​यह खंड माला सिन्हा के उन संस्मरणों, विचारों और लेखों का संकलन है, जो उनके जीवन के अविस्मरणीय क्षणों, महत्वपूर्ण घटनाओं, व्यक्तियों और स्वयं उनके अपने अनुभवों पर आधारित हैं।

अकल्पनीय

कल एक घटना अचानक ही याद आ गई। अस्सी के दशक में धनबाद से पटना के लिए एक ट्रेन शुरू हुई थी "गंगा दामोदर एक्सप्रेस" जो रात के ग्यारह बजे के आसपास पास धनबाद से खुलती और सुबह पांच बजे पटना पहुंचा देती।

यह शुरू की बात है। तब हम धनबाद के जिस इलाके में रहते वहां से स्टेशन पहुंचने में एक घंटा लगता। कंपनी की गाड़ी सीधे हमें रात दस बजे के आसपास स्टेशन छोड़ देती। उसके लिए नौ बजे तक घर से निकल जाना होता। एक बार जब हमें ट्रेन से जाना था गाड़ी हमें छोड़ने के लिए घर पर आ कर लगी हुई थी। पति देव को आफिस से काम निपटा कर आने में देर हुई। ये नहाने चले गये। मैं निकलने की तैयारी कर चुकी थी तभी एक आदमी जो कोलियरी में काम करता था घर पर आया और इनके बारे में पूछा। मैंने उसे बाहर बैठने को कह दिया। इनके आने पर उसने बताया कि उसकी माँ की तबियत अचानक खराब हो गई है और उसे पटना जाने के लिए छुट्टी चाहिए। वह एक दरखास्त लाया था। इन्होंने उस पर अपने दस्तखत कर के उसे मंजूरी दे दी ।

उसे टिकट का इंतज़ाम करना है इस लिए स्टेशन जल्दी पहुंचना है बोल कर वह चला गया। तब पब्लिक ट्रांसपोर्ट की बहुत समस्या थी। उस इलाके से एक लोकल कनेक्टिंग ट्रेन चलती थी धनबाद स्टेशन के लिए जो गंगा दामोदर के समय से पहुंचा देती थी। लेकिन उस लोकल स्टेशन तक, जो चार किलोमीटर दूर था, कहीं से भी वहां पैदल या किसी डंपर या ट्रक से गाँव वाले या मजदूर लोग लिफ्ट लेकर जाते जिनको कोई साधन नहीं होता। वह भी इक्का दुक्का ही चलता नज़र आता। वरना सड़क बिल्कुल सुनसान रहती।

खैर हम भी बाद में अपने समय से निकले। घर से दो किलोमीटर ही आगे हीं बढ़े होंगे कि अचानक ड्राइवर ने गाड़ी रोक दी। क्या हुआ पूछने पर उसने बताया कि कोई आदमी सड़क पर गिरा हुआ है, बोल कर उतर गया और उस आदमी को पलटते ही चीखा "सर इसको तो कोई मार दिया" ये भी तुरंत ही उतर पड़े और पास जा कर गाड़ी की हेडलाईट में देखा। लहु-लुहान पड़ा वह मर चुका था।

यह वही आदमी था जो आधा घंटा पहले मेरे घर से छुट्टी का मंजूरनामा ले कर निकला था। जिसे मैंने बैठने कहा था। जिसकी माँ बीमार थीं। जिन्हें देखने वह जा रहा था। जिसकी बूढ़ी, बीमार माँ उसका इंतज़ार कर रही होंगी।

हमलोग की मानसिक स्थिति क्या हुई होगी सिर्फ कल्पना की जा सकती है। फिर तो थाना को फोन, हास्पीटल में एंबुलेंस को खबर करते , उन सबके वहां पहुंचते आधा घंटा बीत गया। वहां सभी लोग इन्हें जानते हीं थे। तुरंत एंबुलेंस और पुलिस के पहुंचने के बाद ही हम वहां से निकल पाए।

उस समय हम दोनों हीं थे। घबराहट के मारे मेरी तो यात्रा करने की स्थिति ही नहीं बच गई थी,लेकिन रूकने की भी गुंजाइश नहीं थी। उस आदमी का चेहरा नज़र के सामने से हट नहीं रहा था। विक्षिप्त सी हालत हो गई थी मेरी। किसी तरह मेरी रात भर की वह यात्रा पूरी हुई। सुबह पटना पहुंच कर घर में अपनों को देख कर जान में जान आई। उसका चेहरा, महीनों नज़र के सामने से आता रहा। आज तक वो घटना एक बुरे सपनें की तरह जब-तब याद आ जाती है।

जयनाथ महतो

नदी पार का वह रामपुर गाँव। वहीं से आता था वह जयनाथ महतो ! छोटा कद , तपा हुआ पक्का रंग, साठ के लगभग उम्र रही होगी। यह 1983-84 की बात है। जंगली इलाका हुआ करता था वह। कुछ पहले ही डकैती की दो-चार घटनाएं घट चुकी थीं उस इलाके में। शुरू शुरू की बात है इसलिए इनके ऑफिस जाने के बाद मैं घर बंद करके अंदर ही रहती। काॅलोनी सुरक्षित थी। 24 घंटे सुरक्षा- गार्ड्स का पहरा रहता। किंतु दिनभर सन्नाटा रहता। दोपहर में लंच के अवकाश में गाड़ी, स्कूटर के आने जाने से कुछ चहल पहल होती। शाम को फिर काॅलनी के बच्चे खेलने निकलते और लोग-बाग आपस में मिलते जुलते। ऐसे में दिन भर घर के बाहर उसका रहना बहुत हिम्मत देता। हांलाकि कम्पनी से उसका कोई नाता नहीं था। गांव का एक अति साधारण भोला- भाला आदिवासी था वह।

क्या शनिवार, क्या रविवार, बिना नागा हर सुबह कंधे पर एक गमछा डाले एक हांथ में लाठी ठकठकाता नदी पार कर चला आता जयनाथ महतो। आते ही बगान से तोड़ने लायक सब्जियां तोड़ कर टोकरी में रख देता। निस्वार्थ भाव से दिन भर बगान में काम करता, सब्जियां रोपता, उगाता और शाम को बगान की साफ़- सफ़ाई कर चाय पीता, खैनी खाता और दरवाज़े पर आ कर "मेमसाब जाता है, बंद कर लीजिए" आवाज़ लगा कर जाने की सूचना देता। कई बार गाँव के तालाब से मारी गई 5-7 ताजी फड़फड़ाती हुई मछलियाँ अपने गमछे में बांध कर ले आता और ख़ुद ही उसे काट कर साफ़ कर देता तो कभी अपने किसी त्यौहार में बलि चढ़ाए गए पाठे का प्रसाद स्वरूप ताजा मीट। कभी शहद ले आता तो कभी गाय का पुराना घी। हम कितना भी मना करते, समझाते लेकिन कैसा उसका सेवाभाव था हमारे प्रति कि हमारा सब समझाना उसके उपर से गुज़र जाता। ये उसे महीने में कुछ पैसों की मदद करना चाहते तो इनके पैर पकड़ कर माफ़ी मांगता। रोज ही मैं उससे खाने के लिए ज़रूर पूछ लेती तो कभी ईमानदारी से हामी भरता और ज्यादातर पेट भरा होने का कारण बता कर मना कर देता। हाँ, शाम को दूध वाली चाय की तलब उसे रहती।

एक दिन अपनी लाठी के बारे उसने भोलेपन से जो कुछ बताया वैसा वृहद ज्ञान मुझे पहली बार प्राप्त हुआ कि......लाठी अपनी जान की रक्षा के लिए बहुत कारगर अस्त्र है......कि लाठी के सहारे नदी पार की जा सकती है.....कि उंचे टीले की चढ़ाई में देह को उठा कर हल्का कर देती है लाठी.....कि सामने झाड़ियां पड़े तो झाड़ियों को पीट कर बीच से रास्ता बनाने के काम आती.....कि जीव, जंतु, सांप, बिच्छू से मुलाकात हो जाने पर उन्हें निपटाने में भी काम आती। लाठी का ऐसा दमदार महिमामंडन मैंने पहली बार उसी के मुख से सुना एवं लाठी के विषय में सर्वथा अपने ज्ञानकोष की रिक्त गगरी को लबालब भर कर मन ही मन स्वीकार किया उसकी बातों को।

मुझे बड़ी हैरानी होती, लोग आते ही रहते थे अपनी समस्याएं और काम के सिलसिले में। मुझे लगता कि ज़रूर इसका भी कोई काम होगा इसलिए यह इतना लगा हुआ है। इनसे कहती कि ज़रूर बताएगा कभी। ये सिरे से नकार जाते मेरी बात! कहते कुछ नहीं। हांलाकि सच कहूं तो कभी भी उसके किसी व्यवहार से स्वार्थ की बू नहीं आई मुझे। एक साल बीतते ट्रांसफ़र हुआ हमारा। यह बात उसे मालूम थी, लेकिन उसके रूटीन में कोई बदलाव नहीं आया। वैसे ही आता रहा, सब्जियां तोड़ता- रखता, दिन भर काम करता, चाय पी कर खैनी खाता और लाठी ठकठकाता लौट जाता। हमारे जाने का दिन आया....सामान ट्रक पर लोड हुआ...वह हांथ बांधे देखता रहा। मुझे इंतज़ार था कि यह शायद अब कुछ बोले, लेकिन वह घड़ी नहीं आई। इन्होंने चलते वक्त उसके हांथ में जबरन कुछ रूपए रख दिए जिसे स्वीकारते उसका आवेग फूट पड़ा। इतना ही कह पाया " साहब फिर ज़रूर आईएगा"।

वहां से निकलने के बाद रास्ते में इन्होंने बताया कि एक साल पहले इनकी वहां पोस्टिगं के बाद जयनाथ महतो मिलने आया था इनके आफ़िस में। तब इन्होंने उसे बैठने के लिए कुर्सी दे कर चाय मंगवाई थी। इतने सम्मान की उम्मीद ले कर तो वह कतई नहीं आया था, यह बात भावावेग में तब उसने बताई थी और बस यहीं से उसने एक रिश्ता कायम कर लिया हमारे साथ।

चार सालों के बाद दुबारा फ़िर से वहीं ट्रांसफ़र हुआ हमारा। दो-तीन दिनों के अंदर ही हमसे मिलने आया बूढ़ा जयनाथ महतो ! एक हांथ में लाठी, थोड़ी झुकी हुई कमर, कंधे पर गमछे में बंधी हुई कुछ ताजी सब्जियां और बच्चों के लिए घर के पेड़ के कुछ अमरूद..."बाबू लोग के लिए लाया मेमसाब"। बहुत खुश हुआ बच्चों को देख कर ! जाने से पहले बोला फ़िर आता रहेगा मिलने।

और सचमुच कभी कभी चला आता अपनी थकी हुई देह खींच कर लाठी टेकता हुआ। दिन गुज़रते रहे और फ़िर एक दिन उसके नहीं होने की ख़बर मिली हमें।

उस दिन अस्पताल के बेड पर लेटे- लेटे अचानक उसकी याद कैसे आ गई समझ नहीं पा रही हूं । लेकिन कुछ रिश्ते ऐसे भी बन जाते हैं जो अतीत की परतों से सर उठा कब आपके सामने आ जाएं, आपको पता नहीं होता। और जब सामने आ जाते हैं तो उनसे जुड़ा पूरा वाक्या हू-ब-हू नज़रों में कौंध जाता है जैसे कल की बात हो।

ज़िन्दगी और मौत के दरवाजे पर मैं

ज़िन्दगी और मौत के दरवाजे पर मैं

मैं अब तक जो कुछ भी लिखती रही हूं वह उस विषय की मेरी समझ , जानकारी , तथ्यों का विश्लेषण और उस विश्लेषण से बनी मेरी सोच की प्रस्तुति थी ; परन्तु आज जो मैं लिखने जा रही हूं वह मेरा स्वयं का भोगा ऐसा यथार्थ है जो व्यक्ति को आसन्न मृत्यु का आभास तक करा जाता है ।

उम्र ने भी क्या ख़ूब मेहरबानियां की हैं मुझ पर। सीनियर सिटीज़न की दहलीज पर खड़ी मैं, पांच वर्षों से किडनी का इलाज करा रही हूं। हाई ब्लड प्रेशर, आर्थोराईटिस और स्लिपडिस्क का साथ भी पुराना है। मुझे एहसास है कि पिछले कुछ वर्षों में बीमारियों ने मेरी प्राण शक्ति को बहुत क्षीण किया है।

आज मेरी स्थिति समुद्र के किनारे खड़े उस वृक्ष की तरह है, जिसने पूर्व में समुद्री हवाओं के कितने भी थपेड़े आराम से झेले हों पर अब वेग से उठी ज्वार भाटे की एक लहर भी उसके अस्तित्व को मिटा देने के लिए काफी है। कोरोना मेरे लिए ज्वार भाटे की ऐसी ही लहर की तरह है।

इसी चेतना के साथ कोरोना के इस दौर में अलग थलग और बहुत बच के रह रही थी मैं ।

मेरा और मेरी बेटी का घर पास पास ही है । 700 मीटर की दूरी पर। मेरे बेटी -दामाद सुहानी और ऋषि लॉकडाउन लगने के बाद बड़े आग्रह से हमें अपने घर ले गए थे ताकि हम दूसरों के संपर्क में न आए और कोरोना से सुरक्षित रह सकें। कहीं आना जाना नहीं। किसी बाहरी व्यक्ति से मुलाकात नहीं। घर के कामों के लिए पूरे समय की हेल्पर। कोई मेकैनिक घर में किसी काम से आता तो मैं एक कमरे में बंद हो जाती। डॉक्टर से कंसल्टेशन भी ऑनलाइन ही होता था। इतनी सावधानी के बाद भी मेरी तबियत ख़राब हो गई।

