माला सिन्हा ने अपने बीते जीवन में जब कभी किसी खिड़की को खोल कर झाका तो कुछ ऐसा दिख गया जिस पर उन्हें कुछ कहने , कुछ लिखने का दिल कर गया और उन्होंने उस बाबत कोई पोस्ट अपने फेसबुक पर डाल दिया। वेबसाइट का यह भाग उन्हीं पोस्टों की पोटली का दर्शन है।

"आंधी "

फिल्मों, गीतों,और गज़लों से जुड़ा हुआ ऐसा कौन शख्स है गुलज़ार साहब को नहीँ जानता। एक से बढ़कर एक क्लासिक फिल्में मौसम, कोशिश, परिचय, खुशबू, मेरे अपने, लेकिन,इज़ाजत, आंधी जैसी फिल्में बनाने वाले लेखक, नर्माता निर्देशक और गीतकार की कालजयी एक फिल्म पर नज़र डालेंगे ।अब भला 49 साल पहले की फिल्म का जिक्र क्यों! दरअसल यह फिल्म है ही ऐसी।

फिल्म "आंधी" का नाम तकरीबन आप सभी ने सुना होगा। बेहतरीन फिल्मों की दौड़ में मील का पत्थर साबित होने वाली फिल्मों में से एक है यह फिल्म जो आज भी देखने से उतनी हीं तरोताजा महसूस होती है जब 49 साल पहले 1975 में रिलीज हुई थी।

इस फिल्म को लेकर विवाद भी बहुत हुए और उसके प्रदर्शन में विरोध भी बहुत हुए। हिंदी फिल्मों के इतिहास में राजनीतिक पृष्ठभूमि पर बनी फिल्मों में "आंधी" का नाम शायद सबसे ऊपर आएगा। इस फिल्म का विरोध इस कारण से हुआ कि रिलीज के बाद 15 हफ्ते चलने के बाद एक विवादित पोस्टर जो मद्रास के एक डिस्ट्रीब्यूटर ने बनवाया उस पर लिखा था " See your prime minister on screen. "

जी हाँ , कहना न होगा कि उस दौर में कांग्रेस का शासन था और श्रीमती गांधी प्रधानमंत्री थीं । यह खबर जंगल में आग की तरह देश में फैली और कांग्रेस ने इस फिल्म के प्रदर्शन पर रोक लगा दी। जब कि इसकी हकीकत यह थी कि यह फिल्म कथाकार कमलेश्वर के द्वारा लिखी गई कहानी " काली आंधी "पर बनी थी जिसका स्क्रिप्ट और स्क्रीन प्ले गुलज़ार साहब ने उस वक्त की एक बड़ी राजनीतिक हस्ती तारकेश्वरी सिन्हा जो बिहार से थी , के जीवन को ध्यान में रखकर लिखा था।

ये फिल्म कहानी है एक महत्वाकांशी भारतीय नारी की जो सामंजस्य रखने की कोशिश कर रही है अपने राजनितिक करियर और अपने घर के बीच। इस फिल्म में सुचित्रा सेन ने (आरती देवी ) एक राजनितिक पार्टी की अध्यक्ष की भूमिका को , बेहद जीवंत तरीके से निभाया ।

आरती देवी की भूमिका सुचित्रा सेन के लिए एक milestone है। उन्होंने अपनी भाषा के बंगाली लहजे को बहुत ही अच्छे तरीके से सफलतापूर्वक बदला और फिल्म के डायलाग पूरी शिद्दत से हिंदी लहजे में प्रयुक्त किया । उनके पति की भूमिका में संजीव कुमार जिनके अभिनय पर कोई चुनौती नहीं थी, ने फिल्म में जान डाल दी जो अपनी पत्नी को बेइंतिहा प्यार करने के बावजूद उसकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं से समझौता नहीं कर पाता है और अपनी बेटी को लेकर अलग हो जाता है ।

फिल्म का सबसे मर्मस्पर्शी सीन वह है जब आरती देवी काम के सिलसिले में उस शहर में आतीं हैं और इनकी आपस में मुलाकात एक बाग में होती है। तेरे बिना जिंदगी से कोई शिकवा तो नहीं गाना बैकग्राउंड में चल रह है और गाने के बीच में संजीव कुमार का यह कहना " ये चाँद देखना रोज़ आता है पर बीच में अमावस आ जाती है , वैसे तो अमावस 15 दिन तक होती है पर इस बार बहुत लम्बी थी " सुचित्रा कहती है " 9 बरस लम्बी थी न" ... किसी भी बात को इतने खूबसूरत और सरल लहजे में कहलवाना गुलज़ार साहब का ही हुनर था। कहने वाले लेखक आज के दौर में कहाँ मिलते है और ना ही सुचित्रा और संजीव कुमार जैसे मंझे हुए कलाकार

इस फिल्म के गाने आज भी इतने ही लोकप्रिय हैं कि हर संगीत प्रेमी उनसे अपने आप को जुड़ा हुआ महसूस करता है। इस फिल्म का संगीत इस फिल्म की जान है। महान संगीतकार राहुल देव बर्मन नें गुलज़ार साहब के रूहानी बोलों को सुरीले धागे में पिरोया है , एक एक गाना ऐसा बनाया है जो लम्बे समय तक याद रहे और वो हो रहा है आज 48 बरस के बाद भी गाने ऐसे लगते हैं जैसे कल ही बने हो . .. किशोर दा और लता जी की आवाज़ में भीगे... तेरे बिना जिंदगी से कोई , इस मोड़ से जाते है और तुम आ गए हो नूर आ गया है ,,, इन गानों के बारे में क्या कहा जाए । सुनते हुए लगता है कि ये गीत नसों में घुलते जा रहे हों ।

गुलज़ार साहब ने इस फिल्म के हर पहलु को बड़ी अच्छी तरह से फिल्माया है .. एक कसा हुआ निर्देशन , बेहतरीन संवाद और पटकथा , जहां गुलज़ार साहब ने पूरी फिल्म के साथ न्याय किया वही पर अगर इस फिल्म का अंत देखे तो एक निर्देशक की कुशलता का पता चलता है ।

आंधी , सुचित्रा सेन की आखिरी हिंदी फिल्म थी इसके बाद उन्होंने कोई हिंदी फिल्म में अभिनय नहीं किया , बहरहाल फिल्म को फिल्मफेयर अवार्ड भी मिले .. संजीव कुमार को बेस्ट एक्टर और गुलज़ार साहब को बेस्ट फिल्म निर्देशक के लिए ..।

नई पीढ़ी ने चाहे इस क्लासिक फिल्म का नाम न भी सुना हो लेकिन अगर उन्हें देखने का मौका मिले तो जरूर देखनी चाहिए ।

अज्ञेय

अज्ञेय

'अज्ञेय'

पहाड़ नहीं काँपता

न पेड़, न तराई

काँपती है ढाल पर के घर से

नीचे झील पर झरी

दीए की लौ की

नन्ही परछाईं !

अज्ञेय, जिनका पूरा नाम सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन है, उन्हें साहित्य से जुड़े ज्यादातर लोग "अज्ञेय" के नाम से ही जानते हैं। इनका जन्म 7 र्माच 1911 को, उत्तर प्रदेश के देवरिया जीले के कुशीनगर नगर नाम के पास हुआ था, जो ऐतिहासिक स्थल है।प्रारंभिक शिक्षा दीक्षा तो इनकी अपने पिता की देखरेख मे घर पर ही हुई थी, किंतु आगे की शिक्षा के लिए इन्होंने, पंजाब, मद्रास, लाहौर से लेकर अमेरिका के कैलिफोर्निया विश्वविद्ययालय तक का सफ़र तय करने के बाद जोधपुर विश्वविद्यालय तक में अध्यापन का कार्य किया..... यात्राएं की।अंग्रेजों के खिलाफ क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लेने के कारण अंततः अपनी आगे की पढ़ाई नहीं पूरी कर सके थे।

ऐसे में ही किसी दिन ,दिनकर जी के आवास पर अरविंद (सुपौत्र) ने बताया कि, शाम में अज्ञेय जी परिवार के सदस्यों से मिलने आने वाले हैं। वे पटना किसी साहित्यिक गोष्ठी में तब आए हुए थे। वैसे पटना से उनका पुराना संबंध था।उस समय तक दिनकर जी का देहावसान हो चुका था। यह 1978-79 की बात रही होगी। सुन कर बहुत उत्सुकता जगी...तब तक मैं उनकी कुछ रचनाएँ ,नदी के द्वीप, शेखर एक जीवनी एवं कुछ कविता संग्रह पढ़ चुकी थी, एवं उनकी लेखनी पर मुग्ध थी।

हिंदी साहित्य में अनुपम योगदान के लिए उन्हें 1964 में अपनी कृति "आंगन के पार द्वार के" लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार एवं 1979 में कविता संग्रह "कितनी नावों में कितनी बार" के लिए भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनकी प्रमुख रचनाओं में, "हरी घास पर क्षण भर, बावरा अहेरी, इंद्र धनु रौंदे हुए थे, भग्नदूत ,इत्यलम् , शरणार्थी ,क्योंकि मैं उसे जानता हूँ, अरी ओ करूणा प्रभामय इत्यादि कविता संग्रह की किताबों के अतिरिक्त भी उपन्यास एवं अन्य कृतियाँ हैं।

उनके आने तक हम बहुत उत्साहित रहे...मन में तरह तरह की बातें आ रही थीं, कैसा व्यक्तित्व होगा उनका.....सामने से कैसे दिखते होंगे...कैसे कपड़े पहनते होंगे, वगैरह वगैरह...क्योंकि उनकी तस्वीर जो, उनकी रचनाओं के पीछे छपी होती, हमने वही देखी थी, और उन्हें उतना ही जानती थी, जितना रचना के पिछले पृष्ठ पर उनका परिचय छपा होता।

खैर नियत समय पर उनका आना हुआ...अरविंद उन्हें नीचे से लेकर ऊपर आया...उन्हें ड्राईंग रूम में बैठाया गया, रीता, पद्मा और मैं भी उनके बैठने के कोई पांच मिनट बाद अंदर गए एवं दूसरे सोफे पर थोड़ा सिमट कर ही बैठे। ऐसी शख्सियत को नजर उठा कर देखने में भी थोड़ी झिझक हो रही थी।

सोफे के एक किनारे पर सिमट कर उनका बैठना, एक क्षण मे ही उनके संकोची व्यक्तित्व का परिचय दे गया....एक हथेली में दुसरे हाथ की मुठ्ठी बंद थी। सुदर्शन, शालीन व्यक्तित्व के धनी, आंखों पर सुनहरे फ्रेम का चश्मा , हल्की दाढ़ी, खादी का कुर्ता, पैजामा, पैरों में चमड़े की चप्पल.....गौरवर्ण, मुझे अब तक याद है। जितना ओजस्वी व्यक्तित्व था, व्यवहार उतना ही विनम्र ,मितभाषी...कंधे पर था कपड़े का शांतीनिकेतनी झोला......हमारा कौतूहल शांत हो चुका था।

यकीन करना कठिन था कि जिन शख्सियत के दर्शन भर की इच्छा थी वे सामने बैठे हैं। हम आपस में चाहे, साहित्य पर जितनी भी बातें कर लें, उस स्तर पर तो कतई ज्ञानी नहीं थे,या यूं कहें कि परिपक्वता नहीं थी कि उन से इस विषय पर कुछ भी कह पाते....फिर भी हमने बहुत झिझकते हुए उनकी किताबों के नाम गिना कर बताया कि ये किताबें हम पढ़ चुके हैं....खुशी से उन्होंने सर हिलाया....सभी लोगों से हल्की फुल्की बातें हुईं....इसी बीच चाची जी(दिनकर जी की बड़ी बहू) मिलने के लिए अंदर आईं ....चाय के लिए पूूूूछे जाने पर उन्होंने विनम्रता से सर हिला कर मना कर दिया। उन्होंने स्वर्गीय दिनकर जी की चर्चा की...करीब आधा घंटा बैठने के बाद सब से विदा ले कर लौट गए। अरविंद उन्हें नीचे तक छोड़ आया। शायद वे पैदल ही चले गए थे।

अपनी व्यस्तताओं के बावजूद,पटना के अल्प प्रवास में समय निकाल कर, दिनकर जी के परिवार से मिलने आना, न केवल दिनकर जी के प्रति अपनी श्रद्धा को सम्मान देना था, बल्कि उनके अपने व्यक्तित्व की गरिमा एवं विनम्र ,सरल व्यवहार का भी परिचय दे गया।

अज्ञेय जी आज हमारे बीच नहीं हैं, साहित्य जगत को उनकी कमी हमेशा महसूस होगी । उन्होंने शायद अपने लिए ही लिखा था:

घिर रही है साँझ

हो रहा है समय

घर कर ले उदासी

तौल अपने पंख, सारस दूर के

इस देश में तू है प्रवासी!

(अज्ञेय जी की पुन्यतिथि पर विनम्र श्रद्धाजंलि)

एक थीं जद्दन बाई

एक थीं जद्दन बाई

एक थीं जद्दन बाई

संजय लीला भंसाली की वेब सीरीज ‘हीरामंडी’ जबसे रिलीज हुई है, तबसे तवायफ शब्द का ज़िक्र लगातार हो रहा है। नेटफ्लिक्स पर रिलीज हुई ‘हीरामंडी’ आजादी की जंग लड़ते भारत में, अपने कोठों के लिए मशहूर रेड लाइट एरिया ‘हीरामंडी’ की कहानी है। जहां की तवायफें नवाबों के लिए महफिलें सजाने और अपने संगीत और नृत्य के लिए मशहूर थीं।

जाने माने अभिनेता संजय दत्त को कौन नहीँ जानता। साठ- सत्तर के दशक की मशहूर अदाकारा रही उनकी माँ नर्गिस ने अपने जमाने में शो-मैन राजकपूर और अन्य कलाकारों के साथ एक से एक हिट फिल्में अपने र्दशकों को दी और शोहरत के झंडे गाड़े ।उन्हीं नरगिस की मां जद्दनबाई बनारस की मशहूर तवायफ थीं, जो बाद में देशभर में अपने गानों के लिए जानी जाती थीं आज हम जद्दन बाई की हीं बात करेंगे ।

यह उस जमाने का वाकया है जब तवायफों के गाने सुनना नवाबों की शान हुआ करती थी। हिंदुस्तानी संगीत और नृत्य की विरासत को सहेज कर रखने वाले तवायफ कल्चर का ब्रिटिश राज में पूरा नक्शा बिगड़ गया, लेकिन वही कोठों ने बॉलीवुड को भरपूर टैलेंट भी दिया । ऐसी ही एक तवायफ की कहानी आज हम आपको बताने जा रहे हैं, जो बॉलीवुड की पहली म्यूजिक डायरेक्टर और प्रोड्यूसर बनी थीं। नाम था जद्दनबाई।

जद्दनबाई का जन्म 1892 में बनारस में हुआ था। इनकी मां दलीपाबाई थीं, जो इलाहाबाद की सबसे मशहूर तवायफ थीं और पिता थे मियां जान, जिन्हें जद्दनबाई ने महज 5 साल की उम्र में ही खो दिया था। कोठे पर पली- बढ़ी जद्दन को गायकी और नृत्य का हुनर उनकी मां से मिला था। वह कोठे पर रहकर बड़ी जरूर हुईं, लेकिन उनके कोठे पर देह व्यापार नहीं होता था बल्कि सिर्फ ठुमरी और गजलें पेश की जाती थीं। जद्दनबाई ने मां की परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए कोठे की कमान संभाली और मां से भी ज्यादा मशहूर हो गईं।

जद्दनबाई ने तीन शादियां की थीं। पहली शादी उन्होंने गुजराती हिंदू बिजनेसमैन नरोत्तम दास से की थी। दोनों का एक बेटा अख्तर हुसैन हुआ। बेटे के जन्म के कुछ सालों बाद ही नरोत्तम जद्दन बाई को छोड़कर चले गए और कभी लौटे ही नहीं। सालों तक बेटे की अकेले परवरिश करने के बाद कोठे में ही हारमोनियम बजाने वाले मास्टर उस्ताद इरशाद मीर खान से जद्दन ने दूसरी शादी की।

जिससे इन्हें दूसरा बेटा अनवर हुसैन हुआ। चंद सालों में ही दोनों अलग हो गए। इसके बाद जद्दनबाई ने लखनऊ के एक रईस परिवार के मोहन बाबू से तीसरी शादी की। जद्दनबाई और मोहन बाबू की एक बेटी हुई नरगिस जिसनें कोठे से निकल कर कर बनाई अलग पहचान

जद्दन बाई ने कुछ सालों बाद कोठे से निकलकर सिंगर बनने के लिए कोलकाता जाने की ठानी। उन्होंने श्रीमंत गणपत राव, उस्ताद मोइनुद्दीन खान, उस्ताद चड्डू खान साहब और उस्ताद लाब खान साहब से संगीत की शिक्षा प्राप्त की। देखते ही देखते इनके गाने देशभर में पसंद किए जाने लगे। ब्रिटिश शासक इन्हें न्योता देकर रामपुर, बीकानेर, ग्वालियर, जम्मू-कश्मीर जैसी अलग-अलग जगहों पर महफिल सजाने के लिए बुलाया करते थे।

वहीं यूनाइटेड किंगडम की म्यूजिक कंपनी ग्रामोफोन इनकी गज़लों को रिकॉर्ड करवाकर ले जाती थी । इतना ही नहीं उन्हें लाहौर की फोटो टोन कंपनी ने साल 1933 में एक फिल्म भी ऑफर की थी। इस फिल्म में काम करके वह एक्टिंग की दुनिया में आ गईं। इन्होंने आगे ‘इंसान या शैतान’ फिल्म की। इसके बाद वह परिवार के साथ बॉम्बे (मुंबई) पहुंच गईं।

जद्दनबाई ने साल 1935 में अपनी खुद की प्रोडक्शन कंपनी शुरू की, जिसकी पहली फिल्म तलाश-ए-हक थी। जद्दनबाई को फिल्में बनाने पर नुकसान हो रहा था। उनकी सारी फिल्में फ्लॉप हो रही थी और वह कर्ज में डूब गईं। जद्दन बाई और मोहन बाबू ने नरगिस का दाखिला मुंबई के इंग्लिश मीडियम एलीट स्कूल में करवाया था, लेकिन जब प्रोडक्शन हाउस को नुकसान होने लगा और वे कर्जे में डूब गईँ । मजबूरन उन्हें नर्गिस को स्कूल बदलवा कर ऐक्टिंग की दुनियां में कदम रखवा दिया

महज 6 साल की उम्र में नरगिस ने फिल्मों में बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट काम करना शुरू कर दिया था। नरगिस को 14 साल की उम्र में ‘तकदीर’ फिल्म से पहचान मिली। लेकिन जद्दनबाई की प्रोडक्शन कंपनी बंद हो गई और उन्होंने फिल्मों से दूरी बना ली। जब जद्दन बाई के बेटे अख्तर हुसैन ने फिल्म ‘दरोगाजी’ बनाई तो जद्दन बाई ने खुद फिल्म के सभी डायलॉग लिखे। 1949 में रिलीज हुई ये इनकी जिंदगी की आखिरी फिल्म थी। 8 अप्रैल 1949 में कैंसर से जद्दन बाई का निधन हो गया। जब नरगिस की मां का निधन हुआ तो उस दिन सभी फिल्मों की शूटिंग रोक दी गई थी और स्टूडियो एक दिन के लिए बंद कर दिए गए थे।

लेकिन उनके निधन के बाद उनकी बेटी नर्गिस और फिर उनके नाती संजय दत्त ने फिल्मी दुनियां में उनका नाम रौशन किया।

कितने मालिक, कितनी ज़िंदगियां

कितने मालिक, कितनी ज़िंदगियां

कई जीवन, कई देवात्माॅए

आज एक किताब की याद आई अचानक, जिसे अस्सी के दशक में कभी पढ़ा था। हो सकता है कि बहुत से लोगों ने इसे पढ़ा भी होगा। ब्रिटिश लेखक डाक्टर ब्रायन वीज़ के द्वारा लिखा गया, पुनर्जन्म की एक सच्ची कथा पर आधारित इस उपन्यास का पहला अंग्रेजी संस्करण 1988 में छपा था, जिसके लेखक स्वयं एक मनोचिकित्सक रहे थे, और पाराशक्तियों के अस्तित्व पर शोध कर रहे थे। उनकी अपनी एक युवा महिला मरीज कैथरीन(शायद यही नाम था) के छियासी पुनर्जन्मों के अनुभवों पर आधारित इस उपन्यास को लिखा।वैसे मेरा इन बातों पर बहुत विश्वास नहीं है, लेकिन हां, कुछ पारलौकिक शक्तियां जरूर हैं, जिनसे इंकार भी नहीं कर सकती। उस किताब का असर यह हुआ कि बाद में जब इसका हिन्दी संस्करण आया तो उसे भी पढ़ने का मोह नहीं छोड़ पाई मैं।

सत्यकथा पर आधारित इस उपन्यास की नायिका कैथरीन को जब तब अजीब अजीब सी बातें याद आतीं। लेखक डाक्टर वीज़ ने उसकी केस स्टडी की। इलाज के दौरान हिप्नोटाईज़ करके उसके पहले के छियासी जन्मों का अनुभव रिकार्ड किया गया, और यह बात सामने आई कि उसके पुनर्जन्मों के अनुभव, शुरू से सिलसिलेवार नहीं थे। कभी उसे साठवें जन्म की बात याद आती और कभी दसवें-बारहवें जन्म में लौट जाती।

