बेख़ुदी बेसबब नहीं ग़ालिब
उर्दू अदब मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी के बग़ैर अधूरी है। ग़ालिब की शायरी ने उर्दू अदब को नए पंख और नया आसमान दिया। कम लोग जानते हैं कि ग़ालिब की शायरी का बड़ा हिस्सा फारसी में है, उर्दू में उन्होंने बहुत कम लिखा है, लेकिन जितना लिखा है वो ही आने वाले कई ज़मानों तक लोगों को सोचने पर मजबूर करने के लिए काफी है। ग़ालिब की शायरी की सबसे ख़ूबसूरत बात ये है कि वो किसी एक रंग या किसी एक एहसास से बंधे नहीं, हर मौज़ू पर उनका शेर मौजूद है। ग़ालिब शायद उर्दू के इकलौते ऐसे शायर हैं जिन्होंने अपने शेरों में दर्द और ईश्क को पिरोया।
एक ऐसी शख्सियत जिसने खुद अपनी सोच के जादू से नई दुनिया रची। ऐसे ही थे मिर्ज़ा असदुल्लाह बेग खान अर्थात ग़ालिब, जिन्होंने प्रेम और दर्शन के नए पैमाने तय किए पर जिसकी जिंदगी खुद ही वक्त और किस्मत के थपेड़ों से लड़ती रही, लेकिन थकी नहीं।
मिर्ज़ा ग़ालिब के बारे में आजतक जितना लिखा जा चुका है या उनकी शायरी पर जितने शोध हुए या उर्दू शायरी आज जिस मुकाम पर है उसमें उसके फख्र करने के लिए बहुत कुछ है। पर उर्दू शायरी के इस सफ़रनामे में आज भी निर्विवाद रूप से जो सबसे कीमती है वह है मिर्जा गालिब का नाम और उनकी शायरी। लेकिन मौजूदा वक्त में सबसे पहले याद आता है जाने-माने फिल्मकार और गीतकार गुलजार का 1988 में दूरदर्शन पर आया सीरियल मिर्जा ग़ालिब। गुलजार के सीरियल में ग़ालिब का रोल अदा किया था मशहूर फनकार नसीरुद्दीन शाह ने। रोल क्या अदा किया था, छोटे पर्दे पर ग़ालिब को ज़िंदा कर दिया था। नतीजा, आज मिर्ज़ा ग़ालिब का नाम लेते ही नसीरूद्दीन शाह का चेहरा सामने आता है। ग़ालिब की ग़ज़लों को आवाज़ दी थी स्वर्गीय जगजीत सिहं जी ने।
आत्मसम्मान के धनी ग़ालिब को फारसी में महारत हासिल होने के बावज़ूद फारसी के दौर में अपनी शायरी में हिंदी और उर्दू शब्दों का प्रयोग करना, उनके शेरों को आम आदमी की ज़ुबान पर चढ़ा गया।
मिर्जा ग़ालिब का जन्म 27 दिसंबर 1796 में आगरा में हुआ था। 13 वर्ष की आयु में उनका विवाह नवाब ईलाही बख्श की बेटी उमराव बेगम से हो गया था। विवाह के बाद वह दिल्ली आ गये थे जहाँ उनकी तमाम उम्र बीती।
अंतिम मुगल बादशाह शाह जफ़र के दरबार के शायर तो थे ही अपनी सोंच और शायरी में भी अपने समकालीनों से काफी अलग रहे थे। ग्यारह साल की उम्र से हीं उन्होंने लिखना शुरू कर दिया था।
1850 में शहंशाह बहादुर शाह ज़फ़र द्वितीय ने मिर्ज़ा ग़ालिब को दबीर-उल-मुल्क और नज़्म-उद-दौला के खिताब से नवाज़ा। इसके बाद में उन्हे मिर्ज़ा नोशा का खिताब भी मिला।
हिंदुस्तानी जमीन पर जन्में इस नायाब शायर का इतंकाल
15 फरवरी, 1869 को हो गया। उनका मकबरा दिल्ली के हज़रत निजामुद्दीन इलाके में हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह के पास बना हुआ है।