वह 1 सितम्बर की रात थी। दिन में छाती में भारीपन था। एसीडिटी भी थी। लगा गैस के कारण समस्या है। गैस की दवा खाने से कुछ आराम भी हुआ, लेकिन जैसे - जैसे रात बढ़ती गयी मेरी तकलीफ़ भी बढ़ती गयी। सांस लेने में दिक्कत होने लगी। सो पाना तो दूर बिस्तर पर लेट कर रहना भी मुश्किल हो गया। सुबह होते होते यह साफ हो गया था कि मैं किसी गम्भीर बीमारी के चंगुल में फंस चुकी हूं। जल्द इलाज की जरूरत थी‌।

सुबह होते ही, मैं किडनी के लिए जिन डॉक्टर के इलाज में रहती हूँ , उनसे वीडियो कॉल के द्वारा सम्पर्क किया गया। मेरी हालत देख उन्होंने तुरंत अस्पताल आने की सलाह दी। स्थिति की गंभीरता को समझते हुए हमलोग बिना समय गंवाए अस्पताल के लिए निकल पड़े।

मेरी हालत तेजी से बिगड़ने लगी थी। अस्पताल पहुंचने में 45 मिनट लगे होगें। घर से निकले थे तो लिफ्ट तक चल कर गए थे। बेसमेंट में भी कार तक चल कर गए थे परन्तु रास्ते में मुझे लगने लगा था कि मैं अस्पताल नहीं पहुंच पाऊंगी। बेहद लंबा लग रहा रास्ता किसी तरह तय हुआ। तब तक मेरी सांस और आवाज़ दोनो डूबने लगी थी। मेरी हालत ऐसी हो गई थी कि सामने अस्पताल की इमारत दिखाई दे रही है और मैं डूबती आवाज़ में ऋषि से पूछ रही हूँ कि "ऋषि और कितनी देर?" उन्होंने दिखाया कि "मम्मी जी हमलोग पहुंच गए हैं ।वह देखिए सामने अस्पताल है बस दो मिनट और" वह दो मिनट जिसमें मुझे अपनी सांसों को थाम कर रखने के लिये अपनें आप से संघर्ष करना था।

45 मिनट बाद अस्पताल में कार से उतर कर चलने की ताकत नहीं बची थी। मुझे एक- एक सांस के लिए संघर्ष करना पड़ रहा था। दिल डूबता महसूस हो रहा था। मानसिक रूप से मैं पूरी चैतन्य थी , परन्तु शरीर पर से पकड़ ढीली होती जा रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे मेरी चेतना और मेरे शरीर के बीच की दूरी बढ़ती जा रही है। ऐसी स्थिति में मेरे साथ मेरे दामाद और मेरे पति थे जो बहुत हिम्मत देने वाली बात थी ; क्योंकि मैं ऐसी स्थिति में भी आश्वस्त थी कि चाहे जिस भी हालत में होंऊ पर सब ठीक हो जायेगा।

अब मैं बिल्कुल चल नहीं पा रही थी । डॉक्टर के चैम्बर तक जाने के लिए व्हीलचेयर का सहारा लेना पड़ा। यहां तक तो फिर भी ठीक था। मेरा मन तब बैठने लगा जब डॉक्टर ने कोरोना की आशंका जताई और कोविड टेस्ट के लिए रेसपिरेटरी एमरजेंसी में भेज दिया। एक अटेंडेंट व्हीलचेयर को रेसपिरेटरी एमरजेंसी की ओर ले जाने लगा। मन अनजानी आशंकाओं से घिर गया। लगा यह व्हीलचेयर नहीं , मेरी ज़िन्दगी है जो उल्टी दिशा में चल पड़ी है।

खैर , हम रेसपिरेटरी एमरजेंसी में पहुंचे। यह एक हॉल था जिसमें आठ बेड लगे थे। एक पर मुझे लिटा दिया गया। अन्य सात बेड पर दुसरे मरीज़ कोरोना टेस्ट के लिए लेटे थे। मुझे आक्सीजन लगा दिया गया जिससे बहुत राहत महसूस हुई। मेरी उखड़ती सांस वापस स्थिर होने लगी थी। हम आठो‌ं लोगों का एन्टीजेन टेस्ट हुआ और अब परिणाम का इंतजार था।

बेड पर लेटे मेरी कल्पना में मुझे सामने दीवार पर दो दरवाजे दिख रहे थे। एक के परे ज़िन्दगी थी तो दुसरे के परे अंधेरे से भरी सुरंग। इन दो दरवाजों में से किसी एक दरवाजे की ओर मुझे बढ़ना था ।

पर किस दरवाजे की ओर ? यह कोरोना टेस्ट के परिणाम से तय होना था। ज़िन्दगी या ज़िन्दगी के लिए भीषण संघर्ष। मेरे भाग्य में क्या था ? दिमाग सजग था पर जीवन अनिश्चित।

ऐसे में मैं और मेरे अपनें टेस्ट रिपोर्ट का इंतजार कर रहे थे। उसी तरह जैसे बिना किसी गुनाह के कोर्ट केस में फंसे मुलजिम को केस की सुनवाई पूरी होने पर जज के फैसले का इंतजार होता है। सज़ा या बाइज्ज़त बरी वाली मानसिक स्थिति थी ।

टेस्ट रिपोर्ट आया । आठ में से छह लोग कोरोना पोज़िटिव निकले । मैं उन दो लोगों में थीं जिनका रिपोर्ट निगेटिव था । यह मेरे और मेरे अपनों के लिए बहुत राहत वाली ख़बर थी।

जितनी सावधानी और बचा - बचा कर सुहानी और ऋषि ने हमें अपने घर में इस कोरोना काल में रखा था यह उसी का परिणाम था कि मैं कोरोना से बची रही थी। उन लोगों ने हमेशा यह ध्यान रखा कि मैं किसी भी ऐसे व्यक्ति के सम्पर्क में कतई न आ जाऊं जिससे कोरोना लगने की जरा भी सम्भावना हो।

जिन्दगी की आस फिर लौट गयी थी , परन्तु अपनी सांस को वापस पाने का संघर्ष अभी बाकी था। मैं आक्सीजन के बिना एक मिनट भी नहीं रह पा रही थी। अगर वह कोरोना नहीं था तो फिर क्या था ? क्यों रात भर में मेरी ऐसी हालत हो गई थी और कोरोना का संदेह पैदा करने वाले लक्षण आ गये थे ?

ज़िन्दगी और मौत के दरवाजे पर मैं

कई तरह के टेस्ट , स्कैन, एक्स-रे इत्यादि का सिलसिला शुरू हुआ । यह सब होने के बाद अब कारण पता था। निमोनिया (Bilateral Pheumonia) का भयंकर अटैक तथा उसके कारण कुछ और काॅम्पलीकेशन। हार्ट भी प्रभावित था। ठीक से खून पम्प नहीं कर पा रहा था

जल्द इलाज की सख्त जरूरत थी पर अस्पताल में एक भी बेड खाली नहीं था। एडमिशन हो ही नहीं पा रहा था। बेड की कमी के कारण मरीज लौटा दिए जा रहे थे। मेरे डॉक्टर भी परेशान थे। एडमिशन हो तब तो कायदे से इलाज शुरू हो सके।

बेड उपलब्ध होने का इंतजार करती मैं रेसपिरेटरी एमरजेंसी में ही कोविड मरीजों के बीच करीब दस घंटे पड़ी रही। इस बीच वहां कितने ही मरीज कोरोना टेस्ट के लिए आते जाते रहे। मेरे जैसा एक कोरोना नेगेटिव मरीज का उस माहौल में इस तरह घंटो पड़े रहना बहुत ख़तरनाक और पीड़ादायक था।

यह शहर के एक बड़े और नामी अस्पताल का हाल था तो सामान्य अस्पतालों में मरीजों का क्या हाल होता होगा यह विचार अचानक दिमाग में कौंध गया और मन अवसाद से भर गया। यहां गम्भीर हालत के मरीज भी बेड के अभाव में लौट रहे थे। कोरोना फेज़-2 के कारण मरीजों की संख्या में हुई अप्रत्याशित वृद्धि ने जो स्थिति पैदा की उसकी मैं भुक्तभोगी थी। अस्पताल की भी अपनी मजबूरी थी। उनकी भी अपनी क्षमता और सीमाएं हैं , यह मैं समझ रही थी ।

साढ़े नौ बजे रात में बेड खाली हुआ और एक कमरा मिला तब मेरा एडमिशन अस्पताल में हो सका। 2 सितम्बर को एडमिट हुई थी और अपनों की दुआओं से 8 सितम्बर की रात को डिस्चार्ज हो कर घर आ गई।

अस्पताल में जिस तरह से मेडिसिन , नेफ्रोलॉजी तथा कार्डियोलॉजी विभाग के डॉक्टरों की टीम ने मेरा इलाज किया और मेरा हौसला बढ़ाया वह निश्चित ही प्रभावित करने वाला था जिसने मेरे मन में उनके प्रति और ज्यादा सम्मान और विश्वास बढ़ाया।

मेरे दामाद ऋषि जिस तरह मेरी जान बचाने के लिए अपनी जान की फ़िक्र किये बगैर अस्पताल में मेरे पास कोरोना मरीजों के बीच घंटों खड़े रहे और मेरे इलाज की राह सहज करते रहे वह किसी के लिए भी आज के माहौल में आसान नहीं था। खाना पानी भी भूलकर जिस तरह दिन भर ऋषि जूझते रहे वह कभी भुलाया नहीँ जा सकता । मुझे बाद में पता चला कि उस दिन जब तक मुझे बेड नहीं मिला तब तक ऋषि ने खाना तो दूर एक बूंद पानी भी नहीं पिया था। इतनी शिद्दत से जब आप के लिए आपका दामाद इस तरह खड़ा होता है तो बेटा और दामाद के बीच की लकीर का अस्तित्व मिट जाता है और लगता है मेरे सामने मेरा दामाद नहीं एक बेटा खड़ा है ।

ऋषि मुझसे उम्र और रिश्ते में छोटा होने के बावजूद अपने कर्मों की वजह से उस दिन मुझसे बड़े बन गए थे ।आज जब मैं यह लिख रही हूं मेरी आंखों में खुशी के आंसू हैं और मन में संतुष्टि के भाव। मै विश्वास के साथ कह सकती हूं कि ऋषि की किसी बात से अनजाने में भी कभी मुझे कोई क्लेश हुआ होगा तो वह उस दिन पूरी तरह से धुल गया था ।

यह संस्कारों की बात है और इस वक़्त मैं अपने समधी साहब और समधन जी को याद कर रही हूं जिन्होंने ऐसे संस्कार अपने बच्चों को दिए। ऋषि के बड़े भाई और भाभी, धीरज और दीपाली के लिए मैं क्या कहूं जिन्हें मैंने परिवार में कभी भी, किसी के लिए भी ज़रूरत पर खड़े होते और परिवार को जोड़ते, सम्हालते, ऐसे संस्कारों को सींचते और आगे बढ़ाते ही देखा है।

इस मुश्किल वक़्त में मेरे पति हमेशा की तरह मेरे साथ थे और अपने हिस्से का कर्तव्य पूरा करने में हर संभव कोशिश के साथ लगे थे।

बेटी के लिए भावनात्मक तथा व्यवहारिक तौर पर यह बहुत कठिन वक़्त था। वह अगले हीं महीने माँ बनने वाली है । फिर भी वह अपनी जिम्मेदारी ऐसे निभा रही थी जैसे मेरी मां हो और अभी भी जी जान से लगी है ।

मेरा बेटा अमेरिका में है और वहां से वह जो कुछ कर सकता था , कर रहा था ।

मैं यह सब इसलिए लिख रही हूं ताकि विश्वास के साथ बता सकूं कि जब आपका परिवार आप के साथ मजबूती से खड़ा हो तो फिर बड़ी समस्या भी छोटी बन जाती है ।

आज की पीढ़ी अगर परिवार में अंतर्निहित असीम ताकत को समझ कर चले तो शायद उनके लिए जीवन की चुनौतियों से निपटना आसान होगा ।

चलते समय अस्पताल की तरफ़ से मुझे दिया गया एक प्यारा सा मेरा मनपसंद तोहफ़ा। माहौल को खुशनुमा बना कर अस्पताल द्वारा इस तरह विदा करना भी बीमारी के अवसादों को दूर कर गया ।

जीवन की आपाधापी में

जीवन की आपाधापी में

कई बार जीवन में हमें कुछ ऐसे निर्णय लेने पड़ने हैं, जिसके बारे में पता नहीं चलता कि आगे क्या होगा। बस सब कुछ समय पर छोड़ कर हम उसके परिणाम का इंतज़ार करते हैं ।

बात शुरू होती है पतिदेव की पोस्टिंग के दिनों से। टाटा स्टील की Mines division मे Head, Human resources and industrial relations की हैसियत से इनके पदस्थापित रहने के कारण आए दिन नई नई जिम्मेदारियों, चुनौतियों से सामना होता जिसे निभाते हुए ट्रांसफर की आदत पड़ गई थी। चुनौती भी ऐसी कि कभी धनबाद के आदर्श नगर काॅलोनी की पूरी दीवार पर लालखंडी माओवादी बड़े बड़े अक्षरों में इनका नाम लिख कर वहां से इन्हें चले जाने की नसीहतें लिख जाते तो कभी नोआमुंडी में, घर में पर्चे भेज कर धरना, प्रदर्शन या घेराव की अपनी योजनाओं की पूर्व सूचनाएं देते। कभी माफियाओं से धमकियां मिलती। एक बार 200-250 ग्रामीण गड़ासा, भुजाली, भाला, तलवार से लैस बंगला और कालोनी घेरने चले आए। यह अलग बात है कि मदद और आश्वासन पा कर बाद में यही लोग सहयोग भी करते। पतिदेव के एक इशारे पर कुछ भी करने को, मरने-मारने को तैयार। एक बार 35- 40 डकैतों के गिरोह से भी सामना करना पड़ा। बरसात के दिनों में खदान डूबने जैसी दुर्घटनाओं से मजदूरों के नीचे फंस जाने की परेशानी तो कभी लूट-पाट की घटना से दो चार होना। आए दिन छोटी बड़ी घटनाएं घटती हीं रहती थी लेकिन सभी को इस एक पोस्ट में लिखना संभव नहीं।