इस तरह कैथरीन अपने पुनर्जन्मों की घटनाएं बड़बड़ाती रही, जिसे यथावत रिकार्ड किया गया। कभी किसी जन्म में वह किसी कबीले की राजकुमारी है तो कभी दासी है कभी कुछ और है,अलग अलग जन्मों में उसकी अलग अलग भूमिका जरूर रही, लेकिन हर जन्म, उसने स्त्री के रूप में ही लिया। उसके अनुभवों की रिकार्डिंग से यह भी अध्ययन एवं शोध किया गया कि पहले एक जन्म में जो उसके माता पिता या अपने लोग थे, वे हर जन्म में किसी न किसी रूप में उसके आसपास रहे, अर्थात एक जन्म में जो उसके पिता हैं वे किसी और जन्म में उसके भाई तो दूसरे जन्मों में दोस्त, प्रेमी या बेटा के रूप में उस से जुड़े होते......हिपनोटिज़्म की अवस्था में वह एक जन्म को जीती हुई अचानक किसी और जन्म में चली जाती...फिर वापस किसी दूसरे जन्म की बातें करने लगती। जिस सिलसिले में रिकार्डिगं की गई, उपन्यास भी उसी क्रम में ज्यों का त्यों लिखा गया है। इस घटना ने न केवल ब्रायन वीज़ के जीवन को बदला, बल्कि कैथरीन के जीवन में भी एक नया मोड़ ले कर आया।

चुकि यह घटना बहुत पुरानी नहीं है, और कैथरीन के अनुभवों पर स्वयं उसका इलाज कर रहे डॉक्टर के द्वारा उपन्यास के रूप में लिखी गई है इसलिए यह उस जमाने में बेस्ट सेलर साबित हुई।

जिन लोगों का पुनर्जन्म पर विश्वास या दिलचस्पी है, उनके लिए यह एक अच्छी खुराक साबित होगी।

माला सिन्हा

कैफ़ी आज़मी

कैफ़ी आज़मी

दुनिया के नक्शे पर अपने देश के आजमगढ़ जिले का एक छोटा सा गाँव मिजवां अपनी उपलब्धियों पर इठला रहा है और इठलाए भी क्यों न ! आख़िर आज ही के दिन 1919 को सैय्यद अतहर हुसैन रिज़वी नाम का एक चिराग वहाँ रौशन हुआ था जिसे आगे चल कर दुनिया ने कैफ़ी आज़मी के नाम से जाना।

यह और बात है कि ग्यारह साल की उम्र में ही उन्होंने जो नज़्म लिखी उसने उनका हुनर दुनिया के सामने ला दिया

'इतना तो ज़िंदगी में किसी की खलल पड़े,

हंसने से हो सुकूं, न रोने से कल पड़े।''

हिंदुस्तान की अदबी आसमान का सबसे चमकदार नाम है कैफ़ी आज़मी। वो शायर जिसने ज़िंदगी के हर एहसास पर लिखा। जो लिखा उसे जिया भी। ज़ुल्म के खिलाफ़ सिर्फ कलम ही नहीं, आवाज़ भी उठाई। हिंदी सिनेमा को वो गीत दिये जिन्हें ज़मानों तक भुलाया नहीं जा सकेगा। इनकी कलम की ताक़त ने पूरी दुनिया में इन्हें मशहूर किया।

कौमी एकता पर उन्होंने एक से बढ़कर एक नज़्में कही। 'दूसरा वनवास' उसमें से एक है।

राम बन-बास से जब लौट के घर में आए

याद जंगल बहुत आया जो नगर में आए

रक़्स-ए-दीवानगी आँगन में जो देखा होगा

छे दिसम्बर को श्री राम ने सोचा होगा

इतने दीवाने कहाँ से मिरे घर में आए

जगमगाते थे जहाँ राम के क़दमों के निशाँ

प्यार की काहकशाँ लेती थी अंगड़ाई जहाँ

मोड़ नफ़रत के उसी राहगुज़र में आए

धर्म क्या उन का था, क्या ज़ात थी, ये जानता कौन

घर न जलता तो उन्हें रात में पहचानता कौन

घर जलाने को मिरा लोग जो घर में आए

शाकाहारी थे मेरे दोस्त तुम्हारे ख़ंजर

तुम ने बाबर की तरफ़ फेंके थे सारे पत्थर

है मिरे सर की ख़ता, ज़ख़्म जो सर में आए

पाँव सरजू में अभी राम ने धोए भी न थे

कि नज़र आए वहाँ ख़ून के गहरे धब्बे

पाँव धोए बिना सरजू के किनारे से उठे

राम ये कहते हुए अपने द्वारे से उठे

राजधानी की फ़ज़ा आई नहीं रास मुझे

छे दिसम्बर को मिला दूसरा बन-बास मुझे

कैफी साहब सिर्फ अपनी नज़्मों तक ही सीमित नहीं थे बल्कि अपनी जिंदगी में भी काफी प्रगतिशील थे। नज्मों लिखने वाले शायर ने अमीरी-गरीबी के अंतर को मिटाने की बात की। पुरुषों और महिलाओं को समान दर्जा देने की वकालत की। कैफ़ी साहब की प्रमुख नज्मों में से एक नज़्म ‘‘औरत’’ देश में महिलाओं के अधिकारों और बराबरी की पैरवी करती है। पेश है उनकी यह नज़्म

उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे

कद्र अबतक तेरी तारीख़ ने जानी ही नहीं

तुझमें शोले हैं बस अश्क फ़िसानी हीं नहीं

तू हक़ीक़त भी है दिलचस्प कहानी ही नहीं

तेरी हस्ती भी है इक चीज़ जवानी ही नहीं

अपनी तारीख़ का उनवान बदलना है तुझे

उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे

कैफी आजमी की जीवनी 'याद की रहगुजर'

कैफ़ी साहब को प्रसिद्ध फिल्म ‘‘गर्म हवा’’ (1973) की स्क्रिप्ट, डायलॉग और गीतों के लिए तीन फिल्मफेयर पुरस्कार मिला।

पद्मश्री, साहित्य अकादमी फेलौशिप, साहित्य अकादमी अवार्ड, महाराष्ट्र गौरव अवार्ड -महाराष्ट्र सरकार, दिल्ली सरकार राज्य अवार्ड, सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड, अफ्रो-एशियन राइटर्स लोटस अवार्ड, यश भारतीय अवार्ड से नवाज़े जाने के अतिरिक्त उप्र सरकार, पूर्वांचल विश्वविद्यालय, आगरा यूनिवर्सिटी और शांति निकेतन की विश्वभारती विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किए जाने वाले कैफ़ी साहब के नाम से दर्जनों सड़कें, हाईवे, पार्क ट्रेन के नाम तक रखे गए।

इनकी उपलब्धियों की फेहरिस्त बहुत लंबी है जिसे गिने चुने शब्दों में नहीं बयान किया जासकता है।

कैफ़ी साहब ने जिन फिल्मों के गीत लिखे उनमें कुछ फ़िल्में शमा, काग़ज़ के फूल, शोला और शबनम, अनुपमा, आख़िरी ख़त, हक़ीक़त, हंसते ज़ख़्म, अर्थ वगैरह हैं।

1. वक्त ने किया क्या हसीं सितम - काग़ज़ के फूल

2. जाने क्या ढूंढती रहती हैं ये आंखें मुझमें - शोला और शबनम

3. जीत ही लेंगे बाज़ी हम तुम, खेल अधूरा छूटे न - शोला और शबनम

4. मैं ये सोचकर उसके दर से उठा था - हक़ीक़त

5. कर चले हम फ़िदा जान-ओ तन साथियों -हक़ीक़त

6. तुम जो मिल गए हो तो ये लगता है -हंसते ज़ख़्म

7. ये दुनिया ये महफ़िल मेरे काम की नहीं - हीर-रांझा

8. मिलो न तुम तो हम घबराएं - हीर रांझा

9. तुम इतना जो मुस्करा रहे हो - अर्थ

10. कोई ये कैसे बताए कि वो तन्हा क्यों है - अर्थ

( विनम्र श्रद्धांजलि )

ग़ालिब

ग़ालिब

बेख़ुदी बेसबब नहीं ग़ालिब

उर्दू अदब मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी के बग़ैर अधूरी है। ग़ालिब की शायरी ने उर्दू अदब को नए पंख और नया आसमान दिया। कम लोग जानते हैं कि ग़ालिब की शायरी का बड़ा हिस्सा फारसी में है, उर्दू में उन्होंने बहुत कम लिखा है, लेकिन जितना लिखा है वो ही आने वाले कई ज़मानों तक लोगों को सोचने पर मजबूर करने के लिए काफी है। ग़ालिब की शायरी की सबसे ख़ूबसूरत बात ये है कि वो किसी एक रंग या किसी एक एहसास से बंधे नहीं, हर मौज़ू पर उनका शेर मौजूद है। ग़ालिब शायद उर्दू के इकलौते ऐसे शायर हैं जिन्होंने अपने शेरों में दर्द और ईश्क को पिरोया।

एक ऐसी शख्सियत जिसने खुद अपनी सोच के जादू से नई दुनिया रची। ऐसे ही थे मिर्ज़ा असदुल्लाह बेग खान अर्थात ग़ालिब, जिन्होंने प्रेम और दर्शन के नए पैमाने तय किए पर जिसकी जिंदगी खुद ही वक्त और किस्मत के थपेड़ों से लड़ती रही, लेकिन थकी नहीं।

मिर्ज़ा ग़ालिब के बारे में आजतक जितना लिखा जा चुका है या उनकी शायरी पर जितने शोध हुए या उर्दू शायरी आज जिस मुकाम पर है उसमें उसके फख्र करने के लिए बहुत कुछ है। पर उर्दू शायरी के इस सफ़रनामे में आज भी निर्विवाद रूप से जो सबसे कीमती है वह है मिर्जा गालिब का नाम और उनकी शायरी। लेकिन मौजूदा वक्त में सबसे पहले याद आता है जाने-माने फिल्मकार और गीतकार गुलजार का 1988 में दूरदर्शन पर आया सीरियल मिर्जा ग़ालिब। गुलजार के सीरियल में ग़ालिब का रोल अदा किया था मशहूर फनकार नसीरुद्दीन शाह ने। रोल क्या अदा किया था, छोटे पर्दे पर ग़ालिब को ज़िंदा कर दिया था। नतीजा, आज मिर्ज़ा ग़ालिब का नाम लेते ही नसीरूद्दीन शाह का चेहरा सामने आता है। ग़ालिब की ग़ज़लों को आवाज़ दी थी स्वर्गीय जगजीत सिहं जी ने।

आत्मसम्मान के धनी ग़ालिब को फारसी में महारत हासिल होने के बावज़ूद फारसी के दौर में अपनी शायरी में हिंदी और उर्दू शब्दों का प्रयोग करना, उनके शेरों को आम आदमी की ज़ुबान पर चढ़ा गया।

मिर्जा ग़ालिब का जन्म 27 दिसंबर 1796 में आगरा में हुआ था। 13 वर्ष की आयु में उनका विवाह नवाब ईलाही बख्श की बेटी उमराव बेगम से हो गया था। विवाह के बाद वह दिल्ली आ गये थे जहाँ उनकी तमाम उम्र बीती।

अंतिम मुगल बादशाह शाह जफ़र के दरबार के शायर तो थे ही अपनी सोंच और शायरी में भी अपने समकालीनों से काफी अलग रहे थे। ग्यारह साल की उम्र से हीं उन्होंने लिखना शुरू कर दिया था।

1850 में शहंशाह बहादुर शाह ज़फ़र द्वितीय ने मिर्ज़ा ग़ालिब को दबीर-उल-मुल्क और नज़्म-उद-दौला के खिताब से नवाज़ा। इसके बाद में उन्हे मिर्ज़ा नोशा का खिताब भी मिला।

हिंदुस्तानी जमीन पर जन्में इस नायाब शायर का इतंकाल

15 फरवरी, 1869 को हो गया। उनका मकबरा दिल्‍ली के हज़रत निजामुद्दीन इलाके में हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह के पास बना हुआ है।

लेकिन कहा जाए तो सच ये है कि ग़ालिब कहीं गए ही नहीं, वह आज भी हमारी रगों में अपनी शायरी के साथ दौड़ते रहते हैं। ऐसी शख्सियत मरती कहां हैं। वो तो जिंदा रहती हैं किस्सों में, किताबों में, अल्फाज़ों में, अहसासों में, ख्वाबों में, ख्वाहिशों में, जहन में, जिंदगी में।

उनसे जुड़े अनेकों रोचक किस्सों में एक किस्से का ज़िक्र यहां होना जरूरी है।

मिर्ज़ा ग़ालिब की सबसे अच्‍छी बात थी कि उन्‍होंने खुद को हिंदू या मुस्लिम से ऊपर बना कर रखा। शायरी के अलावा उनके दिल और दिमाग पर कोई चीज हावी नहीं हो सकी। यही वजह थी कि ग़ालिब को न तो माथे पर आरती के बाद टीका लगवाने से परहेज था न ही पूजा का प्रसाद खाने से कोई गुरेज़ था। एक बार वो दिवाली की रात अपने एक दोस्‍त के घर मौजूद थे। वहां पर आरती लक्ष्‍मी पूजन के बाद पंडित ने ग़ालिब को छोड़ सभी के माथे पर टीका लगाया। इस पर ग़ालिब ने कहा कि पंडित जी उन्‍हें भी लक्ष्‍मी के आशीर्वाद के तौर पर टीका लगा दें। ये बात सुनकर पंडित ने उनके माथे पर भी टीका लगाया था।

जब ग़ालिब वहां से निकले तो उनके हाथ में प्रसाद के तौर पर बर्फी थी। उसे देखकर एक मुल्‍ला बोले कि मिर्जा अब दिवाली की बर्फी खाओगे। इस पर ग़ालिब रुके और पूछा कि मिठाई क्‍या हिंदू है। इस पर मुल्‍ला बोले और क्‍या। ये सुनकर ग़ालिब ने तपाक से पूछ लिया इमरती हिंदू है या मु‍सलमान। इस सवाल का जवाब मुल्‍ला के पास नहीं था। ग़ालिब उन्‍हें अकेला छोड़कर वहां से चले गए।

ग़ालिब कभी भी धर्म के बंधन में नहीं बंधे और उनकी हमेशा स्‍वच्‍छंद उड़ने की ख्‍वाहिश रही। ग़ालिब को पूरी ज़िंदगी जिस बात का दुख रहा वो ये था कि उनके कोई औलाद नहीं थी। उमराव ने कई बच्‍चों को जन्‍म तो दिया लेकिन कोई भी जी नहीं सका। पूरी जिंदगी उन्‍हें यही कमी सालती भी रही। कई बार उनका ये दुख उनकी ग़ज़लों में भी दिखाई दिया है।

यह बात कम ही लोगों को मालूम होगी कि मिर्जा ग़ालिब की सिर्फ एक ही श्वेत-श्याम तस्वीर है, जो उनके इंतकाल से नौ महीने पहले 27 मई 1868 को दिल्ली के फोटोग्राफर रहमत अली ने तब खींची थी जब अवध के नवाब वाजिद अली शाह और ग़ालिब के मित्र बहादुर शाह जफ़र की तस्वीर खींची गई थी। उस वक्त ग़ालिब बहुत बीमार थे और दोस्तों के बहुत कहने पर ही उन्होंने तस्वीर खिंचवायी थी। उस समय पिनहोल कैमरा नया नया आया था। बाद में इसी तस्वीर से अनगिनत तस्वीरें कलाकारों द्वारा बनाई गई।

ग़ालिब के लिखे पत्र, जो उस समय प्रकाशित नहीं हुए थे, को भी उर्दू लेखन का महत्वपूर्ण दस्तावेज़ माना जाता है। जिसे गुलज़ार साहब ने 'तेरा बयाँ ग़ालिब' के नाम से एलबम में निकाला। इसमें मिर्ज़ा ग़ालिब के ख़त और ग़ज़लें हैं। इस एल्बम में ग़ज़लें जगजीत सिंह की आवाज़ में हैं और ख़त गुलज़ार साहब ने पढ़े हैं।

आज मिर्ज़ा ग़ालिब की उनकी यादों को जीने के लिए या उन्हें महसूस करने के लिए उनकी लिखी हुई ग़ज़लों का संग्रह 'दीवान ए ग़ालिब' के अलावा भी उनकी लिखी हुई अन्य किताबें , ग़जलों के एलबम एवं अन्य दूसरी किताबें हैं। इन अजीम शख्सियत की जयंती पर ख़िराज़ ए अक़ीदत।

'हुई मुद्दत कि 'ग़ालिब' मर गया पर याद आता है,

वो हर इक बात पर कहना कि यूँ होता तो क्या होता' !

हैं और भी दुनिया में सुख़नवर बहुत अच्छे

कहते हैं कि ग़ालिब का है अंदाजे बयां और

उर्दू के मशहूर शायर रसीद अहमद सिद्दीकी ने एक बार कहा था कि 'हम हिंदुस्तानियों को मुग़लों का हमेशा शुक्रगुज़ार होना चाहिए क्योंकि उन्होंने हमें मिर्ज़ा ग़ालिब, उर्दू ज़बां और ताज़महल जैसी तीन ख़ूबसूरत चीज़ें दीं'। ये तीनों ही चीज़ें अलग-अलग होती हुए भी आखिर में मिर्ज़ा ग़ालिब से ही जुड़ती हुई दिखाई देती हैं।

अब जैसे उर्दू को ही देखा जाए जिसके अल्फ़ाज़ों को एक सिरे में पिरोकर मिर्ज़ा ने एक से एक ख़ूबसूरत ग़ज़लें कहीं। वहीं ख़ूबसूरत ताजमहल को भी बनाने के लिए उसी शहर को चुना गया, जिस शहर के रहने वाले ख़ुद मिर्ज़ा ग़ालिब थे। कुल मिला कर मुग़ल काल की तीनों ख़ूबसूरत चीज़ें एक ही शख़्स मिर्ज़ा ग़ालिब के ही इर्द-गिर्द घूमती हुई दिखाई देती है। ग़ालिब की शायरी बेशक ख़ूबसूरत थी, पर उनकी निजी ज़िंदगी बिलकुल इसके उलट थी। बाहर से भले ही ख़ूबसूरत दिखाई देती हो उनकी ज़िंदगी, पर अंदर झांकने पर मजबूरी, लाचारी से भरा एक ऐसा शख़्स नज़र आएगा, जिसने कभी अपने मूल्यों से समझौता नहीं किया। या सच कहा जाए तो तमाम तरह के संकटों के बावजूद अपने शौक़ के लिए जिया। आज इन्हें याद करते हुए ग़ालिब से जुड़े कुछ ऐसे किस्सों का जिक्र भी करना ज़रूरी है जिनके बारे में शायद कम ही लोगों को पता हो या लिखा गया हो।

आखिरी मुग़ल बादशाह बहादुरशाह ज़फ़र अदबी इंसान थे और खुद भी शेर-ओ-शायरी का शौक रखते थे। हर शाम उनके दरबार में मुशायरे का जमावड़ा लगता था, जहां ग़ालिब के साथ-साथ उस समय के मशहूर शायर ज़ौक़ भी शिरकत किया करते थे। माना जाता है कि ग़ालिब और ज़ौक़ के बीच एक ज़बानी जंग थी, जिसे वो कभी एक-दूसरे पर ज़ाहिर नहीं होने देते थे, पर मौका मिलने पर खिंचाई करने से नहीं चूकते थे।

एक बार ग़ालिब अपने कुछ दोस्तों के साथ चाय की दुकान पर ठाठ-मठौली कर रहे थे कि ज़ौक़ साहब पालकी में बैठे वहां से गुज़रे। ज़ौक़ को आता देख मियां ग़ालिब ख़ुद को रोक नहीं पाए और तंज में एक शेर कहा कि,

'बना है शाह का मुसाहिब, फिरे है इतराता'

हालांकि उस समय ज़ौक़ ने मियां ग़ालिब को कुछ नहीं कहा, पर इस तंज की शिकायत उन्होंने बहादुरशाह ज़फर से कर दी। इसके साथ ही उन्होंने ग़ालिब के नाम शाम की दावत और मुशायरे के लिए न्यौता भी भिजवा दिया। असल में इस न्यौते के ज़रिये ज़ौक़ ग़ालिब को बादशाह सलामत के सामने बेइज्ज़त करना चाहते थे।

ग़ालिब को भी इस बात की भनक लग चुकी थी, पर वहां जाना मियां ग़ालिब के लिए गले की ऐसी फ़ांस बन चुकी थी, जिससे इंकार नहीं किया जा सकता था। आख़िरकार मियां ग़ालिब मुशायरे में पहुंचे उनके पहुंचते ही बादशाह ने सवाल दागा कि आपने

'बना है शाह का मुसाहिब, फिरे है इतराता'

कह कर ज़ौक़ साहब पर तंज कसा? चूंकि ज़ौक़ बादशाह के उस्ताद भी थे इसलिए मिर्ज़ा पहले घबराये और जान बचाने के लिए कह दिया कि ये उनकी ग़ज़ल का एक मिसरा था। मिसरा ग़ज़ल के एक हिस्से को कहते हैं।

इस पर बादशाह ने मिसरे को पूरा करने को कहा. अपनी ही बात में ख़ुद को फंसता देख मियां मिर्ज़ा ने मिसरे को कुछ ये कह कर पूरा किया कि

'बना है शाह का मुसाहिब, फिरे है इतराता,

वगर न शहर में ग़ालिब की आबरू क्या है'

इस बात को ज़ौक़ अच्छे से समझते थे कि मिर्ज़ा झूठ बोल रहे हैं इसलिए ग़ालिब को उनके ही जाल में फंसाने के लिए उन्होंने खुद ही इसकी तारीफ़ की और ग़ज़ल को पूरा करने को कहा।

ग़ालिब ने भी हार नहीं मानी और जो ग़ज़ल सुनाई, वो कुछ इस तरह थी कि:

'हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है

तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तुगू क्या है'

ऐसे ही एक दूसरा किस्सा यूँ है कि

दिल्ली कॉलेज में फ़ारसी के उस्ताद बनने वाले थे ग़ालिब।

1840 के आस पास का वक़्त था मुग़ल सल्तनत आर्थिक तंगी के दौर से गुज़र रही थी। ऐसे में ग़ालिब का भी वजीफ़ा बंद कर दिया गया था, जिसकी वजह से ग़ालिब के हालत भी पस्त चल रहे थे। उन दिनों ब्रिटेन की तरफ़ से मिस्टर थॉमस दिल्ली के सचिव नियुक्त किये गए थे, जो मिर्ज़ा की शायरी को काफ़ी पसंद किया करते थे.

