ता भी तय करना था अतः हम वहां से निकल गए। सूर्य देवता ढलान पर थे....कोस्ट हाइवे पर बाएं तरफ, समुद्र और दाएं तरफ शहर.....हम चले जा रहे थे....लगातार चार घंटे तक समुद्र के किनारे किनारे चलना..नजरें भर भर कर हमने हर पल आसमान को रंग बदलते हुए देखा......रास्ते में शाम हुई और सूरज एक नई सुबह का वादा छोड़कर धीरे धीरे समुद्र के दूसरे छोर पर पानी में समाता हुआ अस्त हो गया।

अब हमें अगले शनिवार की तैयारी करनी थी मेरीलैंड राज्य के बाल्टीमोर के लिए....यहाँ मेरी बहन रहती है, इसलिए सहर्ष के बिना ही हमारा, प्रोग्राम बना क्योंकि इतनी छुट्टी लेने में मुश्किल भी होती ,एयर टिकट पहले ही बुक कर दी गई थी।

क्रमशः

माला सिन्हा

क्रम 4

(4)

13.5.2017

देखते देखते शनिवार भी आ गया । बाल्टीमोर के लिए फ्लाइट टेकऑफ होने का समय दिन के बारह बजे का था।एयरपोर्ट जाने मे आधा घंटा का रास्ता था अतः हम घर से सुबह साढ़े आठ बजे एयरपोर्ट के लिए दो गाड़ियों में निकले।सहर्ष की गाड़ी में सुहानी एवं श्रीका एवं दूसरी गाड़ी लेकर मेरी बहन के पति सुनिल, सियाटल से हमसे मिलने आए थे उसमें मैं एवं मेरे पति थे।अपनी लेन से निकलने के बाद ही रास्ता जाम मिला, हम समय हाथ में लेकर चले थे इसलिए जल्दबाजी नहीं थी।पूछने पर पता चला कि शहर में सड़क मेंटेनेंस का काम चल रहा है, इसलिए रास्ते पर जहां तहां बैरिकेड लगा हुआ है।फिर तो हम रास्ता बदलते रहे हर कहीं वहीं हालत थी।अंत मे हमने बाहर के हाईवे का रूख किया....उस रास्ते पर ट्रैफिक जाम की यह स्थिति थी कि जैसे जैसे गाड़ी आगे थोड़ा सरकती हमारी, समय से एयरपोर्ट पहुंचने की उम्मीद टूटती जा रही थी। एयरपोर्ट हमें आधे घंटे में पहुंचना था, उसे हमने ढाई घंटे में तय किया ।हम पूरे रास्ते फ्लाईट के लेट होने की कामना करते हुए गए । लेकिन ऐसा भी होता है कही कि आप कुछ चाहें, और वह मुराद पूरी हो ही जाए।हमारी फ्लाइट छूटनी थी, सो छूट गई ......हमने एयरपोर्ट के गेट तक पहुंचते ही अपने विमान को हवा में उठते देखा । घोर निराशा हुई, साथ में तीन टिकट का पैसा बरबाद होना, निश्चित महसूस हुआ।

लेकिन एयरपोर्ट का एक नियम हमारे पक्ष में काम आया, वह यह कि विमान छूट जाने की स्थिति में अगर उसके डिपार्चर टाईम से दो घंटा के अंदर वहां के काउंटर पर पहुंच कर टिकट दिखा कर इसकी सूचना दी जाए ,तो जाने वाली अगली फ्लाइट में सीट की उपलब्धता के अनुसार वे लोग टिकट की व्यवस्था बिना कोई अतिरिक्त शुल्क लिए, कर देते हैं।उसी आधार पर हमें अगले दिन सुबह की फ्लाइट में टिकट मिली।वहां से सुनिल हमें अपना घर दिखाने ले गए, जो किसी सबर्ब में था, हमने कुछ समय उनके पारिवारिक मित्र रह चुके पड़ोसी के यहां बिताया।ये लोग मुबंई से हैं ।वहां पर लंच करने के बाद शाम की चाय पी कर हम वापस घर लौटे । निहायत साफ सुंदर काॅलनी थी।सुबह के लिए कोई चांस लेने के पक्ष में हम मे से कोई नहीं था, कहते हैं कि दूध का जला छाछ भी फूंक कर पीता है इसलिए सब कुछ पता कर के हम जल्दी ही घर से एयरपोर्ट के लिए निकल गए।

14.5.2017

वहां पहुंचकर सारी औपचारिकता पूरी कर हम विमान में बैठे।नियत समय पर विमान रवाना हुआ।बीच में हमें मीनापोलिस में फ्लाइट बदलनी थी, सो हमने बदली, वहां पर चार घंटे का ब्रेक था ,जो कैसे बीता पता नहीं चला।कारण कि एयरपोर्ट इतना लंबा चौड़ा एवं फैला हुआ था, कि एक टर्मिनल से दुसरे टर्मिनल तक जाने के लिए मोनो रेल की सुविधा थी।मोनो रेल मार्ग अर्थात सिंगल पटरी पर चलती इलेक्ट्रिक ट्रेन....जिस पर सफर करना हमारे लिए नया अनुभव था। श्रिका के साथ हम उसका प्राम ले कर चले थे इसलिए हमें एक जगह से दूसरी जगह आने जाने में बहुत सुविधा हुई।

उड़ते हुए विमान की खिड़की से नीचे देखने पर हमें हरे भरे खेत दिखे जो बिल्कुल सीधे सीधे वर्गाकार या आयताकार भागों में बंटे हुए थे बिल्कुल एक आकार में ।जब कि हमारे देश में ऐसा देखने को नहीं मिलता....अनगिनत टुकड़ों में बंटे हुए ,छोटे बड़े खेत ।अमेरिका के नक्शे को देखने से अलग अलग हिस्सों में बंटे राज्यों की सीमाएं भी लगभग चौकोर आकार में दिखाई देती हैं।

रात आठ बजे के करीब हमारे विमान की बाल्टीमोर एयरपोर्ट पर लैंडिंग हुई।शशि जी एवं श्रुति एयरपोर्ट पर हमें लेने आए थे, घर पहुँचते, रात के ग्यारह बज गए थे।फ्लाइट छूट जाने से एक दिन कम तो जरूर हो गया था वहां के लिए, किंतु एयरपोर्ट प्रशासन की मेहरबानी से हम उसी टिकट पर पहुंच गए थे, इस बात की खुशी थी।

बाल्टीमोर को "ओशन सिटी" भी कहा जाता है वह इस लिए कि यह अटलांटिक महासागर के मध्य क्षेत्र के किनारे बसा हुआ है एवं अपने बीचों के कारण पर्यटकों के लिए पसंदीदा जगहों में से एक है

दूसरे दिन आराम कर के, शाम में हमलोग सभी, शशि जी, डेजी, श्रुति एवं हम लोग शहर की तरफ घूमने निकले।घर शहर से बाहर सबर्ब में था.... वहां

पहुंच कर हमने कुछ समय बिताया।चारो तरफ, उंची इमारतों की से जगमगाती रौशनी से घिरा लेक, जो वहां का स्काई लाईन कहा जाता है, अद्भुत नजारा पेश कर रहा था।वहां पर वाटर स्पोर्ट्स की सुविधा भी थी।ऐसे तो वहां पर बैठना ही बहुत अच्छा लग रहा था किंतु हमारा डिनर, डेजी के एक पारिवारिक मित्र के बहुत आग्रह पर उनके यहाँ होना तय हुआ था, इसलिए आठ बजने पर हम घर की ओर चल दिए।वह शाम अच्छी गुजरी।

16.5.2017

दुसरे दिन हमें वाशिंगटन डीसी जाना था,जो अमेरिका की राजधानी है।शशि जी के आफिस जाने के बाद डेजी एवं श्रुति के साथ हमलोग निकले....गाड़ी श्रुति चला रही थी, करीब दो घंटे की ड्राइव के बाद दोपहर बारह बजे वाशिंगटन पहुंचे।व्हाइट हाउस के परिसर से थोड़ा हटकर पार्किंग के लिए जगह मिली वह भी मुश्किल से।गाड़ी वहां पार्क करने के बाद हमलोग पैदल ही निकल पड़े।सबसे पहले हम वाशिंगटन स्मारक की ओर बढ़े।काफी लंबे चौड़े मैदान के बीचोंबीच खड़ा, 169 मीटर ऊंचा स्मारक,किसी विजय स्तंभ के जैसा लग रहा था, मई का आखिरी हफ्ता था सर पर कड़ी धूप के कारण परेशानी लग रही थी।मौसम बहुत गर्म हो चला था.....तापमान अपने चरम पर था...... उसके बिल्कुल सामने सड़क के दूसरी तरफ लिंकन मेमोरियल स्मारक तथा उस से पहले द्वितीय विश्व युद्ध में मारे गए शहीदों की स्मृतियों में स्मारक बना हुआ था. ....जिसके लिए हमें फिर वहां तक पैदल जाना पड़ा किंतु वहां तक जाने के रास्ते में दोनों तरफ घने पेड़ों की कतारें थी, जिस कारण सड़क पर छाया थी, एवं बैठने के लिए बेंच लगी हुई थी।सड़क के किनारे पेड़ों के नीचे जमीन पर हरी घास लगायी गयी थी, जिसको देख कर ही ठंडक महसूस हुई, घास पर गिलहरियां बिलकुल निर्भीकता से दौड़ लगा रही थी...और तो और, सुहानी एक जगह घास पर श्रीका को आराम देने के ख्याल से लेटा कर सुस्ता रही थी तो दो बतखों ने बिल्कुल पास आ कर उन्हें घूरना शुरू कर दिया मानो वहां उनकी स्वतंत्रता में खलल पड़ गई हो।

लिंकन मेमोरियल, अमेरिका के सोलहवें राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन के सम्मान में बनाया गया, एक राष्ट्रीय स्मारक है, जहां लिंकन की उन्नीस फीट ऊंची संगमरमर की प्रतिमा है।कुछ समय बिता कर, यहां से हम व्हाइट हाउस की तरफ बढ़े।

लगभग दस मिनट चलने के बाद चाक चौबंद सुरक्षा व्यवस्था से घिरे परिसर में हम जहाँ पहुंचे, वहां से आगे जाने पर प्रतिबंध था...भीड़ काफी थी वहां।सामने अमेरिका के राष्ट्रपति का निवास स्थान "व्हाइट हाउस " दिख रहा था...जिसकी चहारदीवारी के अंदर संपूर्ण विश्व से संबंधित महत्वपूर्ण फैसले लिए जाते हैं......., उलझन ग्रस्त राष्ट्रों के मसले सुलझाए जाते हैं, हम उस इमारत के सामने खड़े थे।दफ्तर भी परिसर के अंदर ही दोनों तरफ है।

हालांकि तस्वीरों में देख कर व्हाइट हाउस की इमारत की जो भव्य छवि मन में बसी हुई थी, सामने से देख कर थोड़ी निराशा तो हुई ,फिर भी उसकी ताकत से इंकार नहीं किया जा सकता है ,यह स्वीकार कर हम वापस लौट चले ।

क्रमशः

माला सिन्हा

क्रम 5

(5)

17.5.2017

अगले दिन सुबह हमारी नींद खुली तो वाशिंगटन के अन्य हिस्सों में हमें घुमाने का डेजी का प्लान था ; किंतु पहले दिन की भाग दौड़ के बाद हमने श्रिका का ख्याल कर घर में ही आराम करना ठीक समझा। वैसे भी घर के चारों तरफ हरियाली बहुत थी, एवं अपने बागवानी के शौक की वजह से डेजी ने काफी सब्जियां वगैरह लगा रखी थी ,जिसे जंगली जानवरों से बचाने के लिए तार की जालियों से घेर कर रखा था तो हमने अपना समय घर में ही बिताया।

घर के पीछ 100 - 150 फीट तक खुली जगह थी जिसके बाद घने जंगल शुरू हो गए थे। जंगली भालूओं, हिरणों का घर के पीछे आ जाना और लगायी गयी सब्जियों को तहस नहस कर नुकसान पहुंचाना बहुत साधारण बात थी, वे लोग इन बातों के अभ्यस्त थे किंतु हमारे लिए यह सब सुनकर उन जानवरों को देखने की इच्छा बलवती हो गई।

संयोग कुछ ऐसा रहा कि उस दिन अचानक ही मैने घर की खिड़की से दो शावकों को पीछे की झाड़ियों में देखा एवं कौतुहलवश पीछे का दरवाजा खोल कर मैं बाहर डेक पर निकल आई...कि उनकी तस्वीरें खींच लूं , लेकिन उन्हें भी मेरी आहट मिल गयी थी ,और जबतक मैं अपने फोन का कैमरा आॅन करती, वे झाड़ियों से निकल कर पीछे के जंगल में भाग गए। इसी दौरान एक दिन हमें पीछे जंगल में भालू भी दिखाई दे गया।यह सब मेरे लिए सर्वथा अनूठा अनुभव था, क्योंकि जो जानवर वहां खुलेआम घूम रहे थे, उन्हें हम अपने यहां चिड़िया घरों में पैसा खर्च कर के देखते हैं।

18.5.2017

दुसरे दिन सुबह में श्रुति अपने हॉस्टल टेम्पा लौट गई, एवं हमलोग शशि जी एवं डेजी के साथ शुक्रवार की सुबह न्यूयार्क के लिए निकल पड़े। शायद चार घंटे की ड्राइव थी । हमें स्टैच्यू आॅफ लिबर्टी तक जाने के लिए क्रूज की टिकट, न्यू जर्सी से मिली थी । पूरे रास्ते शशि जी ने गाडी ड्राइव किया। हम न्यूयॉर्क शहर के पुराने हिस्से से होते हुए होटल पहुंचे, जहां हम सभी लोगों के लिए कमरा बुक किया हुआ था । वहां सामान रख कर हमें न्यू जर्सी जाना था।

हमलोग न्यू जर्सी की ओर बढ़े..... बारह बजने वाला था । क्रूज़ चलने का समय हो चला था। बुकिंग पहले की हुई थी किंतु टिकट वहां पर काउंटर से लेना था जिसे लेकर हम क्रूज़ में बैठे। पर दूर से ही हडसन नदी के बीच में लिबर्टी आइलैंड पर ,उन्नत मस्तक पर ताज पहने हुए, एवं दाएं हाथ में मशाल पकड़े , बहुत ऊंचे मंच पर अवस्थित स्टैच्यू आफ लिबर्टी दिखाई देने लगी...यह प्रतिमा दरअसल फ्रांस के लोगों के द्वारा, स्वतंत्रता के प्रतीक के रूप में अमेरिका के लोगों को भेंट की गई थी, जो आज अमेरिका की पहचान बन गई है। वैसे तो यह हरे रंग की दिखती है, किंतु असली में इसके ऊपर तांबे की परत मढ़ी गई है, तांबा बीस पचीस वर्षो में मौसम के प्रभाव के कारण आक्सिडाईस हो कर हरा हो जाता है जिस कारण यह प्रतिमा भी हरे रंग की हो गई है। मंच के चारो तरफ से घूमने का रास्ता बना हुआ है ,हमने वहां एक चक्कर लगाया। सोवेनियर की एक दो दुकानें, काफी शाॅप एवं फास्ट फूड के रेस्तरां भी थे...क्रूज़ दो घंटे बाद लौटने वाला था...काफी समय था हमारे पास...हमने वहीं के रेस्तरां में लंच किया। एक तरफ से देखने पर न्यूयॉर्क शहर का मैनहट्टन वाला हिस्सा दिखाई दे रहा था, लगभग चार बजे क्रूज़ का सायरन बजा और हम चलने की तैयारी में वहां से निकल लिए...लौटते हुए एक दूसरे द्वीप पर क्रूज़ रूका जो पास में ही था.....वहां पर कुछ ही लोग उतरे ,ज्यादातर लोग बैठे रहे... हमने भी उतरने का इरादा त्याग दिया।

वापस न्यू जर्सी के तट पर लौटते हुए शाम होने लगी थी...वहां हमने देखा वर्ल्ड ट्रेड सेंटर में मारे गए, न्यू जर्सी के लोगों की याद में बनाया गया स्मृति चिन्ह...जिस पर उन सभी लोगों के नाम लिखे हुए थे, जिन्होंने बिना किसी कारण अपनी जान गंवाई...देख कर मन जाने कैसा हो गया....अनदेखे, अनजाने उन सभी र्निर्दोष चेहरों की तस्वीर, नज़र के आगे से गुज़र गई। हम कुछ देर वहां यूँ ही बैठे रहे। तभी एक बस आ कर वहां लगी....जिस से एक नवविवाहित जोड़े के साथ दस बारह लोग उतरे....देख कर लगा कि वे तुरंत ही चर्च में शादी कर के आए हैं ....न कोई ताम झाम, न शोर शराबा....कितनी शांति से इनके यहां शादियां हो जाती होगीं।

वहां से हमें न्यूयॉर्क वापस आना था । डेजी का बेटा शरद न्यूयॉर्क में रह रहा था, उसके आफिस के बाद हमें उस से मिलना था....शरद को आफिस से ले कर हम सीधे वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पहुचें, जो 11 सितंबर की उस दुर्भाग्य पूर्ण घटना की याद अपने सीने में संजोए पूरे दम खम के साथ नया रूप ले कर शान से खड़ा था.. ...और शाम हो जाने के कारण अपने समय पर तुरंत ही बंद हुआ था, उस घटना के बाद से वहां की सुरक्षा व्यवस्था बहुत कड़ी कर दी गई है। फिर भी नीचे की एरिया में घूमने देखने के लिए वहां की सिक्युरिटी ने हमें जाने दिया।

वहां आस पास में घूमने के बाद हम टाइम स्क्वायर की तरफ बढे । टाइम स्क्वायर अर्थात दुनिया की सबसे महंगी जगहों में एक ....जहाँ न्यूयार्क की सबसे ऊँची, 86 माले की एम्पायर स्टेट बिल्डिंग, जिसकी ऊपरी मंजिल से पूरा न्यूयॉर्क शहर देखा जा सकता है और न्यूयॉर्क, दुनिया का सबसे महंगा समझा जाने वाला शहर। कार खड़ी करने के लिए पार्किंग मिलने का तो प्रश्न ही नहीं था, सो शरद गाड़ी कहीं अलग किनारे खड़ी कर ड्राइविंग सीट पर ही रहता और हम उतर कर घूमते।

संयोग ऐसा रहा कि, टाइम स्क्वायर पहुंचते ही पता चला कि , शाम में वहां पर किसी शख्स ने फायरिंग कर दिया है, जिस कारण कुछ लोगों को गोली लगी थी इसलिये वहां पर पुलिस की बैरिकेडिंग कर दी गई थी, एवं गाड़ियों को उधर जाने से रोक दिया गया था। आखिर हमलोग गाड़ी से उतर कर पैदल ही उधर चल दिए। हम ने उतर कर पूरे इलाके को निहारा....तस्वीरें लीं एवं वापस होटल लौट चले। शाम से ही शरद ने ड्राइविंग सीट संभाल ली थी.... ट्रैफिक के नियम का कोई आइडिया नहीं होने के कारण हम कुछ कर भी नहीं सकते थे

होटल पहुंच कर हमने डिनर किया । दुसरे दिन सुबह हमें नियाग्रा फालॅ देखने निकलना था।