बड़े बड़े बंगले मिलने के कारण उनमें रहते हुए उनके मुताबिक फर्निचर, या सामान रखना, उनकी देखभाल, अपने या बच्चों के लिए कोई चीज़ पसंद आती तो ले आना। तब भी उसके बाद लगा रहता कि यह भी करना है , वह भी करना है। अब तो बहुत कुछ हटाने के बाद भी हर चीज़, हर सामान ज़रूरत से ज्यादा लगता है। खैर यह सब पुरानी बातें हैं।

जहाँ तक अपनी बात है हमेशा हीं किसी भी काम को करने से पीछे नहीं हटी मैं। उस ज़माने में 35- 36 साल पहले उस डिवीजन की तीन- चार गिनी चुनी ड्राइव करने वाली महिलाओं में एक मैं भी थी। पढ़ाई- लिखाई का सवाल है तो पढ़ाई लिखाई में अच्छी थी मैं । यह सब कहने का मकसद बस इतना भर है कि इस सफ़र में ऐसे पड़ाव भी थे।

परिस्थितियां कैसे बदलती हैं उसे समझने के लिए 22-23 साल पहले से जीवन के ताने - बाने पर नजर डालें तो टाटा कंपनी ने अपने पदाधिकारियों के लिए ग्रेटर नोयडा में "टाटा ऑफिसर्स एनक्लेव" के नाम से परी चौक पर घर बनाया। दिल्ली में बहुत रिश्तेदार थे तो यह सोंच कर वहाँ फ्लैट लिया कि अगर बच्चे बाहर पढ़ने गए या रिटायर्मेंट के बाद हमने दिल्ली मूव किया तो एक घर होगा वहां। फिर 2012 में गाज़ियाबाद में लोनी रोड पर छोटा भाई ले रहा था तो हमने उसके साथ वहां भी एक फ्लैट लिया। यह सोच कर कि भाई भी बगल में साथ रहेगा। इधर पटना में सभी को उम्मीद की हम पटना आ जाएं शायद।

संयुक्त परिवार में पली-बढ़ी, पूरे परिवार में अपनी पीढ़ी की पहली और भाई बहनों में सब से बड़ी मैं, बहुत स्नेह और मान मिला मुझे सभी बड़े- छोटों का। सभी ने मुझ से यही कहा कि मैं पटना छोड़ कर कहीं नहीं रह पाऊंगी। हमें नहीं जाना चाहिए ।

इधर इसी बीच सहर्ष का अमेरिका आना जाना शुरू हो गया था। और वह ज्यादा उधर ही रहने लगा था। दोनों बच्चे सही समय पर सेट्ल हो गए। बेटी की शादी हो गई। उसकी सुखी, सम्पन्न ससुराल यहीं है।

शादी से पहले बेटी का लंदन आना जाना लगा रहता। लेकिन बाद में उसने स्वयं ही आना जाना कम कर दिया। उसे शुरू से इस बात का खयाल था कि रिटायरमेंट के बाद हम जहाँ भी शिफ्ट करें, बस एक सीधी फ्लाईट भर का रास्ता हो ताकि दो दिन की भी छुट्टी हो तो घर आना जाना हो सके। अब सुहानी का लगातार हम से बंगलोर शिफ्ट होने का आग्रह। उसे बहुत फिक्र थी इस बात की, कि रिटायरमेंट के बाद हम कैसे रहेंगे! कैसे हमारी देखभाल होगी।

रिटायर्मेंट का समय आया तो इन्हें कंपनी से एक्सटेंशन मिला जिसे हमने पूरा किया। कंपनी ने तो बहुत सम्मान के साथ विदा किया ही साथ ही अन्य दूसरी कंपनियों से आगे इन्हें नौकरी के कई प्रस्ताव भी मिले। लेकिन अब वहां से मन उचट सा गया था सो हमनें वह सब छोड़ कर बंगलोर आने का निश्चय यह सोंच कर लिया कि तीन साल बंगलोर में रह कर बाद में दिल्ली चले जाएगें। दिल्ली में कुछ आगे भी इनके करनें का विकल्प रहेगा और इधर बच्चों का मन भी रह जाएगा।

2015 में अब जब बंगलोर आने की बात हुई तो जरूरी लगा कि यहाँ एक घर होना चाहिए। शिफ्ट होने से पहले हमनें यहाँ भी घर लिया। फिर भी आसान नहीं था अपनी जड़ों से कट कर कहीं दूसरी जगह बसना। मेरे भाई या रिश्तेदार आशंकित थे कि पता नहीं हम यहाँ रह भी पाएंगे या नहीं। पहले जहां हर काम एक फोन घुमाने से हो जाता अब वहां एक एक डॉकूमेंट्स को बदलने के लिए, बैंक के काग़जात, या पुराने पते, कार लाईसेंस सबको नये पता पर बदलने के लिए दौड़- धूप। सुहानी-ऋषि पास में ही थे तो उनका अपने ऑफिस का समय निकाल कर कहीं ले जाना। एक मजबूत सोशल बाॅडिंग छोड़ कर आने के बाद आस-पास तमिल, तेलगु, कन्नड़, मलयाली पड़ोसी। लोग अच्छे थे लेकिन भाषा की समस्या तो थी। खैर सामने पड़ने से हाय हैलो हो जाता। या थोड़ी बहुत अंग़्रेजी बोल कर काम चल जाता।

2016 में घर में पांव फिसलने से मेरी कलाई में मल्टिपल फ्रैक्चर हो गया था। ऑपरेशन से हाथ बिल्कुल ठीक तो हो गया लेकिन इतनी दर्द निवारक दवाएं मुझे उसके लिए दी गईं कि तीन महीना के बाद ही मुझे किडनी की समस्या हो गई और उसके लिए दवा और परहेज़ दोनों शुरू हो गए तो हमने यहाँ से कहीं और शिफ्ट होने का विचार ही छोड़ दिया। क्यों कि मेडिकल की सुविधा यहाँ बेहतर थी। और उस पर बच्चों का मोह। सब छोड़ कर कैसे जाया जा सकता था।

पटना, मेरा घर, मेरा शहर , इसकी गलियां , सड़कें , चौराहे, बाज़ार, मेरा स्कूल, मेरा पटना कॉलेज, यूनिर्सिटी का लगाव बना रहा। कोई भी मौका लगता मेरा आना जाना चलता रहता। जहां मेरा बचपन बीता वहां का मोह छोड़ना आसान नहीं था।

इधर रिटायरमेंट के चार साल के बाद टाटा स्टील ने "Bhushan Electrical and Steel, जिसे वह खरीदने वाली थी उसमें नौकरी के प्रस्ताव के साथ फिर से इन्हें याद किया। उस पर बच्चों का आग्रह कि इन्हें यह प्रस्ताव स्वीकार कर लेना चाहिए । इनकी सहमति के बाद एक मीटिंग में सब कुछ लगभग तय हो चुका था। वैसे तब तक हम मानसिक रूप से बंगलोर को अपनाने लगे थे। लेकिन अब फिर से दूसरी जगह गृहस्थी बसाने की उलझन। सोंचा कि मैं सुहानी के पास श्रीका के लिए रह जांऊगी और ये चले जाएंगे। मेंरा इलाज चलना भी दूसरा कारण था यहाँ रुकने का । लेकिन खैर बाद में "Bhushan Electrical and Steel Co" कंपनी नीलामी में "Jindal Steel " को चली गई और वह मामला आगे नहीं बढ़ पाया।

ज़िंदगी ठीक ठाक व्यवस्थित पटरी पर चलने लगी। इधर सहर्ष अमेरिका रहने लगा था। उसकी बहुत इच्छा कि हम अमेरिका में उसके साथ रहें।

बदलाव की हमारी कवायद अभी खत्म नहीं हुई थी।आगे कुछ ज्यादा सुखद होना बाकी था। 2020 में कोरोना काल का दौर आया। लाॅकडाऊन लग गया था। हम अकेले कैसे रहेंगे बोल कर ऋषि-सुहानी बहुत आग्रह से हमें अपने साथ ले आए। हम अपने घर में ताला लगा कर चले आए। तभी सहर्ष को वर्क फ्राॅम होम के कारण छ महीने के लिए इंडिया आने की इज़ाजत अपनी कंपनी से मिली। इधर सुहानी की ज़िद की हम इनके साथ शिफ्ट ही हो जाएं।

इसी बीच सितम्बर 2020 में मुझे माईल्ड हार्ट अटैक के साथ एक्यूट न्यूमोनिया का अटैक पड़ा जिसने मेरे हार्ट, किडनी और लंग्स को बुरी तरीके से प्रभावित किया। इसका ज़िक्र मैंने पहले भी किया है । किडनी तो पहले से ही कमजोर थी। अब 8% फंक्शनल किडनी के लिए डायलिसिस की और किडनी स्टेबल हो तो फिर 25% फंक्शनल हार्ट की सर्जरी, और लंग्स को ऑक्सीजन कंसंट्रेटर का जब- तब सपोर्ट। अभी तक जो कुछ भी किया वह अब बेमानी लगने लगा । छ साल पहले अपने स्वास्थ्य की पूरी जाँच के बाद जिस "fit and fine" की मेडिकल रिपोर्ट टाटा हॉस्पिटल से ले कर मैं आई थी,वह सपना हो गया। संयोग ऐसा रहा कि सुहानी के सामने एक खाली फ्लैट मिला तो बेटे ने ज़िद कर के हमें वहां शिफ्ट कराने की इच्छा से खरीद लिया। फिर भी कुछ आशंकाएं थी कि पता नहीं फ्लैट में किस तरह एडजस्टमेंट होगा। लेकिन यहाँ आने के बाद सब कुछ पहले से कुछ ज्यादा व्यवस्थित होने लगा। सिक्यूरिटी हो या मेनटेनेन्स या फिर बच्चों के लिए खेल-कूद की व्यवस्था सब कुछ पहले से बेहतर मिली।

पहले कभी फ्लैट में रहे नहीं थे, बच्चों के साथ रहने के अलावा। लेकिन विधाता ने कुछ और ही सोंच कर रखा था। हमारी सोच से परे थी यह बात कि कभी सुहानी के साथ रह पाऊंगी लेकिन ज़िंदगी इनके साथ इतनी ख़ुशनुमा हो जाएगी यह मैं ने यहाँ रहते हुए जाना और जब इस बात का एहसास मुझे होता है उसके लिए प्रार्थना में मेरे हाँथ स्वतः जुड़ जाते हैं ।

एक भरोसे की छाँव का एहसास, जब दोनों श्रीका और आरिश सामने खेलते हैं, हंसते खिलखिलाते हैं मैं अपनी तकलीफें भूल जाती हूँ। उनकी हरकतों से घर की दीवारें धड़कती महसूस होती हैं और मुझे लगता है कि परिस्थितियों ने मुझसे जो कुछ भी छीना, उससे कहीं ज्यादा मुझे लौटा दिया।

पता नही क्यों, बस यूं हीं यह सब लिख गई।

नेउरा - एक याद

नेउरा - एक याद

पिछले दिनों पुराने एलबम में कुछ तीन- चार दशक पुरानी तस्वीरें मिल गई। जिसे देख कर इच्छा हुई कि इनके बारे में कुछ लिखूं ।

ये 200 -250 साल पहले उस जमाने की हवेलियों के खंडहर की तस्वीरें हैं जो कभी आबाद हुआ करती थीं। इनका कोई मुगलकालीन इतिहास नहीं है लेकिन ये उन रईसों के वैभव और शानो- शौक़त की निशानी हैं जिनके पुरखे कभी नवाब हुआ करते थे। बाद के वंशजों में ऊंचे ओहदों पर कोई जज तो कोई कलक्टर हुए।

पटना से 10-12 किलोमीटर दूर छोटा सा एक मुस्लिम बाहुल्य कस्बा, जिसे गाँव कहना ज्यादा उपयुक्त होगा। पढ़ाई के नाम पर एक मदरसा और एक पाठशाला जहाँ बच्चे बैठने के लिये अपना अपना बोरा लेकर जाते थे। जिन्हें आगे पढ़ना है वे बच्चे ट्रेन से रोजाना दानापुर या पटना तक भी जाना- आना करते। बुआ के बेटे भी दानापुर जाते। गार्ड के डब्बे में उनकी जगह सुनिश्चित थी। ट्रेन स्टेशन पर रुकती तो कंपाउंडर जा कर बैठा देता और लौटने पर फिर उतार लाता।

नेउरा - एक याद

वही गाँव अब इस पटना शहर का हिस्सा हो गया है। "नेउरा" जहां मेरे बड़े फुफा डाक्टर थे, उनका बड़ा नाम था उस इलाके में । दूर गाँव के मरीज उन से अपना इलाज करवाने आते। जो थोड़े संपन्न होते वे मौसम के अनुसार कुछ सौगातें ले कर आते। जैसे मौसमी सब्जियां, मिट्टी की हांडी में बना हुआ चना या सरसों का साग, मिट्टी के घड़े में गन्ना का रस, या अदरक , काली मिर्च और सौंफ डाला हुआ गुड़, दही, बड़ी-तिलौड़ी वगैरह। जो फीस नहीं दे पाते उनका भी इलाज होता। फुफा की छवि गाँव के बेटे के समान थी ।