लेकिन कहा जाए तो सच ये है कि ग़ालिब कहीं गए ही नहीं, वह आज भी हमारी रगों में अपनी शायरी के साथ दौड़ते रहते हैं। ऐसी शख्सियत मरती कहां हैं। वो तो जिंदा रहती हैं किस्सों में, किताबों में, अल्फाज़ों में, अहसासों में, ख्वाबों में, ख्वाहिशों में, जहन में, जिंदगी में।
उनसे जुड़े अनेकों रोचक किस्सों में एक किस्से का ज़िक्र यहां होना जरूरी है।
मिर्ज़ा ग़ालिब की सबसे अच्छी बात थी कि उन्होंने खुद को हिंदू या मुस्लिम से ऊपर बना कर रखा। शायरी के अलावा उनके दिल और दिमाग पर कोई चीज हावी नहीं हो सकी। यही वजह थी कि ग़ालिब को न तो माथे पर आरती के बाद टीका लगवाने से परहेज था न ही पूजा का प्रसाद खाने से कोई गुरेज़ था। एक बार वो दिवाली की रात अपने एक दोस्त के घर मौजूद थे। वहां पर आरती लक्ष्मी पूजन के बाद पंडित ने ग़ालिब को छोड़ सभी के माथे पर टीका लगाया। इस पर ग़ालिब ने कहा कि पंडित जी उन्हें भी लक्ष्मी के आशीर्वाद के तौर पर टीका लगा दें। ये बात सुनकर पंडित ने उनके माथे पर भी टीका लगाया था।
जब ग़ालिब वहां से निकले तो उनके हाथ में प्रसाद के तौर पर बर्फी थी। उसे देखकर एक मुल्ला बोले कि मिर्जा अब दिवाली की बर्फी खाओगे। इस पर ग़ालिब रुके और पूछा कि मिठाई क्या हिंदू है। इस पर मुल्ला बोले और क्या। ये सुनकर ग़ालिब ने तपाक से पूछ लिया इमरती हिंदू है या मुसलमान। इस सवाल का जवाब मुल्ला के पास नहीं था। ग़ालिब उन्हें अकेला छोड़कर वहां से चले गए।
ग़ालिब कभी भी धर्म के बंधन में नहीं बंधे और उनकी हमेशा स्वच्छंद उड़ने की ख्वाहिश रही। ग़ालिब को पूरी ज़िंदगी जिस बात का दुख रहा वो ये था कि उनके कोई औलाद नहीं थी। उमराव ने कई बच्चों को जन्म तो दिया लेकिन कोई भी जी नहीं सका। पूरी जिंदगी उन्हें यही कमी सालती भी रही। कई बार उनका ये दुख उनकी ग़ज़लों में भी दिखाई दिया है।
यह बात कम ही लोगों को मालूम होगी कि मिर्जा ग़ालिब की सिर्फ एक ही श्वेत-श्याम तस्वीर है, जो उनके इंतकाल से नौ महीने पहले 27 मई 1868 को दिल्ली के फोटोग्राफर रहमत अली ने तब खींची थी जब अवध के नवाब वाजिद अली शाह और ग़ालिब के मित्र बहादुर शाह जफ़र की तस्वीर खींची गई थी। उस वक्त ग़ालिब बहुत बीमार थे और दोस्तों के बहुत कहने पर ही उन्होंने तस्वीर खिंचवायी थी। उस समय पिनहोल कैमरा नया नया आया था। बाद में इसी तस्वीर से अनगिनत तस्वीरें कलाकारों द्वारा बनाई गई।
ग़ालिब के लिखे पत्र, जो उस समय प्रकाशित नहीं हुए थे, को भी उर्दू लेखन का महत्वपूर्ण दस्तावेज़ माना जाता है। जिसे गुलज़ार साहब ने 'तेरा बयाँ ग़ालिब' के नाम से एलबम में निकाला। इसमें मिर्ज़ा ग़ालिब के ख़त और ग़ज़लें हैं। इस एल्बम में ग़ज़लें जगजीत सिंह की आवाज़ में हैं और ख़त गुलज़ार साहब ने पढ़े हैं।
आज मिर्ज़ा ग़ालिब की उनकी यादों को जीने के लिए या उन्हें महसूस करने के लिए उनकी लिखी हुई ग़ज़लों का संग्रह 'दीवान ए ग़ालिब' के अलावा भी उनकी लिखी हुई अन्य किताबें , ग़जलों के एलबम एवं अन्य दूसरी किताबें हैं। इन अजीम शख्सियत की जयंती पर ख़िराज़ ए अक़ीदत।
'हुई मुद्दत कि 'ग़ालिब' मर गया पर याद आता है,
वो हर इक बात पर कहना कि यूँ होता तो क्या होता' !