मिर्ज़ा ग़ालिब के हालातों के बारे में जब उन्हें पता चला, तो उन्होंने ग़ालिब के लिए दिल्ली कॉलेज (आज का ज़ाकिर हुसैन कॉलेज) में फ़ारसी के अध्यापक की नियुक्ति की सिफ़ारिश कर दी। ग़ालिब के बारे में लोग जानते हैं कि मुफ़लिसी में रहने के बावजूद वो बड़े ही शान-ओ-शौकत से रहने वाले खुद्दार किस्म के इंसान और शायर थे।

यहां भी कुछ ऐसा ही हुआ और वो पालकी पर चढ़ कर अध्यापक पद के इंटरव्यू के कॉलेज पहुंचे। कॉलेज पहुंचने पर ग़ालिब ने देखा कि यहां कोई उनके स्वागत के लिए नहीं आया, तो गुस्सा होकर बिना इंटरव्यू दिए ही वापस आ गए। यह थी उनकी खुद्दारी।

हालांकि गरीबी के दिनों में ग़ालिब के घर में खाने के लाले पड़े हुए थे, पर जुआ खेलने उनका शौक अपनी जगह था, जिसके लिए वो समय और पैसे का जुगाड़ कर ही लेते थे. उनके इस शौक की वजह से ग़ालिब को दो बार पुलिस वालों ने भी पकड़ा. एक दफ़ा, तो जज ने ग़ालिब को दो साल के कैद की सज़ा भी सुनाई. हालांकि शहर में ग़ालिब की पहचान बड़े-बड़े लोगों से थी, जिसकी सिफ़ारिश से उन्हें तीन महीने बाद ही छोड़ दिया गया था.

ख़ैर आज जब ग़ालिब हमारे बीच नहीं हैं, तो इन्हीं क़िस्सों में उनकी यादें महफ़ूज़ हैं।

हुई मुद्दत कि 'ग़ालिब' मर गया पर याद आता है,

वो हर इक बात पर कहना कि यूँ होता तो क्या होता !

27 दिसम्बर 1797 को मिर्जा ग़ालिब की यौमे पैदाइश है। ग़ालिब मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र के दरबारी कवि थे लेकिन उनकी पहचान इससे कहीं ज़्यादा ऊपर थी। मुग़ल दरबार में ज़ौक़ और ग़ालिब का अक़्सर मुक़ाबला होता था। दोनों एक दुसरे का बहुत एहतराम भी करते थे।

आख़िरी दिनों में मिर्ज़ा ग़ालिब की तबीयत बहुत खराब रहा करती थी । उनके शागिर्द मज़रूह उनसे मिलने जाया करते थे जब तबीयत बहुत बिगड़ती तो अपनी मौत की आरज़ू में मरने की तारीख़ मुकर्रर करते थे। तो किसी ने कहा कि इंशा-अल्लाह ये तारीख़ भी ग़लत साबित होगी। इस पर ग़ालिब ने अपने मख़सूस अंदाज़ में कहा- ''देखो औल-फौल न बको। ये तारीख़ ग़लत हुई तो मैं सर फोड़ कर मर जाऊंगा।" और सारा मज़मा हंसने लगा।

ग़ालिब अपने ग़म के दिनों में भी हंसते हंसाते रहे और आख़िरकार 15 फरवरी 1869 को दिल्ली, चांदनी चौक, मुहल्ला बल्लीमारान में दोशंबे के दिन उनका इंतेक़ाल हो गया। आज उनकी यौमे पैदाइश पर ख़िराज़ ए अक़ीदत !!

(27 दिसम्बर 1797- 15 फरवरी 1869)

गुलज़ार

गुलज़ार

मौत!!!

तू एक कविता है

मुझसे इक कविता का वादा है

मिलेगी मुझको

डूबती नब्ज़ों में जब दर्द को नींद आने लगे

ज़र्द सा चेहरा लिए चाँद उफ तक पहुँचे

दिन अभी पानी में हो

रात किनारे के क़रीब

ना अंधेरा, ना उजाला हो

ना आधी रात, ना दिन

जिस्म जब ख़त्म हो

और रूह को जब साँस आये

मुझसे इक कविता का वादा है

मिलेगी मुझको...

~गुलज़ार

उन्हें बोलते हुए सुनना कभी न भूल पाने वाला एहसास है। मुंबई में सुना था। यूँ लगता है, जैसे वो हाथों के इशारे से अपने चारों तरफ़ हवा के कैनवास पर कोई चित्र बना रहे हैं। और यही चित्र लफ़्ज़ शायरी, नज़्म या नग़मे की शक़्ल में हमारे दिलों पर उभर जाते हैं। उनके गीत संगीत या फ़िल्मों के संवाद सुन कर सहज हीं समझ में आ जाता है कि गुलज़ार साहब के लिखे हुए हैं।

बात तब की है, जब हिंदुस्तान को चीरकर दो हिस्सों में तक़्सीम नहीं किया गया था। तब चेनाब, झेलम, सिंधु और रावी का पानी बिना किसी बँटवारे के गुनगुनाता हुआ आज़ाद बहता था। तब न कोई हिन्दू था, न कोई मुसलमान। तब लोग सिर्फ़ हिंदुस्तानी हुआ करते थे। तब 'माचिस' की तीलियाँ या तो चराग़ जलाने के लिए सुलगती थीं, या फिर चूल्हे। पहाड़ों और आसमान पर भी तब दूरबीनों के पहरे नहीं थे। बर्फीले पहाड़ों से उतरती बर्फ़ में भी, तब रिश्ते आज की तरह ठंडे नहीं पड़े थे। तेज़ 'आँधियों' के ज़ोर के बावजूद रिश्तों में गर्मजोशी रहती थी।

तब अज़ान और आरतियों की आवाज़ें भी हर किसी के दिलोदिमाग़ को सुकून की 'ख़ुश्बू' से मुअत्तर कर देती थीं। लोग चाहे किसी भी मज़हब के हों, कानों में आवाज़ पड़ते ही उनके सिर अदब से ख़ुद-ब-ख़ुद झुक जाते थे। उस वक़्त हर 'मौसम' की 'किताब' सिर्फ़ एक ही रिश्ते का 'परिचय' देती थी, जिसके तहत हर किसी को, हर कोई अपना-सा लगता था। यही आबोहवा थी, जब संपूर्ण सिंह कालरा यानी गुलज़ार का जन्म हुआ। जगह थी हिंदुस्तान का पंजाब सूबा और इस सूबे के झेलम ज़िले के छोटे-से क़स्बे दीना से 3 किमी के फ़ासले पर मौजूद गाँव, कुर्ला। दीना की गलियों में गुज़रा बचपन जीते हुए संपूर्ण सिंह कालरा को गुलज़ार होने में उम्र के कई बरस सर्फ़ हुए।

बहरहाल, आज हम सिर्फ़ उनकी उपलब्धियों की बात करेगें।11 बरस की उम्र पाते-पाते मुल्क के हालात बिगड़े और फिर एक दर्दनाक वाक्या पेश आया। हुआ ये कि मुल्क के सीने पर लहू से सरहद खींच दी गई। और इसके साथ ही मुल्क दो हिस्सों में तक़्सीम हो गया। एक हिस्सा हिंदुस्तान और दूसरा पाकिस्तान बना दिया गया। इस हादसे में गुलज़ार का बचपन पाकिस्तान में ही छूट गया। लेकिन बचपन तबीयत से ही ज़िद्दी होता है, इतनी आसानी से अपनी चीज़ें कहाँ छोड़ता है। लिहाज़ा, ज़रा-सी उम्र में मिला हिज्रत का ये दर्द, किसी जायदाद की तरह अब भी उनके साथ है। एक बार कहीं उन्होंने कहा भी था कि 'विभाजन मेरी लेखनी का बहुत अहम हिस्सा है, क्योंकि बहुत शुरुआती ज़िंदगी में वो दौर देखा और उसका असर आज तक है। आज भी कहीं सांप्रदायिक दंगे देखता हूँ, तो मुझे विभाजन की ही याद आती है और उससे तकलीफ़ होती है।'

बेहिसाब सम्मानों से नवाज़े गए गुलज़ार साहब ने 'चौरस रात' (लघु कथाएँ, 1962), 'जानम' (कविता संग्रह, 1963), 'एक बूँद चाँद' (कविताएँ, 1972), 'रावी पार' (कथा संग्रह, 1997), 'रात, चाँद और मैं' (2002), 'रात पश्मीने की' और 'खराशें' (2003) नाम से किताबें भी लिक्खी हैं। 2002 में उर्दू भाषा में लघु कहानी संग्रह 'धुआँ' के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार, 2004 में पद्मभूषण, 2009 में 'स्लमडॉग मिलियनेयर' के गीत 'जय हो' के लिए सर्वश्रेष्ठ गीत की श्रेणी में 'ऑस्कर' और ग्रैमी सम्मान मिल चुके हैं। 2013 में उन्हें दादा साहेब फाल्के सम्मान से सम्मानित किया गया। यह सम्मान पाने वाले वे 45वें व्यक्ति हैं। इसके अलावा उन्हें 1977, 1979, 1980, 1983, 1988, 1991,1998, 2002, 2005 आदि में सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार भी मिल चुका है। 2018 में उन्होंने बंटवारे के दर्द और त्रासदी को लेकर 'दो लोग' पहला उपन्यास लिखा।

1988 में उन्होंने दूरदर्शन के लिए 'मिर्ज़ा ग़ालिब' धारावाहिक बनाया, जो दूरदर्शन के इतिहास में मील का पत्थर साबित हुई। गुलज़ार साहब गाहे-ब-गाहे ये भी कहते रहे हैं कि वे मिर्ज़ा ग़ालिब की ही कमाई खा रहे हैं। उनकी ग़ज़लों को जगजीत सिंह ने अपनी आवाज़ दे कर अमर बनाया। 'मिर्ज़ा ग़ालिब' के बाद उन्होंने 'तहरीर मुंशी प्रेमचंद की' धारावाहिक भी बनाया।

अपने तमाम एहसासों की सौगात फ़िल्मों, धारावाहिकों, नज़्म, शेर, कविताओं और ग़ज़लों के रूप में हमें सौंपने वाले अज़ीम शख्शियत गुलज़ार साहब का आज 86 वाँ जन्मदिन है। ईश्वर से दुआएं हैं कि एहसासों से भरा आपका गुलशन हमेशा आबाद, गुलज़ार और महकता रहे गुलज़ार साहब..... जन्मदिन बहुत बहुत मुबारक हो आपको।

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गौहर जान

गौहर जान

एक थीं गौहर जान

(26.6.1873 - 17.1.1930)

आज जून की 26 तारीख़। एक ऐसी अज़ीम ज़हीन फ़नकारा गौहर जान को याद करने का दिन जिनके बारे में शायद बहुत कम ही लोग जानते हों। 26 जून 1873 को जन्म लेने वाली गौहर जान जिनकी राग 'जोगिया' में गाई हुई पहली ठुमरी 'रस के भरे तोरे नैन सांवरिया' पहली बार ब्रिटेन की ग्रामोफोन कंपनी ने सन् 1902 में रिकॉर्ड की थी जो इस कंपनी के, भारत के इतिहास में मील का पहला पत्थर साबित हुई। फ़िर तो गौहर जान ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा। इनके गीतों के रिकार्डिंग की जिस श्रृखंला की शुरूआत ग्रामोफोन कंम्पनी ने की, वह छः साल सन् 1908 तक चली और उसकी बदौलत ही ब्रिटिश भारत में इस म्यूज़िक कंम्पनी ने लोकप्रियता की उन ऊंचाईयों को छुआ जिसनें उसके रिकार्डों को गीत संगीत के शौक़ीन लोगों के घर घर तक पहुंचा दिया। इनकी गायी हुई राग जोगिया, राग भैरवी एवं राग भोपाली में कई ठुमरी आज भी सुनी जा सकती है।

हिन्‍दुस्‍तानी शास्‍त्रीय संगीत और नृत्‍य में तो गौहर जान पारंगत थी हीं, लेकिन उन्‍हें सबसे ज्‍यादा इसलिए याद किया जाता है क्‍योंकि भारतीय संगीत के इतिहास में अपने गानों को रिकॉर्ड करने वाली वह पहली गायिका थीं। इतना ही नहीं, संगीत के साथ साथ ये नृत्य में भी पारंगत देश की प्रथम कलाकार थीं। रिकार्डिंग आर्टिस्ट एवं डांसिग स्टार कहा जाता था इन्हें।

बिहार राज्य के दरभंगा के महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह के शासन काल में नौ वर्षों (1887- 1898) तक गौहरजान दरभंगा की राज संगीतज्ञ रहीं।

1887 में गौहर जान ने दरभंगा के लक्ष्मीश्वर विलास पैलेस के दरबार हॉल में महज 14 साल की उम्र में अपनी पहली प्रस्तुति दी। करीब 11 साल वो दरभंगा में रहीं, महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह के निधन के उपरांत 1901 में गौहर जान दरभंगा से कलकत्ता चली गयी। इन्होंने सन् 1902 से 1920 के बीच बंगाली, हिन्‍दुस्‍तानी, गुजराती, तमिल, मराठी, अरबी, पारसी, पश्‍तो, फ्रेंच और अंग्रेजी समेत 10 से भी ज्‍यादा भाषाओं में 600 से भी अधिक गाने रिकॉर्ड किए।अपनी ठुमरी, खयाल, दादरा, कजरी, चैती, भजन और तराना के जरिए हिन्‍दुस्‍तानी शास्‍त्रीय संगीत को दूर-दूर तक पहुंचाया।

हिन्‍दुस्‍तानी शास्‍त्रीय संगीत और नृत्‍य में तो गौहर जान पारंगत थी हीं, लेकिन उन्‍हें सबसे ज्‍यादा इसलिए याद किया जाता है क्‍योंकि भारतीय संगीत के इतिहास में अपने गानों को रिकॉर्ड करने वाली वह पहली गायिका थीं। ऐसा कहा जाता है कि उस जमाने में एक रिकार्डिंग के 3000 रूपये लेती थीं गौहर जान जो काफ़ी बड़ी रकम होती थी तब।

गौहर जान का जन्‍म पटना में हुआ था लेकिन परवरिश हुई आजमगढ़ में। उनके बचपन का नाम एंजेलिना येओवॉर्ड था। अमेरिकी इंजीनियर पिता विलियम राबर्ट और यहूदी मां विक्टोरिया हेमिंग जो भारत में ही रही थीं, उनकी इकलौती संतान , एंजेलिना के माता पिता की शादी 1872 में हुई लेकिन शादी के सात साल बाद 1879 में एंजेलिना के माता-पिता का तलाक हो गया। तलाक के बाद उनकी मां ने इस्‍लाम धर्म कुबूल कर खुर्शीद नामके व्यक्ति से निकाह कर लिया और मलका जान बन कर बनारस चली आईं। इसी प्रकरण में एंजेलिना भी गौहर जान हो गईं।

उस समय तक मलका जान स्‍थापित गायिका बन चुकी थीं। लोग उन्हें 'बड़ी मलका जान' के नाम से जानते थे। 1883 में मलका जान कलकत्ता में नवाब वाजिद अ‍ली शाह के दरबार में नियुक्‍त हो गईं। यहीं पर कलकत्ता में गौहर जान की नृत्य, संगीत की बाक़ायदा तालीम शुरू हुई।

इन्होंने पटियाला के काले खान उर्फ 'कालू उस्‍ताद', रामपुर के उस्‍ताद वज़ीर खान और पटियाला घराने के संस्‍थापक उस्‍ताद अली बख़्श जरनैल से हिन्‍दुस्‍तानी गायन सीखा। इसके अलावा उन्‍होंने महान कत्‍थक गुरु बृंदादीन महाराज से कत्‍थक, सृजनबाई से ध्रुपद और चरन दास से बंगाली कीर्तन में श‍िक्षा ली। जल्‍द ही गौहर जान ने 'हमदम' नाम से ग़ज़लें लिखना शुरू कर दिया। यही नहीं इन्‍होंने रवीन्द्र संगीत में भी महारथ हासिल कर ली थी।

कलकत्ता में नृत्य और संगीत के कड़े प्रशिक्षण और उनकी अपनी मेहनत का कमाल था कि गौहर जान ने 1887 में शाही दरबार, दरभंगा राज में अपना हुनर दिखाया और उन्‍हें वहां बतौर संगीतकार नियुक्‍त कर लिया गया।

गौहर जान

इसके बाद उन्‍होंने 1896 से कलकत्ता में प्रस्‍तुति देना शुरू कर दिया। ठसक ऐसी कि जिस रजवाड़े, रियासत से बुलावा आता, पूरा अमला लेकर पूरे तामझाम के साथ चलतीं। 101 सोने की गिन्नीयों का नज़राना पेश करने और पूरी ट्रेन बुक करने की शर्त पर बुलावा स्वीकार करती। नृत्य-संगीत के माहौल में रहते हुए भी उन्होंने अपनी मर्यादा और गरिमा का सदैव ख़याल रखा। परिस्थितिवश तवायफ़ का ठप्पा लगे होने के बावज़ूद , अपने चारो ओर प्रतिष्ठा की एक लक्ष्मण रेखा उन्होंने खींच रखी थी। कपड़े, गहनो का शौक ऐसा कि, रानियां और नवाबों की बेग़में उन पर रश्क करतीं। मज़ाल कि जिस महफ़िल में जो कपड़े, जेवरात एक बार पहन लिए वो दुबारा किसी महफ़िल में फ़िर नज़र आ जाएं।

1904-05 के दौरान गौहर जान की मुलाकात पारसी थिएटर आर्टिस्‍ट अमृत केशव नायक से हुई। लेकिन शादी होती उससे पहले अचानक 1907 में केशव नायक की मौत हो गई।

गौहर जान को दिसंबर 1911 में दिल्‍ली दरबार में किंग जॉर्ज पंचम के सम्‍मान में आयोजित कार्यक्रम में बुलाया गया, जहां उन्‍होंने इलाहाबाद की जानकीबाई के साथ 'ये जलसा ताजपोशी का मुबारक हो मुबारक हो' गीत गा कर अपनी प्रस्तुति दी। अपने जमाने में वो दुनिया की सबसे धनी कलाकार थी। राष्ट्र पिता महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन में भी इन्होंने आर्थिक मदद के साथ अपनी भूमिका निभाई थी।

असीमित कलाओं की मलिका गौहर जान से जुड़े कई दिलचस्प किस्से भी प्रचलित हैं जिसमें उनके समकालीन एक तवायफ़ बेनज़ीर बाई से जुड़ा एक वाक्या का भी ज़िक्र होना चाहिए।

बात यूं थी कि किसी महफ़िल में गौहर जान से पहले तमाम सुंदर हीरे- मोती के जेवरातों से ख़ुद को सजा कर बेनज़ीर अपना प्रदर्शन कर चुकी थीं ।इसके बाद गौहर जान ने अपनी कला की प्रस्तुति दी और युवा रूपसी हीरों से सजी बेनज़ीर के पास जा कर व्यंग से कहा कि ' बेनज़ीर तुम्हारे हीरे घर में चमक सकते हैं किंतु महफ़िल में तुम्हारी कला ही चमक सकती है'।

उनकी इस बात का असर सुंदरी बेनज़ीर पर कुछ ऐसा हुआ कि वापस बंबई लौट कर उसने अपने सारे गहने, शास्त्रिय संगीत सिखाने वाले अपने गुरू को भेंट में दे दिए। और ख़ुद इस के लिए पूरी लगन से जी तोड़ मेहनत की। दुबारा फिर गौहर जान को बेनज़ीर से मिलने का मौका मिला और इस बार बेनज़ीर की कला से इतनी प्रभावित हुईं कि बेनज़ीर के पास जा कर उसे स्नेहवश कहना नहीं भूलीं कि अब तुम्हारे हीरे सचमुच चमक रहें हैं। कला की ऐसी पारखी थीं गौहर जान की निष्ठा और उनकी आलोचना।

गौहर जान की शोहरत की बुलंदी का आलम ऐसा था कि कुछ समय बाद मैसूर के महाराजा कृष्‍ण राज वाडियार चतुर्थ के आमंत्रण पर मैसूर चली गईं। जहां के दरबार में उन्होंने अपने जीवन की आख़िरी प्रस्तुति दी । उसके 18 महीने बाद 17 जनवरी 1930 को 57 वर्ष की उम्र में मैसूर में उनका निधन हो गया। विडंबना यह रही कि ता- उम्र एक सम्मान जनक ,शान शौकत का जीवन जीने वाली इन फ़नकारा के बाद के कुछ अंतिम दिन बहुत अकेलापन और अवसाद में बीते।

दरभंगा, मैसूर एवं ब्रिटिश राजदरबार की महफ़िलों की रौनकें अपनी कला से रौशन करने वाला एक सितारा आसमान में कहीं खो गया। एक उम्दा गज़लकारा, सुर, संगीत और नृत्य की साम्राज्ञी गौहर जान को जयंती पर मेरा सादर नमन।

जगजीत सिंह

जगजीत सिंह

जगजीत सिंह

(8.2.1941-10.10.1911)

" न था कुछ तो ख़ुदा था, न होता कुछ तो खुदा होता

डुबोया मुझको होने ने, न होता मैं तो क्या होता "

गीत ,ग़ज़ल और संगीत की दुनियां एक ऐसी दुनियां है जहां कोई कलाकार सरहदों की बंदिशों और तमाम पाबंदियों से दूर अपनी सल्तनत का बेताज बादशाह होता है और इस कला में जब उसे महारथ हासिल हो जाए तो फिर कहना ही क्या....सोने पर सुहागा। मिर्जा ग़ालिब की नज़्मों को अपनी आवाज़ देकर रूहानियत बख़्शने वाले जगजीत सिंह जी ऐसे ही कलाकार थे ।

8 फरवरी 1941 को पंजाब के गंगा नगर में एक चिराग रौशन हुआ था, जिसे दुनियां ने आगे चल कर ग़ज़ल गायक जगजीत सिंह के नाम से जाना। अपने हुनर के मालिक और संगीत प्रेमियों के हरदिल अज़ीज़, अपने नाम के अनुरूप जग को जीतने वाले स्वर्गीय जगजीत साहब ऐसी ही शख्शियत थे, जिन्होंने एक महान संगीतकार और ग़ज़ल गायक की हैसियत से हिंदुस्तान के मशहूर शायरों की नज्मों को अपनी आवाज़ के माध्यम से एक नये मायने दिये और इन ग़ज़लों को सुनने और समझने के साथ ही उर्दू ग़ज़ल को एक ख़ास बुद्धिजीवी वर्ग विशेष के मुशायरे से बाहर निकाल कर आम लोगों तक पहुंचाने के साथ लोकप्रियता की बुलंदियों को छुआ।