20.5.2017

सुबह हमने नियाग्रा फाॅल के लिए अपना सफर शुरू किया ....चार पांच घंटे में हम वहां पहुंच गए। नियाग्रा फाॅल, अमेरिका के न्यूयार्क शहर एवं कनाडा के ओन्टारियो शहर, दो देशों की अन्तराष्ट्रीय सीमा पर अवस्थित, नियाग्रा नदी पर है। दोनो देशों को जोड़ने के लिए नदी के ऊपर अलग अलग जगहों से पुल हैं, किंतु एक देश से दूसरे देश जाने के लिए, बिना वीजा के पुल पार नहीं किया जा सकता। फाॅल के बिल्कुल पास में ही होटल था जहां सामान रख कर हम उधर की तरफ चल पड़े....जल का ऐसा वृहद श्रोत......अपने विराट बैभव की भव्यता का दिल खोल कर प्रदर्शन करता हुआ जल प्रपात, जो घोड़े की नाल के आकार जैसी सतह से 167 फीट की उंचाई से ,नीचे गिर रहा था। प्रकृति की इस लीला को प्रत्यक्ष देखना, अपने आप में एक विरल अनुभूति थी । वहां अमेरिका एवं कनाडा दोनों देशों का अपना- अपना क्रूज़ चलता है, जो सैलानियों को बैठा कर घुमाते हुए प्रपात के बीचोंबीच ले जा कर खड़ा कर देता है , पिघलते ग्लेशियर का जल ही प्रपात का रूप ले कर नियाग्रा नदी में गिरता है। हमने कुछ समय ऊपर बिता कर क्रूज़ का टिकट खरीदा एवं लिफ्ट से नीचे गए जहां पर हमें नीला रेनकोट पहनने के लिए मिला, जिसके बाद हम क्रूज़ में सवार हुए.....वहीं कनाडा की तरफ से खुलने वाले क्रूज़ के लोग, लाल रंग के रेनकोट में थे, जो दोनों देशों की अलग अलग पहचान थी । घूमते हुए प्रपात के बीच में क्रूज़ जब खड़ा हुआ जा कर , तो उसकी भीषण गर्जना एवं घने बौछारों में भीग कर महसूस हुआ कि , नियाग्रा जल प्रपात को दुनिया के सात आश्चर्यों में एक, यूँ हीं नहीं गिना जाता है।

क्रूज़ से वापस ऊपर आ कर हमने वहाँ पर एक भारतीय रेस्तरां में लंच किया...कई अच्छे भारतीय रेस्तरां वहां पर हैं, जहां काफी भीड़ थी सैलानियों की।

दोनों देशों की तरफ से नियाग्रा फाॅल में जो प्रकाश सज्जा की गई है, वह अद्भुत है, अलग अलग रंग बदलती रौशनी में जगमगाते नियाग्रा फाॅल की ख़ूबसूरत छटा देखते ही बनती है। अंधेरा होते होते ठंड बढ़ने लगी । भीड़ कम होने लगी तो हम भी वापस होटल के कमरे में लौट आए।

21.5.2017

सुबह हमें बाल्टीमोर निकलना था...नियाग्रा फाॅल से बाल्टीमोर बारह तेरह घंटे की ड्राइव थी। उस पर रास्ते में 'कौरनिंग' नाम की जगह पर ग्लास फैक्ट्री देखते हुए जाने का प्लान बना । होटल से नाश्ता कर के हमने अपना सफर सुबह नौ बजे के लगभग शुरू किया। रास्ते में रूकने के लिए दो घंटे का समय जोड़ कर हमने अनुमान लगाया कि रात ग्यारह बारह बजे तक पहुंच पाएगें। बीच में हमें पेन्सिलवानिया राज्य से हो कर गुजरना था..कौरनिंग मे उत्कृष्ट ब्रांड की क्रॉकरी 'कोरल' का कारखाना भी था, जहां के शोरूम में बाजार से सस्ते दामों में क्रॉकरी उपलब्ध थी, देख कर तो लगा कि, क्या क्या उठा कर ले जाऊं कितु सफर में वजन की समस्या ने रोक दिया, श्रिका के लिये एक दो छोटी मोटी चीजें डेजी ने खरीदी। दिन के उजाले तक तो समय अच्छी तरह बीत गया, हमने रास्ते में एक जगह लंच के लिए गाड़ी रोकी थी, किंतु अंधेरा होने के बाद आबादी विहीन इलाके से गाड़ी गुजरना, मन में डर पैदा कर रहा था....जंगलों के बीच में हाइवे पर जहां तहां, जंगली भालू, हिरण एवं अन्य दूसरे जानवरों से सतर्क रहने की चेतावनी वाले बोर्ड भी मन में ख़ौफ पैदा कर रहे थे....डर था कि हाइवे पर तेज रफ्तार गाड़ियों के आगे अचानक कोई जानवर आ जाए तो दुर्घटना घट सकती है, आते जाते समय रास्ते में ही कई जगह हमें मृत हिरणों के शव दिखे ,जो आने जाने वाले वाहनों से कुचल गए होंगे। ...सड़क बिल्कुल सुनसान थी, तो सुरक्षा का भी डर था, उस पर शरद, जो दिन भर आफिस करने के बाद से लगातार ड्राइव कर रहा था, उस से शशि जी को तो मदद मिली ही, हमें भी हिम्मत बहुत थी। युवा होते बच्चों का साथ मिल जाने से आत्मविश्वास और हिम्मत, किस कदर बढ़ जाती है, यह उन क्षणों में मैने महसूस किया, ........लेकिन उसे झपकी न आ जाए उसके लिए हमलोग सजग थे। आखिरकार रात दस बजे के करीब हमने मेरीलैंड की सीमा में प्रवेश किया । कोई शहर था जहां एक मैक्सिकन रेस्तरां में डिनर करने के बाद आगे बढ़े। घर तक पहुंचते हुए रात के एक बज चुके थे, शरद को अगली सुबह पांच बजे की बस से फिर न्यूयॉर्क लौट कर आफिस जाना था और हमलोग को अगले दिन पोर्टलैंड वापस लौटना था

22.5.2017

दूसरे दिन सुबह हम निकल पड़े । नौ दिन कैसे बीते, पता ही नहीं चला..शशि जी, डेजी, शरद श्रुति की मेहमानवाजी और स्नेह से अभिभूत, हमलोग वहां से पोर्टलैंड के लिए रवाना हुए। रास्ते मे डलास से हमें फ्लाइट बदलनी थी, जहां चार घंटे का ब्रेक था।लगभग छः घंटे की उड़ान एवं चार घंटे का ब्रेक....कुल दस घंटे के बाद पोर्टलैंड पहुंचे तब तक रात हो चुकी थी।

क्रमशः

माला सिन्हा

क्रम 6

क्रम  6

हमारे अपार्टमेंट के बिल्कुल नीचे से मेट्रो ट्रेन गुजरती थी जो लोगों को एक जगह से दूसरी जगह जाने के लिए बहुत बड़ी सुविधा है...5 डालर का टिकट कटवा कर शहर के अंदर कहीं से भी कहीं दिन भर घूमा जा सकता है...सो हमने भी मेट्रो से घूमने का प्लान बनाया और एक दिन सहर्ष के आफिस जाने के बाद श्रिका को उसके प्रैम में डाल कर निकल पड़े । शहर के दूसरे छोर पर वहां का सबसे बड़ा माॅल अभी अभी बना ही था, जहां बहुत ही लंबा चौड़ा स्केटिंग रिंग हमने देखा। बड़े बड़े शोरूम में घूमते हुए शाम हो गई.....वापसी, मेट्रो से ही हुई।

24.5.2017

दो तीन दिन के बाद वैसे ही हमलोग सहर्ष के आफिस जाने के बाद कोलंबिया नदी के किनारे से क्रूज़ पर घूमने निकले । नदी में कई पुलों के नीचे से गुजरते हुए जहाज बीस मील तक शहर के बाहर ले गया । दोनों किनारों पर उंचाई पर बने हुए सुंदर सुंदर लकड़ी के बड़े बड़े घर, हर घर से सीढ़ियों के द्वारा नदी तक उतरने का रास्ता जो उस घर के अपने डेक से मिलता...जहाँ दो तीन नावें बंधी होतीं.....यह सब देखना इतना सुहावना लग रहा था कि महसूस हुआ कि प्रकृति ने जितनी उदारता से इस धरती को सौंदर्य बख्शा है उतना ही ,इस सुन्दरता का लुत्फ उठाने के लिए यहां के लोगों को शौकीन होने के गुण से नवाजा भी है। (वो तस्वीरें जिस हार्ड-डिस्क में थीं वह हार्ड-डिस्क क्रैक कर गई) वाटर स्पोर्ट्स करने वाले लोग भी बहुत दिखे।शहर में ही नदी के ऊपर एक बहुत पुराना पुल ऐसा है, जिसका बीच का हिस्सा लिफ्ट की तरह ऊपर चला जाता है, ताकि बहुत ऊंचे जहाज पार कर सकें, एवं जहाज के निकलने के बाद फिर अपनी जगह आ जाता है।

यहां हर शनिवार, घर के नीचे आस पास के गांवों से किसान ट्रकों में अपनी उगाई गई सब्जियाँ, फल, फूल , बीज, जंक ज्वेलरी, खाने पीने के सामान की स्टाॅल लगाते । सुबह सवेरे ही उनके तंबू लग जाते ,युवाओं की भीड़ जुटती, आपस मे खेल कूद करतब दिखाए जाते ....दोपहर तक यह सब जारी रहता । उसके बाद अपना सामान समेट कर वे वापस लौट जाते । हम लोग भी एकाध बार गए....पूरा वातावरण तरह तरह के खाने की महक से भरा होता, जो असहनीय लगता मुझे। किंतु अपनी खिड़की से देख कर अपने देश की हटिया याद आती मुझे। वहां सप्ताह के सातो दिन अलग अलग क्षेत्रों में बारी बारी से यह सिलसिला चलता।

25.5.2017

क्रम  6

पोर्टलैंड से सियाट्ल की दूरी तीन घंटे की ड्राइव थी, जहां दो बड़ी आई टी कंपनियों, ऐमेजाॅन एवं माइक्रोसाॅफ्ट का मुख्यालय है। इस कारण यहां की आबादी मे युवा जनसंख्या ज्यादा है। हमलोग शनिवार को उधर ही चल पड़े। रास्ते में एक ग्लास-फैक्टरी में कुछ देर को रूक कर हाथ से शीशे को पिघला कर उसके खिलौने बनाते देखा। "एलियट बे" के किनारे बसे हुए इस शहर में, अमेरिका का दूसरा सबसे बड़ा और ऊंचा "जाईंट व्हील" कहा जाने वाला हिंडोला है जिसकी ऊंचाई 175 फीट है, जिस पर बैठ कर ऊपर नीचे आने जाने में पानी के ऊपर 40 फीट के फैलाव में से, दूर तक समुद्र और शहर देखना, बिल्कुल बचपन में झूले गए हिडोंलों की याद दिला गया। हम वैसे हीं उत्साहित थे। नीचे रेस्तरां, काफी शाॅप एवं बच्चों के खेलने के लिए भी बहुत कुछ था। बहुत अच्छी जगह थी। वहीं पर बहुत मछलियों का बहुत बड़ा बाजार था जहां हर तरह के सी फुड की दुकानों से लेकर सब्जीमंडी भी थी। एक दूकान "पाईक प्लेस फिश मार्केट" जहां के विक्रेता गण ग्राहकों को बहुत प्यार से, मछली या अन्य सी-फुड जो कुछ भी उन्होंने खरीदा है, उसे थमाते हैं....पहले वे उस मछली को आपस में एक दुसरे की तरफ उछाल कर एक साथ गाना गाते फिर ग्राहक को पकड़ाते....यह दुकान बहुत पुरानी है, एवं इसका इतिहास कुछ यूँ है कि बहुत पहले कुछ युवा लोगों ने अपने खाली समय में संरचनात्मक कार्य करने हेतु इसे कोऑपरेटिव के तौर पर शुरू किया था। उनकी यह पुरानी परंपरा आज भी इस दुकान में जीवित देखने को मिलती है। सागर की सतह से बहुत उंचाई पर यह मार्केट बसा हुआ है, जहां ऊपर तक जाने के लिए जॉइंट व्हील के सामने ही सड़क पर से सीढ़ियाँ बनी हुई हैं...दुसरा रास्ता सड़क से हो कर थोड़ा घूम कर वहां तक जाता है।वहां से लौटते हुए शाम हो चली थी। रास्ते में विंड-मील फार्म के बगल से गुज़रना अनोखा लगता। वापसी में हमें सड़क पर बहुत ट्रैफिक मिला....घर पहुंचते पहुंचते रात हो गई थी।

क्रमशः

माला सिन्हा

क्रम 7

क्रम  7

(7)

हमें यहाँ डेढ़ महीने से ज्यादा हो गया था, और अभी तक तो हम हर वीकेंड में घूम रहे थे लेकिन अब जो प्लानिंग हुई थी उसमें हमलोग कैलिफोर्निया की तरफ जाने वाले थे....मेरे दो भाई बहन उधर ही थे, जिनसे मिलते हुए हमें आगे जाना था।सहर्ष की इच्छा थी कि तीन हफ्ते लगा कर और कुछ और जगहों पर घूमने की, लेकिन प्रोग्राम बहुत लंबा हो रहा था, हालांकि ईश्वर की कृपा से अभी तक सबकुछ ठीक रहा फिर भी मन में आशंका थी, इसलिये कुछ जगहों को बाद में कभी के दिनों के लिए छोड़ दिया।

27.5.2017

क्रम  7

अगले शुक्रवार को हमने अपना सूटकेस, खाने पीने का सामान, जूस ,पानी की बोतलों के कैरेट के अलावा सफर में जरूरत पड़ने वाली चीजें, दवाएं वगैरह ले कर अपना सफर शुरू किया ....हमने पहले से किसी भी होटल की कहीं बुकिंग नहीं की थी....यही सोच कर कि, सुबह नौ बजे से रात के आठ बजे तक यात्रा करेंगे, जहां पहुंचे वहीं होटल ढूंढ कर ठहर जाएगें। श्रीका को कार- सीट की आदत हो गई थी इसलिए वह आराम से सोती।

हमारा पहला पड़ाव था, ऑरेगाॅन का क्रेटर लेक ,जो एक ज्वालामुखीय झील है, जिसका निर्माण 7,700 वर्ष पहले अमेरिका में , मज़ामा पर्वत के गर्भ में अत्यंत प्रचंड ज्वालामुखी के फटने से हुआ था। यह अमेरिका की सबसे गहरी झील है ,जो दरअसल ज्वालामुखी से लावा बह जाने के बाद उस जगह वृहद कूएं की तरह बन गया गड्ढा है और इस धरती पर सबसे आरंभिक या कहा जाए तो सबसे पुरानी ज्वालामुखीय झील है। अपने नीले और स्वच्छ पानी के कारण यह प्रसिद्ध है। इस झील की गहराई 2,148 फीट है, जिसमें दो आइलैंड्स है। वह मई का आखिरी हफ्ता था लेकिन वहां जमी हुई बर्फ अभी तक पिघली नहीं थी। ऊपर तक जाने का रास्ता जो पहाड़ को काट कर बनाया गया था, वहां तक हम गाड़ी से चले तो गए किंतु बाहर निकलने के बाद बर्फ पर चल कर हमने दूर से ही नीचे झांका। किनारे तक तो जा कर नीचे झाँकने की हिम्मत ही नहीं हुई...नीचे की गहराई से ऊपर तक झील की दीवार बर्फ की मोटी सतह से ढकी हुई थी। फिसलन बहुत थी। एक एक कदम बहुत संभाल कर रखना पड़ रहा था। जरा पैर लड़खड़ाने पर सीधे झील में फिसलने का खतरा सर पर मंडरा रहा था....जिसके बाद तो मृत्यु निश्चित थी। प्रकृति की वह अनूठी कारीगरी, जिसके विकराल एवं प्रचंड रूप ने इस धरती पर कभी तबाही मचाया होगा, वह अपने संपूर्ण सौंदर्य से अलंकृत, करोड़ों वर्षो का इतिहास अपने अंदर समेटे हमारे सामने था।

क्रम  7

जहां हम खड़े थे वहां पर ज्वालामुखी का लावा काफी ऊपर तक जाकर जमा हो जाने के कारण पहाड़ की तरह जम गया था जो बर्फ से ढका हुआ था। हमने कुछ लोगों को उस पर चढ़ते हुए देखा। कुछ दुःसाहसी लोग झील के बिल्कुल किनारे तक चले गए जहां से नीचे की गहराई शुरू होती थी, बिना यह सोंचे हुए कि उनका एक कदम गलत पड़ा या जरा सी चूक हुई तो अंजाम क्या होगा.....खैर उस अद्भुत नजारे को अपने कैमरे में कैद कर के हम निकले। रास्ते में शाम हो गई तो हमने होटल तलाशना शुरू किया। गूगल के द्वारा कई होटलों का पता कर के ,पूछ ताछ करते हुए अंततः हाइवे पर ही एक अच्छे होटल में हमें खाली कमरा मिला, होटल का मालिक भारतीय था, जिसने काफी ध्यान दिया हम पर।अभी तक हम ऑरेगाॅन की सीमा में ही थे।

28.5.2017

क्रम  7

हमारा अगला पड़ाव सैनफ्रान्सिसको था, जहां रात होते होते हम पहुँच गए। रोहित रितिका का घर सैन होज़े में था जहां पहुंच कर आराम मिला। वे हमलोगों का इंतजार ही कर रहे थे....गपशप करते करते सोने का समय हो गया ।अगले दिन रविवार था, हमलोग सुबह जल्दी ही तैयार हो कर निकल गए । रोहित हमें पुरा शहर दिखाते हुए लोम्बार्ड स्ट्रीट ले गया, जहां सड़क बिल्कुल सीधी ढलान पर थी, वह भी जिग-जैग के आकार में। कहा जाता है कि अगर अपनी ड्राइविंग की कला की जांच करनी हो हो तो लोम्बार्ड स्ट्रीट से गाड़ी निकाल लेनी चाहिए। ऐसी खड़ी चढ़ाई से उतरती हुई गाड़ी का ब्रेक बदकिस्मती से अगर फेल कर गया तो गाड़ी वहां से लुढ़कती हुई सीधे समुद्र में। जितनी देर ,गाड़ी को धीमी रफ्तार से नीचे आने में लगे...मेरी सांसे रूकी ही रहीं। हालाँकि आगे पीछे भी गाड़ियां थी। रास्ता एकतरफा था, सभी को उतरना ही था इसलिए एक के पीछे दूसरी गाड़ी र्धैर्यपूर्वक रेंग रही थी...रोहित अभ्यस्त था इसलिए उसने सधे हांथो से बहुत आराम से गाड़ी उतार लिया....हालाँकि अभी यह रास्ता कुछ दिनों के लिए बंद कर दिया गया है। थोड़ा और नीचे की तरफ सामने समुद्र नजर आ रहा था। नीचे विश्वप्रसिद्ध चॉकलेट और आइसक्रीम की फैक्ट्री घिराडेली थी जहाँ की लजीज़ आईसक्रीम से पेट भर कर और कुछ समय बिता कर हम निकल गए, इसके बाद हमें गोल्डन गेट ब्रिज तक गए, जो सैनफ्रान्सिसको खाड़ी के दोनों किनारों को जोड़ता है। पता चला कि बहुत शोध एवं परिचर्चा के बाद इसको लाल एवं नारंगी मिश्रित रंगों से रंगा गया था। इसका निर्माण 1937 में हुआ था, जो उस समय दुनिया का सब से लंबा झूलता हुआ पुल था। इसकी लंबाई लगभग पौने तीन मील है। इसके बारे में जानकारी है कि कैलिफोर्निया में स्वर्ण की खोज किये जाने के बाद इसी सेतु से वर्मा के लोग स्वर्ण ले जाते थे, इसी कारण इसका नाम गोल्डन गेट ब्रिज पड़ा, इसकी खोज अमेरिकी सैनिक अधिकारी जाॅन सी फ्रीमौंट ने की थी। वहां से हमलोग सैनफ्रान्सिसको स्काई लाइन गए जहां की ऊंचाई से समुद्र के किनारे शहर का बहुत बड़ा हिस्सा दिखाई दे रहा था ,शाम होने को थी और हमें लौट कर घर से सामान ले कर सेक्रीमेन्टो शहर निकलना था, जो वहां से दो-ढाई घंटे की ड्राइव पर था। भारत से आए मेरे फूफा और बुआ तब सेक्रीमेन्टो में ही थे। हम घर वापस आकर डिनर करने के बाद निकले । तब दस बज रहे थे। सेक्रीमेन्टो पहुंचते रात के एक बज चुके थे।