यों तो फुफा का अपना पुश्तैनी घर- जमीन पास ही में दो किलोमीटर पर था लेकिन एक पगडंडी के सिवा कोई पक्की सड़क नहीं थी वहां के लिए। और यह कस्बा बिल्कुल रेलवे स्टेशन पर ही था इस लिए गाँव वालों के इलाज के मकसद से स्टेशन से दस कदम दूर एक पुरानी हवेली, जहां फुफा अपना नर्सिंग होम चलाने के लिये लगभग दस सालों तक रहे। बाद में जब उसके बिकने की चर्चा हुई तो उन्होंने अपनी ही वाली हवेली का एक हिस्सा खरीद कर वहीं घर बनाया। उनका अपना नर्सिंग होम था यहाँ, मकान अब भी है लेकिन उनके निधन के बाद बैंक को किराए पर दे दिया गया है। एक हिस्से में लड़कियों को सिलाई- बुनाई सिखाने के लिए महिला केंद्र भी चलता है। अब वहां कोई नहीं रहता। बुआ के बच्चे भी सभी पटना या बाहर बस गए हैं ।

नेउरा - एक याद

तब अकेला एक फुफा का ही मकान था जो आधुनिक नक्शे से बना हुआ था। बाकी पूरे नेउरा में फैली हुई कुल पंद्रह- बीस की संख्या में छोटे मोटे किले के जैसी ऊंची-ऊंची हवेलियाँ जिनकी दीवारें 24 इंच चौड़ी, छतें बीस फीट उंची गार्टर पर ढाली हुईं। चार- पांच छोटे- बड़े आंगन, मुख्य भवन जिसे जनानखाना कहा जाता , का आंगन तो इतना बड़ा कि उसमें चार बैडमिंटन के कोर्ट एक साथ बनाए जा सकते थे। हर एक आंगन चारो तरफ से लंबे चौड़े ओसारे से घिरा हुआ, जिसके ऊंचे ऊंचे मोटे पाये खौफ़ पैदा करते। 15- 20 बड़े छोटे कमरे या हाॅल और किले के मुख्य द्वार के बड़े बड़े विशाल मेहराबदार दरवाज़े होते जो छत को छूते मालूम होते थे। आंगन के दूसरे छोर पर कूंआं। हम मुख्य आंगन वाले हिस्से में हीं रहते थे। एक आंगन में गाय रखी जाती और बाकी कुछ हिस्से को सुरक्षा के ख्याल से बंद रखा जाता।

ऐसा विशाल घर था कि बचपना के कारण रात में तो डरावने सपनें आते हीं थे, दिन में भी भांय भांय करता हुआ आंगन में अकेले जाने में डर सा लगता। जब सभी भाई बहन रहते तो बैडमिंटन खेलते। लेकिन जरूरत के हिसाब से घर का दूसरा विकल्प वहां नहीं था और चुकि वहां 40-50 मरीजों के रहने की व्यवस्था थी तो उनके परिजनों की आवाजाही से चहल पहल रहती।

नेउरा - एक याद

सामने आगे का हिस्सा पुरूषों का दीवानखाना और उसके बाद मुख्य आंगन के अलावा हर बहु बेटी का अपने- अपने आंगन के साथ अपना हिस्सा। यहां एक-दो फार्म हाउस भी थे जहां विदेशों से आ कर पुराने बाशिंदों के बेटे- बेटियाँ कुछ समय बिता कर जाते। एक खानसामा का परिवार उस फार्म हाउस के पिछले हिस्से में स्थाई तौर पर रहता था। स्कूल की छुट्टियों में हम भी जाते। ऐसे ही एक परिवार का वहां छुट्टियों में बिल्कुल घर के सामने वाले फार्म हाउस में आना जाना रहता जिनकी दो हमउम्र बेटियों से हमारी दोस्ती हो गई थी। उनका भी वहां कोई मिलने जुलने वाला घर नहीं था मेरी बुआ के अलावा। होली-ईद मिल जुल कर ही मनती।

हम दिन भर बागीचे में मिल कर साथ घूमते। उसमें आम, अमरूद, लीची, कलौन्दा , और दूसरे फलों और सब्जियों के पेड़ थे। एक तालाब भी था जिसमें मछलियाँ मारी जातीं। उनके रखवाला का नाम था जनक जो मौसम मे आम या कोई फल तोड़ने से पहले या मछलियाँ मारने से पहले फुफा से पूछ जाता और फिर बाल्टी में भर कर आम या मछलियाँ या जो कुछ भी साग सब्जी तोड़ता, कह देने से ले आता। अपने मालिकों की अनुपस्थिति में उसकी आय का जरिया वही फार्म हाउस था। बाकी उस इलाके में गाँव वालो की जरूरतों को पूरा करने के लिए 15-20 छोटी मोटी दुकानें और उसके रहवासी। इसके अलावा कुछ घर, गाँव वालों के। कुल इतनी ही लगभग 500 की आबादी थी वहां की। प्रकृति के सानिध्य में छुट्टियाँ कैसे बीत जाती पता ही नहीं चलता।

नेउरा - एक याद

तब हमारे लिए बहुत कौतूहल का विषय होते थे ये उजड़ी हुई हवेलियों के खंडहर। हर हवेली की एक कहानी।

नेउरा - एक याद

उनमें उनका कोई नौकर चाकर केयर टेकर के तौर पर रहता ताकि जमीन पर कब्जा बना रहे। फुफा का बहुत आदर था वहां इसलिए हम सब भाई बहन वहां जब भी घूमते तो हमें कोई रोक टोक नहीं करता। बड़े चाव से वे लोग हमें दिखाते।

पर्दा -प्रथा के कारण उन हवेलियों की सबसे बड़ी ख़ासियत यह थी कि दूर- दूर और अलग-अलग दिखने वाली ये सारी इमारतें परिवार की महिलाओं के आपस में मिलनें जुलने के लिए एक दूसरे से गुप्त रास्तों और सुरंगों से जुड़ी हुई थीं। आज स्मृतियाँ ताजी हो गई तो यह सब किस्से कहानी जैसा लग रहा है।

नेउरा - एक याद

शहर के विस्तार के साथ अब वो खंडहर भी नहीं बचे हैं । लेकिन उन हवेली के मालिकों की नई पीढी विदेशों में और कुछ वंशज पटना में हीं बस गए थे जिनके नाम पर पटना के पाॅश इलाके की दो सड़कों के नाम भी रखे गए हैं ।

ऐसा बैभवपूर्ण अतीत वाला यह कस्बा अब अपनी पुरानी पहचान खो कर इमारतों के जंगल में तब्दील हो चुका है। कुछ तो देखरेख की कमी और कुछ शहरों में बसने की लालसा से उपेक्षित छोड़ दिया गया एवं बाद के सालों में तो जमीन की आसमान छूती कीमतों ने रही सही कसर भी पूरी कर दी इन्हें नेस्तनाबूद करने में और नामो निशान तक मिटा दिये गए उन खंडहरों के जो आज इमारतों के जंगल में तब्दील हो चुके हैं ।आज अगर वे खंडहर होते तो अपने बच्चों को दिखाती कि उनके साये में हमारा बचपन बीता था।

नेउरा - एक याद

अगर कभी आपका उधर जाना हुआ तो पूछिएगा उन बुज़ुर्गों से जिन्होंने पांच - छ दशक पहले का नेउरा देखा है। आप यकीन नहीं कर पाएंगे कि नेउरा का ऐसा भी कोई शानदार अतीत रहा था।

पटना कालेज

पटना कालेज

160 वर्षों का पटना कालेज

मेरा गौरवशाली गरिमामय गुरूकुल, बिहार का पहला कालेज एवं राज्य का गौरव होने के साथ महान विभूतियों जैसे राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर,

संम्पूर्ण क्रांति की अवधारणा के जनक- जयप्रकाश नारायण,

बी सी राॅय - स्वतंत्रता के बाद पश्चिम बंगाल के प्रथम मुख्यमंत्री ,

सच्चिदानंद सिन्हा- आधुनिक बिहार के निर्माताओं में एक,

कृष्ण सिन्हा- आजादी के बाद बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री,

पटना कालेज

भुवनेश्वर प्रसाद सिन्हा- पटना उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश,

अन्नदा शंकर रे- प्रारंभिक भारत के आई सी एस,

सर खान बहादुर खुदाबख्श- हैदराबाद के प्रथम मुख्य न्यायधीश एवं खुदाबख्श लाइब्रेरी के संस्थापक

एवं अन्य नामी- गिरामी हस्तियों की अध्ययन-स्थली रहे पटना कालेज ने हाल- फिलहाल 9 जनवरी 2023 को 160 वर्ष पूरे किए। यहीं से मैं ने बी ए, एम ए किया और यूनिवर्सिटी की रैंक होल्डर भी रही ।

पटना कालेज

गर्व होता है सोंच कर....

"इसी चमन में हमारा भी इक ज़माना था

यहीं कहीं कोई सादा सा आशियाना था !"

- जिगर मुरादाबादी

महापर्व छठ

महापर्व छठ

लोक आस्था का महापर्व छठ

यूँ तो यह कहा जाता है कि चार दिवसीय छठ पर्व की शुरूआत बिहार राज्य से हुई जिसमें बिना अन्न जल ग्रहण किए सूर्यदेव की उपासना की जाती है एवं नदी या तालाब के जल में खड़े हो कर पहले दिन डूबते सूर्य को और फिर दूसरे दिन उगते सूर्य को अर्घ्य दे कर पूजा की जाती है। लेकिन आज यह व्रत अपनी महिमा एवं लोकप्रियता के कारण पूरे विश्व में श्रद्धालुओं के द्वारा मनाया जाता है। वैसे तो भारत देवी देवताओं और त्योहारों का देश है ही किंतु कुछ कठिन माने जाने वाले पर्वों में छठ भी एक बहुत कठिन व्रत माना जाता रहा है। यह पर्व साल में दो बार मनाया जाता है। कार्तिक के महीनें में एवं चैत्र के महीने में।

छठ वास्तव में सूर्योपासना का पर्व है। इसलिए इसे सूर्यषष्ठी व्रत के नाम से भी जाना जाता है। इसमें सूर्य की उपासना उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए की जाती है। ऐसा विश्वास है कि इस दिन सूर्यदेव की आराधना करने से व्रती को सुख, सौभाग्य और समृद्धि की प्राप्ति होती है और उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। इस पर्व के आयोजन का उल्लेख प्राचीन ग्रंथों में भी पाया जाता है। इस दिन पुण्यसलिला नदियों, तालाब या फिर किसी पोखर के किनारे पर पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है।

अगर पौराणिक मान्यताओं पर नज़र डालें तो उनके अनुसार सूर्य को अर्घ्य देने की शुरुआत महाभारत काल में हुई थी। सबसे पहले सूर्यपुत्र कर्ण ने सूर्यदेव की पूजा शुरू की। कर्ण भगवान सूर्य के परम भक्त थे। वह प्रतिदिन घण्टों कमर तक पानी में ख़ड़े होकर सूर्यदेव को अर्घ्य देते थे। रामायण एवं महाभारत काल से ही भगवान भास्कर को जल में खड़े हो कर अर्घ्य देने की परंपरा रही है।

किंवदंती के अनुसार, ऐतिहासिक नगरी मुंगेर के सीता चरण में कभी मां सीता ने छह दिनों तक रह कर छठ पूजा की थी। पौराणिक कथाओं के अनुसार 14 वर्ष वनवास के बाद जब भगवान राम अयोध्या लौटे थे तो रावण वध के पाप से मुक्त होने के लिए ऋषि-मुनियों के आदेश पर राजसूय यज्ञ करने का फैसला लिया। इसके लिए मुग्दल ऋषि को आमंत्रण दिया गया था, लेकिन मुग्दल ऋषि ने भगवान राम एवं सीता को अपने ही आश्रम में आने का आदेश दिया। ऋषि की आज्ञा पर भगवान राम एवं सीता स्वयं यहां आए और उन्हें इसकी पूजा के बारे में बताया गया। मुग्दल ऋषि ने मां सीता को गंगा छिड़क कर पवित्र किया एवं कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष षष्ठी तिथि को सूर्यदेव की उपासना करने का आदेश दिया। यहीं रह कर माता सीता ने छह दिनों तक सूर्यदेव भगवान की पूजा की थी।

कार्तिक माह शुरू होते ही वातावरण में एक पवित्रता व्याप्त हो जाती है। पर्व शुरू होते हीं चारो तरफ़ छठ के पावन गीतों से एवं रंगीन बिजली, बत्ती से रौशन और सजी हुई साफ-सुथरी सड़कें , घाट संगीतमय हो जाते हैं। पूजा सामग्रियों से दुकानें सज जाती हैं। जो महिला या पुरूष व्रत करते हैं उन्हें परवैतिन और व्रती कहा जाता है। वे इस माह में शुद्ध शाकाहारी भोजन ही लेते हैं। छठ शुचिता और शुद्धि का पर्व तो है ही साथ ही इसके साथ भाईचारे का संदेश भी अन्तर्निहित है तभी तो इस पर्व में जिन पूजन सामग्रियों की जरूरत पड़ती है, वे समाज के सभी वर्गों के द्वारा उपलब्ध करायी जाती हैं। जैसे बिभिन्न वर्गों में हरिजन से सूप-दौरा , कुम्हार के यहां से दीया, कलश, मिट्टी के बर्तन, माली के यहां से सूपाड़ी- पान-फूल, पनसेरी के यहां से रोली, सिंदूर, बिंदी,आरता, बजाज के यहाँ से साड़ी- कपड़ा, चूड़ीहारे से चूड़ी-लहठी, मुस्लिम के यहां से फ़ल, नारियल, किसान का उगाया हुआ गेहुं, चावल, दाल, अनाज , सब्जियां, गौ-पालकों के यहाँ से गाय का दूध, घी इत्यादि जुटा कर ही इस व्रत को सम्पन्न किया जाता है। सड़कों, नदी- तालाब के घाटों की सफाई हफ्तों पहले शुरू हो जाती है जहाँ सूर्यदेव को अर्घ्य दिया जाता है। मिट्टी या नई इंटों से चूल्हे बना कर, आम की लकड़ी की आँच पर ही प्रसाद बनाया जाता है।