हैं और भी दुनिया में सुख़नवर बहुत अच्छे
कहते हैं कि ग़ालिब का है अंदाजे बयां और
उर्दू के मशहूर शायर रसीद अहमद सिद्दीकी ने एक बार कहा था कि 'हम हिंदुस्तानियों को मुग़लों का हमेशा शुक्रगुज़ार होना चाहिए क्योंकि उन्होंने हमें मिर्ज़ा ग़ालिब, उर्दू ज़बां और ताज़महल जैसी तीन ख़ूबसूरत चीज़ें दीं'। ये तीनों ही चीज़ें अलग-अलग होती हुए भी आखिर में मिर्ज़ा ग़ालिब से ही जुड़ती हुई दिखाई देती हैं।
अब जैसे उर्दू को ही देखा जाए जिसके अल्फ़ाज़ों को एक सिरे में पिरोकर मिर्ज़ा ने एक से एक ख़ूबसूरत ग़ज़लें कहीं। वहीं ख़ूबसूरत ताजमहल को भी बनाने के लिए उसी शहर को चुना गया, जिस शहर के रहने वाले ख़ुद मिर्ज़ा ग़ालिब थे। कुल मिला कर मुग़ल काल की तीनों ख़ूबसूरत चीज़ें एक ही शख़्स मिर्ज़ा ग़ालिब के ही इर्द-गिर्द घूमती हुई दिखाई देती है। ग़ालिब की शायरी बेशक ख़ूबसूरत थी, पर उनकी निजी ज़िंदगी बिलकुल इसके उलट थी। बाहर से भले ही ख़ूबसूरत दिखाई देती हो उनकी ज़िंदगी, पर अंदर झांकने पर मजबूरी, लाचारी से भरा एक ऐसा शख़्स नज़र आएगा, जिसने कभी अपने मूल्यों से समझौता नहीं किया। या सच कहा जाए तो तमाम तरह के संकटों के बावजूद अपने शौक़ के लिए जिया। आज इन्हें याद करते हुए ग़ालिब से जुड़े कुछ ऐसे किस्सों का जिक्र भी करना ज़रूरी है जिनके बारे में शायद कम ही लोगों को पता हो या लिखा गया हो।
आखिरी मुग़ल बादशाह बहादुरशाह ज़फ़र अदबी इंसान थे और खुद भी शेर-ओ-शायरी का शौक रखते थे। हर शाम उनके दरबार में मुशायरे का जमावड़ा लगता था, जहां ग़ालिब के साथ-साथ उस समय के मशहूर शायर ज़ौक़ भी शिरकत किया करते थे। माना जाता है कि ग़ालिब और ज़ौक़ के बीच एक ज़बानी जंग थी, जिसे वो कभी एक-दूसरे पर ज़ाहिर नहीं होने देते थे, पर मौका मिलने पर खिंचाई करने से नहीं चूकते थे।
एक बार ग़ालिब अपने कुछ दोस्तों के साथ चाय की दुकान पर ठाठ-मठौली कर रहे थे कि ज़ौक़ साहब पालकी में बैठे वहां से गुज़रे। ज़ौक़ को आता देख मियां ग़ालिब ख़ुद को रोक नहीं पाए और तंज में एक शेर कहा कि,
'बना है शाह का मुसाहिब, फिरे है इतराता'
हालांकि उस समय ज़ौक़ ने मियां ग़ालिब को कुछ नहीं कहा, पर इस तंज की शिकायत उन्होंने बहादुरशाह ज़फर से कर दी। इसके साथ ही उन्होंने ग़ालिब के नाम शाम की दावत और मुशायरे के लिए न्यौता भी भिजवा दिया। असल में इस न्यौते के ज़रिये ज़ौक़ ग़ालिब को बादशाह सलामत के सामने बेइज्ज़त करना चाहते थे।
ग़ालिब को भी इस बात की भनक लग चुकी थी, पर वहां जाना मियां ग़ालिब के लिए गले की ऐसी फ़ांस बन चुकी थी, जिससे इंकार नहीं किया जा सकता था। आख़िरकार मियां ग़ालिब मुशायरे में पहुंचे उनके पहुंचते ही बादशाह ने सवाल दागा कि आपने
'बना है शाह का मुसाहिब, फिरे है इतराता'
कह कर ज़ौक़ साहब पर तंज कसा? चूंकि ज़ौक़ बादशाह के उस्ताद भी थे इसलिए मिर्ज़ा पहले घबराये और जान बचाने के लिए कह दिया कि ये उनकी ग़ज़ल का एक मिसरा था। मिसरा ग़ज़ल के एक हिस्से को कहते हैं।
इस पर बादशाह ने मिसरे को पूरा करने को कहा. अपनी ही बात में ख़ुद को फंसता देख मियां मिर्ज़ा ने मिसरे को कुछ ये कह कर पूरा किया कि
'बना है शाह का मुसाहिब, फिरे है इतराता,
वगर न शहर में ग़ालिब की आबरू क्या है'
इस बात को ज़ौक़ अच्छे से समझते थे कि मिर्ज़ा झूठ बोल रहे हैं इसलिए ग़ालिब को उनके ही जाल में फंसाने के लिए उन्होंने खुद ही इसकी तारीफ़ की और ग़ज़ल को पूरा करने को कहा।
ग़ालिब ने भी हार नहीं मानी और जो ग़ज़ल सुनाई, वो कुछ इस तरह थी कि:
'हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है
तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तुगू क्या है'
ऐसे ही एक दूसरा किस्सा यूँ है कि
दिल्ली कॉलेज में फ़ारसी के उस्ताद बनने वाले थे ग़ालिब।
1840 के आस पास का वक़्त था मुग़ल सल्तनत आर्थिक तंगी के दौर से गुज़र रही थी। ऐसे में ग़ालिब का भी वजीफ़ा बंद कर दिया गया था, जिसकी वजह से ग़ालिब के हालत भी पस्त चल रहे थे। उन दिनों ब्रिटेन की तरफ़ से मिस्टर थॉमस दिल्ली के सचिव नियुक्त किये गए थे, जो मिर्ज़ा की शायरी को काफ़ी पसंद किया करते थे.