क्रम  7

दुसरे दिन हमने बस आराम किया। सभी अपनो के बीच समय कैसे कटता, पता ही नहीं चलता। वहां हम लोकल ही घूमते या तो कभी माॅल जा कर विंडो शॉपिंग करते। शुरूआत में तो रूपये में खर्च करने की आदत के कारण डाॅलर में खरीदारी करना अखरता था...मन ही मन डाॅलर मे अंकित कीमतों को रूपए में गिनती...किंतु बाद मे अभ्यस्त हो गई। तीन चार दिन यही सब चलता रहा।

यहाँ युवावस्था तो लोगों की बिंदास गुजरती है, किंतु वृद्धावस्था इस माएने मे कष्टकर है कि जो वृद्ध अकेले हैं, उन्हें अपना जीवन अकेले ही व्यतीत करना है। अगर सरकार की तरफ से उनको यह सुविधाएं मुहैया नहीं कराई गई होती तो पता नहीं उनका क्या होता। जब कि अपने देश में इनकी कोई सरकारी देखभाल नहीं है फिर भी बच्चे अगर लायक हैं , तो बुजुर्गों का बुढ़ापा ठीक ठाक कट जाता है । तब लगता कि कुछ भी हो, हमने अपने जीवन मूल्यों ,संस्कार एवं परंपराओं को अभी फिर भी थोड़ा बचा कर रखा है। हालाँकि धीरे धीरे इनका रूप भी पश्चिमी सभ्यता के प्रभाव में बदलता जा रहा है और यह पता चलता है अपने देश में बढ़ रहे वृद्धाश्रमों की संख्या से। मैंने वहाँ पर लोगों को स्वास्थ्य एवं फिटनेस के लिए बहुत ही जागरूक देखा । चाहे वे किसी भी आयुवर्ग में हो , इसके पीछे जो मुख्य कारण है शायद , वह वृद्धावस्था मे पारिवारिक सहारे की कमी से उत्पन्न हुई असुरक्षा की भावना है।

क्रम  7

इसका एक उदाहरण मैंने देखा, हालांकि जरूरी नहीं कि यह सभी के साथ लागू हो, सैक्रिमेंटो में बहन के पड़ोस में एक बुजुर्ग बिल्कुल अकेले रहते थे...उनकी तबियत खराब हुई होगी, तो उन्होंने फोन से एम्बुलेंस बुलाया और जा कर अस्पताल में एडमिट हो गए । बाद में अस्पताल से छुट्टी मिलने पर उन्हें एम्बुलेंस घर छोड़ने आया। एक कर्मचारी ने व्हील चेयर पर उन्हें बैठा कर उनके दरवाजे का ताला खोला, क्योंकि उनके हाथ इतने ज्यादा काँप रहे थे, कि वे ताला खोलने की स्थिति में नहीं थे...इसके बाद उसने उनको दरवाजे से अंदर कर दिया।टाटा- बाय कह कर वे लोग एंबुलेंस में बैठ चल दिए और यह सब देखकर मैं सोचती रही कि , जो व्यक्ति एक चाभी दरवाजे में नहीं लगा पाया वह घर के अंदर कैसे कर के अपना कोई काम कर पाएगा....कैसे रह पाएगा।

क्रमशः

क्रम  7

माला सिन्हा

क्रम 8

क्रम  8

8

31.5.2017

आज हमलोग सभी वहां का मशहूर फाॅलसम लेक देखने चले गए । काफी अच्छी जगह थी.... वहां लोग सूर्यास्त देखने जाते हैं...मछली पकड़ने के लिए भी वहां सुबह से दिन भर अपना डेरा डाल कर रखते हैं...शाम होने के साथ ही सूर्य देवता झील में उतरने को तैयार दिखे...उस अद्भुत दृश्य को हर क्षण रंग बदलते देखा हमने.....तस्वीरें ली.... झील मे सांप तैरते देखा, इसलिए अंधेरा होने से पहले वहां से निकल गए।

अगले दिन सलोनी हमें वहां का सीनेट दिखाने ले गई। कड़ी सुरक्षा व्यवस्था को पार कर हम अंदर पहुंचे। ब्रिटिश कालीन उत्कृष्ठ पेंटिग से सज्जित अत्यंत भव्य एवं बैभवपूर्ण गलियारों से गुज़रते हुए हम एसेंबली हाॅल तक पहुंचे....एसेंबली चल रही थी। दरवाजे पर सिक्युरीटी गार्ड खड़ा था, जिसने हमें अंदर जाने दिया । कोई बाहरी व्यक्ति अगर अंदर देखना चाहे तो बिना शोर गुल किए चुपचाप ,गार्ड की इजाजत से अंदर जा सकता है, ऐसी व्यवस्था बनी हुई थी। अंदर बहुत ही बड़े हाॅल में सामने डायस बना हुआ था, एवं उसके सामने सदस्यों के लिए कुर्सियाँ लगीं हुई थी। दर्शकों के लिए ऊपर की दीर्घा में बैठने की व्यवस्था थी। पहले कभी सिनेमा हाॅल में जा कर उपर की बालकनी में बैठ कर फिल्म देखना याद आया। बिलकुल सामने से यह सब देखना अनूठा लग रहा था। राज्य के भाग्य निर्धारण की कुछ घड़ियों के साक्षी हम भी रहे। कुछ देर बैठने के बाद हम वहां से निकले । काउंसलेट में नीचे की मंजिल पर एक तरफ संग्रहालय था ,जहां शीशे के अलग अलग कैबिनेट में प्राचीन अमेरिका का इतिहास दर्ज था। यह सब देखना बहुत दिलचस्प लग रहा था । शाम होने को आई तो हम वहां से निकले.....अब काउंसलेट बंद होने का समय हो चला था, इसलिए लोगों के बाहर से आने पर रोक लगा दी गई थी।

फाॅलसम में चार पांच दिन बिताने के बाद हमारा अगला पड़ाव था लास एंजेलिस, जो अमेरिका के अधिकतम आबादी वाले शहरों में से एक है, इसलिए हमने एक रात के लिए यहां होटल की बुकिंग पहले से करवा ली थी। यहां कहीं किसी भी हाइवे पर निकलने से हमने देखा, हर चालीस-पचास मील पर साफ सुथरा बेहद अच्छे रखाव के साथ रेस्ट एरिया ,जहां आप अपनी इच्छा से कुछ समय सुस्ता सकते हैं, बिल्कुल पिकनिक स्पॉट की तरह अपने साथ लाए खाने को शांति से खा सकते हैं, साथ में कम से कम काफी शाॅप तो रहेगा ही....जहाँ गाड़ियों की आवाजाही बिल्कुल नहीं के बराबर है, वहां काफी शाॅप नहीं भी मिल सकता है, जैसे जंगलों के बीच से गुजरते हाईवे पर.... और उस से भी अच्छी बात यह कि आपको 1 मील पहले ही उसकी लिखित सूचना का बोर्ड दिखाई दे जाएगा। वहां का 1 मील भारत का 1.6 किलोमीटर होता है। माहौल इतना सुरक्षित कि आपको कहीं भी निर्जन, सुनसान, बियाबान में या जंगल में कुर्सी- टेबल लगा कर कोई जोड़ा बियर की चुस्कियां लेते और पिकनिक मनाता दिख जाएगा। लड़कियां, महिलाएं बेख़ौफ़ कहीं भी आ जा सकती हैं।कोई नज़र उठा कर देखेगा भी नहीं।

क्रम  8

अगले दिन हमें लास एंजिलिस के लिए निकलना था जिसकी तैयारी करनी थी...सामान समेटना था।

1.6.2017

हमलोग तैयारी कर गाड़ी में सामान पैक कर निकल गए। एहतियात के तौर पर मैं एक राइस- कूकर और खिचड़ी बनाने लायक थोड़ा सामान साथ ले कर चली थी कि, रास्ते में पता नहीं क्या मिले नहीं मिले, अगर कहीं कुछ खाने लायक नहीं भी मिला तो कम से कम खिचड़ी तो बन सकेगी....हालाँकि अभी तक उसकी नौबत नहीं आई थी । रास्ते में एक दो जगह रूक कर हमने सफर तय किया। दिन भर चलने के बाद शाम में हम लॉस एंजेलिस पहुंचे... बड़ा शहर होने के कारण चलने के पहले ही होटल बुक कर लिया था, इसलिए हमें भटकना नहीं पड़ा।

क्रम  8

क्रमशः

माला सिन्हा

क्रम 9

क्रम  9

(9)

2.6.2017

अगली सुबह हम नाश्ता के बाद निकल गए....सबसे पहले हम एक पहाड़ी पर स्थित ग्रिफिथ आबर्जवेट्री गए ,जहां पर कैमरे से अंतरिक्ष में नेप्च्यून को देखा जा सकता है, उसके बिल्कुल सामने हॉलीवुड की पहाड़ियां दिखाई दे रही थी ,जिसपर हालीवुड का बड़ा सा मोनोग्राम दूर से चमक रहा था। काफी भीड़ एवं गाड़ियों की बहुत लंबी लाइन थी...वहां से लौट कर हम हालीवुड की तरफ गए वहां पर "वाॅक आफ फेम" के नाम से काफी लंबी चौड़ी सड़क है, जहाँ दोनों तरफ के फुटपाथ पर अमेरिका के राजनयिकों, हालीवुड के कलाकारों एवं अन्य मशहूर हस्तियों के नाम ,धातु की बड़ी सी प्लेट पर उभरे अक्षरों में लिखवा कर लगायी गयी है । लोग अपने पंसदीदा शख्सियतों के नाम की प्लेट के साथ फोटो खिंचवाते हुए दिखाई दिए। यह सब घूमते हुए दोपहर बीत गई। लौटने के दौरान सहर्ष ने गाड़ी "बेवरली हिल" के रास्ते की तरफ गाड़ी घुमा लिया....एक ऐसी जगह, जहां पर न जाने कितने ही लोगों के सपने बसते होगें...सड़क के एक तरफ पहाड़ पर बने हुए घर और सड़क के दूसरी तरफ, अथाह समुद्र जिसके किनारे, बीच पर हालीवुड के कलाकारों के अत्यंत भव्य बंगलो की कतारें। हर बंगले के सामने लंबा चौड़ा खूबसूरत बागीचा, एवं पीछे जुड़ा हुआ उसका अपना समुद्री इलाका, या कहें कि बीच, देखना अदभुत अनुभव था। होटल लौटने में शाम हो गई..दिन में घूमने के बावजूद रात में अच्छी नींद सो लेने के कारण अगले दिन थकान नहीं महसूस होती थी, वह इसलिए कि रास्ते में हमें बहुत ही अच्छे और आरामदेह होटल मिले । इसका एक बड़ा कारण, यहां लोगों को पैसा खर्च करने की भरपूर सामर्थ्य है। वैसे भी, अमेरिका की समृद्धता के कारण ही, कैसा भी रिमोट एरिया हो, इंफ्रास्ट्रकचर कहीं भी काफी बेहतर देखने को मिला।

क्रम  9

दूसरे दिन हमें लास वेगास के लिए निकलना था...जो लास एंजेलिस से 260 मील की दूरी पर था, गूगल के मुताबिक सात घंटे की ड्राइविंग थी अतः हमने सुबह जल्दी निकलने का फैसला किया ताकि दोपहर तक वहां पहुंच जाएं । वहां हम सभी को इकठ्ठा होना था। मेरे फूफा, बुआ, सैन होज़े से रोहित, सैक्रिमेंटो से सलोनी एवं भारत से पायल भी सपरिवार दिन में एक साथ पहुंचने वाले थे। एक ही होटल में हम सभी लोगों के लिए कमरा बुक किया हुआ था।

क्रम  9

3,6.2017

क्रम  9

सुबह आठ बजे हम नेवादा राज्य के लास वेगास के लिए निकल गए। यह शहर ,अमेरिका के एक विस्तृत बंजर, रेगिस्तानी हिस्से को बहुत योजनाओं के तहत क्लार्क काऊंटी क्षेत्र के अन्तर्गत शहर के रूप में बसाया गया है। यहां मूसलाधार बारिश के कारण कभी भी बाढ़ आ जाती है।

क्रम  9

लास वेगास के चारो तरफ रेगिस्तानी बनस्पती एवं वन्य जीव मिलते हैं। कैसिनो,डिजनी, रिसोर्ट एवं अन्य मनोरंजन के साधनों की भरमार है। अभी तक हम रास्तों पर केवल हरियाली, नदियां, और पहाड़ और प्रकृति के खूबसूरत नजारों को देखते चले आ रहे थे। अब जो रास्ता शुरू होने रहा था उस पर दूर दूर , जहां तक नजर जाती थी, बंजर धरती दिखाई दे रही थी। लास वेगास चारो तरफ से बनस्पतीहीन पहाड़ों से घिरी हुई बंजर घाटी है। जिसकी समुद्र तल से ऊंचाई 620 मीटर है, इन पहाड़ों को स्प्रिंग माउंटेन कहा जाता है।

क्रम  9

हम रेगिस्तानी इलाके को चीरती हुई, सीधी सड़क पर मीलो मील चले जा रहे थे। मौसम बहुत शुष्क और धूप बहुत तीखी थी। उस पर दूर दूर तक, जहाँ तक नजर जा रही थी, कैक्टस के खेत फैले हुए थे, जो अनोखी छटा बिखेर रहे थे । यह दृश्य देखना भी अपने आप में नया अनुठा लग रहा था....ऐसा नहीं था कि हम किसी बंजर इलाके से पहली बार गुजर रहे थे....लेकिन न जाने किस आकर्षण में नजरें पूरे समय उसी धरती से बंधी रहीं। बड़ा मन हो रहा था, कि कुछ तस्वीरें खींचू ....किंतु धूप से और गरमी के कारण गाड़ी रोक कर एसी से बाहर निकलने की हिम्मत नहीं हो रही थी। फिर रास्ता सिगंल लेन होने के कारण संकरा था दूसरी आती जाती गाड़ियों के कारण कही रोकना मुश्किल था, इसलिए गाड़ी की गति जरा धीरे करवा कर खिड़की का शीशा उतार कर चलती गाड़ी से कुछ तस्वीरें लीं। सलोनी ने बहुत कुछ खाने पीने की चीजें साथ मे दे दी थी, फिर कहीं वालमार्ट या स्टोर मिल जाने से हम फल वगैरह के साथ श्रीका के लिए बेबी फूड खरीद कर रख लेते थे। हमारी कोशिश रहती थी कि दोपहर मे हल्का ही लंच हो।

क्रम  9

रास्ते में मोज़ाब र्डेजर्ट क्षेत्र में हमें 3100 एकड़ में बना हुआ बहुत बड़ा सौर ऊर्जा का प्लांट दिखाई दिया , जिसका टावर, रेगिस्तानी खुली धरती पर दूर से ही चमकता नज़र आ रहा था, .... जो हाल ही में बना था। श्रीका पूरे सफर में शांत खेलती या सोती रही ।नेवादा राज्य की सीमा में प्रवेश करते ही कुछ दुकानें दिखीं। वहां से ठंडा जूस, एनर्जी ड्रिंक वगैरह लेकर हम आगे बढ़े...शहर में प्रवेश करते ही सीन बदल गया था....चौड़ी सड़कें, खुली धरती पर बनी हुई, शीतल एहसास देती इमारतें , क्षितिज के छोर तक फैला आसमान....होटल तक पहुंचने में दो बज गए थे....वहां से हम सभी लोगों का प्रोग्राम साथ निकलने का था, लेकिन हम लोगों को पहले ही देर हो चुकी थी, इसलिए सामान कमरे में उतार कर थोड़ी देर बाद हम सब निकले। लास वेगास की सबसे चर्चित सड़क और वहां का दिल कही जाने वाली जगह का नाम 'लास वेगास स्ट्रिप' है, जहां कतार में सड़क के दोनों ओर कैसिनो, बड़े शानदार होटलों के परिसर, एक से बढ़कर एक दुकानें, सस्ते महंगे रेस्तरां, संगीत के कार्यक्रमो के लिए मंच इत्यादि के साथ देखने के लिए जो सबसे महत्वपूर्ण जगह थी, वह था ''फाउंटेन आफ बेलाजियो" जहां पर "लाइट एंड साउंड" सिस्टम का जैसा अदभुत प्रदर्शन देखने को मिला, वह शब्दों में बताना बहुत कठिन है, लग रहा था कि, रंग बिरंगी बिजली की जलपरियाँ, संगीत की धुन पर नृत्य कर रही हो...हर धुन पर उनकी स्थिति बदल जाती थी..कभी एक, कभी दो तो कभी समूह में पानी की सतह पर, नृत्य कला में पारंगत नृत्यांगनाओं की तरह जल की सतह पर उभरती....और फिर क्षण भर में विलुप्त हो जातीं। बीस पचीस मिनट का यह शो थोड़ी थोड़ी देर के बाद होता था, जिसे देखकर दर्शक आवाक थे। कैसिनो तो इतने बड़े बड़े थे कि एक साथ दो हजार व्यक्ति बैठ सकते थे।

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वहां से निकल कर बहुत मुश्किल से हमने बहुत दूर जा कर एक भारतीय रेस्तरां ढूंढा...रात काफी हो गई थी, रेस्तरां बंद करने का समय हो गया था, इसलिए उसके मालिक ने हमसे तुरतं आर्डर ले लिया एवं रसोइए को रोक कर सभी स्टाफ को छुट्टी दे दी... खाना उसने हमें खुद ही सर्व किया। होटल पहुंचने तक काफी रात हो चुकी थी।

क्रम  9

क्रमशः

क्रम  9

माला सिन्हा

क्रम  9

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क्रम  9

क्रम 10

क्रम 10

(10)

4,6,2017

दूसरे दिन हम सभी सोलह लोगों को एरिज़ोना के ग्रैंड कैनियन नेशनल पार्क देखने के लिए निकलना था।होटल से नाश्ता करने के बाद हम सभी दो गाड़ियों में निकल पड़े । वहां के ट्रैफिक नियमों में एक सख्त नियम यह भी है कि गाड़ी में जितनी सीट है उस से ज्यादा, एक बच्चा भी आप नहीं बैठा सकते हैं, जिसकी उम्र 8 साल से ज्यादा हो, और 8 साल से छोटे बच्चों के लिए कार सीट तो होना ही चाहिए।