मरहूम शायर मिर्जा गालिब की ग़ज़लों को यूँ तो बहुत सारे दिग्गज गायकों ने अपनी आवाज़ से नवाज़ा जरूर, लेकिन उन ग़ज़लों की रूहानियत को जिस अंदाज में जगजीत साहब ने जीया है, या उन ग़ज़लों के एहसास के साथ जो इंसाफ उनकी आवाज़ ने किया, वह बेमिसाल है शायद , या सच कहा जाए तो इन्होंने अपनी ग़ज़लों के ज़रिये मरहूम शायर को फिर से जिंदा कर दिया। मिर्जा ग़ालिब के अलावा मीर, जोश, और फ़िराक जैसे शायरों से भी आम आदमी को परिचित करवाया

...इनकी ग़ज़लों के कुल 43 एलबम रिलीज हुए इसके साथ ही भजन एवं पंजाबी गीतों के 13 एलबम तैयार हुए। साल 2003 में इन्हें "पद्मभूषण" सम्मान से सम्मानित किया गया.... इन्होंने अपने लाइव कंसर्ट का सफर 1979 से शुरू किया। उसके बाद लंदन, न्यूयॉर्क, सिडनी, सिगांपुर के अलावा देश विदेश से होता हुआ इनकी शोहरत ने जो झंडे गाड़े, वह जा कर रूका इनके निधन के साथ।

इनके दो कंसर्ट की गवाह मैं भी बनी...... उससे जुड़ी हुई यादों को साझा कर रही हूं।

वह शरद ऋतु की एक ख़ुशग़वार शाम थी, 2010 के अक्टूबर माह की 16 तारीख ,हवा में धूप, चंदन हुमाद की भीनी भीनी खुशबू तैर रही थी, शरद नवरात्र की नवमी पूजा का दिन। बंगलोर का पैलेस ग्राउंड, वाडियार राजवंश के महल का विस्तृत परिसर, जिसमें वह लगभग डेढ़ सौ साल पुराना बैभवशाली महल पूरी आन बान शान से अपने वैभवपूर्ण इतिहास की गाथा सुनाता आज भी पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है ,उसी पैलेस ग्राउंड में लंबे चौड़े खचाखच भरे पंडाल में ग़ज़ल गायक जगजीत साहब का बेसब्री से इंतजार करते श्रोतागण....पंडाल के दूसरी तरफ पूजा का मंडप, जहां की खुशबू से पूरा वातावरण पवित्र और सुवासित हो रहा था।

जगजीत सिंह

नियत समय पर जगजीत सिंह जी के आने की घोषणा हुई, मंच के नीचे एक तरफ के कोने को घेर कर ग्रीन रूम की शक्ल दिया गया था,जहां जगजीत सिंह जी तशरीफ़ ला चुके थे । हमारी सीट मंच के बिलकुल सामने ,जहां से अंदर सबकुछ साफ साफ दिखाई दे रहा था । सुहानी अंदर जा कर उन से मिल आई, संकोच ने मेरे पांव रोक लिए ....वे अपने सहकलाकारों एवं आयोजकों से घिरे...नियत समय पर उनका मंच पर आगमन हुआ, दर्शकों का उनके सम्मान में खड़े हो कर गर्मजोशी से अभिवादन, उनका भी उसी गर्मजोशी से जवाब। हम बिल्कुल पास से उन्हें देख पा रहे थे। कार्यक्रम शुरू हुआ, ग़ज़लों के बीच में वे एक दो जुमले भी सुनाते जाते....लोग सुध बुध खो कर उनकी ग़ज़लों के नशे में खोए रहे..दो फिल्मी ग़ज़लों 'तुमको देखा तो ये ख़याल आया' एवं 'होठों से छू लो तुम' को शुरू करने से पहले उन्होंने श्रोताओं से भी साथ देने को कहा।

उसके बाद तो ऐसी स्वरलहरी हवा में बिखरी, कि इतनी बड़ी तादाद में बैठे हुए दर्शकों का एक सुर भी, क्या मज़ाल कि इधर उधर हो जाए ....सुहानी ने बीच में कुछ तस्वीरें भी ली...उनकी लोकप्रियता का आलम यह कि दर्शक रात भर भी उन्हें सुन सकते थे, लेकिन कार्यक्रम खत्म होना था, सो हुआ और श्रोता उनकी ग़ज़लों को गुनगुनाते हुए पंडाल से बाहर निकले।

अगले साल सितंबर उनके ब्रेन हेमरेज होने की ख़बर आई जो उन्हें 10 अक्टूबर 2011 को अपने प्रशंसकों को मायूस कर हमारे बीच से उठा कर अनंत यात्रा पर ले गया ।

इससे पहले 1990-91 में झरिया, टाटा स्टील के स्टेडियम में उनका कंसर्ट हुआ था,उसमें उन्हें सुनने का मौका मिला था, तब वो अकेले ही आए थे, बेटे की मौत के बाद चित्रा जी ने उसी समय से गाना छोड़ दिया था। लेकिन अकेले उन्होंने जिस ख़ूबसूरती से श्रोताओं को अपनी और फिर उनकी फ़रमाइश पर ग़ज़लो से बांधे रखा वह अद्भुत था।

उनके निधन के बाद भारत सरकार ने 9 फरवरी 2014 को उनके सम्मान में डाक टिकटें जारी की। उनके द्वारा गाई मिर्जा ग़ालिब की ग़ज़ल के एक अशआर के साथ जयंती पर उन्हें विनम्र नमन :

'हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले

बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले'

दुष्यंत कुमार

दुष्यंत कुमार

"कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए,

मैंने पूछा नाम तो बोला कि हिंदुस्तान है।"

बहुमुखी प्रतिभा के धनी रचनाकार दुष्यंत कुमार ने न केवल कविता, उपन्यास, नाटक, एवं ग़ज़लें लिखीं बल्कि नई कविता के कवि के रूप में प्रतिष्ठित होने का गौरव भी प्राप्त किया। दुष्यंत कुमार को ग़ज़ल लिख कर जितनी सफलता हासिल हुई उतनी साहित्य की किसी दूसरी विधा में नहीं मिली। इसके पीछे जो कारण था वह अन्याय के प्रति वह बेचैनी थी जो अत्यंत संवेदनशील होने के कारण उन्हें बेचैन करती थी। उन्हीं के शब्दों में-

"मैं नहीं मानता कि मेरी तक़लीफ़ ग़ालिब से कम है या मैंने उसे कम शिद्दत से महसूस किया है।हो सकता है अपनी पीड़ा को लेकर हर आदमी को वहम होता हो, लेकिन इतिहास मुझसे जुड़ी हुई तक़लीफ़ों का गवाह ख़ुद है।"

उनकी कविताएं आज भी उतनी हीं प्रासंगिक हैं जितनी अपने लिखे जाने के समय में थीं। उनकी पीड़ा और अंदर की बेचैनी का अंदाज़ा इन पंक्तियों से लगाया जा सकता है।

"कहाँ तो तय था चराग़ाँ हर एक घर के लिए

कहाँ चराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए "

हिंदी ग़ज़लों को नया भाव, नया शिल्प एवं नई तहज़ीब, देने वाले दुष्यंत कुमार की रचनाओं में एकमात्र ग़ज़ल संग्रह "साये में धूप" धारदार ग़ज़लों का वह संग्रह है जिसे अपार लोकप्रियता हासिल हुई। इनकी ग़ज़लों में जो निडरता और बेबाकी थी वह बगैर किसी राजनीतिक छत्रछाया या लेखक संगठन के बैसाखी के थी।यही कारण था कि जनता ने उन्हें अपने साहित्यकार के रूप में आदृत किया। फिल्म "मसान" में उनके लिखे गीत ने "तू किसी रेल सी गुज़रती है" नें फिल्म को निहायत ही बिल्कुल जुदा तेवर अता किए।

डा रोहिताश्व अस्थाना ने उनके बारे में कहा है- " वे हिंदी के एकमात्र ऐसे शायर हैं जिन्होंने ग़ज़ल के रोमांटिक तेवर से अलग विद्रोह चेतना की ग़ज़लें लिख कर काव्यशिल्प में नये मेयार तामीर किए हैं।

जयंति पर विनम्र नमन (1.9.1933)

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फिर तेरी कहानी याद आईं

फिर तेरी कहानी याद आईं

"फिर तेरी कहानी याद आईं" इस शीर्षक में हीं एक कशिश है जो पाठकों को खींचता है। किताब में लेखक श्री ध्रुव गुप्त, जो खुद भारतीय पुलिस सेवा के अवकाश प्राप्त अधिकारी हैं, के तमाम अनुभवों के निचोड़ के साथ ही संस्कृति, मिथक, कला एवं इतिहास से सम्बन्धित गहन शोध की झलक मिलती है। साथ ही संस्कृति और कला से जुड़े सवालों की विवेचना भी गहराई से हमारे समक्ष रखती है। वैसे तो इनके उच्चस्तरीय लेखन का परिचय हमें फेसबुक के पटल पर देखने को मिलता रहता है लेकिन इनकी संवेदनशील कविताओं का एक संग्रह "मौसम जो कभी नहीं आता" शीर्षक शानदार किताब मैंने पहले भी पढ़ी है।

मैं सीधा- सपाट लिखने वाली, इतना कह सकती हूँ कि इस किताब "फिर तेरी कहानी याद आईं " में पुरानी दिल्ली के लाल किले की बेगम जीनत महल की दास्ताँ है तो दूसरों ओर महान सूफी संत शेख चिल्ली, जिन्हें दुनिया झूठे-सच्चे किस्सों, हास- परिहास का पर्याय मानती है, का पता चलता है। चाहे वह सलीम अनारकली के किस्से हों या मिर्जा ग़ालिब के दीवान पर लेखक का जुड़ाव या पकड़ , संवेदनशीलता दिखाई देती है। मिर्जा ग़ालिब के बारे में वे लिखते हैं कि "दिल्‍ली की भीड़ में आपको जरा देर के सुकून, बहुत सारे संवेगात्‍मक अनुभवों और थोड़ी बहुत रचनात्‍मक प्रेरणा की दरकार हो, तो कभी हो आइए मिर्जा ग़ालिब की छोटी सी मजार पर। वहां पहुंच कर आप अपने को छोटा कतई नहीं महसूस करेंगे। एक शायर के उस एकांत कोने में कुछ देर तक बैठने के बाद आपको लगने लगेगा कि आप उनसे मुख़ातिब भी हैं और उनके करीब भी"।

कला का पक्ष भी अछूता नहीं है इस संग्रह में। चाहे पार्श्व गायक मन्ना डे की गायिकी हो या बारिशों के मौसम में कजरी की गूंजती तान या फिर नौटंकी जैसी विधा का ज़िक्र, पाठकों की अपनी जानकारियों को ज्यादा समृद्ध करता है।

1930-40 के दशक में नौटंकी की बेताज मलिका बन बैठी, बेड़िया समाज की गुलाब बाई का रोचक विवरण है, जो बहुत अच्छी अभिनेत्री के साथ बेहतरीन गायिका और गीतकार भी थीं । जिनके बनाए और गाए हुए गीत, फिल्म तीसरी कसम में "पान खाए सैंया हमार और मुझे जीने दो में "नदी नारे न जाओ श्याम पैयां पड़ूं" कुछ बदलाव के साथ बहुत लोकप्रिय हुए।

इस किताब में प्रेम पर उन्होंने लिखा है कि "प्रेम व्यक्ति का स्वभाव है लेकिन अगर इच्छाओं की पूर्ति न हो तो प्रेम हिंसा का रूप भी धारण कर सकता है। इसके विपरीत प्रेम दो व्यक्तित्वों के मिलने से उपजी एक आंतरिक खुशबू है जो उनके बिछड़ जाने के बाद भी उनके व्यक्तित्व में सदा के लिए बची रह जाती है। प्रेम बेड़ियाँ नहीं, मुक्ति देता है। वह एकाधिकार नहीं माँगता। किसी ने आपको दो घड़ी, दो दिन भी प्रेम और आत्मीयता के अनुभव दिए तो आप सदा के लिए उसके कृतज्ञ हो जाते हैं।"

पिता के प्रति जो संवेदनशीलता देखने को मिलती है वह पहले ही लेख "कितने बदल गए पिता" में दिल को गहराइयों से छूती है। चाहे "गंगा बहती हो क्यों" लेख में फिर गंगा की त्रासद स्थिति का वर्णन हो या "बे-नूर आंखों का मसीहा" लूई ब्रेल लिपि के जनक लुई ब्रेल पर मार्मिक लेख हो, हर अध्याय बेहतरीन नई जानकारियों के साथ अपनें आप में बेमिसाल और पठनीय है। पैंतिस आलेखों की यह किताब अनामिका प्रकाशन से प्रकाशित हुईं है एवं एमेज़ाॅन पर उपलब्ध है।

फ़ैज़ साहब

फ़ैज़ साहब

बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी

फ़ैज़ साहब के गाए हुए इस ग़ज़ल के साथ आज का दिन मेहदी हसन साहब की बातें करने का और सिर्फ़ उनकी गायिकी सुनने का दिन है। क्या हुआ जो हमने अपना एक दिन सम्राट ए ग़ज़ल की इस मुकम्मल आवाज़ के संग गुज़ार दिया... अपनी मख़मली गायिकी की जो विरासत वे हमारे लिए छोड़ गएं हैं उसके एवज़ में विनम्र भावपूर्ण श्रद्धांजलि ही तो दे सकते हैं हम उन्हें ।

उन्हें सरहदों के दायरे में बान्ध कर नहीं रखा जा सकता है ।मेहदी हसन पाकिस्तानी ग़ज़ल गायक थे मगर भारत समेत विश्वभर में उन्हें भरपूर प्यार मिला। उन्होंने ग़ज़ल गायकी में एक नई जान फूंकी और जगजीत सिंह, हरिहरण और सोनू निगम जैसे गायकों को खासा प्रभावित किया।

शहंशाह-ए-ग़ज़ल मेहदी हसन की रूहानी ग़जलें, जो आज के माहौल में पूरसुकून एहसास देती हैं हिन्दुस्तान पाकिस्तान की साझा संस्कृति का प्रतिबिंब है।

संगीत की दुनिया में ग़ज़ल गायकी का अपना अलग ही एक अंदाज रहा है। जब ग़ज़ल की महफिलें लगती हैं तो उसका एक अलग ही जादू देखने को मिलता है। महान शायरों के कलामों को जब धुन मिलती है और उन धुनों को एक रुहानी आवाज, तो दिल में भी ग़ज़लों के लिए एक बेकरारी सी पैदा हो जाती है। और अगर वो आवाज अपने आप में ही मुकम्मल आवाज़ हो फिर तो बात ही कुछ और है। ऐसी ही एक मुकम्मल आवाज थी मेहदी हसन साहब की।सुरों पर उनकी जो पकड़ थी उसके बारे में नुसरत फ़तेह अली खान ने कहा था .....

भारतीय शास्त्रिय संगीत में 38 से अधिक रागों में उन्हें महारथ हासिल थी। और उसका सुंदर इस्तेमाल करना वे बख़ूबी जानते थे।

पाकिस्तानी सिनेमा में उनका योगदान अस्मरणीय है। इसके अलावा उनकी ग़ज़लों के एल्बम आज भी उन्हें चाहने वालों के ख़ज़ाने में मिल जाएंगे। उनका जन्म 18 जुलाई, 1927 को राजस्थान के लूना में हुआ था लेकिन बंटवारा के समय बीस साल की उम्र में वे पाकिस्तान चले गए और 13 जून, 2012 को पाकिस्तान के कराची शहर में 84 साल की उम्र में उनका निधन हो गया। उनके साथ ही ग़ज़ल गायिकी की रूह भी संगीत की दुनिया से रूख़सत हो गई।

मेरी कुछ प्यारी यादें उनकी गायकी से जुड़ी हुई हैं, 1980- 81 की बात होगी.... भारत में हसन साहब की दस ग़ज़लों का पहला कैसेट लाॅचं हुआ था 'बेस्ट ऑफ़ मेहदी हसन' ... काॅलेज के दिन थे, किसी को कह कर कैसेट मंगवाया । मेरे कमरे में तब टू इन वन टेप रिकार्डर था । मेरे कमरे के बगल वाला कमरा मेरे चाचा का था। वह कैसेट लगभग हर समय चलता ही रहता , अगर मैं घर में रहती तो...हसन साहब के सुरों के आरोह- अवरोह में खो कर कई बार बिल्कुल ध्यान नहीं रहता कि संगीत का वाॅल्यूम बहुत ऊँचा हो गया है। चाचा मेरे बहुत सरल सहज व्यक्तित्व ...ग़ज़ल का आकर्षण उन्हें क्या खींचता, उससे कहीं ज्यादा उसकी तरगें उन्हें बेज़ार करतीं....ख़ास कर जब 'बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी' में 'जादू' शब्द को हाई-लो नोट्स में हसन साहब का खींचना......चाचा वैसे तो कभी कुछ कहते नहीं लेकिन एक दिन जब यह ग़ज़ल बज रही थी तो बहुत सहजता से उन्होंने कहा....यह क्या हर समय सुनती रहती हो.....दिन भर हू...हू करता रहता है ।उसके बाद जब भी यह ग़ज़ल बजती तो मैं विशेष ध्यान रखती कि वाॅल्यूम तेज न हो.......लेकिन उस 'जादू' शब्द का तिलिस्म ऐसा ही था कि जो उसे सुन ले, वह बस उस गायिकी का दिवाना हो जाए ।आज चाचा नहीं हैं लेकिन जब भी यह ग़ज़ल सुनती हूँ उनकी बहुत याद आती है।और आज भी यह कह सकती हूँ कि मेहदी हसन साहब जैसा कोई और दूसरा नहीं हो सकता।

हसन साहब की दिली ख़वाहिश थी लता जी के साथ अपनी ग़ज़लों का एक एलबम बनाने की जो पूरी तो नहीं हो पाई लेकिन इन दोनों शख्शियतों की आवाज़ में एक नायाब ग़ज़ल की धरोहर ज़रूर मिली हमें जो पेश है उन ग़ज़ल प्रेमियों के लिए जो एक युग जीने की ख़्वाहिश रखते हैं।

प्रस्तुत है फ़रहत शाज़ेद के द्वारा लिखी गई और लता मंगेशकर जी एवं मेहदी हसन साहब के द्वारा गायी गई एकमात्र ग़ज़ल 'तेरा मिलना बहुत अच्छा लगे है, मुझे तू मेरे दुख जैसा लगे है' का लिंक ।लेकिन दुखद यह रहा कि लता जी के साथ गाई गई अपनी एकमात्र ग़ज़ल, जिसे अपनी आवाज़ में सुनने से पहले हीं हसन साहब इस दुनिया से रूख़सत हो गए। हालांकि कहा जाता है कि पहले मेहदी हसन साहब की आवाज़ में यह ग़ज़ल रिकार्ड की गई और बाद में लता जी की आवाज़ को उसमें तकनीक इस्तेमाल कर के डाला गया।

बशीर बद्र

बशीर बद्र

खुदा हमको ऐसी खुदाई न दे -

15 फरवरी 1935 को जन्म लेने वाले सय्यद मुहम्मद बशीर जो आगे चल कर बशीर बद्र के नाम से शेरों-शायरी की दुनिया में मशहूर हुए, नई उर्दू ग़ज़ल के अद्वितीय, ताज़ा बयान शायर हैं जिन्होंने ग़ज़ल में नए शब्दों को शामिल करते हुए नए संवेदी आकृति तराशे और नई पीढ़ी के मनोविज्ञान और उसके भावात्मक तक़ाज़ों को व्यक्त किया।

बशीर बद्र साहब ने शेरों के बारे में बेहद खूबसूरती से कहा है कि ग़ज़ल के सच्चे शेर बच्चों की वो मासूमियत है जिसमें साठ साल की बुजुर्गियत मुस्कुराती है।

इनकी शायरी की जुबान ऐसी है जो ज़िंदगी की बड़ी से बड़ी मुश्किलों को भी बहुत सादगी से बयान करती है।

आज उनकी यौमे पैदाइश पर उन्हें याद करते हुए कुछ दिलचस्प वाक्यातों का ज़िक्र होना जरूरी है।

"उजाले अपनी यादों के हमारे पास रहने दो

न जाने किस गली में जिन्दगी की शाम हो जाये "

लगभग पचास साल पहले लिखा गया बशीर साहब का यह वह शेर है जिसे सियासी जिम्मेदारियों और अजमतों की शख्सियत इंदिरागांधी ने अपनी एक सहेली ऋता शुक्ला को लिखा था।

इसी शेर को तब ट्रेजडी क्वीन कही जाने वाली अदाकारा मीना कुमारी जी ने अंग्रेजी पत्रिका " स्टार एण्ड स्टाइल" में अपने हांथो से लिख कर उर्दू में छपवाया था।

हरदिल अजीज शायर बशीर बद्र साहब की कामयाबी और शोहरत का आलम यह रहा कि दुबई में रहने वाली शायरा डाक्टर अख्तर जहां मलिक ने उनके 72 अशआरों को रेशम से चादर पर काढ़ कर उन्हें तोहफे में "जश्ने बशीर बद्र 28 सितम्बर सन् 2000 ई" उसी चादर पर काढ़ कर दिया। वह चादर अब भी उनके घर में मौजूद है ।

अंतरिक्ष परी कल्पना चावला की मौत को उन्होंने बेहद खूबसूरत और मार्मिक लहजे में बयां किया।

"कल्पना खो गई है तारों में

अपनी बच्ची को ढूंढ लाऊं क्या

आज संडे है, कल भी छुट्टी है

आसमानों में घूम आऊं क्या?