मिर्ज़ा ग़ालिब के हालातों के बारे में जब उन्हें पता चला, तो उन्होंने ग़ालिब के लिए दिल्ली कॉलेज (आज का ज़ाकिर हुसैन कॉलेज) में फ़ारसी के अध्यापक की नियुक्ति की सिफ़ारिश कर दी। ग़ालिब के बारे में लोग जानते हैं कि मुफ़लिसी में रहने के बावजूद वो बड़े ही शान-ओ-शौकत से रहने वाले खुद्दार किस्म के इंसान और शायर थे।
यहां भी कुछ ऐसा ही हुआ और वो पालकी पर चढ़ कर अध्यापक पद के इंटरव्यू के कॉलेज पहुंचे। कॉलेज पहुंचने पर ग़ालिब ने देखा कि यहां कोई उनके स्वागत के लिए नहीं आया, तो गुस्सा होकर बिना इंटरव्यू दिए ही वापस आ गए। यह थी उनकी खुद्दारी।
हालांकि गरीबी के दिनों में ग़ालिब के घर में खाने के लाले पड़े हुए थे, पर जुआ खेलने उनका शौक अपनी जगह था, जिसके लिए वो समय और पैसे का जुगाड़ कर ही लेते थे. उनके इस शौक की वजह से ग़ालिब को दो बार पुलिस वालों ने भी पकड़ा. एक दफ़ा, तो जज ने ग़ालिब को दो साल के कैद की सज़ा भी सुनाई. हालांकि शहर में ग़ालिब की पहचान बड़े-बड़े लोगों से थी, जिसकी सिफ़ारिश से उन्हें तीन महीने बाद ही छोड़ दिया गया था.
ख़ैर आज जब ग़ालिब हमारे बीच नहीं हैं, तो इन्हीं क़िस्सों में उनकी यादें महफ़ूज़ हैं।
हुई मुद्दत कि 'ग़ालिब' मर गया पर याद आता है,
वो हर इक बात पर कहना कि यूँ होता तो क्या होता !
27 दिसम्बर 1797 को मिर्जा ग़ालिब की यौमे पैदाइश है। ग़ालिब मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र के दरबारी कवि थे लेकिन उनकी पहचान इससे कहीं ज़्यादा ऊपर थी। मुग़ल दरबार में ज़ौक़ और ग़ालिब का अक़्सर मुक़ाबला होता था। दोनों एक दुसरे का बहुत एहतराम भी करते थे।
आख़िरी दिनों में मिर्ज़ा ग़ालिब की तबीयत बहुत खराब रहा करती थी । उनके शागिर्द मज़रूह उनसे मिलने जाया करते थे जब तबीयत बहुत बिगड़ती तो अपनी मौत की आरज़ू में मरने की तारीख़ मुकर्रर करते थे। तो किसी ने कहा कि इंशा-अल्लाह ये तारीख़ भी ग़लत साबित होगी। इस पर ग़ालिब ने अपने मख़सूस अंदाज़ में कहा- ''देखो औल-फौल न बको। ये तारीख़ ग़लत हुई तो मैं सर फोड़ कर मर जाऊंगा।" और सारा मज़मा हंसने लगा।
ग़ालिब अपने ग़म के दिनों में भी हंसते हंसाते रहे और आख़िरकार 15 फरवरी 1869 को दिल्ली, चांदनी चौक, मुहल्ला बल्लीमारान में दोशंबे के दिन उनका इंतेक़ाल हो गया। आज उनकी यौमे पैदाइश पर ख़िराज़ ए अक़ीदत !!
(27 दिसम्बर 1797- 15 फरवरी 1869)