क्रम 10

नेवादा राज्य से एरिज़ोना की तरफ बढ़ते हुए रास्ते में हूवर डैम मिला, जहां से दोनों राज्यों की सीमाएं अलग होती हैं। आश्चर्य हुआ देख कर कि दोनों राज्यों की अपनी अपनी सीमाओं के अंदर बिल्कुल आस पास दो केबिन बने हुए थे, जिसकी बाहरी दीवार पर दोनों राज्यों के समयानुसार घड़ियां लगी हुई थी...नेवादा की घड़ी से एरिज़ोना की घड़ी का समय, दो घंटे आगे किया हुआ रहता है जो उस समय नहीं था अर्थात नेवादा में पौने बारह बज रहा हो ,तो एरिज़ोना की घड़ी उसी समय पौने दो बजे का समय बताएगी, लेकिन उस समय एरिज़ोना का समय नहीं मिलाया गया था।

ग्रैंड कैनियन पहुंचते हुए शाम हो चली थी....सूर्यास्त का समय हो रहा था, जिसकी लालिमा में उस घाटी के सौंदर्य को निहारना, सैलानियों का मुख्य आकर्षण है । गाड़ी पार्क करने के बाद, आगे बढ़ने पर घाटी का जो दृश्य हमारे सामने था, वह अचंभित करने वाला था, प्रकृति की ऐसी अदभुत कारीगरी, जिसकी कल्पना करना भी एक आम इंसान की पहुंच से बाहर हो, ऐसा विहंगम दृश्य नज़रों के सामने था.....मन को यकीन दिलाना मुश्किल हो रहा था कि कैसे कोई कुदरती रचना इतनी खूबसूरत भी हो सकती है.... घाटी की गहराई में सतह तक नजर दौड़ाने पर कोलराडो नदी तलहटी में बहती हुई दिखाई दी, जिसका पानी बिल्कुल हरे रंग का दिख रहा था....उपर से देखने में यह बहुत ही क्षीण लग रही थी, लेकिन दरअसल, उतनी क्षीण वह नदी थी नहीं, यह हमें आगे जा कर समझ में आया, जब हमने धरती पर से, नीचे झांक कर उसमें चलती हुई फेरियों और मोटरबोट को देखा, जो उस ऊंचाई से कोलराडो में चींटी की तरह बहती हुई दिखाई दे रही थी। यहां राफ्टिंग भी होती है।

क्रम 10

इसके भूगर्भीय इतिहास को जाने ,तो यह लगभग 20 करोड़ वर्ष पहले, कोलराडो नदी की धारा से धरती को, परत दर परत, काटी गई तंग घाटी है। नदी की धारा के द्वारा काटे जाने के क्रम में कोलराडो पठार ऊपर उठता गया....यह घाटी लगभग 60 लाख वर्ष पूर्व अस्तित्व में आई थी ,इसकी लंबाई- 277- मील ( 446 किलोमीटर), एवं गहराई -1829 मीटर ,अर्थात पौने दो किलोमीटर से कुछ ज्यादा है,...भिन्न भिन्न स्थानों पर इसकी चौड़ाई 4 -मील (6.4 किलोमीटर) से 18- मील (29 किलोमीटर) तक है। आधुनिक अमेरिका के 1779 में अस्तित्व में आने से पहले यहां अमेरिकी इंडियंस रहते थे, यहां की गुफाएं उनका घर थीं। जहाँ उनके धार्मिक, एवं पवित्र स्थल भी होते थे।

सन् 1540 में यहां पहुंचने वाले पहले यूरोपीय यात्री थे स्पेन के 'गार्सिया लोपेज द गार्नेस'। यह तो हुआ इसका इतिहास। इस विशालकाय प्राकृतिक अजूबे को देखने के लिए पर्यटकों को हवाई जहाज की सुविधा भी मिलती है । इसकी घाटी की तलहटी में आज भी कुछ गांव बसे हुए हैं, जहां की दुनियाँ बिल्कुल अलग और आदिम अमेरिका की जीती जागती तस्वीर है। यहां के निवासी बांस की टोकरियाँ और अन्य वस्तुएं बना कर शहरों में बेच आते हैं। इनके परिवहन का एकमात्र मुख्य जरिया घोड़ा है।

क्रम 10

कोलराडो की धारा ने करोड़ों करोड़ वर्ष लगा कर धरती की सतह को जिस खूबसूरती से काटा है, उसे देख कर यकीन करना मुश्किल था कि यह घाटी किसी सिद्धहस्त कलाकार की तराशी गयी कृति नहीं है....ऐसी गढ़न तो शायद इंसानों के हाथ से भी संभव नहीं हो सकती थी....उभरे हुए स्तूपाकार गुंबद छोटे बड़े मंदिरों की तरह नज़रों के सामने थे, जिन्होंने अपने देश के अजंता एलोरा के गुफाओं की याद दिला दी..... सूर्यास्त होने लगा था....उसकी सुनहरी रश्मियाँ उन गुंबद पर मुकुट की तरह सज उठी थीं....ऐसी अदभुत संरचना के सौंदर्य को केवल महसूस किया जा सकता था, हमने वहाँ कुछ तस्वीरें खींची जरूर किंतु उस अजूबे के जादू को कैमरे में नहीं उतारा जा सकता था, और ना ही इसके सौंदर्य को शब्दों में परिभाषित कर प्रकृति की इस कारीगरी के प्रति अन्याय किया जा सकता है। विस्तार से इसे समझने के लिए मैं लिंक शेयर कर रही हूँ, जिसे देखकर वो यादें ताजा हो जाती हैं।

वहीं पर ' होपी हाउस ' संग्रहालय जिसकी संरचना किसी आदिम युग की याद दिला रहे थे। पतली ईंट जैसे छोटे बड़े लाल पत्थरों को जोड़ कर बनाया गया एक बड़ा सा ऊंचा भवन था वह, जिसके अंदर हाथों से बने सोवेनियर की दुकान, शिकार में प्रयुक्त होने वाले प्राचीन हथियार, प्राचीन अमेरिका में पहने जाने वाले वस्त्र, टोपियां, घुटनों तक के जूते, इत्यादि का ऐसा संग्रह था जो अमेरिका की आदिम सभ्यता की तस्वीर प्रस्तुत कर रहे थे।

क्रम 10

शाम हो चली थी ,पर्यटकों की भीड़ कम होने लगी । सुर्यास्त होने के बाद हम भी वहां से निकल पड़े....हमें आगे जाना था। रोहित सब के साथ वहां से वापस लौट गया था। अंधेरा होने वाला था। गूगल ने जो रास्ता बताया, उस पर अगला शहर 'पेज' तक 200 मील(320 किलोमीटर) की दूरी बता रहा था, जहां हमें रात गुजारनी थी, जब कि दूसरा रास्ता बहुत लंबा दिखा रहा था, इसलिए, हमने पहले वाले छोटे रास्ते को चुना.... जिसकी बायीं तरफ ग्रैंड कैनियन की पथरीली निर्जन घाटी, बिल्कुल समानांतर आरंभ हो चुकी थी, तो दूसरी ओर दायीं तरफ दूर दूर तक घने जंगल फैले हुए थे, ...जब तक थोड़ा उजाला रहा तब तक तो घाटी की सुंदरता, उसके टेढ़े मेढ़े कटाव, उसके अलग अलग बदलते रंग, कहीं चौड़ी तो कहीं रूप बदल कर बिल्कुल संकीर्ण हो जाती घाटी मन को मोहते रहे....हम चले जा रहे थे, अंधेरा गहरा गया था। दूर दूर तक न कोई रोशनी , न गाड़ियों की आवाजाही.....हम मीलो-मील उस घोर सुनसान इलाके के अंधेरे में अब तक एक-डेढ़ घंटे चल चुके थे। अभी तक बगल से दो तीन गाड़ियां ही गुज़री थीं। अंधेरा होने के साथ ही वह बायीं तरफ की बियाबान निर्जन घाटी, तो दाहिनी तरफ घनघोर जंगल , जो अब तक लुभा रहे थे, वो मुझे डराने लगे...उस पर हर दो-तीन मील पर चेतावनी बोर्ड पर जंगली भालूओं, बिल्लियों, तेन्दुओं और चीते से बचने की चेतावनी, जो उस रात के घुप्प अंधेरे में अपनी ही गाड़ी की हेडलाइट्स में जब तब चमक जाते

जंगल घने होते जा रहे थे, गाड़ियां दिखनी लगभग बंद ही हो चुकी थी। दरअसल इन जानवरों के हमला करने का खतरा तो था ही....यह डर भी था कि अचानक तेज रफ्तार गाड़ी के सामने आ जाने से गाड़ी उलट जाने जैसी दुर्घटना भी घट सकती है । उस अंधेरी और सुनसान सड़क पर हम तेज रफ्तार से गाड़ी भगाए चले जा रहे थे। सब से ज्यादा चिंता मुझे श्रिका के लिए हुई, जो इन सब बातों से परे अपनी कार-सीट में बेखबर सो रही थी। हमें तीन-साढ़े तीन घंटा और चलना था, कि अचानक सहर्ष ने बताया कि, पेट्रोल का लेवल कम होने से गाड़ी रिजर्व में चली गई है। यहाँ हम से एक गलती यह हो गई थी, कि रास्ते में हमने पहले गाड़ी का पेट्रोल टैंक यह सोंच कर फुल नहीं करवाया था कि आगे करवा लेंगे। यह बात हमारे मन में भी नहीं आई, कि छः सात घंटे के रास्ते में कहीं पेट्रोल पंप नहीं मिलेगा। अभी तक ऐसा नहीं हुआ था। लेकिन जिस रास्ते पर कोई गाड़ी मुश्किल से दिखाई दे रही थी, उस पर पेट्रोल पंप की उम्मीद करना बेमानी था। कहीं कोई रौशनी नहीं। फंस जाने पर मदद की कोई उम्मीद नहीं। नेटवर्क भी काम नहीं कर रहा था कि, पता चल पाता कि पेट्रोल पंप आगे कितनी दूर है। गाड़ी में बिल्कुल चुप्पी छायी हुई थी बस कभी कभार एक दो शब्दों में बेटे और इनके बीच कुछ बातें हो जातीं। बेटा सौ मील प्रति घंटा की तेज रफ्तार गाड़ी का इंजन ढलान पर बंद कर देता तो गाड़ी बंद इंजन में भी मीलों आगे बढ़ जाती। हम सभी अपनी अपनी आशंका और डर को अपने में जब्त करने की कोशिश कर रहे थे। मेरे पास तो अब हनुमान चालीसा पढ़ने के सिवा कोई चारा नहीं था, सो मैंने मन ही मन जपना शुरू किया....शायद ज़िंदगी में पहली बार इतने मन से।

क्रम 10

पूरे रास्ते एक तरफ जंगल और दूसरी तरफ जंगलों के बाद घाटी, जो भयावह लग रही थी, उसका अस्तित्व बरकार रहा। खैर ईश्वर ने मदद की ....करीब ढाई घंटे चलने के बाद शहर के नजदीक पहुंचने से नेटवर्क आया फोन में , जिसके बाद मालूम हुआ कि आधा घंटा के बाद पेट्रोल पंप है...रात के बारह बज रहे थे दूर से ही हमें पेट्रोल पंप का स्टेशन दिखा तो जान में जान आई। रूक कर पेट्रोल लिया। थोड़ा आगे जाने पर छिटपुट रौशनी के साथ शहर वहां से शुरू हो रहा था। कोलराडो नदी ग्रैंड कैनियन का दामन थामे शायद आगे कहीं बढ़ गई थी, और हम शहर की तरफ जाने वाले रास्ते पर पर मुड़ गए.....वीडियो में जंगलो के बीच जो सड़क दिखाई दे रही है, हमारी गाड़ी उसी रास्ते पर दौड़ रही थी ...ढूढने पर हमें आगे जा कर एक अच्छा सा होटल मिल गया, तब तक रात का एक बज चुका था। खाने के लिए हमारे पास काफी कुछ था.....राहत मिल जाने से मन मस्तिष्क भी काफी हल्का हो गया था।

क्रमशः

क्रम 10

माला सिन्हा

क्रम 11

क्रम 11

11)

5.6.2017

अगली सुबह हम, एंटिलोप कैनियन देखने के लिए निकले, जो पथरीली धरती की सतह से नीचे, नदी की जलधारा के कटाव से जमीन के अंदर अपने आप बनी हुई, आश्चर्यजनक प्राकृतिक करिश्मा थी। टिकट लेने के बाद बहुत लंबी लाइन में लगना पड़ा, हर दस-बारह लोगों के ग्रुप के साथ एक गार्ड या इंस्ट्रक्टर, जो भी कह लें, था । हमारे साथ भी एक हो लिया ,जो अपने निर्देशन में हमें ले जा रहा था । दोपहर बारह बजे का समय था ...सूर्यदेव बिल्कुल सर के ऊपर थे....एंटिलोप कैनियन देखने का सबसे उपयुक्त समय यही माना जाता है, जब ऊपर से सूरज की किरणें छन कर सीधी अंदर आती हैं......सब से आगे हमारा गार्ड था, उसके पीछे मेरे पति, फिर मैं, मेरे बाद श्रिका को कैरियर बेल्ट से आगे बांधकर खड़ी सुहानी, और सब से पीछे सहर्ष था...हमारे ग्रुप के बाकी लोग पीछे थे...कैनियन के टेढ़े मेढ़े मुख से, जो मुश्किल से 2' × 2.5' रहा होगा , जहाँ से नीचे उस कुएं जैसी सुरंग में उतरना था, बिल्कुल खड़ा, संकरा और तंग कटाव था, जिसमें नीचे उतरने के लिए लोहे की पतली सी सीढ़ी, जिसकी चौड़ाई- डेढ़ फीट रही होगी कि बस, राॅड जैसी रेलिंग पकड़ कर पैर टिकाया जा सके, दीवार से लगी हुई खड़ी थी। गार्ड ने हमें सामने की बजाय पीछे मुड़कर सीढ़ी पकड़ कर ,उतरने को कहा। इसलिए कि सामने की तरफ से उतरने पर चक्कर आ जाने का डर था.....लगभग 120 फीट लंबी और 50 फीट गहरी, उबड़ खाबड़ सतह वाली लगभग सीधी गहरी सुरंग थी, और बता कर खुद उतर गया। उसके पीछे मेरे पति भी एक दो सीढियाँ उतर चुके थे, जब मेरी बारी आयी तो मैंने नीचे झांका और फिर तो मेरा आत्मविश्वास और हिम्मत दोनों जवाब दे गए....एक तरह से देखा जाए तो 5-6 मंजिल की ईमारत की ऊंचाई से सीधे नीचे उतरना था, वह भी डेढ़ फीट चौड़ी सीढ़ी से .......मैंने उतरने का इरादा त्याग दिया..लेकिन पीछे मुड़कर सुहानी को देखा...जो उतरने की बिल्कुल तैयारी में थी तो मन को कड़ा किया....जगह इतनी तंग थी, कि मुड़ कर वापस लौटने की गुंजाइश तो बिल्कुल नहीं थी। पीछे दूर तक लोगों की लंबी लाईन। गार्ड के बताए अनुसार हिम्मत से हमनें सीढ़ियों से उतरना शुरू किया, जो उस समय जैसे ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रही थीं, लेकिन धीरे धीरे हम सभी एक एक कर के सारी सीढ़ियाँ उतर गए...!

क्रम 11

अब उस कुदरती करिश्मा का जो तिलिस्म हमारे सामने था, उसके मोहपाश में मंत्रमुग्ध और आवाक थे हम सभी लोग......लाल और केसरिया रंग की चट्टानों की परत दर परत तहें, गुफा की दिवारों पर पानी की बहती धारा की जीवंत निशानियाँ लग रही थीं ....हाँ लाल विशालकाय चट्टानों के अंदर ही अंदर कटाव से बनी हुई , आड़ी-तिरछी ,तंग-संकरी, उंची- नीची सतहों वाली गुफा ही थी वह, जिसने किसी उच्च कोटि के चित्रकार की कला जैसा सौंदर्य समेट रखा था । उसके फर्श की सतह उबड़ खाबड़ होने के साथ ही समय के साथ चिकनी हो गई थी। आसान नहीं था उस पर चलना। धरती के नीचे एक दूसरी जादुई दुनिया थी, जो जल की धाराओं के द्वारा , करोड़ों वर्षो में तराशे गए अपने इतिहास की गाथा सुना रही थी। हर कदम के साथ एक नया ही तिलिस्म खुल रहा था

मेरा मन करोड़ों वर्ष पहले की कल्पना में डूब चुका था। ऐसा कैसे हो सका होगा.......जब अंजाने ही यह जादुई प्रक्रिया आरंभ हुई होगी। अंजाने ही धरती में जब तब दरारें पड़ी होगीं और जल की धाराओं ने उन चट्टानों पर अपनी इबारतें लिखनी शुरू की होगीं। उपर धरती की सतह पर पड़ी दरारों से सूर्य की सुनहरी किरणें छन छन कर आ रही थी जो गुफा के केसरिया रंग की दिवारों पर पड़ कर दैविक आभा फैला रहीं थीं, साथ ही उन रश्मियों के पड़ने से दीवार पर भिन्न भिन्न तरह की सुनहरी आकृतियाँ भी उग आई थी। जहाँ दरारें नहीं थीं, वहां पर रौशनी के लिए बल्ब लगाए गए थे। बंद जगह पर घुटन सी महसूस होती ,तब तक फिर किसी दरार से झांकती हुई रौशनी राहत पहुंचा जाती।

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एक-दो जगहों पर छोटी बड़ी और सीढ़ियाँ मिलीं, जिनसे ऊपर चढ़ना था, सम्हाल कर कदम रखते हुए हम आगे बढ़ रहे थे। आखिरकार ऊपर एक बड़ी दरार को छूती हुई सीढ़ी से चढ़ कर हम ऊपर पहुंचे। जैसे ही उस दरार से सर जरा सा बाहर निकाला ही था कि पुत्र महाराज, जो कैमरा ताने, निशाना साध कर, दनादन फोटो दागने के लिए तैयार खड़े थे, अपनी फोटोग्राफी का कमाल दिखाते हुए, मिशन में कामयाब हो गए। निकलने के बाद पीछे मुड़कर उस पथरीली धरती को जब देखा तो यकीन करना मुश्किल था कि इसके नीचे कोई रहस्यमयी दुनिया दबी हुई है, जहाँ से गुज़र कर हम अभी अभी आए हैं।

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यहां की यादें संजो कर हम आगे बढ़ चले। वहां से करीब एक मील आगे हमारा अगला पड़ाव 'हार्स शू बेन्ड' था, जो ग्रैंड कैनियन घाटी का ही हिस्सा है... धूप बहुत तीखी थी, श्रिका को नाना जी के पास गाड़ी में एसी में सोती हुई छोड़, मैं, सुहानी और सहर्ष देखने के लिए उतरे। थोड़ा पैदल चल कर पहाड़ी पर चढ़ना था...तीखी धूप और गर्मी के बावजूद सैलानियों की संख्या कम नहीं थी। वही पथरीली शुष्क जमीन से घिरी हुई, उस घाटी की गहराई में एक पठार के चारो ओर घोड़े की नाल के आकार में घूमी हुई, कोलरेडो नदी अपना नीला रंग लिए चमक रही थी। वहां पर जल क्रीड़ा के लिए मोटर बोट चलते देखा, तस्वीर में जो छोटे छोटे बिंदुओं की तरह दिखाई दे रहे हैं। बहुत देर तक वहाँ रूकना मुश्किल था, सो हम तीनों जल्द ही वापस गाड़ी तक लौट आए।