मिस यूनिवर्स के इंटरव्यू में मिस यूनिवर्स का ताज हासिल करने वाली सुष्मिता सेन से जब पूछा गया कि आप इतना रिजर्व क्यों रहती है तो उनका जवाब था। महानगरों की संस्कृति की तस्वीर पेश करता यह शेर कितना तल्ख लेकिन सादगी भरे लहजे में कहा गया ।

"कोई हांथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से

ये नये मिज़ाज़ का शहर है जरा फ़ासले से मिला करो"

बशीर बद्र साहब की ज़िंदगी में हादसे भी बहुत गुज़रे जिसे उन्होंने बेहद हौसले से बर्दाश्त किया और बहुत सलीके से बयां भी किया ।

"लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में

तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में "

उनका मानना रहा है कि शायरी की दुनिया में पिता की मौत के बाद पिता की विरासत बेटे की हो जाए, ऐसा नहीं होता। यह विरासत उसे शायरी के लिए सिर्फ तैयार कर सकती है। कहना न होगा कि इनकी गज़लों और नज़्मों को दिग्गज ग़ज़ल गायकों ने अपनी आवाज़ में रूहानियत बख़्शी है। जगजीत सिंह जी एवं चित्रा सिंह की आवाज़ में गायी गई उनकी ग़ज़लों ने एक मुकाम हासिल किया।

"खुदा हमको ऐसी खुदाई न दे

कि अपने सिवा कुछ दिखाई न दे"

एक रोचक किस्सा यह भी है कि 34 साल की उम्र में बशीर साहब एम ए करने अलीगढ़ यूनिवर्सिटी पहुंचे।1969 तक बशीर बद्र की ग़ज़लें इतनी मशहूर हो चुकी थीं कि वे युनिवर्सिटी के सिलेबस का हिस्सा हो गई थीं ।उनका एडिशन हुआ तो छात्रों ने पूछा कि क्या वे अपनी ग़ज़लें पढ़ कर परीक्षा देंगे तो ऐसे में तो वही टॉप करेंगें। यह मुद्दा प्रोफेसर तक पहुंचा।और बाकी छात्रों की भावनाओं का खयाल रखते हुए उनकी अलग से परीक्षा हुई और उन्होंने टाइप भी किया ।

1999 में पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित किये जाने वाले बशीर बद्र साहब की कामयाबी और शोहरत का राज यह रहा कि उन्होंने आम आदमी के जज़्बातों को बोलचाल की जुबान में बड़ी सादगी और ख़ूबसूरती के साथ पेश किया। धर्म समुदाय से परे उनकी ग़ज़लों में गांव की मिट्टी की सोंधी यादें और भीनी खुशबू का एहसास होता है।

"गीले गीले मंदिरों में बाल खोले देवियाँ

सोंचती हैं उनके सूरज देवता कब आएंगे "

अपनी ग़ज़लों और शायरी से आम से ख़ास तक लोगों के दिलों में एक ख़ास मुकाम बनाने वाले शायर बशीर बद्र साहब को सुदीर्घ, सुस्वस्थ जीवन की शुभकामनाओं के साथ उनकी यौमे पैदाइश पर बहुत मुबारकबाद।

मज़हर इमाम साहब

मज़हर इमाम साहब

मज़हर इमाम साहब

(12.3.1928 - 30.1.2012)

" तू है ग़र मुझ से ख़फा, खुद से ख़फा हूं मैं भी

मुझको पहचान कि तेरी ही अदा हूँ मैं भी

एक तुझ से हीं नहीं फ़स्ल-ए-तमन्ना शादाब

वही मौसम हूँ वही आब-ओ-हवा हूँ मैं भी

मुझको पाना हो तो, हर लम्हा तल़ब कर ना मुझे

रात के पिछले पहर मांगी दुआ हूँ मैं भी

सब्त हूँ दस्त-ए-ख़ामोशी पे हिना की सूरत

ना-शुनिदा ही सही तेरा कहा हूँ मैं भी

जाने किस सम्त चलूँ, कौन से रूख़ मुड़ जाऊँ

मुझ से मत मिल के ज़माने की हवा हूँ मै भी

यूँ न मुरझा के, मुझे ख़ुद पे भरोसा न रहे

पिछले मौसम में तिरे साथ खिला हूँ मैं भी "

स्वर्गीय मज़हर इमाम साहब, उर्दू साहित्य के जाने माने, नरम लहजे के शायर, ग़ज़लकार एवं आलोचक रहे थे। लंबा छरहरा कद, शांत, शालीन व्यक्तित्व के मालिक , मित्तभाषी , सौम्यता चेहरे से झलकती.... मेरी सहेली फ़रज़ाना के पिता एवं मेरे लिए पितातुल्य...बिहार का दरभंगा जिला उनकी जन्मभूमि रही, जहाँ आज भी उनकी पुश्तैनी हवेली है ....उर्दू एवं फारसी में मगध एवं बिहार विश्वविद्यालय से एम ए की डिग्री हासिल करने के बाद 1951 में कलकत्ता दैनिक समाचार पत्र "कारवां " से जुड़े, जिसके बाद, पटना में 1967 से 1975 तक ऑल इंडिया रेडियो में नौकरी के दौरान एक लंबा वक्त गुज़ारा। तत्पश्चात, जम्मू कश्मीर दूरदर्शन में पदभार सम्हाला और श्रीनगर में रहे। तीन दशकों तक अपनी सेवाएं दे कर 1988 में दूरदर्शन जम्मू कश्मीर से बतौर निर्देशक , अपने पद से सेवानिवृत हुए। सन् 1990 की शुरूआती महीनों में इमाम साहब ने कश्मीर छोड़ने का फैसला कर, दिल्ली का रूख किया एवं उसे अपनी कर्मभूमि के तौर पर चुना। घाटी छोड़ने का दर्द उनकी कलम से कुछ यूं बयां हुआ

"वादी-ए-गुल से निकलना एक मजबूरी सही

शहर-ए-ना-पुरसाँ में हम को राएगाँ होना ही था "

उर्दू के मशहूर आलोचक नियाज़ फतहपुरी ने उन्हें पहले दर्जे का शायर बताया है। उन्होंने नज़्में, ग़ज़लें दोनो कही हैं। अपनी शायरी के शुरूआती दौर में प्रगतिशील आंदोलन से प्रभावित रहे लेकिन आगे चल कर अपनी अलग राह बनाने में एक मुक़ाम हासिल किया एवं समकालीन शायरों से अलग दिखने में सफल रहे। उनकी ग़ज़लें समकालीन घटनाओं का इतिहास ही नहीं पेश करतीं बल्कि इंसान की आंतरिक पीड़ा एवं भावनाओं की झलक दिखाती हैं।

इमाम साहब ने अपने ख़ास लब व लहजे में जिस तरह की उम्दा एवं अति विशिष्ठ उर्दू शायरी की परंपरा की शुरूआत की उसके आधार पर उनकी गिनती नासिर काज़मी, शक़ेब जलाली, और जमील मज़हरी जैसे बड़े शायरों में की जाती है।

वे पहले ऐसे शायर थे, जिन्होंने परंपरागत उर्दू शायरी एवं गज़लों को एक नया आयाम दे कर जम्मू कश्मीर की पृष्ठभूमि को अपनी गज़लों के कैनवास पर उतारा। रूहानी एहसास से भरी होती उनकी ग़ज़लें....ग़ज़लों के संग्रह की तेरह किताबें लिखी जिनमें, पिछले मौसम का फूल, रिश्ता गूंगे सफ़र का, बंद होता हुआ बाज़ार, ज़ख्म-ए-तमन्ना मुख्य हैं।

1)ज़ख्म ए तमन्ना,

2) रिश्ता गूंगे सफर का,

3) पिछले मौसम का फूल

4) निस्फ़ मुलाकात,

5) बंद होता हुआ बाज़ार,

6) पालकी कहकशां की,

7) अक्सर याद आते हैं,

8)आती जाती लहरें,

9) एक लहर जाती हुई,

10) तंक़ीद नुमां,

11) ज़मील मज़हरी- आदाब के माएमार,

12) निगाहे तैराना

सन् 1994 में उनकी काव्य रचना "पिछले मौसम का फूल" के लिए उन्हें भारत का उच्चस्तरीय सम्मान "साहित्य अकादमी पुरस्कार" से नवाज़ा गया, जिसके साथ ही फिल्म जगत के गीतकार निदा फाज़ली, बशीर बद्र, मख़मूर सईदी ,शीन काफ़ निज़ाम , जयंत परमार जैसे शायरों की लिस्ट में उनका नाम शुमार हुआ। इसके अतिरिक्त राजभाषा विभाग, बिहार सरकार के द्वारा "मौलाना मज़रूल हक़" उच्चस्तरीय पुरस्कार, दिल्ली उर्दू एकादमी के द्वारा "ग़ालिब अवार्ड" से सम्मानित किया गया। इमाम साहब के व्यक्तित्व एवं अवदानों पर विभिन्न विश्वविद्यालयों के द्वारा पी एच डी की अनेक डिग्रियां भी प्रदान की जा चुकी हैं।

मज़हर इमाम साहब का नाम उन शायरों में शुमार होता है,जिनकी गज़लों एवं शायरी को फिल्म जगत के दिग्गज गायकों, हरिहरन , उस्ताद अहमद हुसैन , मोहम्मद हुसैन ने अपनी आवाज़ से सजाया। कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी, कि इमाम साहब ने ग़ज़ल लेखन में एक नया प्रयोग कर के 1945 में आज़ाद ग़ज़ल की शुरुआत की।

यूँ तो ग़ज़ल, उर्दू काव्य का बहुत लोकप्रिय, मधुर और दिलकश अंदाज है ही, उस पर आज़ाद गज़ल की एक ख़ास बात यह है कि, उसका प्रत्येक शेर अपने आप में एक मुकम्मल दास्तान होता है, और उसका ताल्लुक गज़ल में आने वाले अगले पिछले या अन्य शेरों से हो, यह जरूरी नहीं है..... तभी से आज़ाद गज़ल की परंपरा को आगे बढ़ाने और अपनी रचनाओं में शुमार करने की कवायद युवा शायरों में शुरू हुई।

खुशकिस्मती ने मुझे, दस- ग्यारह सालों के दौरान उन से तीन- चार बार मिलने का मौका दिया, जब जब वे धनबाद आए,टाटा स्टील के कोलियरी डिवीजन की डिगवाडीह काॅलनी हो या भेलाटांड काॅलनी बिल्कुल मेरे बाद का घर फ़रज़ाना का था, जिसके बीच एक ही दीवार थी, उस दौरान मुझे, उनके बारे में बहुत कुछ नज़दीक से जानने का मौका मिला......मैं आखिरी बार उन से तब मिली, जब 2009 में मेरा दिल्ली जाना हुआ। तब मयूर विहार स्थित उनके निवास पर उनसे एवं आंटी से मिलने का मौका मैं नहीं गँवाना चाहती थी। आंटी का स्नेह एवं अपनत्व पूर्ण व्यवहार ही था जो मुझे तीन दिनों के अल्प प्रवास में भी उन तक खींच ले गया.... आंटी से फोन पर उनके घर का पता पूछा तो मुझे घर ढूंढने में मुश्किल न हो, और मैं रास्ता न भटक जाऊं, इसलिए वे खुद ही बाहर निकल कर सड़क पर खड़ी थी। बहुत ख़ुश हुईं मुझे देख कर...फ़रज़ाना तब तक सपरिवार कनाडा जा चुकी थी... उम्र और वृद्धावस्था ने काफी असर छोड़ा था इमाम साहब पर...बिस्तर पर ही लिटा दिया था

उन्हें....उसके बाद भी मेरा दिल्ली आना जाना तो होता रहा, लेकिन मिलना नहीं हो पाया....हां फोन पर बात हो जाती आंटी से कभी कभी..... बहुत धक्का लगा उर्दू काव्य साहित्य को जब उनके इंतकाल की ख़बर आई,जिसे शिद्दत से महसूस किया उनके पाठकों प्रशंसकों, एवं चाहने वालों ने ।

बेहतरीन यादों के साथ, उन्हें उनकी यौम ए वफ़ात पर ख़िराज़ ए अक़ीदत , उनके एक शेर के साथ...

सफ़र में अचानक सभी रूक गए

अज़ब मोड़ अपनी कहानी में था

# मज़हर इमाम साहब

मदन मोहन

मदन मोहन

माई री मैं कासे कहूं पीर अपने जिया की...

भारतीय फिल्म जगत को अपने एक से बढ़ कर एक गीतों की धरोहर सौंपने वाले और संगीत के क्षेत्र में विलक्षण प्रतिभा रखने वाले अत्यतं मशहूर संगीतकार स्वर्गीय मदन मोहन जी की आज जयंती है।

अपनी गज़लों के लिए प्रसिद्ध इन संगीतकार का पूरा नाम मदन मोहन कोहली था। अपनी युवावस्था में ये एक सैनिक थे। बाद में संगीत के प्रति अपने झुकाव के कारण ऑल इंडिया रेडियो से जुड़ गए। तलत महमूद तथा लता मंगेशकर से इन्होने कई यादगार गज़लें गंवाई । यहां तक की मशहूर मलिका ए ग़ज़ल गायिका बेग़म अख़्तर से भी अपनी धुनों पर गीत गवा लेने में ये सफ़ल रहे। मदन मोहन ने ‘दाना पानी’ (1953) में बेग़म अख्तर से कैफ़ इरफ़ानी की ग़ज़ल ‘ऐ इश्क़ मुझे और तो कुछ याद नहीं है’ गवाई। बेग़म अख्तर साहिबा फ़िल्मों के लिए गाना छोड़ चुकी थीं। उनका मदन मोहन के इसरार पर वापस आना इस बात की तस्दीक करता है कि वे ग़ज़ल की कंपोज़ीशन करते वक़्त पूरी ईमानदारी बरतते थे।

मदन मोहन का जन्म 25 जून 1924 बगदाद, इराक में हुआ था। जहाँ उनके पिता राय बहादुर चुन्नीलाल इराकी पुलिस के साथ एक एकाउंटेंट जनरल के रूप में काम कर रहे थे। मदन मोहन ने अपने जीवन के पहले पाँच साल यहाँ बिताए। उनके पिता राय बहादुर चुन्नीलाल फ़िल्म व्यवसाय से जुड़े थे और बाम्बे टाकीज और फ़िल्मीस्तान जैसे बड़े फ़िल्म स्टूडियो में साझीदार थे।

घर में फ़िल्मी माहौल होने के कारण मदन मोहन भी फ़िल्मों में काम कर बड़ा नाम करना चाहते थे लेकिन अपने पिता के कहने पर उन्होंने सेना में भर्ती होने का फैसला ले लिया और देहरादून में नौकरी शुरू कर दी। कुछ दिनों बाद उनका तबादला दिल्ली में हो गया। लेकिन कुछ समय के बाद उनका मन सेना की नौकरी में नहीं लगा और वह नौकरी छोड़ लखनऊ आ गये।

आदरणीय लता मंगेशकर से सन 1967 में पूछा गया था कि उस साल उनके गाये हुए 10 बेहतरीन गाने कौन से हैं जिस पर लता जी का जवाब था कि उनकी फ़ेहरिस्त में सिर्फ एक संगीत निर्देशक के दो गाने थे- ‘लग जा गले से फिर ये हसीं रात हो न हो’ और ‘बैरन नींद न आये’ ।

मदन मोहन के काम का दायरा इतना बड़ा है कि उसकी पैमाइश एक लेख में नहीं हो सकती। उनका बग़दाद में 25 जून को पैदा होना, बचपन से ही प्रतिभाशाली होना, पिता राय बहादुर चुन्नीलाल का बॉम्बे टॉकीज़ का संस्थापक होना, संगीत के जुनून के चलते उनको घर से निकाला जाना, किशोर कुमार की ही तरह संगीत की कोई फॉर्मल ट्रेनिंग न लेना और जद्दन बाई जैसी गायिका का बच्चे मदन मोहन से प्रभावित होना, ये सब बातें उनके काम के आगे कम ही अहमियत रखती हैं।

ग़ज़लों के साथ इंसाफ करने की नीयत की बानगी का एक क़िस्सा यूं है कि ‘मौसम’ फ़िल्म में गुलज़ार ने अपने पसंदीदा संगीतकार को छोड़कर मदन मोहन को चुना क्योंकि फिल्म का मिज़ाज कुछ ऐसा ही था। फ़िल्म की ग़ज़ल ‘रुके-रुके से क़दम रुक के बार-बार चले’ बहुत मशहूर हुई थी, और आज भी है।

मदमोहन के साथ लता जी की गाई हुई एक से एक नायाब ग़ज़लें हैं। लता जी ने उन्हें अपना गुरू भाई माना और उनकी धुनों पर यादगार गीतों के तोहफ़े हमें दिये। मसलन, ‘धुन’(1953) की ग़ज़ल ‘बड़ी बर्बादियां लेकर दुनिया में प्यार आया’. ‘अनपढ़’ (1962) की, ‘आपकी नज़रों ने समझा प्यार के काबिल मुझे’ तो अब कल्ट बन चुकी है. मजरुह सुल्तानपुरी की ‘दस्तक’(1970) की ग़ज़ल, ‘हम हैं मता-ए-कूचा-औ-बाज़ार की तरह’ हो या फिल्म ‘जहांआरा’ की ‘वो चुप रहें तो मेरे दिल के दाग़ जलते हैं’, 'लग जा गले से फ़िर ये हंसी रात हो न हो', तू जहां जहां चलेगा मेरा साया साथ होगा। मदन मोहन जी के गानों की फ़ेहरिस्त इतनी लंबी है कि उसे एक ही पोस्ट में नहीं लिखा जा सकता है। अपनी आवाज़ में उन्होंने फ़िल्म दस्तक के लिए एक गाना 'माई री मैं कासे कहूं पीर अपने जिया की' एवं फ़िल्म 'वो कौन थी' का 'नैना बरसे रिमझिम' भी गाया।

वर्ष 2006 में फिल्म 'वीर जारा' के लिए उनकी बनाई धुनों का इस्तेमाल 'तेरे लिए हम हैं जीए, हर आंसू पिए' गाने में किया गया था। एक साथ कई पीढ़ी को अपनी धुनों से नवाज़ने एवं अपने यादगार, अनमोल गीतों की सौग़ात हमे सौंपने वाले ऐसी शख़्शियत और अपने बेहद पसंदीदा संगीतकार स्वर्गीय मदन मोहन जी को मेरी विनम्र श्रद्धांजलि।

मल्लिका ए ग़ज़ल - बेगम अख्तर

मल्लिका ए ग़ज़ल - बेगम अख्तर

मल्लिका ए ग़ज़ल - बेगम अख्तर

मल्लिका ए ग़ज़ल के नाम से जानी जाने वाली महान गायिका बेगम अख्तर जो संगीत की दुनिया में किसी परिचय की मोहताज़ नहीं हैं, वास्तव में दादरा ठुमरी के अलावा बेमिसाल ग़ज़लों को गाने में उनका कोई जवाब नहीं था उस जमाने में। फैजाबाद के शादीशुदा वकील असगर हुसैन और तवायफ मुश्तरीबाई की बेटी बिब्बी ही आगे चल कर बेगम अख्तर के नाम से जानी गईं।

वैसे उनका नाम अख्तरी बाई फ़ैज़बादी था जिन्हें दादरा, ठुमरी व ग़ज़ल में महारथ हासिल थी, कला के क्षेत्र में भारत सरकार से पहले पद्म श्री तथा सन १९७५ में मरणोपरांत पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था। उन्हें "मल्लिका-ए-ग़ज़ल" के ख़िताब से नवाज़ा गया था। इसके अलावा संगीत नाटक एकैडमी के पुस्कार से भी सम्मानित किया गया उन्हें।

बेगम अख्तर ने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत "एक दिन का बादशाह" से की थी लेकिन दुर्भाग्य से उनकी यह फिल्म नहीं चल सकी

इसके कुछ समय बाद वो लखनऊ लौट आईं जहां पर उनकी मुलाकात निर्माता-निर्देशक महबूब खान से हुई ।बेगम अख्तर की प्रतिभा से महबूब खान इतने प्रभावित थे कि उन्हें मुंबई बुलाया। अबकी बार मुंबई जाने के बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और फिल्मों के साथ साथ ही अपने गायकी के शौक को भी बरकार रखते हुए मल्लिका-ए-ग़ज़ल के नाम से पहचानी जाने लगी ।15 वर्ष की उम्र में बिना किसी तैयारी के उनका पहला स्टेज शो हुआ।

उनकी आवाज में जिंदगी के सारे दर्द साफ झलकते थे। यह कार्यक्रम बिहार के भूकंप पीड़ितों की मदद के मद्दे नज़र चंदा इकट्ठा करने के लिए कोलकाता में हुआ था।

मशहूर शहनाई वादक अमान अली खान साहब और उनके नौजवान युवा शागिर्द (उस्ताद) बिस्मिल्लाह खान ने भी इसमें शिरक़त की थी। कार्यक्रम के बीच में एक शास्त्रिय संगीत के गायक की प्रस्तुति थी, किंतु ऐन वक्त पर उनका आना नहीं हो सका ।लोगों का धैर्य जवाब देने लगा था। आयोजकों को शर्मिंदगी न झेलना पड़े और कार्यक्रम में व्यवधान न आए, इस लिहाज़ से पटियाला घराने के उस्ताद मुहम्मद अता खान साहब जो वहां उपस्थित थे, उन्हों ने अपनी एक शिष्या को मंच पर आगे करने का फैसला किया। यह 1949 की बात थी।

कांपती टांगों से 15 वर्ष की अख़्तरी बाई फ़ैज़ाबादी मंच पर आईं। दर्शकों का रेला देखने के बाद उन्होंने आंखें बंद कर ख़ुदा को याद किया और जानी-मानी ग़ज़ल गायिका मुमताज़ बेग़म का कलाम उनके मुंह से निकल पड़ा।

'तूने बुत-ए-हरजाई कुछ ऐसी अदा पाई

तकता है तेरी ओर हर एक तमाशाई’

ग़ज़ल पूरी हुई। लोग आवाज़ की कशिश से हैरान रह गए। तालियों की गड़गड़ाहट ख़त्म होने तक वे चार ग़ज़लें गा चुकी थीं। शो तो ख़त्म हो चुका था, दास्तां अभी बाकी थी। एक महिला कार्यक्रम पूरा होने के बाद उन तक आई और कहा, ‘मैं ये तय करके आई थी कि मुझे कुछ देर ही इस कार्यक्रम में रुकना है, तुम्हें सुना तो ठहर गई'। उस महिला ने आगे कहा, ‘अब कल तुम मुझे सुनने आना.’ ये कहकर उसने अख़्तरी बाई को खादी की साड़ी भेंट की। वह महिला कोई और नहीं, बल्कि भारत की स्वर कोकिला सरोजिनी नायडू थीं!