इस व्रत में इतने नियम और वर्जनाएं हैं कि पहले यह चार दिनों का कठिन व्रत परिवार के बड़े-बुजुर्गों द्वारा ही ठाना जाता था। देखा है मैंने अपनी दादी, माँ, बुआ, चाची या अन्य बुज़ुर्ग महिलाओं को छठ करते। दादी के बाद नियम कुछ ढीले हुए। एक तपस्या ही होती है यह। पूरा कार्तिक माह शुद्ध शाकाहारी खाना, (कहीं बिना लहसुन-प्याज का भी) बनता। प्रसाद बनाते समय या पूजा करने के लिए बिना सिलाई किया हुआ कपड़ा, सिर्फ़ एक साड़ी या धोती ही पहनी जाती। अर्थात प्रसाद भी बनाने का नियम है तो वह निर्जला एवं एकवस्त्रा हो कर।

अर्घ्य या पूजा के समय भी पीले रंग में रंगी हुई साड़ी या धोती, एक ही वस्त्र पहनने का नियम होता था पहले। कोई दिखावा नहीं, आडंबर नहीं। जमीन पर कंबल चादर बिछा कर सोना पड़ता । किंतु अभी बहुत कुछ बदल चुका है। अपनी सुविधा और सहूलियत के अनुसार बहुत बदलाव भी आया इस पर्व में जो आपको स्पष्ट ही कहीं भी किसी छठ के घाट पर दिख जाएगा। वैसे लोग अब भीड़-भाड़ से बचने के लिए अपने घर की छतों या बगानों में थोड़े पानी में भी खड़े हो कर शांतिपूर्वक अर्घ्य देने लगे हैं।

अमावस्या के छठे दिन नहाय खाय के दिन, नाखून काट कर सर धो कर नहाने के पश्चात ही अरवा चावल, कद्दु डाल कर बनी हुई चने की दाल, आलू-गोभी की सब्जी, धनिया की चटनी, बचका खा कर शुरू किया जाता है यह व्रत। शाम को फिर वही निरामिष भोजन।

दूसरे दिन इसे खरना या लोहण्डा भी बोला जाता है। इस दिन केवल शाम को एक समय सूर्य की पूजा कर के प्रसाद चढ़ा कर भोजन किया जाता है। बाद में व्रती की छोड़ी हुई जूठी थाली का भोजन और अग्रासन घर के बच्चों को दिया जाता।

बहुत जगह खीर ,रोटी , चावल के आटे का पीठा और केला चढ़ता है प्रसाद में। मेरे यहाँ खरना के दिन अरवा चावल का भात, घर के जांता (चक्की) में कुटी हुई चने की दाल कद्दु और घी के साथ मिट्टी या पीतल की हांडी में पकायी हुई, रोटी, पीठा , गुड़ और दूध चढ़ता प्रसाद में। इस बिना हल्दी मसाले के बने सादा प्रसाद का जो स्वाद होता वह अन्यत्र कहीं पाया नहीं जा सकता। बहुत रौनक होती खरना के दिन प्रसाद खाने के लिए आए श्रद्धालुओं से।

तीसरे दिन शुद्ध धुले सुखाए, घर में पीसे गेहुं के आटे और नये गुड़, गाय के घी से ठेकुआ या खबौनी, चावल के आंटे में, गुड़ और घी मिला कर कसाढ़ बनता जिसकी मीठी खुश्बू से सारा घर मह-मह महकता। सूप में सभी मौसमी फल, मूली, नींबू, सुथनी, गगरा नीबूं, गन्ना, सिंदूर, पान, सूपाड़ी, लौंग, इलायची, जायफल, आरता, धूप-दीप, हुमाद से सजा कर शाम को जल में खड़े हो कर डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। जिसमें परिवार के सभी लोग मित्र, हितैषी शामिल होते हैं। बहुत से लोगों की मन्नत रहती है तो वे पांच- सात ईख को उपर जोड़ कर मंडप बनाते हैं एवं दीप जला कर कोशी भर कर रात्रि जागरण करते हैं घाट पर, या घर की छत पर जहाँ उन्होंने अर्घ्य दिया हो। परिवार की सुख समृद्धि के लिए किया जाने वाला यह व्रत कई बार मन्नत माने जाने के कारण भिक्षा मांग कर भी पूरा किया जाता है। लोग एक दुसरे की मदद करने से पीछे नहीं हटते।

छत्तिस घंटे के उपवास के बाद चौथे दिन पारन की सुबह इस महापर्व को सूर्योदय के समय उगते सूर्य को अर्घ्य दे कर सम्पन्न किया जाता है। एवं उसी सूप के प्रसाद एवं नींबू- चीनी के शर्बत से उपवास तोड़ा जाता है। घाट पर ही उपस्थित श्रद्धालुओं एवं रास्ते भर लोगों को प्रसाद बाँट कर घर लौटना होता है। गगां नदी में बहती नावों में सैर कर रहे यूनीवर्सिटी के छात्रों द्वारा फैलाए गए चादरों तक प्रसाद फेक कर पहुंचाने की होड़। प्रसाद बांटने का आनंद ही कुछ और होता। पारन के दिन स्वादिष्ट और चटपटे भोजन का भी अपना आकर्षण होता है।

छठ पूजा की धार्मिक मान्यताएं भी हैं और सामाजिक महत्व भी है। लेकिन इस पर्व की सबसे बड़ी बात यह है कि इसमें धार्मिक भेदभाव, ऊंच-नीच, जात-पात भूलकर सभी एक साथ इसे मनाते हैं। किसी भी लोक परंपरा में ऐसा नहीं है। सूर्य, जो रोशनी और जीवन के प्रमुख स्रोत हैं और ईश्वर के रूप में जो रोज सुबह दिखाई देते हैं उनकी उपासना की जाती है। इस महापर्व में शुद्धता और स्वच्छता का विशेष ख्याल रखा जाता है और कहते हैं कि इस पूजा में कोई गलती हो तो तुरंत क्षमा याचना करनी चाहिए वरना ऐसी मान्यता है कि तुरंत सजा मिलने का डर भी रहता है।

सबसे बड़ी बात है कि यह पर्व सबको एक सूत्र में पिरोने का काम करता है। इस पर्व में अमीर-गरीब, बड़े-छोटे का कोई भेद-भाव नहीं रहता है। ईश्वर की नज़रों में सभी एक हैं। सब एक समान एक ही विधि से भगवान की पूजा करते हैं। अमीर हो या गरीब, दोनों मिट्टी के चूल्हे पर एक ही तरह का प्रसाद बनाते हैं । बांस के बने सूप में ही अर्घ्य दिया जाता है। गंगा और भगवान भास्कर सबके लिए एक जैसे हैं। छठ एक महापर्व ही नहीं बल्कि अपने आप में एक संस्कृति है, हर किसी को अपनी जड़ों से जोड़ कर रखनें की।

शुभकामनाओं के साथ प्रार्थना है कि छठी माँ एवं सूर्यदेव हम सभी के जीवन को सुख-समृद्धि का वरदान दें।

महुआ

महुआ

महुआ

अभी कुछ दिन पहले कहीं रास्ते से गुज़र रही थी तो एक चिर परिचित गंध को महसूस किया। महुए की वही गंध जो बरसों फिज़ा में घर के आस पास बिखरी होती।और उसके साथ ही याद आई महुए के उस विशालकाए दरख्त की जो घर के सामने वाले पार्क के एक कोने में था। बरामदे में अकेले बैठे बैठे पार्क देखना समय काटने जैसा था। दिन में कुछ खास गतिविधि नहीं रहती लेकिन शाम होते ही पार्क के रंगीन रौशनी वाले फव्वारे चालू होते तो कुछ गिने चुने लोगों की हलचल दिखाई देती। वहां पर घूमने आए लोग उन फव्वारों के साथ तस्वीरें खिंचवाते। ठंड के मौसम में शाम को तमाम् रौशनी के बावज़ूद पार्क में सन्नाटा छाया रहता। फिर भी इलाका बेहद शांत होते हुए भी पार्क के कारण गुलज़ार लगता था।

फागुन चढ़ते ही इलाके की हवा में मीठी मादक सी गंध फैल जाती। आम के पेड़ बौराए मंजरों से भर जाते। ऊँचे नीचे सर्पीले रास्तों के दोनो ओर लगाए गए पलाश, गुलमोहर और अमलतास के पेड़ फूलों से लद जाते। हर फूल की अपनी ख़ूबसूरती। हर पेड़ पूरे साज श्रृंगार के साथ अपनी छटा बिखेरता महसूस होता।

महुआ

सामने पार्क में महुए के पेड़ पर पहले फूल आते और फिर फल। ये फल चैत्र माह तक पकते और पेड़ से टप टप टपकते। इसे बीनने के लिए आदिवासी बच्चों की जमात जुटी रहती। दिन भर वे बच्चे महुआ बीनते वहां नज़र आते। एक खेल के जैसा था यह उनके लिए। एक होड़ सी मची रहती उनमें कि कौन कितना ज्यादा बीन पाया उसकी कमाई उतनी। बहुत लगन से वे बीनते। शुरू में मुझे समझ में नहीं आता था लेकिन बाद में एक दिन उनसे पूछने पर पता चला कि महुआ बीन कर उसे बेचने से पंद्रह बीस रूपए एक किलो के मिल जाते हैं। इस महुए से कच्ची शराब बनती जिसे आदिवासी बड़े चाव से पीते ।यह सिलसिला तब तक चलता जबतक की पेड़ फल से बिल्कुल खाली नहीं हो जाता।

महुआ

जब सारे फल झड़ जाते तो एक सन्नाटा सा फैल जाता उसके चारो ओर और वह विशाल दरख्त बहुत उदास मालूम होता। टेढ़े मेढ़े ऊँचे नीचे रास्तों को निहारता हुआ वह महुआ का पेड़ उन बच्चों का इंतज़ार करता प्रतीत होता जब फिर से उसपर फूल फल लद जाएगें और टपकते हुए महुआ को बीनते हुए बच्चे उसका अकेलापन बाँट लेगें। लगता जैसे अगर एक बार वे बच्चे दिखाई दें तो वह कह सके उनसे कि 'तुम्हारी खाली टोकरियां फिर महुए से भर दूंगा। आना अगले बरस तुम फिर से फागुन में।'

मुर्गा महादेव मंदिर

मुर्गा महादेव मंदिर

मुर्गा महादेव मंदिर

नाम कुछ अजीब सा लग रहा है न सुनने में। मुझे भी थोड़ा अजीब लगा था जब मैंने पहली बार यह नाम सुना था। पश्चिमी सिंहभूम का सबसे चर्चित यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है जिसका अपना धार्मिक महत्व है और लोगों की आस्था है कि यहां मनोकामनाएं पूरी होती हैं। वैसे तो यहाँ बारह महीने पूजा अर्चना होती है लेकिन सावन, कार्तिक और शिवरात्रि के समय लाखों की संख्या में यहां भक्त आते हैं। इतनी महत्ता के बावज़ूद मंदिर परिसर में प्रवेश करते ही अभूतपूर्व आध्यात्मिक शांति महसूस होती है। कोई व्यवसायिकता नहीं, भीड़ भाड़ नहीं। प्रकृति की गोद में शांत वातावरण के बीच पंद्रह फीट ऊँचे प्रपात से गिरते जल का कोलाहल और पक्षियों की चहचहाहट अनुपम समा बांधते हैं। संयोग रहा तो रास्ते में कभी हांथियों का झुंड भी दिखाई दे जाएगा। मुख्यद्वार के बाद एक तरफ अंदर पूजा सामग्री की कुछ दुकानें हैं जहां नारियल, पेड़ा, प्रसाद वगैरह मिल जाता है।

झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम और ओड़िशा की सीमा पर नोआमुंडी शहर से दूर खनन क्षेत्र के मुगा-बेड़ा गांव में स्थित है। टाटा नगर से रेल मार्ग के जरिए नोआमुंडी स्टेशन पर उतर कर सुरम्य रास्तों से होते हुए करीब 10 किलोमिटर दूर पैदल या फिर गाड़ी से यहां पहुंचा जा सकता है।

धरती की सतह से नीचे सीढ़ियों द्वारा उतर कर सामने ही मंदिर है। और मंदिर से लगा हुआ जल प्रपात का ऊँचाई से गिरता और अट्हास करता हुआ जल इस स्थान को अद्भुत सौंदर्य प्रदान करता है। इसलिए पूजा दर्शन के अलावा पिकनिक के लिए भी यह लोगों के आकर्षण का केंद्र है।

सब से हैरान करने वाली बात यह है कि यह एक ऐसा प्राचीन तीर्थस्थल है जहां आदिवासी और ब्राह्मण; दोनों पूजन विधियों का पालन किया जाता है।

मुर्गा महादेव मंदिर

वन ग्राम मुर्गा -बेड़ा में प्राकृतिक तौर पर ठकुरानी पहाड़ियों से निःसृत होने वाले बारहमासी दो मनमोहक जल प्रपात बहते हुए एक कुंड से हो कर आगे नदी का स्वरूप धारण कर लेते हैं। पहाड़ और घने जंगल के बीच प्रकृति की अनमोल धरोहर वाला यह धर्म-पर्यटन स्थल ग्राम नोआमुंडी और जोडा गाँव के बीच में अवस्थित है।

उस जल प्रपात की एक धारा अनवरत मंदिर के गर्भगृह के अंदर शिवलिंग तक बहती है। उस जल से एवं दूध, गंगाजल से अभिषेक करके ही पूजा होती है। बगल में माँ गौरी की भी मूर्ति है। चाहें तो नीचे कुंड में नहा कर भी पूजा दर्शन करते हैं भक्त। मन्नत मांगनी हो तो लाल कपड़े में सूखा नारियल बांधने की प्रथा है और पूरी होने पर उसे खोलने की।