यहां के बाद हमारा अगला पड़ाव था, साल्ट लेक सिटी' जो वहाँ से 390 मील (624 किलोमीटर) दूर था। दिन आधा से ज्यादा बीत चुका था। इसलिए हमने वहाँ से चलने के पहले होटल बुक कर लिया ताकि रात होते होते आराम से पहुंच कर नींद पूरी कर सकें। साल्ट लेक सिटी 'यूटा' राज्य के अंतर्गत पड़ता है। यहां देखने के लायक कुछ नहीं था। हमें केवल रात गुजारनी थी। वहां पहुंचने के बाद सुबह निकलने की तैयारी कर के हम सो गए।

क्रम 11

6.6.2017

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लेकिन यूटा राज्य की सीमा में प्रवेश करने के साथ ही, जो लैंडस्केप हमें देखने को मिले, वह अचंभित करने वाले थे.... 390 मील लंबी वह सड़क जिस घाटी के बीच से निकलती है, उस घाटी में भी करोड़ों-करोड़ वर्षों के स्मृति चिन्ह के जैसे प्रकृति के द्वारा तराशे गये पत्थरों के स्तूप ,नक्काशीदार खंभों की तरह पत्थर की शिलाएं जो एक ही तरह की गढ़न में गढ़ी गई मालूम हो रही थी...इनका सिलसिला पूरे रास्ते बरकरार रहा.. .इसलिए इसे 'मौनुमेंट वैली' भी कहा जाता है.... देख कर दंग थी मैं कि प्रकृति ने कैसी कैसी अद्भुत कारीगरी से धरती को सजाया है...समान लंबाई-चौड़ाई, कटाव और ऊंचाई वाले ये खंभे, स्तूप या गुंबद एक दूसरे से जुड़े हुए थे। कहीं मीलों-मील फैली चट्टानों पर मूर्तियों जैसी एक तरह की आकृति उभरी हुई थी तो कहीं छोटी छोटी गुफाएं भी दिखीं । कभी मीलों तक दोनों तरफ एक डिजाइन के खंभे ,तो कभी स्तूपों के आकार वाले गुंबद दूर तक साथ रहे । लग रहा था, जैसे प्रकृति ने युगों- युगों में इस घाटी को अपने हाथों से सजाया है। हैरत इस लिए भी हो रही थी, कि मीलों तक ये एक ही तरह के होते जैसे किसी मूर्तिकार ने अपनी एक हीं तरह की बनाई गई मूर्तियों को तराश कर करीने से कतारों में सजा दिया हो।

अंततः साल्ट लेक सिटी पहुंचने पर हमें हाईवे पर ही होटल मिल गया, जहां रात में आराम से सो कर सुबह हम अपने अगले पड़ाव यलो स्टोन नेशनल पार्क के लिए निकलने वाले थे।

क्रम 11

क्रमशः

क्रम 11

माला सिन्हा

क्रम 12

क्रम 12

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7,6,2017

सुबह हम होटल से नाश्ता करने के बाद येलो स्टोन नेशनल पार्क के लिए रवाना हुए, जो साल्ट लेक सिटी से 324 मील (518- किलोमीटर) दूर था और व्योमिगं राज्य के अन्तर्गत पड़ता है। यह क्षेत्र आधुनिकता से दूर कस्बाई संस्कृति के निकट ज्यादा लगा ,हम चले जा रहे थे...दोपहर हो गई थी लंच का समय हो गया था, और हम खाने के लिए किसी सही जगह की तलाश में थे...गूगल ने फिर मदद की और 'ताज' नाम के भारतीय रेस्तरां का पता बताया, जो कुछ आगे था। हमारे वहां पहुंचते पहुंचते रेस्तरां बंद होने का समय हो गया था, सहर्ष ने अंदर जा कर बात की तो वे लोग खाना खिलाने के लिए तैयार हो गए, विदेश की धरती पर होटल के बोर्ड पर भारतीय नाम देख कर , बहुत आत्मीयता महसूस हुई। हमलोग अंदर गए...सारे ग्राहक जा चुके थे, बफ़े सिस्टम में पहले ग्राहकों को खाना लगाने के बाद अब वे लोग सब कुछ हटा रहे थे...होटल के मालिक पंजाब से थे, उन्होंने फिर से टेबल लगवा कर बहुत खुशी से बिल्कुल गरम खाना लगवाने के साथ गरम रोटियाँ भी बनवाई, और बहुत प्यार से पेश आए। एक अच्छी याद ले कर हमने उनसे विदा ली...।

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येलो स्टोन नेशनल पार्क पहुंच कर हमने वहाँ एक दूसरा ही कुदरती करिश्मा देखा...धरती के नीचे से करोड़ों वर्ष पहले लावा के रूप मे जो गंधक उबल कर अन्य खनिज पदार्थों के साथ बाहर आया होगा, वह अब ठंडा हो कर पहाड़ के रूप में जम गया है, जहां आज भी धरती के अंदर से गंधक मिश्रित पानी का सोता बहता है।सफेद, पीले और काले रंग की ऐसी पहाड़ी अपने आप में एक अजूबा है।

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शाम हो चली थी.....हमने आगे जा कर एक होटल ढूंढा, छोटा ही शहर था शायद इडाहो था। होटल वालो ने एक स्ईट दे दिया, जिसमें किचन भी था। वैसे वहाँ के होटलों की एक ख़ास बात यह रही कि कमरा के नाम पर कहीं भी एक अच्छा ख़ासा सुईट ही मिला। हमारे पास मैगी के पैकेट्स थे, सो वहां हमने बनाया, जो पहली बार काम आए। वैसे अभी तक जो भी होटल मिले,कहीं कोई परेशानी नहीं हुई। अब तक का सफर आराम से कटता आया था।

दुसरे दिन हमें 'ग़ीज़र' देखने जाना था, जो 'ओल्ड फेथफुल' नाम के क्षेत्र में पड़ता था....यह नाम क्यों पड़ा होगा इसके पीछे जरूर कोई कारण रहा होगा, किंतु वह पूरा इलाका, लगभग आबादीहीन ही दिखा, जहां जगह- जगह धरती के अंदर से खौलते हुए पानी के सोते, फव्वारे के रूप में ऊपर उठते, और प्रकृति की लीला से रूबरू करा कर शांत हो जाते...सच कहा जाए तो उस पूरे क्षेत्र में धरती का आक्रोश जगह जगह देखने को मिला। वहां पहुंच कर हमने अंदर जाने का टिकट लिया। वह कोई बंद जगह नहीं थी, बस एक फाटकनुमा इमारत थी जिसे पार करने के लिए टिकट लेना था .....जहां खौलते हुए पानी का फव्वारा हर बीस-पच्चीस मिनट पर निश्चित तौर पर धुएं के साथ धीरे धीरे ऊपर उठता, नीचे आता, और,पंद्रह-बीस मिनट तक, अपना करतब दिखा कर शांत हो जाता...फिर कोई नाम निशान नहीं। काफी भीड़ थी वहां, लोग विडियो बना रहे थे, हमने भी कोशिश की, लेकिन उसकी प्रचंडता को कैद करने में मेरे फोन का कैमरा नाकाम रहा।

क्रम 12

वहां से निकल कर हम उस स्थान पर बढ़े, जहां एसिड की नदी बह रही थी। सुनने में बहुत अजीब लगता है 'एसिड की नदी ' किंतु वाकई, जो नीला, हरा तरल पदार्थ धरती की सतह से फूट कर बह रहा था, उसके संपर्क में आस पास की जमीन बिल्कुल जल गई थी, और उससे उठता हुआ धुआं, धरती के रोष का एक अलग ही रूप दिखा रहा था। वहीं पर हमें एसिड का तालाब देखने को मिला, जिसका हरा नीला तरल खौल रहा था, जिसकी इन्द्रधनुषी छटा अद्भुत लग रही थी। उसके चारों तरफ, कुछ हटकर धरती की सतह से पांच छः फीट ऊपर लोहे का पतला सा पुल बना हुआ था जिस पर चल कर उसको पास से देखा जा सकता था। हमने भी एक चक्कर लगाया और वापस गाड़ी में आकर वहां से आगे बढे। यह पूरा इलाका जंगली भैसों के लिए जाना जाता है एवं इनके आतंक से यह इलाका अछूता नहीं है। अपनी शांति में खलल डाले जाने पर या छेड़े जाने पर, ये सैलानियों पर हमला भी कर देते हैं। रास्ते में हमें जहां तहां झुंड में या अकेले बायसन मिले... आगे बढ़ने पर एक जगह सड़क के बिल्कुल किनारे दो बायसन बैठे दिखाई दिए, तो सहर्ष ने कुछ बढ़ा कर दूर गाड़ी रोकी और तस्वीर खींचने के लालच में दोनों भाई-बहन गाड़ी से उतर गए....डरते डरते कुछ तस्वीरें खींची ,जिसका पता बायसन्स को नहीं चला। फिर हम तुरंत ही वहां से निकल लिए।

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'इडाहो' राज्य से गुजरते हुए हमने 'मोंटाना' राज्य की सीमा में प्रवेश किया...यह इलाका शहरों की चकाचौंध से दूर प्राचीन अमेरिका के गांवों की झलक दिखाता ,घने जंगलों से घिरा है, जहां जंगली भालूओं का बसेरा है।घूमने का यह हमारा आखिरी पड़ाव था, और पोर्टलैंड के रास्ते में पड़ता था।यह जगह 'बियर पार्क' के नाम से जानी जाती है, हम शाम से पहले ही वहां पहुंच गए...बिलकुल छोटा सा गांव था वह, लगभग 250-300 साल पुराना, लेकिन टूरिस्ट स्पॉट होने के कारण कुछ होटल थे वहां। हमनें अपना सामान होटल में उतारा और पैदल ही निकल चले। यहां पर देखने लायक जो जगह थी, वह था बियर म्यूजियम...बिल्कुल खुला खुला विस्तृत आकाश की नीलिमा के नीचे, छोटा सा गांव था ,जहां की मुख्य सड़क के दोनों तरफ जो कुछ दुकानें थीं ,उनमें पुराने समय में पहनें जाने वाले जूते, टोपियाँ, पुराने डिजाइन के बर्तन , छड़ियाँ, औजार, लैंप इत्यादि आज भी बिक रहे थे। जी तो चाह रहा था कि ये ऐन्टिक वस्तुओं में कुछ ले चलूं, किंतु फिर वही दिमागी चेतावनी.... सामान और वजन की। दूकानों में घूमते हुए एहसास हुआ कि तस्वीरों या मीडिया के द्वारा हम जिस अमेरिका को जानते हैं, यह उस से कितना अलग है, और कैसे कैसे कुदरती अजूबों से भरी पड़ी है हमारी धरती।

बियर पार्क, जहां भालूओं की अनेक प्रजातियों के जीवित संरक्षण के अलावा उनके सैकड़ों वर्षों से प्राप्त अस्थिपिंजरों को भी सुरक्षित रखा गया है ,देखना भी आश्चर्यजनक था। श्रिका सात महीने पूरा कर चुकी थी, और अब बहुत कुछ समझने लगी थी, वहां के म्यूजियम में दस फीट ऊंचा टेडी बियर को देखकर बहुत खुश हुई, ।यह सब देख कर हम होटल लौट आए।

क्रम 12

8.6.2017

क्रम 12

सुबह हमने जल्दी निकलने का निश्चय किया क्योंकि वहाँ से पोर्टलैंड की दूरी 621- मील ( 994 -किलोमीटर ) थी, जो एक दिन में नहीं तय की जा सकती थी, बीच में 'बट' राज्य में कहीं रात गुजारने के लिए रूकना पड़ता, अतः हम सुबह नाश्ता के बाद हम जल्द निकल गए, आगे जा कर रास्ते में कुछ बर्गर वगैरह लेकर हम बढ़ते चले गए....अब हमें घर पहुँचने की जल्दी थी, इसलिए हम ज्यादा दूरी तय करने की कोशिश में थे। शाम होते ही हमने रास्ते में होटल में ठहर जाना ठीक समझा। अब तक हम 'बट' से पहले लगभग 500-मील ( 800 किलोमीटर) चल चुके थे जहां हमें रात तक पहुंचना था, वहां हम शाम से पहले ही पहुंच गए।

क्रम 12

9,6,2017

अगले दिन अपना सफर शुरू किया रखा।अब घर पहुंचने के लिए केवल 180-मील (288- किलोमीटर) तय करना था जो हमने बहुत आराम से वहां से लगातार चार पांच घंटे- की ड्राइव के बाद वाशिंगटन राज्य से होते हुए औरेगौन की सीमा में प्रवेश किया।घर पहुंचते हुए शाम के चार बज चुके थे.....अपार्टमेंट की इमारत में नीचे काफी- शाॅप एवं 'सबवे' था, जो यूनिवर्सिटी एरिया में होने के कारण चौबीस घंटे खुला रहता था। सामान ऊपर पहुँचा कर सहर्ष नीचे से कुछ बर्गर वगैरह पैक करवा कर ले आया। खैरियत थी कि घर पहुंचने के बाद थकान महसूस हुई, वरना अभी तक तो किसी जूनून में ही घूम रहे थे.....इस दौरान कितनी नदियों को हमने पार किया...कितने पहाड़ों के साये में रास्ता तय किया....कितने जंगलों और रेगिस्तानो से हो कर गुजरे ....घने जंगलों में कहीं खंडहर हुए वीरान घरों ने ध्यान खींचा तो कहीं गहरे समुद्र के नीचे बने सुरंग मार्ग से निकलना पड़ा।

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इसी दौरान सभी , सलोनी के साथ दो बार, सियाटल से पोर्टलैडं हमसे मिलने और घूमने आए...सहर्ष का दो कमरे का फ्लैट वैसे तो बैचलर का घर था, किंतु जरूरत भर हर सामान, वहां मौजूद था। सलोनी पहले रह चुकी थी पोर्टलैंड में ,उसकी पुरानी जगह थी ,उनके आने से एक एक छोटा मोटा गेट-टूगेदर हमारे घर में भी हो गया।

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हमारे पास वहां, अब गिने चुने दिन थे। 29 जून को हमारी भारत वापसी की टिकट थी। इस लिहाज से हमारे पास दो वीकेंड ही था, जिसमें हमने अपनी बची खुची खरीदारी पूरी की , और घर मे ही समय गुजारा, एक बात जिस पर मेरा ध्यान ख़ास तौर पर गया, वह यह कि सड़कों पर कई जगह पर हमने मैनहोल में पीतल के भारी भरकम ढक्कन यूँ ही लगे देखे....जब देखती तब यही ख्याल आता, कि ऐसा अगर हमारे देश में लगा, पड़ा होता तो......?

हमारी नन्ही परी, श्रीका ने तो कमाल ही किया। तीन महीने की उम्र से घूमते घूमते वह इतनी अभ्यस्त हो गई थी कि हमें बिल्कुल पता नहीं चला कि हम इस नन्ही जान के साथ सफर में रहे और बहुत अच्छे से हमारा करीब तीन महीनों का प्रवास पूरा हुआ।

क्रम 12

From Suhani's wall :

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Our USA vacations comes to an end... And I am happy to be going back home with a lot of fond memories and new experiences.

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This was a fantastic trip, as much as we stayed home and experienced "living in the US", we also travelled... A LOT. Thanks to Saharsh's super planning and Daisy Mausi, Mausa Jee, Sharad, Shruti, Saloni Didi, Jija Jee, Rohit Bhaiya, Ritika Bhabhi and Saharsh's efforts and super hospitality we visited amazing destinations covering 14 states in these 2.5 months.

We travelled a total of about 55450 km by air (43600 km), road (11800 km) and water (just 50 km). And Shrika braved it all like a champ. My baby is a traveller

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USA is so so very scenic... the landscape changed in every state.. from snowclad mountains to rocky deserts, from river drive to pine forest, from miles and mile of green farm land to miles and miles of barren land... All this and more. There was so much to see and admire.

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माला सिन्हा

मुसाफिरी - यूरोप

क्रम 1

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मुसाफिरी : यूरोप

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यूरोप के लिए हमने अपनी यात्रा मुंबई से शुरू की थी।बीच में हमारा पड़ाव था दुबई, जहां से आठ घंटे के बाद हमारी अगली उड़ान थी म्यूनिख के लिए। हम कुछ लोगों की टिकट कोलकाता से एवं कुछ लोगों की दिल्ली से भी थी।दुबई में और साथियों के साथ समय अच्छा से बीत गया।

म्यूनिख में हमारे ठहरने की व्यवस्था ट्रेवल एजेंसी के द्वारा पांच सितारा होटल में की गई थी।सुबह का नाश्ता होटल में एवं घूमने के दौरान, लंच एवं डिनर की व्यवस्था, तय कार्यक्रम के तहत भारतीय मेन्यू के मुताबिक होती।

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सबसे पहले हमने आस्ट्रिया में जो जगह देखी वह एक जगह जो हम ने देखी, वह थी सैकड़ों सालों से बंद पड़ी नमक की खान....जिसका नाम साल्जबर्ग है....लगभग डेढ सौ साल पहले यहां से नमक निकाला जाता था, लेकिन बाद में जब तक खान धंसने के दौरान होने वाली मौतों के कालण इसे बंद कर दिया गया...हाँ सैलानियों के लिए यह जगह आज भी देखने लायक रखी गई है।

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हमनें धरती के नीचे अब तक कोयला और लोहा की खान ही अंदर जा कर देखे थे, लेकिन नमक की खान देखने का यह अनुभव बिल्कुल अनूठा था।नमक निकालने की जो तरकीब डेढ़ सौ साल पहले थी आज भी वही काम कर रही थी।बिना किसी तकनीकी बदलाव के सीढ़ी के बदले लकड़ी का स्लाइड ( wooden slide) था।जिस पर बैठ कर फिसलते हुए हमें नीचे लगभग तीस मीटर तक जाना था।ठीक वैसे ही जैसे बच्चे पार्क में स्लाइड्स पर फिसल कर खेलते हैं।इसके लिए हर किसी को बहुत मोटा सूती कपड़े का जूडो कराटे के ड्रेस की तरह कुछ पहनने को दिया गया था, ताकि फिसलने में आसानी हो।वह लकड़ी की सतह भी तो शीशे की तरह इतनी चिकनी हो गई थी, कि दुगुने वेग से हम नीचे फिसलते चले गए।

दरअसल वह नमक की जो खान थी वहां करोड़ों साल पहले कभी गहरा समुद्र हुआ करता था जो मौसम बदलने और समय के साथ सूख कर नमक की खान में तब्दील हो गया।

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नीचे हमें एक गाइड मिली, जो इधर उधर जाने वाले कई सुरंगों में से किसी एक सुनिश्चित सुरंग से आगे ले चली।

एक जगह बीच में देखा दो व्यक्तियों की आकृति बनी हुई थी, उनके पास के पत्थर पर जो लिखा हुआ था, उससे पता चला कि हजारों वर्ष पहले नमक की खुदाई में उनके शव की ममी मिली थी जो नमक के संसर्ग में शवों की बन गई थी वहां। जिन्हें तब तो निकाल लिया गया था और संरक्षित नहीं हो पाने के कारण वे ख़राब हो गई थी बाद में उनकी स्मृति चिह्न में उन दोनों आकृतियों को लगाया गया था।कई और प्रतीक चिन्ह भी मिले जो नमक को निकालने के लिए उपयोगी रहे होंगे।

हमारे लंच की व्यवस्था किसी भारतीय रेस्तरां में थी।वहां से हम आगे बढ़े।

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इसके बाद हमें वियना जाना था....