फिर एक दिन, एंजेलिना योवर्ड यानि मशहूर गौहर जान, जिनकी पूरे हिंदुस्तान में धूम थी, फ़ैज़ाबाद आईं। इत्तेफ़ाक से वे उस कक्षा में गई जहां ‘बिब्बी’ उर्फ़ अख़्तरी पढ़ती थीं किस्सा है कि बिब्बी ने योवर्ड का दामन थाम लिया और कहा, ‘आप गौहर जान हैं न?’ आप ठुमरी गातीं हैं। गौहर जान बोलीं, ‘क्या तुम भी गाती हो?’ बिब्बी ने उन्हें ख़ुसरो का कलाम ‘अम्मा मोरे भैया को भेजो सवान आया’ सुनाया। कहते हैं कि गौहर जान इसे सुनकर अवाक रह गईं. बोलीं, ‘अगर इस बच्ची को तालीम मिल गई तो ये मल्लिका-ए-ग़ज़ल बनेगी!

अख़्तरीबाई को संगीत विरसे में मिला था। उस्ताद मोहम्मद अत्ता खान को उन्हें शास्त्रीय गायक बनाने की ज़िद। अख़्तरी ने उस्ताद की शागिर्दी छोड़ दी। पर गुरु ने तब तक वह सिखा दिया था जो उनके ज़िंदगी भर काम आने वाला था। उन्होंने ख़्याल, ठुमरी, दादरा और ग़ज़ल का फन सीख लिया था।

फिर गुरु को उन्होंने ऐसा पकड़ा कि नहीं छोड़ा। फ़ैज़ाबाद से परिवार कोलकाता चला आया। साथ में उस्ताद भी आए। घर की तंगहाली के कारण एक दिन वे एचएमवी के दफ़्तर चली गयीं। लपककर, कंपनी ने दादरा और ग़ज़लें रिकॉर्ड कर लीं। इसके बाद तो उन्हें पीछे मुड़कर देखने की ज़रूरत नहीं पड़ी। यह उनका ही जादू था कि ग़ज़ल कोठों से निकलकर आम लोगों की ज़िंदगी में आने को बेक़रार हो गयी।

ग़ालिब, मोमिन, फैज़ अहमद फैज़, कैफ़ी आज़मी, शकील बदायूंनी जैसे कमाल के शायरों के कलामों को उनकी आवाज़ ने नए मुक़ाम दिलवाए। लखनऊ घरानों की शान कही जाने वाली ठुमरी को गौहर जान के बाद नयी ऊंचाइयों पर अगर कोई ले गया तो वे बेगम अख़्तर ही थीं। वाज़िद अली शाह की बनाई हुई ‘हमरी अटरिया पे आजा रे सांवरिया’ तो उनके जैसा शायद कोई गा ही नहीं पाया।

बेगम अख्तर की आवाज़ का जादू लोगों के सिर पर चढ़कर बोल रहा था। उनकी शक्लो-सूरत भी भली थी

फ़िल्म निर्माता उनसे अभिनय की भी मांग करने लगे। इसके बाद उन्होंने ‘नल और दमयंती’, ‘एक दिन की बादशाहत’, ‘मुमताज़ बेगम’, ‘अमीना’, ‘जवानी का नशा’ और कई फ़िल्मों में काम किया।

कहा जाता है कि ईस्ट इंडिया फ़िल्म कंपनी ने उनकी तनख्वाह 700 रुपये मासिक से बढ़ाकर 2000 कर दी थी. लेकिन उनका मन नहीं लग रहा था। सो इस सब को छोड़कर वे 1942 में लखनऊ चली आईं. लेकिन महान फ़िल्म निर्माता महबूब उनके उनके पीछे वहां तक आ गए और फ़िल्म ‘रोटी’ में रोल और गाने की हां करवाकर ही माने।

मदन मोहन जैसे ग़ज़ल संगीतकार के कहने पर उन्होंने उनके संगीत पर फिल्म 'दाना पानी' के लिए ग़ज़ल ‘ऐ इश्क़ मुझे और तो कुछ याद नहीं है’ गाया, जबकि उन्होंने तब तक फिल्मों के लिए गाना छोड़ दिया था।

कैफ़ी साहब का ज़िक्र न हो तो बेगम साहिबा पर हर लेख अधूरा रहेगा। दोनों इतने अच्छे दोस्त थे कि कैफ़ी साहब ने एक बार उनके कुछ यूं कहा था, ‘ग़ज़ल सिर्फ सुनने को ही नहीं देखने को भी मिलती है ’। जिस प्रकार फैज़ अहमद फैज़ की कुछ नज़्मों को नूरजहां ने गाकर अमर किया था, कुछ वैसे ही इधर भी देखने को मिला। 11 बरस के कैफ़ी की पहली ग़ज़ल, ‘इतना तो ज़िंदगी में किसी के ख़लल पड़े, हंसने से हो सुकूं न रोने से कल पड़े’ से लेकर तमाम दूसरे गजलें उन्होंने अपनी आवाज़ से नवाज़ीं।

रीता गांगुली एक मज़ेदार वाकये का ज़िक्र करती हैं। उन्ही के शब्दों में ‘एक किसी रिकॉर्डिंग के लिए मैंने (रीता) कैफ़ी साहब की कुछ ग़ज़लें चुनीं। एक ग़ज़ल में मक्ता (आख़री शेर) नहीं था। मैंने अम्मी (बेगम अख़्तर) को बताया तो उन्होंने झट से मुझे कैफ़ी साहब को फ़ोन लगाने को कहा और बोला कि कहो अम्मी की तबियत बेहद ख़राब है, जल्द आयें। कैफ़ी साहब जानते थे कि अम्मी को एक बार दिल का दौरा पड़ चुका है। डरते हुए उन्होंने कहा कि उन्हें फ़ोन करने से बेहतर होता मैं डॉक्टर को फ़ोन करतीं। मैंने कहा कि अम्मी ने सिर्फ़ आपको बुलाया है...

कैफ़ी साहब आधे घंटे में होटल पहुंचे। मैं उन्हें सीधे कमरे में ले गयी जहां अम्मी बैठी थीं। कैफ़ी साहब ने देखा, वो तो सोफ़े पर आराम फ़रमा रही हैं। वो कुछ कहते, इसके पहले ही अम्मी ने उनका हाथ पकड़ा और बोला, बच्ची ने रिकॉर्डिंग के लिए तुम्हारी ग़ज़ल चुनी है, उसका मक्ता नहीं है। कमरे में शराब है, सोडा है और ग्लास है. मक्ता हो जाए, तो बता देना, दरवाज़ा खुल जाएगा। ये कहकर, उन्होंने कैफ़ी साहब को कमरे में बंद कर दिया और बाहर से कुंडी लगा दी। कैफ़ी साहब झल्लाकर बोले कि अजीब पागलपन है, शागिर्दा को भी झूठ बोलना सिखा दिया। तभी उनके कमरे से सोडे की बोतल खुलने की आवाज़ आई. तीन घंटे बाद वो बाहर निकले, ग़ज़ल मुकम्मल थी।

सुना करो मेरी जान इनसे उनसे अफ़साने

सब अजनबी हैं यहां कौन किसको पहचाने

समोसों और चंद सिगरेटों की तमन्ना

तन्हाई और बेगम अख़्तर का गहरा साथ था। वे अक्सर कहा करतीं, ‘सब कुछ साथ छोड़ जाएगा तन्हाई के अलावा.’ खाना बनाने की शौकीन। दो प्याज़ा सब्ज़ी बड़े चाव से बनातीं। और समोसे पर तो उनका सब कुछ कुर्बान। शराब, सिगरेट और कैफ़ी साहब ही उनके आख़िरी दिनों के दोस्त थे।

कभी लखनऊ जाना हो तो मिलके आइएगा। गौहर जान की नहीं, हिंदुस्तान की मल्लिका-ए-ग़ज़ल 30 अक्टूबर, 1974 से लखनऊ के पसंदा बाग में आराम फ़रमा रहीं हैं। मानो इस इंतज़ार में कि कोई आए और उनसे कहे, ‘अम्मी, चलो उठो। ठुमरी ही गा दो या कोई ग़ज़ल हो जाए.’ पर ऐसा कब होता है?

7 .10.1914, - 30.10. 1974,

Awards: Padma Bhushan, Padma Shri, Sangeet Natak Akademi Award for Hindustani Music

महात्मा गांधी

महात्मा गांधी

आज जिन महापुरूष का 152 वां जन्मदिन है उन्हें देश में कौन नहीं जानता है और जाने भी क्यों नहीं ! महात्मा गांधी जैसे महापुरुष तो कई सदियों में एक बार जन्म लेते हैं ।

यह हमारा सौभाग्य था कि इनके जैसी विभूति ने हमारे देश में न सिर्फ़ जन्म लिया बल्कि हमारे स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व भी किया। उन्हें कृतज्ञ राष्ट्र ने बड़ी आत्मीयता और सम्मान से राष्ट्रपिता के आसन पर बैठाया। और न सिर्फ हमें वजहें दी अपने राष्ट्रपिता पर गर्व करने की बल्कि पूरा विश्व उनका मुरीद रहा है।

आदिकाल से दुनिया को किसी भी लड़ाई के लिए खतरनाक, घातक और विध्वंसक हथियार की अहमियत ही मालूम थी। हम अगर इतिहास में पीछे मुड़कर देखें तो गांधी जी के प्रार्दुभाव के पहले लड़ी गई असंख्य लड़ाईयाँ घातक हथियारों के बल पर ही लड़ी और जीती गई थीं।

सत्य, अहिंसा, सत्याग्रह जैसे साधारण लगने वाले विचार, घातक से घातक हथियारों से भी अधिक प्रभावी हो सकते हैं यह दुनिया ने पहली बार गांधी जी के नेतृत्व में चले हमारे देश की आजादी के संघर्ष में देखा था।

इन्होंने न केवल खून खराबे वाले पारम्परिक और सदियों से स्थापित लड़ाई के तरीके के विपरीत अहिंसा और सत्याग्रह का विचार दिया बल्कि इसके प्रति अटूट विश्वास और आत्मबल से इसकी सार्थकता भी सिद्ध की, जो अद्भुत था।

दुनिया हैरान थी। एक साधारण सा दिखने वाला अर्धनग्न फकीर दुनिया को युद्ध के ख़ून ख़राबे और विध्वंसकारी तरीके की जगह न्याय , आत्मसम्मान और आजादी के लिए संघर्ष का ऐसा मार्ग दिखा रहा था जिसमें आग्रह था, सौहार्द था, अहिंसा थी, आपसी सहमति और सम्मान की महत्ता थी। यह चमत्कारिक था। संपूर्ण विश्व के लिए यह विश्वास करना मुश्किल हो रहा था कि शांति पूर्ण तरीके से भी कोई लड़ाई सफलता पूर्वक लड़ी और जीती जा सकती है।

सत्याग्रह गांधी जी के अनेकों मौलिक तथा मानवीय मूल्यों को स्थापित करने वाले विचारों में एक था। उन्होंने जो दर्शन और विचार रखे वो आज भी सामयिक हैं। यह और बात है कि गांधी के बताए मार्ग पर चलने के लिए जिस आत्मबल और नैतिक शक्ति की आवश्यकता है वह गुण दुर्लभ होते जा रहे हैं।

भारत से बाहर जिन्होंने महात्मा गांधी के मार्ग पर चल कर जनता की लड़ाई को नेतृत्व दिया उनमें सहज ही नेल्सन मंडेला और मार्टीन लूथर किंग का नाम ध्यान में आता है।

महान वैज्ञानिक आइंस्टीन ने महात्मा गांधी के 75वें जन्मदिन पर अपने संदेश में लिखा था :

"आने वाली नस्लें शायद मुश्किल से विश्वास करेंगी कि हाड़ मांस से बना हुआ गांधी नाम का कोई

ऐसा व्यक्ति भी इस धरती पर चलता फिरता था।"

--आइंस्टीन

शुरुआती दौर में आइंस्टीन ने जिन दो महान वैज्ञानिकों को अपना आदर्श मान कर अपने कमरे में उनकी पोट्रेट लगाया था, वे थे - आइज़क न्यूटन और जेम्स मैक्सवेल।

लेकिन अपने सामने दुनिया में तरह-तरह की भयानक हिंसक त्रासदी देखने के बाद आइंस्टीन ने अपने कमरे में में लगी इन दोनों पोर्ट्रेट के स्थान पर दो नई तस्वीरें टांग दीं। इनमें एक तस्वीर थी महान मानवतावादी अल्बर्ट श्वाइटज़र की और दूसरी थी महात्मा गांधी की। इसे स्पष्ट करते हुए आइंस्टीन ने उस समय कहा था-

‘ समय आ गया है कि हम सफलता की तस्वीर की जगह सेवा_की तस्वीर लगा दें।'

--आइंस्टीन

ऐसा ही अद्भुत व्यक्तित्व था सत्य, अहिंसा, सेवा और मानवतावाद के पर्याय राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का। जयंती पर विनम्र नमन !

मारे गए गुलफ़ाम

मारे गए गुलफ़ाम

फणीश्वर नाथ रेणु

फणीश्वर नाथ रेणु का जन्म 4 मार्च 1921 को बिहार के अररिया जिले के हिगंना औराही गांव में हुआ था।भारतीय गांवों की पृष्ठभूमि को अपने लेख, निबंध, कहानी संग्रह एवं उपन्यासों के माध्यम से उकेरने वाले , मुंशी प्रेमचंद के बाद ये दूसरे सफल लेखक थे ।इनके उपन्यासों में मैला आंचल, परती परिकथा, जुलूस, दीर्धकालिक, कितने चौराहे एवं पलटू बाबू रोड इत्यादि हैं, जिसमें मैला आंचल के लिए इन्हें "पद्मश्री" पुरस्कार से सम्मानित किया गया, एवं साहित्य जगत में इस उपन्यास को मील का पत्थर माना गया। इनके द्वारा रचित कथा संग्रह में मारे गए गुलफ़ाम, एक श्रावणी दोपहरी की धूप, एक आदिम रात्रि की महक, पंचलाइट, ठेस इत्यादि है।साहित्य में इनके योगदान के लिए इन्हें नागार्जुन पुरस्कार भी प्रदान किया गया।

इनकी रचना 'मारे गए ग़ुलफ़ाम' पर फिल्म तीसरी कसम बनी, जिसमें मुख्य भूमिका फिल्म जगत के सबसे बड़े शोमैन कहे जाने वाले स्वर्गीय राज कपूर एवं उस समय की बेहद खूबसूरत अदाकारा वहीदा रहमान ने निभाई थी।इस फिल्म का निर्माण गीतकार शैलेन्द्र ने किया था एवं इसे निर्देशित किया था बासु भट्टाचार्य ने।फिल्मों के इतिहास में " तीसरी कसम " को मील का पत्थर माना गया, जो अपने समय का बेमिसाल महाकाव्यात्मक अध्याय रच गई। गांव का भोला भाला युवक हीरामन एवं गांवों में घूम घूम कर नौटंकी करने वाली नौटंकी टोली की नर्तकी हीराबाई की यह प्रेम कथा, प्रेम की एक अद्भुत किंतु दुखांत आख्यान साबित हुई, जिसकी कसक वर्षों तक, दर्शकों के मन मस्तिष्क पर छाई रही।

फणीश्वर नाथ रेणु की अनुपम कृतियों ने गद्य ,उपन्यास एवं कविताओं के रूप में हिन्दी साहित्य को अत्यन्त समृद्ध किया........इनकी भाषा शैली का जादूई प्रभाव पाठकों को रचना के अंत तक बांधे रखता है.....इनकी कथाओं एवं उपन्यासों में लोकगीतों का सर्जनात्मक प्रयोग एवं आंचलिक जीवन के हर रंग देखने को मिलते हैं.......1952-53 के दौरान गंभीर रूप से बीमार पड़ना ही लेखन में इनके झुकाव का कारण बना।

'रेणु' जी जिनके लेखन में हमेशा गाँव झलका, वो खेतों की हरियाली और पगडंडी पर गाँव में चलती बैलगाड़ी को उन्होंने हमेशा अपने लेखन में जिंदा रखा।

उनकी लिखी 'मैला आँचल' स्वयं में कालजयी किताबों की श्रेणी में हैं। रेणु की लगभग हर कहानी में पात्रों की सोंच घटनाओं से प्रधान होती थी।

एक किस्सा यूँ है कि फणीश्वरनाथ रेणु जी ने गीतकार शैलेन्द्र को मुंबई के प्रसिद्द पवई झील के किनारे एक बहुत ही करूण गीत सुनाया था। गीत के बोल ग्रामीण माटी की महक समेटे हुए उस नवविवाहिता के मन का भाव प्रकट रहे थे जो अपने भाई और परिवार को याद कर रही है। दरअसल जब पहले अक्सर छोटी उम्र में ही विवाह हो जाया करता था तब, बिहार के ज्यादातर हिस्सों में नवविवाहित बिटिया को बरसात में होने वाली कीचड़ मिट्टी से लथपथ होकर ससुराल में काम करने से बचाने के लिये अक्सर बेटियों को सावन मास में मायके बुला लिया जाता था ताकि अभी सुकुमार, नाजुक बेटियां बरसात में होने वाली कीचकाच से बची रहें। इस ग्रामीण गीत ‘सावन-भादों’ को फणीश्वरनाथ रेणु ने अपनी बहन से सुना था। इस गीत के बोल थे

"कासी फूटल कसामल रे दैबा, बाबा मोरा सुधियो न लेल,

बाबा भेल निरमोहिया रे दैबा, भैया के भेजियो न देल।"

कहते है जब भाव प्रबल हों तो भाषा मायने नहीं रखती। उस दिन भी कुछ ऐसा ही हुआ था। तीसरी कसम फिल्म के दौरान शैलेन्दर जी रेणु जी से ‘महुआ घटवारिन’ की ओरिजनल गीत-कथा सुनना चाहते थे जिससे वो उसके आधार पर गीत लिख सकें। एक दिन दोनों ‘पवई-लेक’ के किनारे एक पेड़ के नीचे बैठे हुए थे। ‘महुआ घटवारिन’ का गीत रेणु जी को पूरा याद नहीं था। इसलिये उन्होंने छोटी सी भूमिका के साथ अपनी बहन से सुना हुआ ‘सावन-भादों’ गीत अपनी मोटी आवाज में गाना शुरू किया। गीत शुरू होते ही शैलेंद्र जी की बड़ी बड़ी आँखें छलछला आईं। गीत समाप्त होते होते वह फूट फूटकर रोने लगे। गीत गाते समय रेणु जी मन के बाँध में भी दरारें पड़ चुकी थीं। शैलेंन्द्र के आँसुओं ने उन्हें एकदम से तोड़ दिया। रेणु और शैलेन्द्र दोनों गले लगकर रोने लगे।

अपने स्कूल एवं काॅलेेेज के शुरुआती दिनों में मैंने रास्ते में अक्सर , रेणु जी को रिक्शे पर बैठ कर आते जाते, तो कभी घर के सामने से रिक्शे की खोज में पैदल गुजरते हुए देखा...बस दूर से ही देखती, और गर्व की अनुभूति से भर जाती। वे पटना के राजेन्द्र नगर में हमारे घर के पीछे ही कहीं रहते थे। झक्क सफेद खादी का कुर्ता पैजामा, काले घुंघराले कंधे तक लंबे बाल ,आंखों पर मोटे फ्रेम का चश्मा.....एकाध बार कभी नज़रें टकरा भी जातीं। उन दिनों तब बहुत आम बात थी, उन जैसी ख़ास शख्सियत को अक्सर देखना । वैसे तो उनकी पहचान का मुहल्ले का एक रिक्शा चालक था जो उन्हें कहीं भी ले जाता, ले आता था, लेकिन जब कभी वह नहीं होता तो उन्हें पैदल ही आते जाते देखती। या कभी घर के पास के मोड़ पर एक पान की दुकान थी जहां पर खड़े हो कर रिक्शा का इंतजार करते।

याद है मुझे एक बार कालेज के बेहद शुरूआती दिनों में कालेज जाने के लिए जिस रिक्शे वाले को मैंने रोका, उसे मेरे पीछे से आते हुए रेणु जी ने पहले ही इशारा किया था रूकने का और जब रिक्शा उनके लिए रूका तो हमारी नज़रें टकराईं और वे उस रिक्शेवाले को मेरी तरफ इशारा कर उसे मेरे लिए छोड़ कर आगे बढ़ गए।

कभी ख्याल ही नहीं आया मुझे कि एक आटोग्राफ ही लूँ कभी उन से। आता भी कैसे.....न तो आज की तरह तड़क भड़क थी, न ताम झाम....न हांथ में कैमरा फोन होता था और न ही सेल्फी लेने का ख्याल भी कहीं दूर दूर तक सपने में भी आने का सवाल था। एक मुहल्ले के लोग करीब करीब एक दूसरे को जानते ही थे । ऐसा नहीं कि लोग उन्हें पहचानते नहीं थे या उनकी अपनी पहचान फिल्म "तीसरी कसम" के कथाकार के रूप में नहीं बनी थी। फिल्म तब तक काफी धूम मचा चुकी थी।

मै जब भी उन्हें देखती, तो हमारी आपस में जरूर चर्चा होती कि ,आज मैंने रेणु जी को देखा। कई बार कोई साथ होता तो उसे दिखाती। कभी अपनी पत्नी लतिका जी के साथ दिख जाते...ऐसा सरल सहज व्यक्तित्व था उनका। तब नहीं जानती थी मैं, कि दो शब्द लिखूंगी कभी उनके लिए। फिर उनका दिखाई देना बंद हो गया। यह अचानक एक दिन मैंने महसूस किया।

यह तो हुई मेरी बात, रेणु जी का जिन घरों में भी आना जाना रहा होगा, उसमें एक घर जो बाद में मेरी ससुराल हुई, श्वसुर जी पर उनका बहुत स्नेह था। जैसा मुझे बाद में सुनने में आया था कि, पटना में 1975 की बाढ़ में वे रिक्शा पर चल कर ख़ैरियत पूछने आ गए थे, और जहां पर रिक्शा रोकना पड़ा था, वहां से उन्हें पैदल रिक्शे वाले का कंधा पकड़ कर एक फीट पानी में चल कर आना पड़ा था। ऐसे सरल,सहज, धरातल से जुड़े व्यक्ति थे रेणु जी।

गंभीर बीमारी की चपेट में पड़ कर, महज छप्पन वर्ष की उम्र में 1977 में इनका देहावसान हुआ और साहित्य के आकाश का एक चमकता सितारा देखते देखते दुनियां की नज़रों से ओझल हो गया। उनकी एक कविता के साथ,जयंती पर शत शत नमन !