स्थानीय धर्मविदों के मुताबिक़, ‘मुर्गा महादेव’ का शास्त्रगत भावार्थ और अजीबोगरीब नामकरण की प्रचलित कथा भी जिज्ञासापूर्ण है। मुर्गा महादेव नाम मुरुगन तथा महादेव से बना है। द्रविड़ों की भाषा में जिसका अर्थ कार्तिकेय और शिव है। जानकारों का मानना है कि मुर्गा महादेव एक प्राचीन धार्मिक स्थल है। यहां शुरुआत में आदिवासी देवताओं की पूजा अर्चना होती थी। इसके पश्चात कालांतर में यह हिंदुओं के तीर्थ स्थल में भी परिवर्तित हो गया। आज भी यह स्थानीय आदिवासियों और अन्य समुदायों के भक्तों में आस्था का केंद्र बना हुआ है।

मुर्गा महादेव मंदिर

सारंडा जंगल के खनन इलाके में अवस्थित इस मंदिर की स्थापना करीब 100 साल पहले हुई है।

यह मुगा बेड़ा गाँव ओडिसा के क्योंझर जिले का एक पहाड़ी गाँव है जो इन प्राकृतिक खनिज संसाधनों, लौह अयस्क खदानों, सघन वन का धनी यह जिला निर्धन, पिछड़े आदिवासियों की सम्पन्न लोक सांस्कृतिक-धार्मिक विरासत के कारण भी पूरे देश में जाना जाता है। हजारों साल प्राचीन चट्टानों के लिए भी यह पहाड़ी वन क्षेत्र विख्यात है, जो भूगर्भ विज्ञानियों और पुरातत्व के विशेषज्ञों, सर्वेक्षणकर्ताओं के लिए आकर्षण का केंद्र भी है। पुरातत्वविदों के मुताबिक़ ये चट्टानें 38 हजार वर्ष पुरानी हैं, जो कि विश्व की सर्वाधिक प्राचीन है। इन चट्टानों में अंकित गुप्त काल के अभिलेखों के प्रति भी इतिहास में रूचि रखने वालों का गहरा आकर्षण है।

श्रावण मेले और अन्य पर्व पर मंदिर समिति के अलावा टाटा स्टील प्रबन्धन, स्थानीय और आसपास की सेवा समितियां भी भक्तों को , प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से, पेय जल, भोजन, स्वल्पाहार, चिकित्सा आदि सुविधाएं सेवायें प्रदान करने में जुटी रहती हैं।

मुर्गा महादेव मंदिर

मुर्गा महादेव मंदिर की स्थापना से जुड़ी एक कथा किंवदंती भी इस क्षेत्र में प्रचलित है। कहा जाता है कि ग्राम जोडा में रहने वाला एक निःसंतान व्यक्ति संतान प्राप्ति की कामनावश शिवजी की पूजा करने दूरस्थ जगहों पर जाया करता था। एक दिन स्वप्न में उससे शिवजी ने कहा कि, ‘मेरी पूजा के लिए दूर दूर जाने की आवश्यकता नहीं है, वरन पास में ही किसी स्थान पर आराधना करो, तुम्हें संतान की प्राप्ति हो जायेगी।’ फिर अगले दिन उसने ग्राम मुर्गा बेड़ा में शिवजी की पूजा प्रारम्भ कर दी। फलस्वरूप उसकी मनोकामना पूर्ण हो गयी। तब से लोगों की आस्था कायम है।

उसी आस्था के साथ आप सभी को शिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएं।

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ये मोह-मोह के धागे

ये मोह-मोह के धागे

अभी अभी पता चला पहली बार कि आज #internationalcatday है, जो कभी सुना नहीं था। मुझे अपनी बिल्लियाँ याद आ गईं।

8. 8. 2023.

ये मोह-मोह के धागे--

कुछ पारिवारिक विरासत का असर था और कुछ जानवरों के प्रति बचपन से बेटे का लगाव, जिस कारण हमेशा से हीं हमारे घर में रंगीन मछलियां, विलायती चूहे, खरगोश, या कुत्ता पलते रहे। सांपों का विचरण भी आए दिन आमबात थी। यहां तक तो सब ठीक- ठाक चलता रहा।

ये मोह-मोह के धागे

बचपन से यह सुनते आने के कारण कि बिल्ली नहीं पालनी चाहिए, मैं बिल्लियों से हमेशा ही थोड़ी दूरी बरतने वाली, मेरे घर में ये दोनों कब अपने परिवार का हिस्सा बन गए समझ हीं नहीं पाई। बेटे को मुबंई में जागिंग के दौरान सुबह सुबह मिल गए थे दोनों।

दूध भरी कटोरी के साथ एक पेड़ के नीचे कोई रख गया था उन्हें, एक दिन के रहे होंगे शायद। जिन्हें रोड के आवारा कुत्तों से बचाने की नीयत से एक हथेली पर उठा कर वह घर ले आया था कि कुछ दिन के बाद उन्हें छोड़ देगा। लेकिन मोह का बंधन तोड़ना इतना सहज थोड़े न होता है सो रह गए दोनों उसके पास, उबले अंडे और फ्रिज़ में उबाल कर रखे गए चिकन के भरोसे।

ये मोह-मोह के धागे

खुद तो आॅफ़िस के कैंटिन में खाता किंतु घर के फ्रिज में उबले चिकन और अंडो की भरपूर व्यवस्था रहती। दोनों का नाम भी रख दिया गया था बटर-कप और बबल। दो कमरे के फ्लैट में उनके खेलने के लिए विशेष मचान भी बनाया गया। मैं मुबंई जाती तो दोनों हमारा एक-एक बेड सोने के लिए अधिकारपूर्वक चुन लेते। इसी बीच बेटे को अमेरिका जाना हुआ तो दोनों को एक दोस्त के पास रख कर गया लेकिन इसी बीच वहां तीसरे माले की बाल्कनी से गिर कर एक, बबल के रीढ़ की हड्डी टूट गई। अब मुश्किल था उसे सम्हालना फिर भी दोस्त ने डाक्टर, दवा से ले कर हर संभव देखभाल की दोनों की। बेटा जब वापस लौटा तो डाक्टर ने सुझाव दिया कि इसे जहर की सुई लगवा देनी चाहिए। लेकिन उसका मन किसी भी तरह इसके लिए तैयार नहीं हुआ।

उसके बाद सिलसिला शुरू हुआ दवाओं, इंजेक्शन, एक्सरे, सिटी-स्कैन, फिज़ियोथेरापी तक। इन सब के कारण उसकी हालत में धीरे धीरे थोड़ा सुधार तो जरूर हुआ लेकिन अब भी वह पैर घसीट कर ही चलता था। कमर से पीछे के हिस्से ने बिल्कुल काम करना बंद कर दिया था जिससे उसके पिछले दोनों पैर हमेशा छिले रहते और घाव रहता। बहुत उपाय किए गए कि किसी तरह वह थोड़ा भी सामान्य हो जाए।

ये मोह-मोह के धागे

दुबारा फिर जब बेटे के अमेरिका जाने की बारी आई तो हमारे पास नोआमुंडी पहुंचाने की बात कही उसने। ट्रेन की टिकट कटवाने से पहले कर बिल्लियों का वजन करवा कर गार्ड के डब्बे में इन दोनों को जमशेदपुर लाया गया। वजन के हिंसाब से रेलवे में पशुओं का टिकट कटता है। रास्ते में जब किसी स्टेशन पर ट्रेन रूकती तो अपने सहयात्रियों को सामान देखने को कह, दौड़कर बाहर से छः डब्बा पार कर गार्ड के डब्बे में पहुंचता। बिल्लियों को खाना पानी देता और अगले स्टेशन पर फिर से जब ट्रेन रूकती तो अपनी जगह पर दौड़ कर वापस लौटता। खैर, नोआमुंडी से जमशेदपुर के लिए गाड़ी भेजी गई थी जिससे तीनों घर आए। बेटा कुछ दिन रह कर लौट गया और इन दोनों बिल्लियों की जिम्मेदारी अब हमारी हो गई।

मेरे पास जूट की बुनी हुई कम उंचाई वाली दो मचिया ( बैठने का मोढ़ा ) थी। सबसे पहले दो गद्दी सिल कर बज़ाप्ते हमनें उनके सोने बैठने के लिए बेड तैयार किया, जिसे अंदर बाहर कहीं भी रखा जा सकता था।

ये मोह-मोह के धागे

अंडा चिकन का स्वाद इस कदर इनके मुंह चढ़ा था कि कुछ और खाते नहीं थे। घर की हर उठने बैठने की जगह पर अधिकारपूर्वक कब्जा.... बेड पर हमारे पैरों के नीचे ही एक सोता.....दूसरा बहुत मुश्किल से चढ़ पाता या अपनी मचिया पर सोता। समझदारी इतनी ज्यादा कि एक बार जरा बोलने से ही कोई बात समझ जाते बच्चों की तरह। बिल्लियां इतनी ज्यादा समझदार और सहयोगी हो सकती है यह पहली बार हमनें जाना। एक बबल तो बिल्कुल अपाहिज ही हो गया था लेकिन दूसरे बटर कप को इलाके में मशहूर होने में ज्यादा वक्त नहीं लगा। घर की खिड़कियों में जाली लगी थी। हमनें एक खिड़की की जाली का एक कोना मोड़ कर छोड़ दिया था ताकि दरवाजा बंद भी हो तो वह उस कोने से अंदर आ जा सके। उसी कोने से आवाजाही कर वह पूरे इलाके का भ्रमण कर खाने या सोने के समय पर अपनी जगह पर लौट आता। कब जाता, कब आ कर हमारे पैरों के नीचे सो जाता, हमें पता भी नहीं चलता।

दो-तीन दिन के लिए कहीं जाने से आउट हाउस वाले देख लेते लेकिन लंबा जाने पर उन्हें साथ ले जाना पड़ता, क्योंकि खाना पीना छोड़ देते बिल्कुल। उनके साथ उनके बेड-गद्दी के अलावा उनकी सारी व्यवस्था चलती।

ये मोह-मोह के धागे

बिल्लियों की उम्र सामान्यतः सात-आठ साल होती है। ऐसे ही में बाहर काॅलनी घूमने के दौरान एक दिन किसी विषैले सांप ने बटर कप को काट लिया, जिसके दांतों के निशान उसके शरीर पर गड़े मिले। घर तक पहुंचने की कोशिश में गेट पर पहुंचने से थोड़ा पहले हीं उसके प्राण निकल गए थे। बहुत चंचल था....उसके नहीं रहने से घर की सारी चहल पहल शांत हो गई। एक उदासी छा गई घर में। बबल भी अकेला हो गया बिल्कुल।

अब हम बच्चे की तरह ज्यादा देखभाल से दूसरे की हिफ़ाजत करने लगे। अपाहिज होने के चलते बहुत काम बढ़ गया था उसके साथ। उसकी मरहम पट्टी करने से ले कर नहलाना धुलाना तक हर काम। घाव पक जाता तो दवा को पाउडर कर दूध में मिला कर देते। तबीयत ज्यादा बिगड़ती तो पेशाब की जगह खून आने लगता। उसका बेड अपने बेडरूम में रखना पड़ता रात को।

ये मोह-मोह के धागे

दिन ऐसे हीं निकलते रहे। रिटायरमेंट के बाद जब बंगलोर आने की बात हुई तो उसके कारण हमनें गाड़ी से आना तय किया। लोगों ने बहुत कहा कि हमें इसे किसी संस्था में दे देना चाहिए जहां इसकी देखभाल हो जाए। लेकिन कैसा लगाव हो गया था कि इस बारे में सोंच भी नहीं सके। तीन दिन के सफ़र में उसके लिए रास्ते में किसी होटल से उबला अंडा और चिकन खरीदने के बाद उसका मसाला धो कर उसे खिलाना पड़ता।

रास्ते में नेल्लौर में एक होटल में ठहरने के दौरान वहां के एक बेयरे ने बहुत मिन्नतें की कि "सर मुझे दे दें। मेरे पास दो बिल्लियां और हैं लेकिन हम नहीं छोड़ पाए उसे।" एक जगह शाम ढलने के बाद सन्नाटे में हमनें सड़क के किनारे गाड़ी रोक कर जैसे ही उसे उतारा, न जाने कहां से उसे इतनी फ़ुर्ती आ गई कि पूरी ताकत से सीधे जंगल की ओर झाड़ियों में भागा और लापता हो गया। बहुत देर तक इधर उधर ढूंढने के बाद ड्राईवर ने, जो साथ था परेशान हो कर कहा - "सर रात हो रही है।अब नहीं मिलेगा, चलना चाहिए।" अब हमारे सामने बहुत विकट स्थिति खड़ी हुई ; इन्होंने तेज-तेज आवाज़ में दो तीन बार उसका नाम लेकर पुकारा तो अंधेरे में उसकी आंखें चमकीं और ड्राईवर उसे पकड़ कर लाने में सफ़ल हुआ।

ये मोह-मोह के धागे

महाराष्ट्र से शुरू हुआ उसका सात राज्यों, बिहार, झारखंड, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडू , कर्नाटक तक का सफ़र खत्म हुआ बंगलोर पहुंच कर। गौर कीजिएगा, जबकि ट्रेन से उसने जिन राज्यों को पार किया वह नहीं जोड़ा है मैंने ।

यहां बंगलोर से भी महीनों के लिए बाहर जाते तो कामवाली को घर की चाभी देकर और उसके लिए खाने की व्यवस्था कर के जाते। वह दोनो समय आ कर खाना देकर साफ़-सफ़ाई कर जाती। अंदर से जख्मी उसके शरीर की हालत दिन ब दिन बिगड़ती जा रही थी। आखिरकार उसका अंत निकट आया और मैं जब पटना में थी तभी मेरे पीछे में उसनें दम तोड़ा। उसे अपनी तकलीफ़ो से मुक्ति मिली यह ख़बर इन्होंने फोन पर मुझे दी। बेटे के पास दो साल एवं हमारे पास चार साल, इसी हालत में हमनें उसे सम्हाला ।

ये मोह-मोह के धागे

ये निरीह मूक जानवर भी किस तरह हमारे जीवन में भावनात्मक रूप से जुड़ जाते हैं, यह हम पहले से नहीं समझ सकते। बंगलोर आने के एक साल बाद बिल्कुल वैसी ही एक तीसरी बिल्ली ने आना जाना शुरू किया था। श्रिका खुश होती इसलिए मैं उसे खाना- दूध देने लगी। मुझे लगा जैसे हमलोगों से लगाव के कारण बबल पुनर्जन्म ले कर आ गया है, बिल्कुल वैसा ही रंग-रूप, उतना ही अधिकार पूर्वक। लेकिन दो साल तक आने के बाद शायद वह भी किसी हादसे का शिकार हो गया और उसका आना बंद हो गया।

यहां शुरू से सड़क के एक क्राॅस ब्रीड के कुत्ते ने घर को अपना शरणगाह बनाया हुआ है। क्राॅस ब्रीड है इसलिए खूंखार भी बहुत है। मौका मिलने से अपनी वफ़ादारी निभाना भी नहीं भूलता। अच्छा लगता है गेट पर उसका होना।

ये मोह-मोह के धागे

तस्वीरों का श्रेय मेरे पशुप्रेमी पुत्र महाराज को जाता है।

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रंगमा

रंगमा

# अंतराष्ट्रीय घरेलू कामगार दिवस

रंगमा

रंगम्मा...