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वियना, ऑस्ट्रिया की राजधानी एवं उनके नौ प्रांतों में से एक है....

निहायत ही बेहद खूबसूरत जगह.... रसीले मीठे अंगूरों की खेती एवं वाईन के लिए मशहूर....नाम भी शायद इसी लिए वियना पड़ा हो

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वियना ऑस्ट्रिया का सबसे प्रमुख नगर है जिसकी आबादी १.७ मिलियन है। यह ऑस्ट्रिया का सबसे बड़ा शहर एवं यहां की सांस्कृतिक, आर्थिक एवं राजनैतिक गतिविधियों का केन्द्र है।

क्रमशः

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मुसाफिरी : यूरोप

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हमारा डिनर वियना के एक रेस्तरां में था।वहां तक बिल्कुल खड़ी चढ़ाई होने के कारण, हमारी बस को नीचे ही रोक दिया गया था, वहां से लगभग दो सौ मीटर हमें उपर चढ़ना था।रास्ता सकरा ही था।मकान एक दुसरे से जुड़े हुए लग रहे थे। ट्रेवल एजेंट हमें एक छोटे से घरनुमा मकान तक ले गया....हाँ उसका तंग मुख्य द्वार होटलों की तरह सजा हुआ था तो समझ में आया कि हमारा पड़ाव आ गया।अंदर प्रवेश करते ही जिस चीज से स्वागत किया गया, वह था दो बड़ी बड़ी परातों में काले, चमकते, मीठे, रसीले अंगूर जैसे बस अभी अभी बाग से तोड़ कर उन्हें सजा दिया गया हो, एवं दूसरी जो चीज वाईन थी, जिसे वेलकम ड्रिंक के तौर पर कड़क वर्दीधारी बेयरा लिए खड़ा था।उसकी संरचना एक घर की ही थी, जिसे उत्कृष्ट साज सज्जा से उच्चस्तरीय रेस्तरां में परिवर्तित किया गया था।खुशनुमा माहौल, गीत संगीत की तैरती मधुर धुन, सजे हुए टेबल ने दिनभर की थकान उतार दी।लंबे से हाल के बाद सामने ऊपर की ओर जाती हुई सीढ़ियाँ दिखाई दी...जूस स्नैक्स लेने के बाद और मित्रों के पीछे हमने भी उउपर सीढ़ियों का रूख किया।लगभग तीन मंजिल की उंचाई तक सीढ़ियाँ थी....शाम हो चली थी....उपर पहुंचे तो उपर का नजारा देख कर हैरानी से आंखे खुली की खुली रह गई।हम पहाड़ की ऊंचाईयों के बीच कहीं खड़े थे....जहाँ तक ऊपर नजर जा रही थी, दूर दूर तक करीने से सजी हुई काले अंगूरों के बाग, जिसकी बेलें ऊपर सीधी क्यारियों में जहां तक दिखाई दे रही थीं,उसका छोर नहीं पता चल रहा था।उनका आदमी वहां खड़ा था,....अंगूर तोड़ने या खाने की कोई रोक टोक या मनाही नहीं थी...उसपर हम तो नीचे से ही थोड़ी बहुत पेटपूजा कर आए थे, फिर भी पेड़ से तोड़ कर चखने का मोह तो कोई भी नहीं छोड़ पाया।वैसे स्वादिष्ट मीठे अंगूर उसके बाद शायद ही हमने खाए हो ऊपर अंधेरा हो चला था और हमे होटल लौटना भी था सो हम एक लज़ीज़ भोजन, संगीत,आरकेस्ट्रा का लुत्फ उठा कर होटल लौट चले।

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आज हमें सिटीटूर के लिए जाना था।बस से हमें शहर जगह जगह घुमाते हुए शाॅन ब्रून महल ले जाया गया, जो कभी हैबसबर्ग शासकों का मुख्य ग्रीष्मकालीन निवास था, जो वियना के हेटिंग में स्थित था। 1,441 कमरों वाला बारोक महल देश के सबसे महत्वपूर्ण स्थापत्य, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक स्मारकों में से एक है। 1950 के दशक के मध्य से यह एक प्रमुख पर्यटक आकर्षण रहा है महल की स्थापत्य कला, वास्तु कला एवं आर्किटेक्चर की बेजोड़ सुंदरता, रखरखाव और इसके बाग बागीचे की खूबसूरती का बहुत बड़ा योगदान है। वैसे देखा जाए तो आस्ट्रिया, जर्मनी, एवं अन्य यूरोपीय देशों में स्थापत्य कला एवं र्आर्किटेक्चर से समृद्ध इमारतें हैरान करने वाली हैं। रात का डिनर एक दूसरे पांच सितारा होटल में व्यवस्थित था।वैसे एक अच्छी बात थी दो भारतीय शेफ भी हमारे ट्रिप में साथ थे, शायद कैरो के अनुभवों से सीख मिली थी एजेन्सी को।

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अगले दिन में हमें जर्मनी की सबसे ऊंची चोटी जुत्सपिक पर जाना था जिसके लिए सुबह ही हमने होटल छोड़ दिया था।शहर से बाहर रास्ते के अनुभवों से हमने जाना कि वहाँ के लोगों को फूलों से बहुत प्यार है।कोई भी घर चाहे छोटा हो या बड़ा, घर की बालकनी या खिड़कियों में इतने फूल लगे होते कि वे फूलों के कारण छुप जाती थी।दूर दूर तक हरियाली से भरे खेतों, मैदानों के बीच छोटे छोटे घरौंदे जैसे सुंदर घर। हमारी बस एक खास सीमा तक चढ़ाई वाले रास्ते को पार कर रूक गई, जहां से हमें उपर ट्रेन से जाना था।टिकट तो सभी जगह लगती थी।हर आधे घंटे पर ट्रेन ऊपर जाती थी,....दुसरी लाईन से लौटने वाली ट्रेन उसी क्रम में लौटती थी।हम ऊपर पहुंचे।हमें वहां बर्फ होने की बात बताई गई थी।हम दोपहर तक पहुंचे थे, कड़ी धूप के कारण बर्फ पिघल चुकी थी।फिर भी स्कीइंग एरिया में लोग कर रहे थे....हमने भी आजमाया और चरखी की तरह घूमते हुए नीचे पहुंच गए। जर्मनी में विदेशी कार BMW का कारखाना है सो उन्होंने विज्ञापन या प्रतीक के तौर पर सबसे उच्चतम चोटी पर कार लगा रखी थी।।लंच वहीं के रेस्तरां में था, बहुत ही अच्छी व्यवस्था....हाथ धोने के लिए वाश बेसिन की जगह लकड़ी का चापाकल।यह सब होते चार बजे वापसी की तैयारी हुई।कारण शाम होने से पहले ट्रेनें बंद कर दी जाती हैं। दुसरे दिन दुबई होते हुए, वहां से आगे मुबई के लिए हमारी उड़ान थी...सुबह हमने होटल छोड़ दिया एयरपोर्ट जाते समय रास्ते में BMW का कारखाना देखने के लिए बस रोकी गई....शो रूम में लगी सैकड़ों चमचमाती, अलग अलग गाड़ियों और मोटरसाइकिल को देख कर उसका वृहद रेंज पता चला....आम तौर पर उतने मॉडल भारत में कम ही देखने को मिलते हैं।यहां से हम यात्रा की सुखद यादें लिए एयरपोर्ट के लिए रवाना हुए। एक लंबी उड़ान के बाद मुबई की धरती पर कदम रखने के बाद ही सकून मिला- एक लम्बी यात्रा कर अपने घर लौटने का सकून।

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माला सिन्हा

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सफ़रनामा - मिश्र

क्रम 1

28 जनवरी, 2011

(1)

हमारे वे मित्र जो फेसबुक पर हैं या नहीं है, और जिन्होंने इस त्रासदी को वहां होने के कारण बहुत नजदीक से महसूस किया है, उनके लिए, उनकी अपनी आपबीती मेरी कलम से ।

होटल के बाहर की ,जो तस्वीरें साथ हैं, वो या तो होटल की बाल्कनी से हम ने खींची थी, या फिर चलती हुई गाड़ी या बस से। तो बात शुरू करते हैं, मुंबई से.....!

मुंबई :

उन दिनों मैं अपने बेटे सहर्ष के पास मुंबई में थी,और मेरे पति अपनी पोस्टिंग पर नोआमुंडी में। नोआमुंडी में टाटा स्टील कंपनी की कच्चे लोहे की खदानें हैं, जो चारों तरफ से घने जंगलों से घिरी हुई हैं जिस कारण यहाँ भरपूर हरियाली है। साथ ही उंचे-नीचे पहाड़ एवं प्राकृतिक सुरम्यता अभूतपूर्व लगती है। जमशेदपुर स्टील प्लांट में कच्चा लोहा यहाँ से रेल मार्ग से जाता है। यह जगह, समुद्र की सतह से 2500 फीट की ऊँचाई पर, नौ पहाड़ों के शीर्ष पर स्थित है, इसलिए इसका नाम 'नोआमुंडी' पड़ा। सच कहूँ तो जमशेदपुर से एक सौ बीस किलोमीटर दूर झारखंड, उड़िसा के बार्डर पर यह एक छोटा सा सुंदर हिल स्टेशन है।

वहां रहते हुए बीच बीच में मैं, कभी सहर्ष के पास मुंबई, तो कभी सुहानी के पास बैंगलोर चक्कर लगा कर महानगर के सैर सपाटों का लुत्फ उठा लिया करती थी। खैर तब मैं मुंबई में ही थी, जब पतिदेव ने फोन पर बताया कि अगले महीने कंपनी की तरफ से कान्फ्रेंस के सिलसिले में "कैरो" जो इजिप्ट की राजधानी है, जाना है।इसका पुराना नाम 'काहिरा' और "मिश्र'' है। सुन कर खुशी का ठिकाना नहीं रहा। टाटा स्टील के अलग अलग डिविजन से सौ आफिसरों का नाम पति पत्नी समेत शामिल था।

ग्रुप बड़ा था, इतने लोगों की टिकट एक साथ, एक फ्लाइट में न लेकर लोगों की सुविधा के अनुसार कोलकाता, दिल्ली और मुंबई से टिकटें बुक की गईं।टिकट से लेकर यात्रा के पूरे प्रबंध का जिम्मा 'थामस एवं कुक ' नाम की ट्रेवल एजेंसी को सौंपा गया था। मेरे उस समय मुंबई में होने के कारण हमनें अपनी टिकट वहीं से बुक करवाई थी। मेरे पति जाने के एक दिन पहले, यानी 27 जनवरी को मुंबई पहुंचे...हम नवी मुंबई के वाशी में रहते थे, और मेरी छोटी बहन वहां से सात - आठ किलोमीटर दूर 'नेरूल' इलाके में रहती थी। जाने वाले दिन, 28 जनवरी की सुबह अपनी बहन से मिलते हुए हम सांताक्रूज में एक पांच सितारा होटल में पहुंचे, जहां हमें इकट्ठा होना था।हमारी फ्लाइट मध्य रात्रि में थी अतः हमारे लंच और डिनर की व्यवस्था वहीं होटल में थी।

वहाँ पहुँच कर अपना सामान कमरे में रखवा कर लाउंज में पहुंचे तो देखा वहां लगभग सभी लोग उपस्थित थे जिन्हें जाना था। लंच और डिनर के बीच में थोड़ा आराम करने का समय था। रात, खाने के बाद हमें दो बसों में एयरपोर्ट ले जाया गया ।

क्रमशः

क्रम 2

29 जनवरी, 2011

(2)

सुरक्षा जाँच के बाद सारी औपचारिकताएं पूरी कर, उत्साहित मन के साथ हम उड़ान भरने को तैयार विमान में बैठ चुके थे....मध्य रात्रि करीब दो बजे हमारा विमान उड़ा।अपने आस पास के सभी चेहरे परिचित थे और माहौल बिल्कुल पारिवारिक, अपना सा।

विंडों सीट पर बैठी मैं उड़ते विमान से नीचे देखती, प्रकृति के विराट,असीमित सौंदर्य, अद्भुत नज़ारे को मन के कैनवास पर उतारती चली जा रही थी.....जिस ऊंचाई पर विमान उड़ रहा था वहाँ से नीचे बहती हुई नदियाँ महीन धागे की तरह दिख रही थीं......कहीं उंचे उंचे पहाड़ हरे ज़िग ज़ैग का आभास दे रहे थे.... कहीं घने जंगलों का गलीचा बिछा था....तो कहीं धरती की पथरीली सतह के रंग बिखरे पड़े थे। बाहर जहां दूर तक नज़र जाती ,आकाश की विस्तृत नीलिमा के नीचे, बादलों के धुंध को चीरता हमारा विमान कभी उनके बीच में गोते लगाता तो कभी उनके ऊपर उठ कर उड़ता चला जा रहा था।

मैं अपने कैमरे से उनकी तस्वीरें खींच रही थी। बीच में दुबई में करीब चार घंटे का ले-ओवर था जहां से हमें आगे के लिए फ्लाईट बदलनी थी। यहां भी सारी औपचारिकताएं पूरी कर हम आगे कैरो के लिए विमान में बैठे। करीब छ-सात घंटे की उड़ान के बाद पायलट ने विमान के कैरो पहुंचने की सूचना दी। धीरे धीरे धरती की ओर बढ़ता विमान कैरो इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर उतरने की तैयारी करने लगा । पूरी रात जागने के बावज़ूद हम थके नहीं थे । बीच बीच में थोड़ी झपकी जरूर आती रही। आपस में हंसी मजाक करते हुए हमने वह उड़ान पूरी की थी ।

हमारा शेड्यूल प्रोग्राम जो था, वह पहले बता दूं कि उसके मुताबिक 29 जनवरी को कैरो के एयरपोर्ट पर मुंबई, दिल्ली, कोलकाता से आने वाली उड़ानों का समय, अलग अलग था, उसी के अनुसार उन्हें होटल में सामान रखने के बाद आस पास लोकल जगहों पर घुमाने का कार्यक्रम था। 30 जनवरी को दिन में होटल के कान्फ्रेंस हाल में टाटा ऑफिसर्स की मीटिंग रखी गई थी एवं हम महिलाओं को शापिंग के साथ दूसरे टूरिस्ट स्पॉट दिखाने का प्रोग्राम था, उसी के अनुसार लंच डिनर की व्यवस्था की गई थी जिसमें भारतीय खाने को भी शामिल करने का निर्देश, ट्रेवल एजेंसी को पहले से दिया गया था। पहचान के लिए हमें अपने अपने नाम का परिचय पत्र दिया गया था, जिसे ट्रिप के दौरान, हर समय अपने पास रखने को कहा गया था।

रात में 'नाइल' नदी ,जो विश्व की सबसे लंबी नदी है एवं कैरो शहर के बीचोंबीच बहती है उसमें क्रूज से सभी को घुमाना तय था....डिनर के साथ ही क्रूज

पर बेली डांस की प्रस्तुति भी शामिल थी...इस नृत्य में नर्तकी की मोहक भाव भंगिमा में उसकी नाभि की अहम भूमिका होती है।

इजिप्ट, दुनियां के सात अजूबों में से एक, पिरामिडों एवं स्फिनक्स के लिए जाना जाता है....जिसके बारे में हम बचपन से पढ़ते आए हैं। इन्हें 'गीजा के पिरामिड ' भी कहा जाता है,जो हर साल दुनिया के अलग अलग हिस्सों से लाखों सैलानियों के आकर्षण का केंद्र रहा है।

ये पिरामिड, प्राचीन मिश्र के राजाओं की कब्रें हैं, जिन्हें उस काल में 'फराओ' कहा जाता था। मृत्यु के बाद इनके शरीर को कई प्रकार के मसालों से तैयार किया गया विशेष लेप लगाया जाता था। जिस कारण इनका शव हजारों वर्षों तक खराब नहीं होता था। जिसे 'ममी' कहते थे।इन कब्रों मे फराओ के

ऐशोआराम के सारे साजोसामान के साथ हीरे जवाहरात, सोने चांदी की बेशुमार दौलत, नौकर चाकर, हाथी, घोड़े,ऊंट,आदि तमाम इंतज़ामात के साथ दफना दिया जाता था। इसके पीछे मिस्त्रवासियों का ढृढ़ विश्वास यह था कि उन्हें जन्नत में भी वही ऐशोआराम मिलेगा, जिसकी उन्हें आदत थी। ये पिरामिड ईसा पूर्व तीन हजार वर्ष पुराने हैं।आज भी खुदाई में कहीं कहीं 'ममी' मिल जाती है।

कैरो यूं तो रेगिस्तानी इलाका है, बावजूद इसके लाखों सैलानियों के आगमन के कारण, यहां की सुविधाएं किसी विकसित देश की तरह हीं हैं। बड़े बड़े पांच सितारा होटलों की कमी नहीं है, उस पर नाइल नदी का शहर के बीच से बहना.... नदी के दोनो किनारों पर दोनों तरफ होटलों की कतारें, इसके आकर्षण को बढ़ाता है। यह तो हुई कैरो की बात।

खैर, उस लंबी उड़ान के बाद, दिन के करीब बारह बजे, पायलट की अगली घोषणा के साथ ही हमारी प्रतीक्षा की घड़ियां समाप्त हुई। हमने खिड़की से बाहर झांका। नीचे दूर तक विस्तृत रेगिस्तानी इलाका नजर आ रहा था कि अचानक माथा ठनका। ऐसा महसूस हुआ कि हमारा विमान रनवे पर उतरने की बजाए शहर के ऊपर ऊपर चक्कर काट रहा है। हमने अनुमान लगाया कि शायद रनवे खाली नहीं हो। करीब एक घंटे चक्कर काटने के बाद, विमान कैरो की धरती पर उतरने की तैयारी में रनवे की ओर बढ़ा...विमान के रूकने के बाद अन्य यात्रियों की तरह हमनें भी अपना केबिन लगेज लिया एवं उतरने के लिए लाइन में लग गए। दस ग्यारह घंटे की उड़ान के बाद लोगों के क्लांत चेहरे पर पहुंचने का सुकून और उत्साह झलक रहा था।

क्रमशः

क्रम 3

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हम प्राचीन मिस्र की शहजादी,क्लियोपेट्रा की धरती पर खड़े थे ,जिसके अप्रतीम सौंदर्य एवं तीक्ष्ण बुद्धिमता की चर्चा पूरे विश्व में विख्यात है.... प्राचीन मिस्त्र की सभ्यता उस काल में काफी समृद्ध और सुसंस्कृत रही....ईसा पूर्व तैतीस सौ वर्ष पहले मिस्र का एक चर्चित फ़राओ तूतनख़ामेन, जिसे मात्र नौ साल की उम्र में मिस्र का राजा बनाया गया, उसने अपने पिता के ख़िलाफ जा कर देश के कई नियमों को बदला, एवं सूर्य देव की पूजा बंद करवा कर चंद्रमा की पूजा शुरू करवाई। इसके साथ ही शासन संबंधित कई बदलाव किए, उसकी उन्नीस वर्ष की आयु में रहस्यमय परिस्थितियों में मौत हो जाने के बाद उसके शरीर को ममी बना कर सोने से मढ़वा कर दफनाया गया था। जिसकी ममी हाल ही में उन्नीसवीं सदी में मिली.....जिसके साथ ही सोने जवाहरात का ज़खीरा मिलने की बात बताई गई। इसी तरह मिस्र की एक ख़ूबसूरत महारानी नेफ़रतीति की चर्चा भी आज तक होती है जिसे तूतनख़ामेन की सौतेली माँ बताया गया। नेफ़रतीति की ममी भी तूतनख़ामेन की ममी के पास ही मिलने की बात बताई गई।