'कहाँ गायब थे मंगरू?'-किसी ने चुपके से पूछा।

वे बोले- यार, गुमनामियाँ जाहिल मिनिस्टर था।

बताया काम अपने महकमे का तानकर सीना-

कि मक्खी हाँकता था सबके छोए के कनस्टर का।

सदा रखते हैं करके नोट सब प्रोग्राम मेरा भी,

कि कब सोया रहूंगा औ' कहाँ जलपान खाऊंगा।

कहाँ 'परमिट' बेचूंगा, कहाँ भाषण हमारा है,

कहाँ पर दीन-दुखियों के लिए आँसू बहाऊंगा।

'सुना है जाँच होगी मामले की?' -पूछते हैं सब

ज़रा गम्भीर होकर, मुँह बनाकर बुदबुदाता हूँ!

मुझे मालूम हैं कुछ गुर निराले दाग धोने के,

'अंहिसा लाउंड्री' में रोज़ मैं कपड़े धुलाता हूँ।

(4.3.1921- 11.4.1977)

मुकेश चंद्र माथुर

मुकेश चंद्र माथुर

ओ जाने वाले हो सके तो लौट के आना....

भारतीय फिल्म जगत के सबसे महान शोमैन राज कपूर जी की आवाज़ बन जाने वाले गायक मुकेश को कौन नहीं जानता।

हिंदी फिल्मी गीतों को अंतर्राष्ट्रीय प्रसिद्धि दिलाने वाले पहले गायक मुकेश, जिनका पूरा नाम मुकेश चंद्र माथुर को गुजरे कई दशक हो चुके हैं, लेकिन आज भी उनकी जगह भरी नहीं जा सकी हैं। भारतीय संगीत के गौरवशाली इतिहास के सर्वश्रेष्ठ गायकों में एक मुकेश नें अपने 36 साल के कॅरियर में 1500 गाने गाए, और उनका लगभग हर गाना हिट रहा। मुकेश ने दिल की गहराइयों में उतर जाने वाली अपनी सधी हुई आवाज में न केवल प्रेम के दुःख, दर्द, निराशा और विरह की गहनतम भावनाओं को अपना स्वर दिया, बल्कि हल्के- फुल्के अंदाज के हास्य, उमंग और मिलन के गीत भी गाए। जिनकी लिस्ट बहुत लंबी है।

इंजिनियर पिता की संतान मुकेश अपनी बहन को संगीत सिखाने वाले शिक्षक के रियाज़ को कमरे के बाहर से अलग से सुनते थे और इसी रूझान के कारण दसवीं तक पढ़ाई करने के बाद छोड़ दी

उनके संगीत का सफर शुरू हुआ 1940 में जब दूर के रिश्तेदार मशहूर अभिनेता मोतीलाल ने उनकी आवाज़ सुनी और प्रभावित होकर बंबई ले आए और उन्हें अपने साथ रखकर पंडित जगन्नाथ प्रसाद से संगीत सिखाने का भी प्रबंध किया। इसी दौरान खूबसूरत मुकेश को एक हिंदी फिल्म ‘निर्दोष’, 1941 में अभिनेता बनने का मौका मिल गया, जिसमें उन्होंने अभिनेता गायक के रूप में संगीतकार अशोक घोष के निर्देशन में अपना पहला गीत ‘दिल ही बुझा हुआ हो तो’ भी गाया। इस फिल्म में उनकी नायिका नलिनी जयवंत थीं, जिनके साथ उन्होंने दो युगल गीत भी गाए। इनमें एक गीत था तुम्हीं ने मुझको प्रेम सिखाया। यह फिल्म फ्लॉप हो गई और मुकेश के अभिनेता गायक बनने की उम्मीदों को तगड़ा झटका लगा। इसके बाद मुकेश ने ‘दुःख-सुख’ और ‘आदाब अर्ज’ जैसी कुछ और फिल्मों में भी काम किया।

बावज़ूद इसके उनका संघर्ष जारी रहा

मुकेश को कामयाबी मिली निर्माता मज़हर खान की फिल्म ‘ पहली नज़र’ -1945 के गीत ‘दिल जलता है तो जलने दे’ से जो संयोग से मोतीलाल पर ही फिल्माया गया था। अनिल विश्वास के संगीत निर्देशन में डॉ. सफ़दर आह सीतापुरी की इस ग़ज़ल को मुकेश ने सहगल की शैली में ऐसी पुरक़शिश आवाज में गाया कि लोगों को भ्रम हो जाता था कि इसके गायक सहगल हैं। इसी गीत को सुनने के बाद सहगल ने मुकेश को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था।

देखने में आकर्षक और सुदर्शन व्यक्तित्व के स्वामी मुकेश ने ‘आवारा’ फिल्म की जबरदस्त कामयाबी के बाद एक और फिर अभिनेता बनने की कोशिश की और 1953 में ‘माशूका’ और 1956 में अपने प्रोडक्शन के तले बनाई फिल्म ‘अनुराग’ में नायक की भूमिकाएं निभाईं, लेकिन इन फिल्मों के नाकाम होने पर उन्होंने अपना पूरा ध्यान गायकी की तरफ देना शुरू कर दिया। मुकेश को अपने तीन दशक से भी अधिक लंबे कॅरियर में चार बार सर्वश्रेष्ठ गायक का ‘फिल्म फेयर पुरस्कार’ प्रदान किया।

राजकपूर की फिल्म ‘सत्यम् शिवम् सुंदरम्’ के गाने ‘ चंचल निर्मल शीतल’ की रिकॉर्डिंग पूरी करने के बाद वह अमेरिका में एक कंसर्ट में भाग लेने के लिए चले गए। इस कंसर्ट के ठीक चार दिन बाद 27 अगस्त, 1976 को इन्हें अमेरिका में दिल का दौरा पड़ा और वह दुनिया के संगीत प्रेमियों को अपने प्यारे गीत ‘ओ जाने वाले हो सके तो लौट के आना’ की स्वर लहरियों में छोड़कर सदा के लिए अलविदा कह गए।

आज भी उनके सोज़पूर्ण ज़ुकामिया आवाज़ की दिलक़शी सुनने वालों के दिल की गहराइयों तक सीधे पहुंचती है। उनका गाया हुआ कम से कम एक गाना भी सुन कर उनको याद करने का दिन है आज।

जयंती पर विनम्र नमन।

मेहदी हसन

मेहदी हसन_

ये धुआं सा कहां से उठता है.....

एक ऐसी शख्सियत, जिनकी आवाज़ और गाई हुई ग़ज़लों का जादू उनके चाहने वालों की, रगों में लहु के साथ घुल कर बहता हो, का नाम...उस्ताद मेहदी हसन साहब।

1927 में भारत के राजस्थान में पैदा हुए गज़ल सम्राट मेहदी हसन अपने खानदान की सोलहवीं पीढ़ी थे, जिनके खून में संगीत की विरासत और रियाज़त रची बसी थी। पिछले आधे दशकों से इनकी आवाज़ की विरासत को इनके चाहने वालों ने संभाल कर रखा है

। जिस युग में मेहदी हसन साहब रहे,उसमें उन्होंने ही गज़ल गायिकी को ऊँचाई की बुलंदियों की तक पहुंचाया।

सुरों पर इनका कैसा अद्भुत नियंत्रण था यह इनकी गायिकी को सुनकर अंदाज़ लगाया जा सकता है।बहुत सरल, सहज, परिष्कृत और दिल को छूने वाली कर्णप्रिय गायिकी के पूरोधा थे हसन साहब।इनके छः दशकों के सक्रिय गायन में सूरों पर इनकी जो पकड़ देखने को मिली, वह हर किसी के बस की बात नहीं... तभी तो जहां नुसरत फ़तेह अली खान ने इनके लिए कहा था 'सुर लगाने में कोई भी मेहदी हसन साहब की बराबरी नहीं कर सकता' वहीं आबीदा परवीन उन्हें गज़ल गायिकी का शीर्ष कहती हैं। सुर साम्राज्ञी लता जी ने तो यह तक कह डाला कि 'मेहदी हसन साहब के गले में भगवान बसते हैं।'

इन महान कथनों के आगे अब और कुछ भी लिखा जाए तो शब्द कम पड़ जाएगें......सिवाए इसके;

अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख्वाबों में मिले....

पाकिस्तान में 2013 में 13 को जून लंबी बीमारी एवं गले में ख़राबी,उनके इंतकाल का कारण बना...इनके जाने से गज़ल की दुनिया में जो ख़ालीपन आया वह कमी शायद ही कभी पूरी हो पाए....अपने चाहने वालों के ख़्वाबों में शायद वो कभी आएं....इस ख्वाहिश के साथ यौम-ए-वफ़ात पर ख़िराज़ ए अक़ीदत,

मेहदी हसन साहब की मुहब्बत और तारीफ़ में गुलज़ार साब ने जो अल्फ़ाज़ गढ़े, वह आप भी पढ़ें।

'आँखों को वीज़ा नहीं लगता,

सपनों की सरहद नहीं होती

बंद आँखों से रोज़ मैं

सरहद पार चला जाता हूँ

मिलने "मेहदी हसन से"

सुनता हूँ उनकी आवाज़ को चोट लगी है

और ग़ज़ल खामोश है

सामने बैठी हुई

काँप रहे हैं होंठ ग़ज़ल के

फिर भी उन आँखों का लहज़ा बदला नहीं

जब कहते हैं...

सूख गए हैं फूल किताबों में

यार "फ़राज़" भी बिछड़ गए हैं,

शायद मिलने वो ख्वाबों में

बंद आँखों से अक्सर सरहद पार

चला जाता हूँ मैं

आँखों को वीज़ा नहीं लगता

सपनों की सरहद नही होती'

–गुलज़ार

v

मौसम गुलज़ार साहब

मौसम

गुलज़ार साहब की फिल्मों की बात हो या गीत और नज़्मों की, बेहद शिद्द्त से देखने- सुनने वाले प्रशंसकों का अपना एक खास तबका है। उस दौर की देखी गयी फिल्में कोशिश, खुशबू, परिचय , मौसम, इज़ाजत, मासूम, "लेकिन" या आंधी हो,या और दूसरी फिल्में ,, उनकी की बात ही कुछ अलग है। जिसकी कहानी आज भी भुलाई नहीं जा सकी है।

आजकल खाली वक्त में यू-ट्यूब पर चुनींदा पुरानी देखी गयी कुछ ऐसी फिल्में ढूंढ-ढूंढ कर देखती हूँ जिनकी छाप आज भी मन पर असर करती है। अभी हाल- फिलहाल यू-ट्यूब पर गुलज़ार साहब की कोई मूवी तलाश कर ही रही थी कि मौसम मूवी से नज़रें मिलीं और सालों पुरानी, गाली देती शर्मिला टैगोर की इमेज दिमाग में घूम गई…... कुछ दृश्य आज भी मन में इस कदर छपे हैं, मानों अभी अभी फिल्म देख कर सिनेमा हाल से बाहर निकले हों। फिल्म कितनी सशक्त है उसका पता ऐसे पलों में ही चलता है।

इसी क्रम में कल गुलज़ार साहब की "मौसम" पर नज़र पड़ते ही दुबारा उस फिल्म को देखने से अपने आप को रोक नहीं सकी। फिल्म नें सोंचने पर मजबूर किया और आपके साथ अपनें विचारों को साझा करने के लिए भी। तो आज बात करते हैं मौसम की ।

वादा, छोटा सा शब्द, पलक झपकाते ज़ुबां से फिसल जाता है, पर न निभाने का ख़ामियाज़ा कितना संगीन हो सकता है, शायद ही कभी किसी ने सोचा हो.. शायद इसलिए, क्योंकि वादा खिलाफी का असर अक्सर सालों बाद जो दिखता है, वो भी परोक्ष रूप से…

कुछ ऐसे ही भूले बिसरे वादों के तार जोड़ती है “मौसम”, एक फिल्म जो 1975 में रुपहले परदे पर अाई, और आज चार दशक बाद भी उतना ही प्रभाव रखती है।गुलज़ार साहब द्वारा निर्देशित इस फिल्म में संजीव कुमार और शर्मिला टैगोर ने अभिनय किया है ।

शर्मिला टैगोर को उनके अभिनय के लिए 23वें राष्ट्रीय फिल्म समारोह में सिल्वर लोटस पुरस्कार मिला और फिल्म को दूसरी सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का पुरस्कार देकर सम्मानित किया गया। फिल्मफेयर अवार्ड से सर्वश्रेष्ठ फिल्म के लिए और गुलज़ार साहब को सर्वश्रेष्ठ निर्देशक के सम्मान से नवाजा गया ।

फिल्म, एजे क्रोनिन के 1961 के उपन्यास द जूडस ट्री पर आधारित है। गुलज़ार साहब की सबसे मशहूर और सशक्त मूवी में से एक है मौसम… हालांकि कहानी उनकी अपनी नहीं। इस फिल्म की पटकथा कमलेश्वर द्वारा भूषण बनमाली और गुलज़ार साहब के साथ मिल कर लिखी गई थी। उसी समय में एक साथ आंधी (1975) की पटकथा भी लिखी गई थी , और यहां तक ​​​​कि शूट भी एक साथ ही किया गया था, जिसमें संजीव कुमार नें दोनों फिल्मों में बुज़ुर्गियत की दहलीज पर खड़े एक किरदार की भूमिका निभाई थी।

हालाँकि, आंधी को पहले रिलीज़ किया गया था, लेकिन यह फिल्म राजनीतिक विवादों में घिर गई और इसके कुछ हिस्सों को फिर से शूट करना पड़ा, इस बीच मौसम पूरी हो कर रिलीज़ हो गयी । जब शर्मिला टैगोर के साथ "मेरी इश्क के लाखो झटके" गीत की शूटिंग की जा रही थी, कोरियोग्राफर सरोज खान भी एक और फिल्म के लिए स्टूडियो में थीं , तभी गुलज़ार साहब ने उनसे शर्मिला टैगोर को कुछ स्टेप्स सिखाने का अनुरोध किया।

शर्मिला टैगोर का डबल रोल, संजीव कुमार का परिपक्व अभिनय, सुघड़ कहानी, लुभाते डायलॉग्स और मनभावन संगीत… इस बात से कैसे इंकार किया जा सकता है कि क्लासिक हो तो ऐसी।

आप सबने शायद मौसम देखी होगी, पर मेरे बचपन की ये बस हल्की सी याद है ये इकलौता सीन कभी दूरदर्शन के ज़माने से ज़हन में बसा हुआ… फिल्म के बारे में इस से ज़्यादा कुछ याद नहीं था शायद शर्मिला की वो इमेज ही थी जिसने आज भी बरबस, मुझसे मौसम को देखने को विवश किया।

फिल्म में “दिल ढूंढ़ता है फिर वही फुर्सत के रात दिन” भूपेन्द्र सिंह की आवाज में और बाद में फ्लैशबैक में संजीव कुमार और शर्मिला टैगोर पर फिल्माया गया गीत लता जी और भूपेन्द्र सिंह के द्वारा गाया गया डूएट।

एक ओर जहाँ शोखी और चुलबुलापन से भरा गाना "मेरे इश्क में लाखों झटके" और " छड़ी रे छड़ी कैसी गले में पड़ी" दर्शकों को गुदगुदाता है वहीं जीवन के उस मोड़ पर अपनी असलियत जानने के बाद शर्मिला टैगोर का अपनें वर्तमान हालात से समझौता न कर सक पाने की स्थिति में पिता का घर छोड़ कर जाने की उलझन और कश्मकश के साथ "रूके रूके से कदम रूक के बार बार चले" भावुक कर जाता है।

फिल्म शुरू हुई… अमरनाथ गिल, नामी गिरामी डॉक्टर और ड्रग मैन्युफैक्चरर, दार्जिलिंग आए हैं, एक लंबी छुट्टी बिताने.. पर उनकी पहली ही सुबह, जब वे चहलकदमी करते, चाय की चुस्कियों संग, आसपास के इलाके में एक लड़की की मालूमात करते दिखे तो समझ में आया कि वे यहां 25 बरस बाद, किसी की तलाश में आए हैं, कोई अधूरा वादा निभाने, किसी कहानी के सिरे जोड़ने…

गज़ब लगी ये बात.. धीमे धीमे फ्लैशबैक में शर्मिला और संजीव की ईज़ी केमिस्ट्री, थापा वैद्य की दोहे मिश्रित सहजता, मज़ेदार डायलॉग्स और मधुर गीतों के बीच मैं खो सी गई… डॉ अमरनाथ के साथ चंदा और कजरी को खोजती मेरी निगाहें और धक धक करता दिल, उनकी तलाश जल्द पूरी होने की दुआएं मांगता… जीती रही मैं हर दृश्य, और फिर आया वही सीन, जो कब से मेरे दिल को कुरेद रहा था… कजरी का वो रूप देखकर, अमरनाथ के साथ मेरा भी मन भारी हो गया …

और इस मोड़ पर अंदाज़ा लगा कि ये कहानी, अब एक साथ कई दिशाओं में भागेगी… वैश्या बनी कजरी के लिए आदमी का एक ही रूप साकार हो सकता है और अमरनाथ के लिए पिता के अतिरिक्त कुछ भी होना, असंभव… कथानक समझ चुकी थी और अब मेरी दिलचस्पी इसके फिल्मांकन पर थी..

यकायक दिल कहीं पीछे छूट गया और दिमाग हावी हो चला.. सामाजिक सरोकार, रिश्तों की नाज़ुक धार और मानव मन की बेवकूफियां, सब नज़र आने लगीं , अमरनाथ के किरदार में…। शुरुआत में बेपरवाह संजीव के जिस किरदार ने मन लुभाया था, वही इंसान अब मुझे गलतियों का पिटारा नज़र आने लगा।

चंदा को दिया वादा न निभाने की वजह बड़ी उलजुलूल सी लगी.. डॉक्टरी का इम्तेहान देते ही लौट आने वाला इंसान, कब और कैसे, सर्जरी करके किसी की मौत का कारण हो, जेल चला गया और क्योंकर कभी इस बात को अपनी प्रेयसी से कह भी, न पाया.. और अब उसी प्रेमिका की बेटी के अपने प्रति बढ़ते आकर्षण को समझ भी नहीं पा रहा।

मैं सवालोंं के इन चक्रवातों में उलझी हुई थी कि दिल ने समझाया , दिमाग को चुप करवा ले, इमोशनल मूवी है, लॉजिक मत ढूंढ...

बस दिल का वापिस कब्ज़ा हुआ और इस मोड़ पर अंदाज़ा लगा कि ये कहानी, अब एक साथ कई दिशाओं में भागेगी… वैश्या बनी कजरी के लिए आदमी का एक ही रूप साकार हो सकता है और अमरनाथ के लिए पिता के अतिरिक्त कुछ भी होना, असंभव… कथानक समझ चुकी थी और अब मेरी दिलचस्पी इसके फिल्मांकन पर थी..

चंदा को दिया वादा न निभाने की वजह बड़ी उलजुलूल सी लगी.. डॉक्टरी का इम्तेहान देते ही लौट आने वाला इंसान, कब और कैसे, सर्जरी करके किसी की मौत का कारण हो कर जेल चला गया और क्योंकर कभी इस बात को अपनी प्रेयसी से कह भी न पाया.. और अब उसी प्रेमिका की बेटी के अपने प्रति बढ़ते आकर्षण को समझ भी नहीं पा रहा.. सोंचने लगी क्या पुरुष इतने ही संवेदनहीन होते हैं.. न कह पाते हैं न समझ पाते हैं..

चंदा, अमरनाथ, कजरी के दुख को जीते हुए फिर दिल से इस पछतावे को किसी अच्छे मोड़ पर ले जाने की दुआ निकली.. और हुआ भी कुछ ऐसा ही ।

बहरहाल, मूवी बहुत ही अच्छी है, दिल ओ दिमाग पर असर डालती हुई और मुझ जैसे इंसान को कभी जजमेंटल तो कभी सेंटीमेंटल करती हुई.. सोचने और महसूसने को हर रंग भरपूर मिलेगा मौसम में…। नहीं देखा हो तो अब भी जरूर देखिएगा…!!