उसके माता पिता ने

उसका यही नाम रखा होगा

या उसकी अपनी भाषा में

शायद इसका बहुत सुन्दर अर्थ हो

मै उसे रंगमा हीं बुलाती और ऐसा लगता

जैसे किसी ध्वनि तरंग को छेड़ दिया गया हो

बिना नागा ,हर सुबह अपने समय पर

जिम्मेदारी की उर्जा से भरी

हंसती हुई, मेरे दरवाजे पर हाजिर हो जाती

अपनी युवा होती बिटिया को

मदद के लिए साथ लाती,

या कभी उसे अकेले भी भेजती

परंतु मुझे अच्छा लगता उसका भी साथ आना

चार पांच भाषाओं की जानकारी रखती

इस लिए उसके साथ

बात करना कठिन नहीं लगता

ईमानदारी उसमें कूट कूट कर भरी होती

इसका बेहिचक प्रचार कर आत्मसम्मान से

उसकी सुदृढ़ काठी और तन जाती ...

ज्यादातर काम वालियों को देखा है मैंने

परिवेश के अनुसार पहनावे को अपनाते हुए

जहाँ से जो मिल गया

उसी की आदत वे डाल लेतीं

परंतु कायल हुई मै इसकी

जीवन की ढलती दोपहर में भी

धुन की पक्की, अत्यंत सुघड़

अलग अलग रंगों वाली साफ,सिंथेटिक साड़ियाँ

पहन कर आती रोज

पैरों में चांदी के मोटे कड़े

घुंघराले कसे बाल

नाक में बड़ी सी सोने की लौंग

कानों में सोने के कर्णफूल

पीले धागे में गुंथा सोने का

चौकोर सिक्के जैसा लाकेट वाला मंगलसूत्र

जिसे वह हमेशा अपने

आँचल के नीचे छुपा कर रखती

उसके व्यक्तित्व और साँवले रंग पर खूब जँचते

वैसे तो उसके आने से

उसके गजरे की खुश्बू से मेरा घर महकता

कभी नहीं होने से

मैं हंस कर पूजा से उतारे गए गुलाब

उसके कसे जूड़े में खोंस देती

वह दिल से खुश हो जाती

मैं भी उसकी ये खूबियां

अच्छी तरह से समझने लगी थी

न किसी चीज का लालच

न कभी कोई अपेक्षा

मेहनत कर गुजारा भर कमा लेती

हाँ, जितना करती उतने के पाई पाई का

हिसाब रखती

जो मिल जाता उसे सर आँखों पर लेती

कोई कुछ कर दे तो

उसकी कद्र करना नहीं भूलती

धीरे धीरे वह,

मेरे घर की दिनचर्या में गहरे पैठती गई

और करती गई मुझे आश्वस्त भी

क्यों कि उसका आना

लगभग तय ही होता

ये रगंमाएं

अपने कन्धों पर

कई घरों के झाडू पोछा ,रसोई,

कपड़े,बर्तनों की सफाई का दारोमदार,

उठाये फिरतीं

हमारे जीवन का एक अहम हिस्सा बन कर

सुखी गृहस्थी की औषधि की तरह

हमारी चौखट पर अपनी उम्र तब तक काट देतीं

जब तक अपनी काया से

थक कर हार नहीं जातीं

फिर खो जातीं कहीं

गुमनामी के अन्धकूप में

बिना कुछ कहे अपने पीछे छोड़ जाती हैं

हमारी ड्योढ़ी पर एक रिक्तता

एवं

अपने होने और नहीं होने के बीच

फर्क का सवाल

जिसका उत्तर पा लेते हैं हम

ढूंढ कर फिर से एक नई बाई

और कर लेते हैं पूर्ववत

अपनी दिनचर्या सामान्य

शुरू हो जाता है

एक नया अध्याय फिर से

जैसे कुछ हुआ ही न हो ...!

वह ख़ौफ़नाक रात

पतिदेव की नौकरी के पैतीस वर्ष गुजार कर, जिदंगी के इस दौर में जब पीछे मुड़ कर देखती हूँ, तो याद आती हैं वो तमाम घटनाएं और हादसे जिनसे जब तब दो चार होते रहे हम उन दिनों।

टाटा स्टील के कोलियरी डिविजन में एक लंबा समय गुजारने एवं बाद में झारखंड - उड़ीसा बार्डर के पास नोबामुनडी में मेरे पति की पोस्टिंग हो गयी। यहाँ टाटा स्टील के माइंस डिविजन का हेडक्वार्टर था।

धनबाद माफिया और क्रिमिनल के लिए बदनाम था तो आयरन माइंस आदिवासी इलाका में था जहां धरना-प्रदर्शन और आदिवासियों की छोटी बड़ी मांग और पूरा नहीं होने पर काम बन्द कर देने की धमकी।

हमारा सामना अक्सर ऐसी परिस्थितियों से होता रहा जिसको याद करने से सब कुछ अब कहानी के समान प्रतीत होता है।

बात 1992 की है, मार्च महीने की चौबिस तारीख ,कृष्ण पक्ष का पखवारा। धनबाद से बीस किलोमीटर दूर हमलोग कोलियरी की जिस कालोनी में रहते थे, जहां कुछ फ्लैट, और बंगलों के अलावा कुल तेरह बंगलों की एक अलग कालोनी और थी जहां सीनियर अफ़सरों के बंगले हैं। जो रास्ता उसमे अंदर जाता था उसमें दोनो तरफ बंगले हैं और आगे इस रास्ते को बंद कर दीवार उठा कर ऊपर से कंटीले तारों से घेर कर बंद कर दिया गया है, जिस कारण यहां आने जाने के लिए एक ही रास्ता है।

रास्ते की शुरुआत में बायें तरफ का पहला बंगला मेरा था जहां हमारे उस घर में जाने से पहले दो बार पहले डकैती हो चुकी थी। ऐसे ही एक बंगले में पहले भी रह चुके थे हम, जिसमें डकैती होने के कारण कोई जाता नहीं था। यहां पर मेरे सामने का बंगला जिन साहब का था वह अपनी लाइन में शुरू का तीसरा बंगला था। उस कालोनी में तीन तरफ से रास्ते थे। एक पीछे फ्लैट्स की तरफ, दुसरा मुख्य रास्ता जो बाज़ार की तरफ जाता था और तीसरा कच्चा रास्ता था मेरे घर के पीछे, जंगलों के बीच से।

हमारा और सामने वाले बंगला का गेट बिल्कुल आमने सामने था एवं बीच में एक शेड बना हुआ था, जहां तीन शिफ्ट में वॉचमैन की ड्यूटी लगी होती। रात में सिक्युरिटी की पेट्रोलिंग जिप्सी बारह बजे एवं पुलिस थाने की पेट्रोलिंग जीप दो से तीन बजे के बीच में चक्कर लगाती। कालोनी की पिछली दीवार से हो कर कतरी नदी बहती थी, जो कि एक बरसाती नदी थी और बारिश के मौसम में बिल्कुल उफान पर होती। 1995-96 में भारी बारिश के कारण पूरी नदी का पानी वहां पर की एक सरकारी कोलियरी, गजलीटाडं की कोयला खदान में समा गया था, जिस कारण 72 खनिक जो उस समय अंदर अपनी ड्यूटी पर थे, उनकी जल समाधि हो गई थी। भारी बारिश के कारण पूरे जिले की खदानों मे पानी भर जाने से जहां तहां की मिट्टी धंसती गई और न जाने कितने घर जमीन में समा गए तब। ऐसा ही एक हादसा उससे पहले चासनाला खदान में भी हो चुका था जिस पर "कालिया" फिल्म भी बाद में बनी थी।

बात हो रही थी भेलाटाडं की ,जहां मेरे घर के पीछे लगभग जंगल ही था और नदी तक जाने के लिए कच्ची पगडंडी, जिसका इस्तेमाल नदी के उस पार रहने वाले आदिवासियों में इक्का दुक्का लोग ही करते थे या फिर शायद गैरसामाजिक तत्व। वैसे भी सांप बिच्छूओं का बसेरा था उधर। मेरे घर में तो जिस दिन सांप नहीं निकलता उस दिन लगता मानो कुछ हुआ ही नहीं। मेरे घर की छत पर पीछे की तरफ बड़े बड़े हैलोज़ेन बल्ब लगे हुए थे रोशनी के लिए। हम महिलाएं रात 10 -11 बजे तक आराम से आपस में मिलते घूमते जब हमारे पति, हेड आफिस, मिटिंग के लिए गए होते। इतना कुछ होने के बावज़ूद जिदंगी बेफिक्र गुज़र रही थी। शांत जगह, सभी लोग अपने परिवार के जैसे।

24 मार्च की रात हमलोग बच्चों के स्कूल के लिये सुबह की तैयारी कर के सो गए। हमारे गेट में ताला लगा दिया जाता था, जिसकी एक चाभी आउटहाउस वाले के पास रहती और दूसरी हम रखते। बेडरूम सामने सड़क की तरफ था, पर्दा हटा कर हम बीच में उठने से झांक भी लेते कि वॉचमैन कहां है। रात बारह बजे सिक्युरिटी की गाड़ी पेट्रोलिंग के लिए आई और घूम कर चली गई। हमारी भी आंख लग गई थी कि तब तक अचानक वॉचमैन के चीखने की आवाज़ सुनाई दी "मार देलक.....मार देलक...मार देलक...जान गेल....जान गेल" ....मेरे पति और मैं दोनों ही एक साथ चौंक कर उठ बैठे ...वॉचमैन की चीख पुकार के साथ ही न जाने कैसी कैसी मिली जुली, चीखने चिल्लाने की तेज आवाजें आने लगी...जरा सा पर्दा हटा कर झिरी से झांका तो जो सामने देखा वह दृश्य लहु जमा देने के लिए काफी था....करीब बीस से तीस वर्ष के बीच के 25 - 30 डकैत चेहरे पर तरह तरह के रंग रोगन पोते हुए, हाथों में भाला, बरछी, पेड़ों के बिल्कुल हरे तने, छड़ियों के रूप में पकड़, सामने बंगले में दौड़ते भागते नज़र आए ..गोलियों की आवाज़ें भी आने लगी थी

मेरे पति तो पल भर में पूरा माजरा समझ कर मुझे बच्चों को अपने कमरे में लाने कहा जो दूसरे कमरे में सो रहे थे और दोनों बच्चों के साथ जमीन पर लेट जाने को कहा क्योंकि जो गोलियां वहां चलने वाली थी ,वह सीधे खिड़की से अंदर आ कर हमें लग जाने का खतरा था....फिर सिक्यूरिटी कंट्रोल रूम को अंधेरे में फोन लगाने लगे .... हम लाइट नहीं जला सकते थे , क्योंकि डकैत बिल्कुल सामने थे। उस पर मुश्किल यह कि इंटरनल फोन, जिसका एक सेट ड्राइंग रूम में भी था ,जो नंबर डायल करने से साथ साथ तेज आवाज़ में टिनटिना रहा था और उसकी आवाज़ बाहर जाने का डर था, खैर चार डिज़िट के नम्बर को अंधेरे में टटोल कर बिल्कुल धीमी आवाज़ में इन्होंने कंट्रोल रूम को स्थिति बताई और उसे ही पुलिस थाने को भी खबर देने को कहा.... थाना थोड़ा दूर था...भारी बोल्डरों (पत्थरों) से डकैतों ने सामने के बंगले का मुख्यद्वार तोड़ दिया था......गृहस्वामी नींद से जाग कर जबतक पूरा माज़रा समझ पाते तब तक तो डकैतों ने लकड़ी के कुंदों से मार कर बुरी तरह उन्हें और उनके बेटे को घायल कर दिया था......और जो कुछ भी ले जा सकते थे वह लूटपाट किया ...वहां का एक- एक स्विचबोर्ड तक उन्होंने तोड़ डाला था तो बाकी तो कुछ कहने को बचा ही नहीं...उन साहब की पत्नी तो पीछे के दरवाजे से पीछे फ्लैट्स थे, उधर भागीं....उनका अगला निशाना था बगल वाला दूसरा बंगला जहाँ उसी गैंग के कुछ लोगों ने धावा बोला और वहाँ भी बोल्डरों से दरवाज़ा तोड़ कर लूटपाट मचाई....जब तक डकैतों ने दरवाजे को तोड़ने की कोशिश की तब तक वहां से जिनका घर था वो साहब पत्नी समेत कभी आलमारी, तो कभी तख्त दरवाजे पर खिसका कर डकैतों को रोकने की कोशिश करते रहे..... लेकिन कहां ये दोनो पति पत्नी, और कहां वे आठ दस डकैत। आखिरकार वे साहब तो पीछे की दीवार फांद कर पीछे कूद गए जिस कारण उनका एक पैर टूट भी गया।

पीछे की दीवार में दरवाजा तो था लेकिन ताला बन्द होने के कारण आतंकवश चाभी खोज नहीं पाये।