मिस्र का ऐसा वैभवपूर्ण इतिहास...... .जिसके बारे में बचपन से अब तक पढ़ी गई कहानियाँ, उन क्षणों में बिजली की तरह मन में कौंध गईं। हम विमान से बाहर निकल कर आगे बढ़े ,सामने देखने पर लगा जैसे एयरपोर्ट पर बहुत अफ़रा तफ़री मची हुई है। माज़रा कुछ समझ में नहीं आया....कुछ उड़ती सी ख़बर भी मिली किंतु वास्तविक स्थिति तब मालूम हुई, जब वहां पहले से खड़े, हमारे ट्रेवल एजेंसी के प्रतिनिधि ने बताया कि शहर में दंगा हो गया है....एवं कर्फ्यू लगा दिया गया है, जिस कारण हमें एयरपोर्ट पर ही तब तक रूकना पड़ेगा जब तक कि स्थिति नियंत्रित नहीं होती। हमें होटल पहुंचाने वाली बस एयरपोर्ट पर लगी हुई तो थी, लेकिन बाहर की स्थिति नियंत्रण से बाहर थी। बसों, गाड़ियों को कर्फ्यू के बावजूद, दंगाई जला दे रहे थे......कुछ ही देर के बाद, फिर तो जिस सच्चाई से सामना हुआ, उस ने सभी यात्रियों के होश उड़ा दिए।

मिस्र के पिछले कई दशकों के इतिहास में पहली बार ऐसी घटना थी जिसमें जनता लाखों की तादाद में सरकार के खिलाफ़ सड़क पर निकल आई थी......कहा जाता है, कि करीब दस लाख लोग तहरीर स्क्वायर पर विरोध प्रदर्शन में जुटे थे जिन पर बेरहमी से प्रहार किया गया......लाठी, गोली तो छोटी बात थी, दमन का आलम यह था कि तहरीर स्क्वायर खाली करवाने के लिए निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर ट्रक और टैंक चढ़ाने से भी गुरेज़ नहीं किया गया ,परिणाम स्वरूप दर्जनों लोग मारे गए.....और सैकड़ों घायल हुए। इस से परस्थिति और बिगड़ गई एवं सरकार के नियंत्रण से पूरी तरह बाहर हो गई।

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इसी अराजकता की स्थिति में हमलोगों ने मिस्र की धरती पर कदम रखा।

इस घटना की पृष्ठभूमि को समझने के लिए थोड़ा सा पीछे जाते हैं......मिस्र एक इस्लामिक देश है, वहां की सरकार अभी तक तानाशाही व्यवस्था के तहत शासन करती चली आई थी। पिछले तीस वर्षों से तत्कालीन राष्ट्रपति होस्नी मुबारक सत्ता पर काबिज़ थे । उनके शासन के खिलाफ, 2011 आते आते असंतोष ,चरम पर पहुंच गया था । तानाशाही का जहर इस हद तक समाज में फैल गया था कि कुछ युवा संगठनों ने होस्नी मुबारक की सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए उग्र आंदोलन प्रारंभ कर दिया था , जिसे 'मुस्लिम ब्रदरहुड' एवं आम जनता का व्यापक समर्थन मिला। प्रारम्भ में आंदोलन को सख्ती से दबाने की कोशिश की गई परंतु 29 जनवरी, 2011 को अचानक आंदोलन ने हिसंक रूप ले लिया। दूसरी तरफ होस्नी मुबारक के समर्थक भी सड़कों पर उतर आए..... परिणाम स्वरूप शहर में दंगे शुरू हो गए....हमारे कैरो हवाई अड्डा पर उतरने के पहले ही शहर में कर्फ्यू लग चुका था.....किसी भी व्यक्ति को देखते ही गोली मारने का आदेश पुलिस को मिल चुका था.....इतना सब कुछ जानते हुए भला किसकी हिम्मत होती कि वह एयरपोर्ट से बाहर निकलने की सोंचे।

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इसी दौरान पता चला कि दिल्ली से आने वाली, हमारी टीम के दूसरे सदस्यों की फ्लाइट सुबह आठ बजे अपने नियत समय पर पहुंच गई थी, उस समय स्थिति बिल्कुल सामान्य थी,अतः इस से आने वाले हमारे मित्र, सकुशल, सुरक्षित होटल पहुंच गए थे,एवं तय कार्यक्रम के मुताबिक उन्हें आस पास की जगहों पर दो तीन घंटे घुमा भी दिया गया था जो बात हमें बाद में पता चली .....हमारी भूख, प्यास, थकान सब काफूर हो चुके थे.....एक तो विदेश की धरती.....अनजाना परिवेश,.....भाषा की समस्या....उस पर दंगों की आग में झुलसता शहर.....गाड़ियों, बसों के जलाए जाने की ख़बरें..... बीच बीच में कहीं दूर गोलियों के चलने की आवाज। बेहद डरे हुए और आशंकित मन लिए, हम सभी एयरपोर्ट पर ही अपने को सुरक्षित महसूस कर रहे थे....हाँ, फ़िर भी इतना भरोसा था कि कुछ भी हो, कंपनी हमें किसी तरह की हानि नहीं होने देगी। कारण यह भी था कि हमारी संख्या अधिक थी इसलिए हमें एक दुसरे के साथ से हौसला मिल रहा था।

एयरपोर्ट के सारे टी वी चालू थे, जिससे शहर के अलग अलग तमाम हिस्सों से दंगो का लाइव प्रसारण हो रहा था, जिसे देख, हर यात्री का चेहरा ख़ौफजदा था....सुबह के बाद जितनी भी फ्लाइट्स आई थीं, सभी के यात्री एयरपोर्ट पर फंसे हुए थे....उनकी नज़रें टी वी स्क्रीन पर टिकी थीं......वहां के लोग गोरे चिट्ठे, एवं तीखे नाक नक्श वाले थे....महिलाओं की सुंदरता ध्यान खींच रही थी। वे सर से पैर तक ढकीं , बुरके की तरह के ही तीन-चार तहों के 'गाउन' जैसे ,काफी आधुनिक परिधानों में थीं। आतंक के माहौल में एयरपोर्ट, रेलवे स्टेशनों की तरह लोगों से पटा पड़ा था। इसी दौरान, कोलकाता से आने वाली तीसरी फ्लाइट भी पहुँच गई थी, जिससे हमारे और साथी लोग भी आ गए थे, जिन्हें देखकर हमारा मनोबल थोड़ा और बढ़ गया........अंदर दम घुट रहा था.....फ्लाइट्स आती जा रही थी.....लोगों की भीड़, एयरपोर्ट के अंदर बढ़ती जा रही थी....पैर रखने की जगह नहीं थी, अतः शाम होते होते जितने लोग अंदर थे सभी को बाहर कर, अंदर एयरपोर्ट बिल्कुल खाली करवा दिया गया.....बाहर तो भीड़ के कारण बैठने की भी जगह कहीं नहीं थी, इसलिए हम लोग, बाहर एयरपोर्ट के कैंपस में इधर उधर घूम रहे थे.... अंधेरा हो चला था......बाहर हड्डियों को भेदने वाली काफी सर्द हवा चल रही थी जिसके कारण खुले में बहुत ज्यादा ठंड महसूस होने लगी .... ठंड से बचने का कोई उपाय नहीं दिख रहा था....हम बहुत गरम कपड़ा भी साथ नहीं ले कर गए थे....एक शाॅल या स्वेटर ही हमारे पास था। आखिरकार, ट्रेवल एजेंट को बोल कर बस, जो वहाँ हमारे लिए लगी हुई थी, उसके गेट खुलवाए गए.......बस में अंदर बैठने के बाद थोड़ा आराम मिला....., उसके बाद चाय काॅफी की तलब महसूस हुई तो काॅफ़ी - स्टाॅल से हमने काॅफ़ी ली.......पहली सिप में स्वाद थोड़ा अजीब सा लगा.....इस बाबत हमनें जब दुकान वाले से दूध के बारे में पूछा तो उसने टूटी फूटी अंग्रेजी में बताया कि काॅफी में इस्तेमाल दूध, ऊँट का है। सुन कर ध्यान आया कि, यहां गाय या भैंस का दूध कहां से आएगा .....उपाय क्या था, सोंच कर हमने जैसे तैसे दो चार घूंट काॅफी गटक ली।

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माला सिन्हा

क्रमशः

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क्रम 4

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29 जनवरी, 2011

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खौफ और अनिश्चितता के इस माहौल में बातें तो यहां तक भी होने लगीं थी कि अगर स्थिति पर नियंत्रण नहीं हुआ तो हमें एयरपोर्ट से ही वापस भारत लौटना पड़ सकता है । जैसे तैसे कर के शाम हुई.....अंधेरा होने के कारण दंगा थोड़ा सा शांत हुआ......वह भी इस लिए, कि होस्नी मुबारक को, सेना के दबाव मे बिना गद्दी छोड़े, तत्काल एक कमेटी बना कर अपनी सत्ता, कमेटी को सौंपनी पड़ी । रात दस बजे के करीब एयरपोर्ट के सुरक्षा अधिकारियों की घोषणा के बाद हमारे ट्रेवल एजेंट को हमें होटल ले जाने की अनुमति दी गई तो सुन कर थोड़ी राहत मिली.....लेकिन तब मुश्किल यह हुई कि बस तो जा नहीं सकती थी, और दंगों के कारण वहां कुछ टैक्सी या प्राइवेट कारें, जो सुबह से फँसी रह गई थीं, वो गिनी चुनी संख्या में थीं. ....और जाने वाले लोग ज्यादा....अतः दो दो परिवार किसी तरह आपस में एडजस्ट कर होटल रवाना हुए।हमनें भी मुंहमांगा किराया दे कर एक टैक्सी बुक की एवं श्रीमती एवं श्री आर के श्रीवास्तव के साथ होटल रवाना हुए।

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एयरपोर्ट से होटल के रास्ते में हमने देखा, रात के

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नीरव सन्नाटे को चीरती, सड़कों पर परेड करती सेना के जवानों की टुकड़ियां......वातावरण में गूंजती, उनके भारी गमबूटों की आवाजें.....सेना की गश्त लगाती गाड़ियां .....रात के अँधेरे में दैत्य की तरह रेंगती मशीनगनें, टैकं एवं अन्य मारक हथियारों से सड़कें पटी हुई थी..... पूरे शहर पर सेना का कब्जा हो चुका था.....टैक्सी ड्राइवर हमें मुख्य मार्ग से न ले जा कर , अंदर के रास्तों से ले जा रहा था....उसे पता था कि वह किस तरह हमें होटल पहुंचा सकेगा।रास्ते में जलती हुई गाड़ियाँ दिखीं.....कई जगह हमें जलती हुई गाड़ियों के पास से, या जली हुई गाड़ियों के अवशेष के उपर से, तो कभी उसमें से निकलते हुए धुएँ के बीच से निकलना पड़ा।

कई जगहों पर सेना ने हमें रोका। हमारी गाड़ी की जांच की गई....टैक्सी ड्राइवर से कुछ पूछा उन्होंने....जान सांसत में थी हमारी.....उस वक्त हमारी मानसिक स्थिति जो थी, वह शायद अब मैं नहीं बता पाऊं.......किसी तरह हम होटल पहुंचे। टैक्सी ड्राइवर को भाड़े के अलावा सकुशल पहुँचाने के लिए अच्छा टिप दिया और राहत की सांस ली।

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होटल पहुँचते रात के एक बज रहे थे.....लाउंज में काफी चहल पहल थी....जो लोग सुबह पहुंच गए थे, उन से मुलाकात हुई.....उन्हें सुबह तय कार्यक्रम के तहत घुमा दिया गया था....होटल के कर्मचारी भाग दौड़ में काफी व्यस्त दिखे....सुबह पहुंचे लोगों में से कुछ लोग ग्रुप मैनेजर के साथ हम सभी की प्रतीक्षा कर रहे थे, अतः हम नीचे लाउंज में ही हाथ मुँह धो कर थोड़ा बहुत कुछ खा कर अपने कमरे में पहुंचे।हमारा सामान वहां पहले पहुंच चुका था.....हमने टी वी आन किया.....हर चैनल पर दंगों का लाइव प्रसारण चल रहा था....आधी रात के समय शहर के मुख्य चौक 'तहरीर स्क्वायर' की तस्वीरें आ रही थीं, जो इन दंगों का साक्षी बन चुका था....वह रात कैरो शहर के इतिहास के पन्नों में कालरात्रि के रूप में दर्ज हो चुकी थी।कर्फ्यू के बावजूद शहर में जहां तहां घटनाएँ घटती चली जा रही थीं....आगजनी....गोलीबारी.....हत्या.....महिला पत्रकारों, स्त्रियों के साथ बदसलूकी की लगातार खबरें....जैसे कोई जलजला आ गया था।

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न्यूज देखते देखते कब नींद आई, पता ही नहीं चला।

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सुबह तड़के, आसमान में हेलिकॉप्टरों की गड़गड़ाहट की आवाज से आंख खुल गई। बाहर बाल्कनी में जा कर झांका तो बदन में झुरझुरी हो आई ......अनहोनी की आशंका से मन सिहर उठा...आसमान में सेना के चार पांच हेलिकॉप्टर के साथ कुछ फाइटर एयरक्राफ्ट चक्कर लगा रहे थे....होटल की इमारत बत्तीस मंजिला थी, और हमारा कमरा सत्रहवीं मंजिल पर था, सो दूर तक शहर दिख रहा था....जगह जगह पर धुएँ के गुबार उठ रहे थे....दूर से शोर शराबा सुनाई दे रहा था....कुछ लोगों का हुजूम नज़रों के आगे दूर, नाइल नदी के पुल के ऊपर से गुज़रता दिखाई दिया.... नारा लगाते लोगों की आवाजें हवा के साथ तैरती आ रही थी। यह तो बाहर का दृश्य था । अंदर की स्थिति यह थी कि, हाउस कीपिंग के लिए आया वेटर, एक एक लीटर पानी की दो बंद बोतलें रख गया, साथ ही यह भी बता गया कि, होटल का बहुत सारा स्टाफ आज नहीं आया है, हमनें कमरे में रखे, चाय, चीनी, पाउडर दूध के पाउच से उसी पानी में इलेक्ट्रिक केटल में चाय बना कर पी और तैयार हो कर नीचे डाइनिंग एरिया में पहुंचे। नाश्ते की अच्छी व्यवस्था थी....सभी लोगों के साथ हमनें नाश्ता किया.....अब तक हम पिछले दिन के झेले गए आतंक से थोड़े मुक्त हो गए थे.....कारण यह भी था कि, होटल में अपने साथियों के साथ हमनें अपना हौसला बनाए रखा था।

वहीं पर हमें यह बताया गया कि, होटल के बाहर कहीं भी जाना संभव नहीं है। स्थिति भांप कर हमने अपना सारा कार्यक्रम मन ही मन रद्द मान लिया....होटल में रूके रहना ही बेहतर था। चुकि होटल, पांच सितारा था एवं नाइल नदी बिल्कुल नीचे से बह रही थी.... इस लिए मन बहलाने के ख्याल से बेहतर जगह थी। जनवरी महीने की गुनगुनी धूप में हम सब ने वहीं नदी के किनारे डेक पर अपनी बैठक जमा ली। नाइल के दूसरे किनारे पर बड़े बड़े होटलों की इमारतें खड़ी थीं, जिनके मोनोग्राम धूप में चमक रहे थे। सभी अधिकारी कान्फ्रेंस हाल में मीटिंग में थे और हम लोग अलग अलग ग्रुप में बंट कर अपना समय काटने की कोशिश करते रहे....जो काटे नहीं कट रहा था....यूँ तो हर कोई आपस में हंस बोल रहा था, लेकिन मन ही मन हम पर जो बीत रही थी, वह हम ही जान रहे थे । अपने देश से दूर हर कोई, बच्चों, घर, परिवार की चिंता में परेशान था....संपर्क के सारे साधन ठप्प पड़े थे.....समय जैसे रूक गया था। तभी पता चला कि कंपनी के एक अधिकारी श्री श्रीवास्तव का सिम काम कर रहा है, जान कर मैंने उन से अनुरोध किया कि मुझे सुहानी या सहर्ष से किसी से भी बात करवा दें।

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हम सभी को यह चिंता भी सता रही थी कि, भले हम होटल में अभी तक सुरक्षित हैं किंतु यहां से जो खबरें मीडिया के जरिए बाहर जा रही थी उन से हमारे बच्चे या घर वाले कितने परेशान होंगे। मेरे दोनों बच्चे महानगर में थे इसलिए वहां फोन लगने की संभावना ज्यादा थी.....किसी एक से भी बात हो जाने से सभी को हमारी कुशलता की खबर मिल जाती। श्री श्रीवास्तव ने सुहानी से मेरी बात करवा दी.....एक मिनट से भी कम समय में मैं ने सिर्फ इतना ही कहा कि "हम लोग बिल्कुल ठीक हैं, सभी को बता दो" और सुहानी ने उसी समय जिम्मेदारी पूर्वक परिवार में सभी लोगों को हमारी सलामती की खबर दे दी थी।

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यूँ तो हमारा होटल शहर से थोड़ा अलग हट कर था

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किंतु बगावत के लपटों की आंच वहाँ तक पहुंच रही थी।दिन भर सेना के एयरक्राफ्ट एवं हेलिकॉप्टर उड़ते रहे....उनकी गड़गड़ाहट वातावरण को आतंकित और भयावह कर रही थी.....बीच बीच में वे इतना नीचे आ जाते कि लगता, होटल की छत से टकरा जाएगें.... हर वक्त अनहोनी की आशंका में झूलते हुए हमने किसी तरह वह दिन पार किया।

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अरसे से चल रहा आंदोलन बगावत का रूप ले चुका था। मिस्र के इतिहास में इन धधकते पलों के गवाह बनते जा रहे थे हम। हमारी नज़रो के सामने से एक आततायी तानाशाह का तख्ता पलटने वाला था। और फिर देखते देखते राष्ट्रपति होस्नी मुबारक का तख्ता पलट चुका था.....तरह तरह की अटकलें लगाई जा रही थी.....ब्रिटिश न्यूज चैनल 'बी बी सी' से जो खबरें आ रही थी उस से बाहर की स्थिति साफ समझ में आ रही थी। होस्नी मुबारक अपने कुछ वफ़ादार सिपाहियों के साथ, अपना महल छोड़ कर कहीं जा छिपे थे। स्थिति बद से बदतर होती चली जा रही थी।

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टाटा प्रबंधन की, भारत और मिश्र में भारतीय दूतावास से लगातार बातचीत हो रही थी, जिसके बारे में हमें वहां उपस्थित अपने वरिष्ठ अधिकारियों से पता चला, जो वहां से लगातार टाटा प्रबंधन के संपर्क में थे। उन्होंने बताया कि भारत से चार्टड विमान भेजने के प्रयास किए जा रहे हैं, अगर मिल गया तो कल हमें वहाँ से निकाल लिया जाएगा।

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हम इतिहास के पन्नों में, इन सारी खौफनाक घटनाओं के साक्षी बन चुके थे.....किसी समय, कुछ भी होने की संभावना बनी हुई थी.....डर यह भी सता रहा था , कि कहीं किसी एयरक्राफ्ट ने होटल पर बम गिरा दिया तो? पता नहीं हम अपने देश लौट भी पाएंगे या नहीं.....! यह आशंका हर वक्त दिमाग पर हावी थी।