युगपुरूष जे आर डी टाटा

युगपुरूष जे आर डी टाटा

युगपुरूष जे आर डी टाटा

जहांगीर रतनजी दादाभाई टाटा यानी जेआरडी या ‘जेह’, का नाम सुनते ही ज़ेहन में ऐसे शख़्स की तस्वीर उभरती है जो देश का पहला कमर्शियल पायलट रहा, अपनी दूरदर्शिता से टाटा संस कंम्पनी को बुलन्दियों पर ले जाने वाले जे आर डी टाटा के साथ एयर इंडिया के बनने की दास्तां जुड़ी है, जिन्होंने टाटा स्टील, टाटा इंजीनियरिंग एंड लोकोमोटिव कंपनी (टेल्को) तथा टाटा के अन्य कंपनियो आगे बढ़ाने में अपनी पूरी जिन्दगी लगा दी। टाटा संस के इस चेयरमैन को अपने उसूलों के चलते कई बार नुकसान भी उठाना भी पड़ा मगर उसूलों से उन्होंन कभी समझौता नहीं किया।

जहांगीर रतनजी दादाभाई टाटा भारत में वो नाम है जो आज भी बेहद सम्‍मान के साथ लिया जाता है। बेहद अमीर परिवार में जन्‍म लेने के बाद भी जमीन से जुड़े हुए इंसान थे वे। हालांकि उनका जीवन भी चुनौतियों से घिरा हुआ था, लेकिन वो हर चुनौती का सामना करते हुए आगे बढ़ते चले गए। टाटा स्‍टील के अलावा एयर इंडिया की कमान संभालने वाले जे आर डी टाटा खुद एक बेहतरीन कमर्शियल पायलट थे। अपने व्‍यस्‍त जीवन में से वो इसके लिए भी समय निकाल ही लिया करते थे।

29 जुलाई 1904 को फ्रांस की राजधानी पेरिस में पैदा हुए जेआरडी की शुरुआती शिक्षा भी वहीं हुई थी। उन्‍होंने बाद में वहां की सेना में भी अपनी सेवाएं दी। इसकी वजह थी कि वे हर वक्‍त कुछ नया करने और सीखने के जुनूनी व्‍यक्ति थे। जब उनके पिता को इसका पता चला तो उन्‍होंने जेआरडी को भारत वापस बुला लिया। 1930 में जेआरडी का विवाह थेलमा विका जी से हुआ था। भारत सरकार ने 26 जनवरी 1955 को जेआरडी को पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। 26 जनवरी 1992 को उन्‍हें भारत के सर्वोच्च सम्मान 'भारत रत्‍‌न' की उपाधि से अलंकृत किया गया था। इसके अलावा परिवार नियोजन एवं जनसंख्या नियंत्रण के क्षेत्र में अमूल्य योगदान के लिए 'संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या पुरस्कार' प्रदान किया गया।

जन कल्याण के क्षेत्र में भी जेआरडी ने अद्वितीय योगदान किया। उनका मानना था कि मनुष्य का महत्व मशीन से कम नहीं है। उनकी देखभाल करना एक अच्छे प्रबंधन से अपेक्षित है। उनके मार्गदर्शन में ही टाटा स्टील में पर्सनल विभाग की स्थापना हुई। समाज कल्याण की योजनाएं भी विकसित होती गई। ग्रामीण विकास, सामुदायिक विकास समेत विभिन्न ट्रस्टों सहित कई महत्वपूर्ण संस्थाएं जेआरडी की दूरदृष्टि का ही परिणाम है।

जेआरडी ‘क्रोनी कैपिटलिस्ट’ यानी सत्ता की जी-हुजूरी करके अपना काम निकालने वाले कारोबारी नहीं थे। यह बात आज भी टाटा समूह को देखकर समझी जा सकती है। उनका मानना था कि समाजवाद से सिर्फ़ अर्थव्यवस्था का ही नुकसान नहीं हुआ, कभी-कभी कुछ दूसरे उद्देश्य भी शहीद हो गए। यह भी कि भारत की मुश्किलों को हल करने के लिए विशेषज्ञों की ज़रूरत है न कि राजनेताओं और नौकरशाही की।

युगपुरूष जे आर डी टाटा

इनसे जुड़ी हुई उपलब्धियों और घटनाओं का ब्यौरा तो बहुत लंबा है जिसे कुछ पंक्तियों में नहीं समेटा जा सकता फिर भी एक रोचक वाक्या का ज़िक्र यहां ज़रूरी है।

ये साठ के दशक की बात है। मशहूर फिल्म अभिनेता दिलीप कुमार और जेआरडी टाटा एक ही प्लेन में सफ़र कर रहे थे। उस वक्त दिलीप कुमार कामयाबी की बुलंदियों पर थे। दिलीप कुमार ने जेआरडी टाटा को पहचान लिया, लेकिन टाटा अपने ही काम में मगन थे। वो सफ़र के दौरान भी कुछ फाइलों में उलझे हुए थे। दिलीप कुमार ने किसी भी तरह से उनसे बातचीत की शुरुआत करनी चाही। आखिरकार वो एक स्टार थे। लेकिन टाटा ने उनकी तरफ आंख उठाकर देखा भी नहीं। आख़िर दिलीप कुमार से जब नहीं रहा गया तो वो बोल पड़े- हेलो, मैं दिलीप कुमार। टाटा ने उनकी तरफ देखा। अंचभित होकर उनका अभिवादन स्वीकार किया और मुस्कुराते हुए फिर अपने काम में मगन हो गए। दिलीप कुमार से जब नहीं रहा गया तो उन्होंने दोबारा कहा - मैं दिलीप कुमार हूं। मशहूर फिल्म स्टार, जेआरडी टाटा बोले- सॉरी, मैं आपको पहचान नहीं पाया जनाब। वैसे भी मैं फिल्में नहीं देखता। दिलीप कुमार रुपहले पर्दे के हीरो थे और टाटा रियल लाइफ के हीरो। तो ऐसा था युगपुरूष जेआरडी टाटा का व्यक्तित्व, जिन्होंने अपने दम पर जिस औद्योगिक रियासत टाटा संस को खड़ा किया वह उस सदी में कल्पना से बाहर की बात थी।

उन्होंने देश की जरूरत को ध्यान में रखते हुए कई क्षेत्रों में कम्पनी की स्थापना की और देश के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उसी दौर में टी सी एस जैसी कम्पनी अस्तित्व में आई, जो आज देश की सबसे बड़ी आई टी कम्पनी है। यह मेरा सौभाग्य रहा कि मुझे उन्हें उनके जामाडोबा (धनबाद) दौरे के दौरान 1987 में प्रत्यक्ष देखने का मौका मिला। जो मुझे याद है - सरल व्यक्तित्व के धनी, गोरा चिट्ठा रंग, सामान्य सी काया, लम्बी नाक, चमकती आंखें और मोहक हल्की मुस्कान - जैसे सबको आश्वस्त कर रही हो, वो हैं तो किसी को चिंता करने की जरूरत नहीं। ऐसा वात्सल्य भाव झलकता था उनके चेहरे पर। खुशहाल टाटा परिवार और खुशहाल देश उनका सपना था और वे अंतिम सांस लेने तक इसके लिए काम करते रहे। 29 नवंबर 1993 को स्विट्जरलैंड के जेनेवा शहर में 89 वर्ष की उम्र में भारत रत्‍‌न जेआरडी टाटा ने अंतिम सांस ली थी। उनकी मृत्यु के कुछ ही दिनों बाद उनकी धर्मपत्‍‌नी थेलमा का भी निधन हो गया।

गर्व है मुझे कि मैं इसी टाटा परिवार का हिस्सा 35 वर्षों तक रही। जयंति पर कोटि कोटि नमन।

लाल बहादुर शास्त्री

लाल बहादुर शास्त्री

पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के जीवन से जुड़ी एक घटना

उन्होंने अपनी माँ को नहीं बताया था कि वो रेल मंत्री हैं। कहा था" मैं रेलवे में नौकरी करता हूँ "। एक बार वे किसी कार्यक्रम में आए थे तब उनकी माँ भी वहाँ पूछते पूछते वहाँ आईं कि मेरा बेटा भी यहाँ आया है।वो भी रेलवे में है।

लोगों ने पूछा कि क्या नाम है आपके बेटे का तो जब उन्होंने नाम बताया तो सब चौंक गए। किसी ने विश्वास नहीं किया।किंतु जब उन्होंने दृढ़ता पूर्वक कहा कि " नहीं वो आए हैं" तो लोगों ने उन्हें लाल बहादुर शास्त्री के सामने जा कर पूछा कि " क्या ये वही हैं "?

उन्हों ने कहा "हाँ वो मेरा बेटा है"

लाल बहादुर शास्त्री

लोगों ने मंत्री जी से दिखा कर कहा "क्या वो आपकी माँ हैं"? तो उन्होंने अपनी माँ को बुला कर थोड़ी देर पास बैठाया और कुछ देर बाद घर भेज दिया।

पत्रकारों ने शास्त्री जी से फिर पूछा "आपने उनके सामने भाषण क्यों नहीं दिया"?

उनका जवाब था "मेरी माँ को नहीं पता कि मैं मंत्री हूँ।अगर उन्हें पता चल जाए तो लोगों की सिफ़ारिश करेंगी और मैं मना नहीं कर पाऊंगा " और उन्हें अहंकार भी हो जाएगा" ।उनका जवाब सुन कर सभी सन्न रह गए।

लाल बहादुर शास्त्री

कहाँ गए वो निस्वार्थ ईमानदार लोग!

शत शत नमन उन्हें

विन्ध्यवासिनी देवी

विन्ध्यवासिनी देवी_

बिहार प्रांत का गौरव

बिहार-कोकिला पद्मश्री विन्ध्यवासिनी देवी

अगर बिहार प्रांत की पृष्ठभूमि में लोक गीतों या लोक संस्कृति की बात हो तो एक नाम सहज ही उभर कर आता है, पद्मश्री विन्ध्यवासिनी देवी का, जो देश की संस्कृति में किसी परिचय का मोहताज़ नहीं है। बिहार की स्वर-कोकिला विंध्यवासिनी देवी एक ऐसी शख़्शियत जिन्होंने रूढ़ियों की बेड़ियां काट कर लोकगीतों से अपनी एक अलग पहचान बनाई! वह भी तब, जब हमारे समाज में पर्दा प्रथा अपनी चरम पर थी।

विंध्यवासिनी देवी का जन्म बिहार के मुजफ्फरपुर में 05 जनवरी 1920 में इनकी नानी के घर में हुआ था। एक साधारण मध्यम वर्गीय परिवार में जन्म लेकर बचपन से इन्होंनें संगीत का जो सपना संजोया था उसी सपने को लेकर इन्होंने लोकगीतों के क्षेत्र में जिन ऊंचाइयों को छुआ है, वह उस समय के रूढ़िवादी समाज में उनकी बहुत बड़ी उपलब्धि रही है।

इनकी शादी महज 14 वर्ष की उम्र में हो गई थी। सन 1945 में ये सपरिवार पटना चली आयीं ।संगीत के लिए इनका लगाव शुरू से रहा किंतु उस समय के बिहार में लड़कियों को संगीत की शिक्षा देने के प्रति कोई उदार सोंच नहीं थी वह भी एक संयुक्त परिवार में। उनके पति ने इनकी प्रतिभा को परखा, इनका हुनर पहचान कर पारिवारिक बंदिशों के बावज़ूद इन्हें संगीत सीखने में हर संभव सहयोग किया। संगीत गुरू इनके अपने पति श्री सहादेश्वर वर्मा और दूसरे गुरू श्री क्षितेश चंद्र वर्मा से इनकी संगीत की शिक्षा हुई। मिथिलांचल से सम्बंध होने एवं पटना से जुड़ाव होने के कारण मैथिली, भोजपुरी और मगही भाषा पर इनकी अच्छी पकड़ थी। इन भाषाओं में पारंपरिक गीतों के लिए वे काफी चर्चित रहीं।

उनके साथ घटी एक घटना ने उनके जीवन को पूरी तरह बदल दिया। हुआ यूं कि किसी छोटे मोटे सांस्कृतिक समारोह के अवसर पर दूसरे किसी प्रांत के एक व्यक्ति ने इनसे ये कह दिया कि बिहार के लोगों को गीत-संगीत से कोई मतलब नहीं होता। यह घटना इनके जीवन का अहम मोड़ साबित हुई जिसने इन्हें अंदर तक झकझोर दिया। इसके बाद इन्होंने संगीत के क्षेत्र में अपना आकाश तलाशने का लक्ष्य बना लिया।

बिहार कोकिला के नाम से चर्चित रही लोक गायिका विन्ध्यवासिनी देवी ने न केवल बिहार का मान बढ़ाया, बल्कि उनके गाए भोजपुरी लोकगीत अपने देश से बाहर 'मॉरीशस', 'फ़ीज़ी' जैसे देशों में गूंजते रहे। जिस दौर में हमारे समाज में स्त्रियों के लिए तमाम बंदिशें और कड़ी वर्जनाएं थीं, संगीत की तो बात ही क्या एक मध्यमवर्गीय परिवार की लड़कियों की शिक्षा प्राप्त करने की राह में भी तमाम अड़चनें थी। उस दौर में विन्ध्यवासिनी देवी के गीत आकाशवाणी के जरिए सुनने के लिए लोग बेसब्री से इंतज़ार करते थे। उन्होंने भोजपुरी लोकगीतों को लिखने और गा कर आगे बढ़ाने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

गीतों को अपनी आत्मा में रचाने-बसाने वाली विन्ध्यवासिनी देवी नें 1948 में जब पटना आकाशवाणी की शुरूआत हुई, तब उसके उद्घाटन के अवसर पर 'भइले पटना में रेडियो के शोर तनी सुनअ सखिया..'

गीत को पेश कर सुर्खियों बटोरीं।

इन्होंने न केवल लोक गीत-संगीत अपितु नाटक के क्षेत्र में भी उस समय अपनी क़ाबिलीयत के झंडे गाड़े।

सन 1948 में जब आकाशवाणी के पटना केंद्र की शुरुआत जब हुई तब रामेश्वर सिंह 'कश्यप'' लिखित भोजपुरी नाटक 'लोहा सिंह' का प्रसारण हुआ करता था। जिसमें एक बहुत लोकप्रिय पात्र, खदेरन की माँ 'खदेरन को मदर' की भूमिका प्रसिद्ध लोक गायिका प्रो. विन्ध्वासिनी देवी ने निभाई थी। यह जनता के बीच बेहद लोकप्रिय हास्य नाटक था। इस नाटक को इतने ज्यादा श्रोता मिले कि घर घर में इसके पात्रों के नाम की गूँज सुनाई देती। ख़ास कर यह 'खदेरन को मदर' संबोधन बहुत पसंद आया था लोगों को तब। लेकिन इस नाटक की ख़ासियत यह थी कि तमाम पात्रों के हास-परिहास और ठहाकों के बावज़ूद यह नाटक 'लोहा सिहं' उस समय की सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनैतिक व्यवस्था पर बेहद सशक्त और कठोर कटाक्ष था।

विन्ध्यवासिनी देवी ने कई क्षेत्रिय भाषाओं में अपनी गायन कला का प्रदर्शन किया। उन्होंने मैथिली, भोजपुरी ,मगही समेत कई भाषाओं में लोकगीतों को गाया और उस जमाने में बिहार को एक नई पहचान दिलाई। उन्होंनें शादी, विवाह, छठ पूजा के गीतों के अलावा बच्चों के जन्म पर गाए जाने वाले सोहर और अन्य कई तरह के लोकगीत गाए जो काफी प्रसिद्ध हुए। इन्होंने एक तरह से ऑल इंडिया रेडियो के निर्माता के रूप में कार्य किया है। इस क्षेत्र के उत्थान के लिए उन्होंने 'विन्ध्यकला मंदिर' नामक संगीत संस्था की स्थापना की। अबतक इस संस्था ने पचपन वर्ष पूरे कर लिए हैं जो आज भातखंडे यूनिवर्सिटी लखनऊ से अंगीकृत है। इस संस्था का संचालन उनकी पुत्री पुष्पारानी मधु और पुत्र सुधीर कुमार सिन्हा कर रहे हैं। लोकगीत एवं लोक- संस्कृति के इतिहास में पद्मश्री विन्ध्यवासिनी देवी का नाम एक सिर्फ़ एक शख्शियत ही नहीं मील का पत्थर भी माना जाएगा।

जहां तक मुझे याद है कि आकाशवाणी पटना से सत्तर के शुरूआती दशक में शाम सात बजे आधे घंटे का रेडियो पर लोक संगीत नाम से एक कार्यक्रम आता था। जिसमें ज्यादातर विन्ध्यवासिनी देवी के ही गाए हुए गीत आते। मेरी मां बहुत प्रशंसिका थीं लोक गीतों की तो शाम को रेडियो को चालू किया ही जाता था। मुझे लोक गीतों की कोई ख़ास समझ तो नहीं थी बावज़ूद इसके बचपन से ही इनकी ठोस और मधुर आवाज़ में गाए गीतों से परिचय रहा। वह दशक बिन्ध्य कला मंदिर संस्था का शायद शुरूआती दौर रहा होगा। राजेन्द्र नगर बारह न. रोड में जो मेरे घर के बिल्कुल ही पीछे था और मेरे घर से साफ साफ़ दिखता था, इतना कि वहां आने जाने वालों को पहचाना जा सके, एक किराए के नए मकान से इस संस्था की संपूर्ण रूप में शुरूआत हुई थी। उससे पहले यह इनके निवास से संचालित होती रही थी। ऐसा इसलिए लिख रही हूं कि कुछ दिनों के बाद यह 'विन्ध्यकला मंदिर' वहीं पर के एक दूसरे मकान में स्थानांतरित हो गया था। कुछ सालों के बाद सुनने में आया कि वहां से कहीं और ले जाया गया है उसे। जब मेरी शादी हुई तो ससुराल में पता चला कि मेरी अपनी मौसी सास की अपनी छोटी देवरानी हैं विन्ध्यवासिनी देवी। इनकी ससुराल, छपरा और सोनपुर के बीच दिघवारा नामकी जगह में थी। मौसा जी चार भाई थे। इनके पति नें संगीत में इनकी रूचि देखते हुए इन्हें काफी प्रोत्साहित किया एवं संगीत के उनके पहले गुरु भी बने। जब सीडी और कैसेट का प्रचलन नहीं था, तब विंध्यवासिनी देवी आकाशवाणी द्वारा अपने गीतों की मिठास घोल लोगों के दिलों पर राज करती थीं। वह कभी भी किसी एक भाषा और बोली को पकड़कर नहीं बल्कि जितने अधिकार से वे मैथिली गीतों को गाती थीं, उतने हीं अधिकार से भोजपुरी में भी गीतों की प्रस्तुति करती थीं।

मिलनें पर मौसी जी से बहुत बातें होतीं उनके कार्यक्रमों के बारे में। संगीत की दुनिया से जुड़े विन्ध्यवासिनी देवी के किस्से सुनना अच्छा लगता मुझे। मौसी जी के साथ उनका कभी- कभार आना जाना भी होता लेकिन मुझे कभी उनसे मिलने का कभी मौका नहीं मिला। इसका अफ़सोस भी रहा।

इन्होंनें लोकगायिकी के क्षेत्र में देश विदेशों में काफी नाम कमाया। भारत सरकार ने इनकी इन उपलब्धियों को देखते हुए इन्हें पद्मश्री की उपाधि से सम्मानित किया। इसके अतिरिक्त 1991में संगीत नाट्य अकादमी से सम्मानित किया गया। वर्ष 1989 में मध्य प्रदेश सरकार नें इन्हें अहल्या बाई सम्मान से सम्मानित किया। इन सबके अतिरिक्त और कई सम्मानों से इन्हें नवाज़ा जा चुका है। बिहार रत्‍‌न सम्मान, देवी अहिल्या बाई सम्मान, भिखारी ठाकुर सम्मान आदि सम्मान पा चुकी विन्ध्यवासिनी देवी का कद समाज में काफी ऊंचा रहा।

विंध्यवासिनी देवी ने लोक रामायण, बिहार के संस्कार गीत, ऋतुरंग आदि गीतों की रचना की थीं। लोक गीतों का साम्राज्य स्थापित करने के बाद देश के सांस्कृतिक आकाश में इनका नाम एक नक्षत्र की तरह दैदिप्यमान लेकिन कभी भी उनके मन में अहम भाव नहीं आया। विंध्यवासिनी देवी का संबंध रंगकर्मियों के अतिरिक्त साहित्यकारों से भी रहा। साहित्यकारों में फणीश्वर नाथ रेणु, रामधारी सिंह दिनकर, हिंदी की प्रसिद्ध उपन्यासकार गौरा पंत 'शिवानी' के साथ-साथ वरिष्ठ रंगकर्मी व नाटककार अनिल कुमार मुखर्जी के अलावा गीतकार भूपेन हजारिका आदि लोगों से मधुर संबंध रहे इनके। इन्होंने भोजपुरी फिल्म 'छठी मइया की महिमा' में अजीत अकेला के साथ एवं 'कन्यादान ' आदि फिल्मों के गीत भूपेन हजारिका के संगीत के साथ गाए। इसके अलावा 1962 में भारत-चीन युद्ध के दौरान सैनिकों का हौसला बढ़ाने के लिए कई गीत भी लिखे और गाए भी थे ।

इनके गाए हुए भोजपुरी गीतों की जो धूम थी वह छठ जैसे महापर्व के दौरान वातावरण में चहुंओर गूंजती। इनके गीतों के साथ व्रत की शोभा में चार चाँद लग जाते।

छठ गीतों का उनका पहला एलबम 1960 के आसपास निकला था, उनके गाये गीतों में छठ के कुछ चुनिंदा गीत जो आज भी छठ के मौके पर बजाए जाते हैं।

'हे चननही काठकेर नईया'

'काहे के मईया के बस्ती'

'सोने के खरौआ हो दीनानाथ'

कार्तिक मास इहो पुनीत महीनवां'

'केलवा जे फरले घवद से'

'हाजीपुर नरियर'

'रिमझिमी बूंदवा बरसी'

'हे गंगा मईया'

'सात ही घोड़वा सुरूज देव देव रथे अ सवार..',

'हमसे राजा बिदेसी जन बोल, हम साड़ी न पहिनब बिदेसी हो पिया देसी मंगा द..'

आदि कई लोक गीतों की रचियता एवं बिहार की स्वर कोकिला एवं पद्मश्री का सम्मान पाने वाली वरिष्ठ लोक गायिका विंध्यवासिनी देवी भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके रचित गीत आज भी उनके होने का एहसास दिलाते हैं।

18 अप्रैल 2006 को पटना में कंकड़बाग स्थित उनके आवास पर 86 वर्ष की उम्र में इनका देहावसान हो गया। पद्मश्री विन्ध्यवासिनी देवी नें बिहार के लोकगीतों को विश्वस्तर पर एक नई पहचान दी है एवं संगीत के क्षेत्र में जो असाधारण मुकाम हासिल किया वह अविस्मरणीय एवं अपने आप में एक विरासत है। इनकी स्मृति को नमन।

*** बिन्ध्यवासिनी देवी के गाये हुए छठपूजा के ये अद्भुत गीत कभी एकांत में सुनिए। आत्मविभोर कर देगें