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दोपहर में लंच के समय ,माहौल बदलने के लिए एक छोटा मोटा सांस्कृतिक कार्यक्रम, शाम को प्रस्तुत करने की योजना बनी। उन संकट के क्षणों में भी खुशियों के कुछ पल तलाशने की कोशिश की हमनें।

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हमारे ग्रुप में प्रतिभा की कमी नहीं थी, सो महिलाओं ने डिनर के पहले कान्फ्रेंस हाल में गाना, स्किट एवं फैशन शो के साथ बहुत अच्छा कार्यक्रम प्रस्तुत किया। श्रीमती दिवाकेरा से लता जी का गाना सुन कर तो सब झूम उठे।

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इस संकट की घड़ी में भी, शेड्यूल के मुताबिक डिनर के मेन्यू में कोई तब्दीली नहीं हुई थी, एवं भारतीय आइटम के साथ खाने की बहुत अच्छी व्यवस्था थी।

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डिनर के बाद हम ऊपर कमरे में सोने आ गए। टी वी पर अभी भी उसी तरह के समाचारों की लाइव कवरेज आ रही थी।शहर में त्राहि त्राहि मची हुई

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थी.....किसी तरह वह 30 जनवरी का दिन पार हुआ....... हमने भगवान से प्रार्थना की, कि हमें वहां से जितनी जल्दी हो सके, निकाल लें और अपनी आंखे सोने के लिए मूंद लीं।

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31 जनवरी, 2011

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अगली सुबह जब नींद खुली....देखा, पीने का पानी नहीं था.....रूम सर्विस की घंटी बजाई....बहुत देर के बाद कोई कर्मचारी आया, जिसने बताया कि होटल की सर्विस वैन जिसमें राशन, पानी, फल, सब्जियां वगैरह आती हैं...एक भी नहीं आई हैं....अतः हमें नल के पानी से काम चलाना पड़ेगा...हमने नाश्ता का पूछा, तो उसने टूटी फूटी अँग्रेजी में बताया कि बेकरी आइटम के अलावा, किचन के स्टोर में जो फल वगैरह पहले से उपलब्ध होगा, वह रहेगा।

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सही भी था....सर्विस वैन आती भी भला कैसे....शहर में जो संकट फैला हुआ था, उस में तो लोगों की जान पर बनी हुई थी।

खैर उस कर्मचारी की सूचना पर, हमनें कमरे में नल के पानी से चाय बनाई। शायद नाइल नदी का पानी रहा हो। तैयार हो कर नीचे पहुँचे, कि जो कुछ भी होगा थोड़ा बहुत खा लेते हैं....डाइनिंग हाल में एक मैनेजर और दो तीन स्टाफ की ही उपस्थिति थी.....वे लोग वहीं होटल में ही दो दिनों से रुक गए थे.....वैसे भी पूरे होटल में इक्का दुक्का वे ही कर्मचारी नजर आ रहे थे, जो वहाँ रूके हुए थे या जिनका घर आस पास में था।

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टेबल पर बेकरी आइटम के अलावा भी बहुत कुछ था....हालाँकि जो लोग बिल्कुल शाकाहारी थे, अण्डा भी नहीं खाते थे, उनके लिए समस्या यह थी कि पता नहीं चल रहा था, कौन सा आइटम वेज है और कौन सा नॉनवेज.....ख़ैरियत यह थी कि फल रखे हुए थे, जिससे उन्होंने काम चलाया। डाइनिंग हाल में पानी की बंद बोतलें दिखीं जो उन्होंने खाने के समय के लिए रखा था, हमलोगों ने वहाँ से पानी ले कर प्यास बुझाई। किसी समय नल का पानी भी उबाल कर पीने के लिए ठंडा करना पड़ा।

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नाश्ते के बाद हम यूं ही होटल में इधर उधर घूमते, भटकते रहे....तस्वीरें खींचते रहे ...कुछ लोग अपने कमरे में लौट गए.... करने को कुछ था नहीं सो कुछ लाउंज में बैठ कर अपना समय काट रहे थे तो कुछ ने डेक को चुना। हर कोई इस इंतजार में था कि कब चार्टर्ड विमान भेजे जाने की पक्की खबर मिले। दोपहर में जब हम लंच के लिए इकट्ठे हुए तो डाइनिंग टेबल पर जो खाना लगा हुआ था उसे देखकर हैरानी के साथ सुखद आश्चर्य हुआ.....टेबल पर कांटिनेंटल के साथ बेकरी आइटम तो थे ही, साथ में बिल्कुल शुद्ध भारतीय खाना, चावल, दाल, और आलू टमाटर की सब्जी भी थी। इतना कुछ सामान जो उनके स्टोर में था, जिसे हमारे अधिकारियों ने किचन में खड़े होकर अपने सामने निर्देश दे कर बनवाया था। दो दिनों से बेकरी आइटम खा-खा कर ऊब चुके लोगों ने इसे बहुत पसंद से खाया....जिसका स्वाद उन्हें शायद अब तक याद हो। होटल में न जाने कितने डाइनिंग हाॅल थे। हर नाश्ते खाने की व्यवस्था अलग अलग डाइनिंग एरिया में रहती।

उस दिन भी स्थिति जस की तस बनी रही....हाँ, शाम में कर्फ्यू में कुछ देर के लिए ढील दी गई थी.... ..हम मानसिक रूप से पहले दो दिन के आतंक से बाहर निकल गए थे....शाम की चाय हमने अपने एक मित्र के परिवार के साथ उनके कमरे में जा कर बहुत सुकून के साथ पी।

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चूंकि हमारा होटल से निकलना मुश्किल था, इसलिए हमारे ट्रेवल मैनेजर ने वहां की लोकल पेंटिंग्स के सप्लायर को दिन में होटल में ही बुलवा लिया था....सोवेनियर की दुकान लाउंज में ही थी। हालांकि पेंटिंग्स की काफी कीमत बता रहा था फिर भी हमने निशानी के तौर पर एक दो पेंटिंग्स और सोवेनियर खरीदा। होटल का जो मुख्य लाउंज था, उसमें भगवान बुद्ध की लगभग छत छूती विशालकाए प्रतिमा देख कर सुखद आश्चर्य हुआ। साथ ही अपने पाटलीपुत्र का समृद्ध गौरवशाली इतिहास याद आया। जो इस बात का जीता जागता प्रमाण था कि उस सदी में बिना किसी मुक्कमल साधन के दुनिया के कोने कोने तक कैसे भगवान बुद्ध का संदेश पहुंचा होगा।

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हमारे कमरे की बाल्कनी से जहां एक ओर शहर का भयानक मंजर दिख रहा था.....नाइल नदी के ऊपर जो पुल था उस पर से गुजरते हुए लोगों का हुजूम दिन भर जुलूस की शक्ल में गुजरता हुआ नारे लगाता जिस ओर जा रहा था, उसे देख कर हमने अनुमान लगाया कि शायद वे शहर के मुख्य चौक 'तहरीर स्क्वायर' की तरफ जा रहे हैं क्योंकि उसी दिशा में दूर से जगह जगह धुआं उठता दिखाई दे रहा था, तो दूसरी ओर की दिशा में बहुत दूर गीजा के पिरामिड दिखाई दे रहे थे, जिसे देखने हम इतनी दूर से आए थे....यह एक अच्छी बात हुई.....हालाँकि सामने जा कर पिरामिड नहीं देख पाने का मलाल तो बहुत हुआ, किंतु 'जान है तो जहान है' मान कर हमनें संतोष कर लिया।

रात डिनर के लिए जब हम डाइनिंग एरिया में पहुंचे, तब पता चला कि एयर इंडिया के दो चार्टर्ड विमानों की व्यवस्था हो गई है, और कल सुबह यानी 1 फरवरी को हमें लेने पहुंचेगा.....सुन कर किसी घुटन भरी कैद से निज़ात मिलने जैसा महसूस हुआ। सभी ने राहत की सांस ली....कमरे में लौट कर हमने अपना सामान समेट कर सूटकेस लगभग पैक ही कर लिया.....भगवान से सकुशल विमान पहुंचा देने की प्रार्थना की.....और सुबह के इंतजार में सोने की कोशिश करते हुए आंखे बंद कर ली।

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क्रमशः

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क्रम 7

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1 फरवरी, 2011

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सुबह कमरे में चाय पी कर हम फटाफट तैयार हो कर सामान सहित नीचे लाउंज में पहुंचे.... वहीं सभी को इकठ्ठा होना था। एयरपोर्ट पहुँचाने वाली बस पहले ही लग चुकी थी। समय की कमी के कारण पानी की बंद बोतल के साथ नाश्ता का पैकेट, होटल से पैक करवा कर बस में रखवा दिया गया था।

तभी फिर उहापोह की स्थिति उत्पन्न हो गई जब पता चला कि पहला विमान पहुंचने हीं वाला है, और दूसरा तीन चार घंटे बाद पहुंचेगा। टाटा कंपनी के अलग अलग डिवीजनों के हिसाब से नामों की लिस्ट बन चुकी थी अतः भारतीय दूतावास ने एक विमान की लगभग कुछ सीटें हम टाटा वालों को और बाकी दूसरे सैलानियों के बीच बांट दी थी , क्योंकि हम टाटा के लोगों के अलावा, अन्य भारतीय सैलानी भी वहां उसी मुसीबत में जहां तहां होटलों में फंसे हुए थे ।

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हां तो हुआ यह था कि भारतीय दूतावास ने नामों की जो लिस्ट तैयार की थी,उसमें हमारा नाम पहले विमान से जाने वालों में था....दूसरे विमान से जाने वालों को तब तक होटल में ही रूकना था। यह जान कर पहले जाने वाले लोगों के चेहरे पर इस विपत्ति से छुटकारा पाने की तसल्ली झलकने लगी ,जब कि बाकी लोगों के चेहरे पर घबराहट भरी मायूसी छा गई। हमें होटल में यह भी कहा गया कि अगर रास्ते में सब कुछ ठीक रहा तो बाहर ही बाहर हमें रास्ते से ही पिरामिड दिखा दिया जाएगा।

इसी दौरान, लाउंज में लोगों की अफरा तफरी और आसमान में फाइटर प्लेन एवं हेलिकाप्टरों की गड़गड़ाहट मिल कर वातावरण को अनिश्चित एवं आतंकित कर रहे थे......जाने वाले जितनी जल्दी हो सके, वहां से निकल जाना चाहते थे....जिन्हें रूकना पड़ रहा था, वे एक पल वहां रूकना नहीं चाह रहे थे......अगले पल क्या होगा, यह आशंका सभी के मन को कुरेद रही थी।

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इस दौरान पहले जाने वाले लोगों के नाम पुकारे जाने लगे तो जाने वालों में पांच छः लोग अनुपस्थित पाए गए.....उनकी खोज बीन शुरू हुई तो किसी ने बताया कि वे लोग तड़के, पिरामिड देखने निकल गए हैं....उनकी बात चीत उस बंदे ने रात में सुनी थी। इस माहौल में उनके इस तरह से बाहर निकलने से दूसरी चिंता शुरू हो गई कि वे पता नहीं किस हाल में, कहां हैं....उन से कोई संपर्क होना मुश्किल था......इस संकट में अचानक खड़ी हो गई इस परिस्थिति ने बाकी लोगों को काफी चिंतित किया। अभी यह सब चल ही रहा था कि वे हमारे निकलने के ठीक पहले किसी तरह पहुंचे।

आखिर एक एक कर के हम सभी लोग बस में बैठने लगे। जो लोग रूक गए थे उन्हें छोड़ कर निकलना हमें अच्छा नहीं लग रहा था, लेकिन करते क्या उन्हें सिर्फ दिलासा ही दे सकते थे, जो हमनें किया ....और बस में बैठ कर रवाना हुए।

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हम दूसरी बार कैरो की सड़कों पर गुजर रहे थे, दूर तक जाने वाली सड़क बिल्कुल सुनसान थी......हर तीन- चार सौ मीटर की दूरी पर सेना की मशीनगनें और टैंक खड़े थे....इतने टैंक और मशीनगन तो हमने फिल्मों में भी एक साथ नहीं देखा था ...इक्का दुक्का गाड़ियां भी नज़र आ रही थीं......जनजीवन जो तीन दिन से बिल्कुल ठप्प हो गया था, वह कर्फ्यू में थोड़ी ढील पड़ने से पटरी पर आता दिखा..... गीजा की तरफ बढ़ते हुए सड़क पर दोनों ओर पक्के मकान बने हुए दिखे । तीन चार मंजिला मकानों की संख्या भी कम नहीं थी। यह देखकर हैरानी हुई कि ज्यादातर मकानों की खिड़कियों में पल्ले नहीं लगे थे, एवं बिना प्लास्टर के थे....बिलकुल बंद बंद से। या यूं कहें कि संपूर्ण रूप में बने हुए मकान कम ही दिखे, कारण जो भी रहा हो। बीच बीच में रेगिस्तानी इलाका होने के बावजूद हरे भरे खेत भी सड़क के किनारे मिले।

आखिरकार, गीजा शहर के करीब पहुंचते ही हमें दूर से पिरामिडों के शीर्ष दिखाई देने लगे थे....मन रोमांचित हो आया, चूंकि समय कम पड़ रहा था और हमें वापस लौट कर एयरपोर्ट पहुंचना था, इसलिए एक जगह, जहाँ से पिरामिड कुछ ज्यादा स्पष्ट दिखाई दे रहे थे, वहां बस रोकी गई.....लोगों ने उतर कर तस्वीरें लीं, और दूर से ही उन पिरामिडों से विदा लेकर, हम वापस एयरपोर्ट लौट चले।

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एयरपोर्ट पहुंच कर हम सब ने नाश्ता किया,एवं अंदर बढ़े......अंदर की स्थिति और ज्यादा अस्त व्यस्त मिली.....दुनियाँ एवं भारत के अलग अलग हिस्सों से आए सैलानियों का जैसे हुज़ूम, एयरपोर्ट पर उमड़ आया था....हर कोई भागता दौड़ता परेशान दिख रहा था।जिनका नाम पहले विमान से जाने वालों की लिस्ट में था वे पहले ही बोर्डिंग पास लेकर लाइन में लग चुके थे...हर कोई आगे पहुंचना चाहता था।

सुरक्षा जाँच के बाद हमने भी अपना बोर्डिंग पास लिया और लाइन में लगे.....वहां पर ट्रेवल एजेंट ने पानी की बंद बोतलों का इंतजाम कर के रखा था, वह हमें दी गई......बोर्डिंग पास पर कोई सीट नंबर अंकित नहीं था ,तब तक लाइन बहुत लंबी होती जा रही थी। तभी मुझे एक महिला का बोर्डिंग पास गिरा हुआ मिला, जो शायद हड़बड़ी में गिर गया था, उसे मैंने बोर्डिंग गेट पर जमा किया और एयरलाइंस की बस में बैठे.....रनवे पर खड़ा एयरइंडिया का विमान देख कर जान में जान आई......विमान में बैठने के बाद महसूस हुआ मानो हमें किसी आत्मीय की छत्रछाया मिल गई हो, साथ ही यह पता चला कि विमान अभी तुरंत ही रनवे पर उतरा था, एवं उसकी तकनीकी जांच होना और इर्धन भरा जाना बाकी था..... जो हमारे बैठने के बाद हुआ। दो घंटे बीते....तब तक सभी यात्री धैर्यपूर्वक बैठे रहे....इसी दौरान में हमें बिल्कुल गरम लंच,सर्व किया गया...एयरहोस्टेज़ द्वारा पूछे जाने पर मैंने शाकाहारी खाने की इच्छा जाहिर की । जब खाना मुझे दिया गया तो बाॅक्स खोलने पर,उसमें एक पराठा, मूगं की दाल और मटर पनीर की थोड़ी सब्जी थी। फ्लाईट्स का खाना तो बहुत खाया अब तक लेकिन उस खाने में अपनी सोन्धी मिट्टी की जो सात्विक और देशी खुश्बू थी वह आज तक जेहन में बसी है। आखिरकार अंत में उड़ान भरने को तैयार विमान का इंजन स्टार्ट हुआ और हम कैरो की धरती को निहारते हुए, हर पल उस से दूर होते, अपने वतन को उड़ चले.....!

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इस यात्रा की शुरुआत हमनें जिस उत्साह के साथ की थी, उसके लिए जितनी प्लानिंग की गई थी उन सब का रूप, कैरो की धरती पर बदल गया था, जिसकी कल्पना भी हमारे मन में नहीं थी....हम देखने कुछ गए थे, और देख कर कुछ और लौट रहे थे......मिस्र के इतिहास में , राष्ट्रपति के तख्ता पलट की जिन घटनाओं के हम प्रत्यक्षदर्शी रहे, वह हमारे जीवन की, एवं मिस्रवासियों के लिए एक ऐतिहासिक घटना है।

पूर्व के प्लान के मुताबिक नहीं घूम पाने का अफसोस और विद्रोहरत देश में चार दिन, अनहोनी की आशंकाओं के बीच गुजारने का तनाव, उस पल आत्मसंतोष में बदल गया, जब लौटते वक्त यह अहसास हुआ कि जिस घटनाक्रम को हमनें झेला और जिसके गवाह रहे वह एक विरल अनुभव था, जो संयोगवश हमारे हिस्से में आ गया था.......साथ ही साथ हमारे अनुभव के संसार को अत्यंत समृद्ध भी कर गया।

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लगातार दस घंटे की उड़ान के बाद हम मुंबई पहुंचे..... उस त्रासदी से सभी की सकुशल वापसी हो गई, जिसके लिए ईश्वर को धन्यवाद दिया।

बाद में अपने घर पहुंच कर लोगों से पता चला कि हमारे निकलने के बाद एयर इंडिया का दूसरा चार्टर्ड विमान भी अपने समय से कैरो पहुंच गया था, एवं वहाँ रूके हुए हमारे साथियों के अलावा, अन्य दूसरे सैलानियों को लेकर समय से अपने वतन रवाना हो गया था। सुनने में यह भी आया कि होस्नी मुबारक को गिरफ्तार करने के बाद, कहीं जा कर कैरो की स्थिति कुछ सामान्य हो सकी।

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हालाँकि, टाटा कम्पनी ने अगले साल हमें यूरोप की यात्रा पर भेजा,जिसे हमने काफी एन्जॉय किया ..... लेकिन हमारी इजिप्ट की यात्रा, हमारे जीवन मे एक अविस्मरणीय अध्याय जोड़ गयी ।

माला सिन्हा

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*** यहां ऐसा ही महसूस हुआ था कि हम मौत के मुंह से निकल आए। ऐसा ही एक वाक्या 2004 का है जब हम साक्षात मौत के मुहं में जाने से बच गए थे।

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हमलोगों को ऐसे ही सिलसिले में थाईलैंड के पटाया बीच पर जाना था। जाने की टिकट 28 दिसंबर की थी। जाहिर है, टिकट, सारी बुकिंग होने के अतिरिक्त सारे कार्यक्रम तय थे। सारी तैयारी हो चुकी थी। 28 की सुबह कोलकाता से फ्लाईट थी। हम निकलते, उससे दो दिन पहले 26 दिसम्बर को सुनामी आ गई थी और फिर जो हुआ था.....आज भी याद कर जी दहल उठता है कि टिकट अगर दो दिन पहले की होती या सुनामी दो दिन बाद आई होती ......! यह कार्यक्रम दुबारा 2010 में फिर बना।

बहुत आभार ईश्वर का !!!