इधर उनकी पत्नी बच्चों समेत घर के रसोई के दरवाजे से सामने की सड़क पर बाहर निकल आईं, जिसे डकैतों ने देखा नहीं क्योंकि वे बंगलों में लूटपाट में मशगूल थे..... कल्पना करना भी रोंगटे खड़ा कर देता है कि मध्य रात्रि में सूनी सड़क पर डकैतों के तांडव के बीच दो अबोध बच्चों का हाथ थामें स्तब्ध खड़ी पचीस साल की युवती ...साथ ही साथ डकैतों ने एक नंबर के बंगले में बत्ती जलते ही आतंक फैलाने के लिए वहां के लाॅन में बम फेंक दिया।

गोलियां चल रही थी और हम सभी निहत्थे लोग बाहर नही निकल पाने के लिए विवश थे....वाॅचमैन का गमछा मेरी दीवार पर पड़ा था ।उसने जान बचाने के लिए मेरे लाॅन में कूदने की कोशिश की थी जिसे डकैतों ने पैर पकड़ कर खींच लिया था। इसी बीच शोर गुल सुन कर पीछे फ्लैट एरिया में रहने वाले हमारे सिक्युरिटी आफिसर अपनी पिस्तौल लिए रात के कपड़ों में ही नींद से उठ कर बाहर निकल आए.... दूसरी तरफ से कंट्रोल रूम की गाड़ी भी पहुंच गई। यह देख मेरे पति भी बाहर निकल कर सामने वाले साहब के बंगले में भागे....देखा मुख्य दरवाज़ा सर कटे हुए सिपाही की तरह धराशायी पड़ा था एक तरफ....अंदर दोनो पिता- पुत्र बुरे हाल में पडे थे- खून बहुत बह चुका था ....बाहर वाॅचमैन की तो कई जगह से हड्डियां टूट चुकी थी, वह तो लगभग खतम ही हो चुका था..... दीवार पर खून के बड़े बड़े धब्बे थे...उसका सर पकड़ कर उन्होंने दीवार पर दे मारा था.... तुरंत एम्बुलेंस को फोन किया गया।

इधर दो तरफ से घेर कर सिक्युरिटी के लोगाें ने फायरिंग शुरू कर दी थी । उधर से डकैत भी लगातार गोलियाँ चला रहे थे , लेकिन दो तरफ से घिर जाने के कारण मेरे घर के पीछे जो खुला जंगली रास्ता था, वो उधर से ही गोलियां दागते हुए भाग गये.... आए भी थे उधर से ही। इधर एम्बुलेंस से घायल लोगों और वाॅचमैन को तत्काल ही अस्पताल भेजा गया। ख़ैरियत यह कि, समय से इलाज शुरू हो जाने से और डाक्टरों की मुस्तैदी से सभी लोग खतरे से बाहर हो गए।

इस पूरे घटनाक्रम को डकैतों ने केवल दस मिनट में अंजाम दिया ....दो घरों में लूटपाट, गोलीबारी, बम फेंकना और लूटे गए जेवरात,रूपये और अन्य सामान के साथ भागने में सफल हो जाना। अगर मेरे गेट में उस रात ताला नहीं लगा होता तो उन डकैतों का एक शिकार हम भी हो गए होते। इस घटना ने पूरे धनबाद और जमशेदपुर को हिला कर रख दिया था।

हांलाकि एक महीना के अंदर उस गिरोह के दो तीन लोगों को पकड़ लिया गया। इस घटना के बाद पूरी कालोनी को कटीले तारों से घेरवा दिया गया और सुरक्षा व्यवस्था बहुत कड़ी कर दी गई। लेकिन इस घटना का असर ऐसा हुआ कि बाहर बंदूकधारी गार्ड्स , डाॅग स्क्वायड और पुलिस की लगातार पेट्रोलिगं के बावज़ूद हम महीनों ठीक से सो नहीं पाए थे....पत्ता भी खड़कता तो चौंक कर जाग जाते।

वैसे भी चुकि मेरे घर के पीछे वाला कच्चा रास्ता अपराधियों के आने जाने का ही था , देर रात कहीं से आते जाते मेरे घर के पीछे उनके गुज़रने का आभास होता। उसके बाद ड्यूटी पर तैनात वाॅचमैन की दौड़ पुकार मचती...उनकी सीटियों की आवाज़ें गूंजती....पकड़ो मारो का शोर गूंजता......सिक्युरिटी और थाने की पुलिस आती और फिर सबकुछ शांत और सामान्य हो जाता।

उस डकैती वाले घटना के बाद भी डकैतों ने धावा बोला, गोलियां चलीं पर हमारी कालोनी कंटीले तारों से घिर जाने और गनमैन के पोस्टिंग एवं उनकी मुस्तैदी के कारण, डकैत फिर कभी सफल नहीं हो पाए।

डकैतों का आतंक तब बन्द हुआ जब एक डकैत डकैती के प्रयास में घिर गया और जवाबी कार्रवाई में हमारे कालोनी से सटे, बन्द पडे ,पावर हाउस के कंपाउंड में मारा गया।

आज वह घटना याद आती है तो एक डरावना सपना सा लगता है, लेकिन तब यह कितना सामान्य लगता था। जब कुछ हुआ तो कुछ दिन की गहमा-गहमी और फिर जीवन पटरी पर। सब कुछ पहले जैसा। शायद यही कारण रहा कि हमलोग अवसर उपलब्ध होने के बावज़ूद भी न किसी दुसरे कालोनी में गए, न दुसरे बंगले में। हम वहां से 11 साल बाद तभी हटे जब हमारा ट्रांसफ़र जमाडोबा हो गया।

वह तब की होली

वह तब की होली

खूब याद है वो बचपन की होली, रंगों से भरी पिचकारियां, महीने भर पहले से नए कपड़े सिलाने की धूम, पटना जंक्शन के पीछे का एक दर्जी जो मलमल के कुर्ते हाथ से सिलता था, उसके जिम्मे कपड़ा लगाना ताकि वह समय पर तैयार कर दे, उसके बाद धोबी की ड्यूटी होती जो उन कुर्तों पर अबरक मिला हुआ कलफ चढ़ा कर प्रेस करता और बांह पर गेलहा अर्थात एक तरह की किसी चिकनी चीज से चुन्नट करता, यह नफ़ासत की निशानी होती।अब तो धोबियों का यह हुनर गुम होता चला गया या उसकी मांग करने वाले लोग ही शायद उसे भूल गए।

दादी, माँ, बुआ, चाची के लिए पतली कोर वाली सफेद सूती साड़ियां, जिन्हें पीले रंग में अबरक मिला कर रंगवा दिया जाता था, जो साड़ियों पर सितारे की तरह चमकते थे.....मन हो तो बहुएं अपनी अपनी साड़ी में गोटा भी लगा लेती थीं....बच्चों में लड़कियों के कपड़े एक थान से बनते और लड़कों का एक तरह का कुर्ता पैजामा।बाद में पापा का काम के सिलसिले में लखनऊ आना जाना बढ़ा तो सब के लिए वहीं से लखनवी चिकन के कपड़े,साड़ियां, वगैरह आने लगे और पुरानी परिपाटी में एक बदलाव आया।खैर तैयारी पूरी होते होते होली का दिन आ जाता, पूर्णिमा की शाम होलिका दहन के लिए महीनों पहले से किसी खाली मैदान या चौराहे पर लकड़ियां जमा की जातीं, जिसे मुहल्ले के लड़के मिल कर करते।

हिंदी कैलेंडर का वर्ष होलिका दहन के बाद ही बदलता है, जिसे संवत जलना कहते हैं, वैसे ठेठ बोली में अगजा जलना भी कहा जाता है।जिसके लिए हर घर से लकड़ी, गोयठा जो भी मिले उसे अग्नि में समर्पित किया जाता है, लोगों के घर के बाहर गलती से पड़ी रह गई कुर्सी, टेबल, चौकी जो भी बाहर पड़ी मिल जाए, रातोंरात गायब हो जाते, और दूसरे दिन होलिका के लिए जमा किए गए लकड़ियों के ढेर में टूटी फूटी हालत में मिलते.....मुहुर्त होता है होलिका जलने का जिसके पहले उसमे बिना नमक की बेसन की बड़ी, पकौड़ी डाली जाती है, और कढ़ी चावल बनता.... अर्थात पिछले साल के जितने ग्रह गोचर हैं उन्हें अग्नि में जला कर हम आने वाले संवत के लिए मंगल कामना करते हैं।हमारे घर से भी वह सब भेजी जातीं.....मुहल्ले के बच्चे उस अलाव में नये आलू पकने के लिए डाल आते.... भले ही वह तड़के किसी और के हाथ लग जाए, या सुबह उन गिन कर डाले गए आलुओं को ढूंढने की मुहीम में उतने आलू न मिलें......फिर तरह तरह की सब्जियों वाली पकौड़ियों, सलाद और धनिये की चटनी से पेट भरने की रस्म पूरी की जाती।

उसके बाद अगले दिन तो मुहल्ले में जो धूम मचती, पुराने कपड़ों के बक्से खोले जाते.... सुबह ही कहीं से किसी गधे को पकड़, उसकी पूंछ में खाली टीन कनस्तर बांध कर, हुड़दंगी टोलियों के, रंग पोटीन पुते आबनूसी चेहरे, उनकी फटी कमीज या कुर्ते से अस्तित्व की लड़ाई लड़ती, लटकती आस्तीन की झूलती बाहें, वस्त्र के बाकी बचे खुचे टुकड़ों पर, चरित्र का विज्ञापन बन कर चमकती, आलू के टुकड़ों पर खोद कर बनाई गई, चोर, 420 के अलंकारों से की गई मुहरबाजी।मालपुए, दहीबड़े, इत्यादि पकवानों से मह मह महकती रसोई और मेहमानों की आवाजाही....सुबह रंगपुते रिश्तेदारों, पड़ोसियों और दोपहर से साफ-सुथरे नए कपड़ों में आने वाले मेहमानों का स्वागत किया जाता....क्या होली होती थी वह और ख़ास कर हमारे घर की।

पापा का यह मानना कि मेहमानों को अगर मटन सींक कबाब नहीं खिलाया तो कैसी होली....कैसी आवभगत, सो सुबह से ही बाहर बरामदे में कबाब की तैयारियों में जुट जाते,पक्की ईंटें पहले से मंगवा कर रखी जातीं, और उन्हें जोड़ कर चूल्हा बनाया जाता.....हफ्तों पहले बांस की खपचियों को छिलवा कर चिकना करवाया जाता......एक स्टाफ मदद के लिए तैनात रहता, जो ऊपर के काम करता..... आखिर दोपहर के खाने तक बनना जो होता..याद है कीमा मिलाते मिलाते पापा की उंगलियां चढ़ जातीं, और तब तक कीमा भी आधा से ज्यादा पक चुका होता बिना आग के ही .....लकड़ी के कोयले पर सिंक रहे कबाब के ऊपर शुद्ध घी डाल कर उसे घुमाते रहना.... घी डाले जाने से जो खुशबू उठती वह दूर दूर तक फैलती.... अंदर आंगन में ठंडाई बनाने की जिम्मेदारी भाई की होती ...जिसके साथ एक और आदमी सिल-बट्टा के साथ लगा होता...मिक्सी में पीसे गए मसालों से वह ताव नहीं चढ़ता या स्वाद नहीं आता ठंडई में...ऐसा समझा जाता ..उसके लिए दूध एक दिन पहले ही उबाल कर ...... फ्रिज में ठंडा होने के लिए रख दिया जाता...साथ ही साथ लकड़ी के चूल्हे पर बड़ी सी देग में मटन भी पकता।माँ, भाभियों के हिस्से बाकी पकवान बनाने और खाने पीने की व्यवस्था करने का काम आता...खैर इधर सब कुछ बन कर तैयार होता और उधर मेहमानों का आना भी शुरू होता...दोपहर के खाने में ज्यादातर पापा,चाचा, भाईयों के मित्रगण होते.... नहाने धोने का कार्यक्रम भी जैसे तैसे पूरा किया जाता।हंसी खुशी रंगों से सरोबार वह दोपहर बीतती।और फिर थोड़ा आराम करने के बाद शाम की तैयारी होती।सफेद मलमल का कुर्ता पैजामा और गोटे अबरक से सजी काॅटन साड़ियों, की छटा देखते ही बनती...हमारे यहाँ की घर की शादियों में एक शहनाई वाले ग्रुप को नियम से हर शादी में बुलाया जाता था बजाने के लिए, जो इस मौके पर अपनी बख्शीश लेने आना, नहीं भूलता....हाजिर हो जाता शाम के वक्त चार पांच लोगों की टीम को लेकर...जब हमलोग नए कपड़ों में बाहर निकल कर बड़ों के पैर पर अबीर डाल कर प्रणाम करते, और टीका लगवाते.....और फिर कुछ ही देर के लिए सही, उसके शहनाई की स्वरलहरी जो हवा में बिखरती वह रास्ते से गुजरने वाले लोगों के कदम कुछ पलों के लिए रोक देती......एक खूबसूरत समां सा बंध जाता।तब उसे जो भी बख्शीश मिलती रही हो, लेकिन हमारे घर की हर होली को वह शहनाई वाला यादगार जरूर बनाता रहा।धीरे धीरे समय बदला और समय के साथ सब कुछ बदलता और सिमटता चला गया।

अब न मां पापा हैं और न कभी वैसी होली लौटने वाली है......2016 में आखिरी होली उनके साथ बीती.....और 2017 की होली सिर्फ पापा के साथ।......अब सिर्फ यादें हैं।

यह ढाई फीट की पिचकारी पापा ने सहर्ष को उसकी तीसरी होली पर मंगवा कर दी थी। इन पुरानी यादों के साथ रंगो और खुशियों से सरोबार रंगीन होली की हार्दिक शुभकामनाएं !

शिकन न डाल जबीं पर शराब देते हुए

शिकन न डाल जबीं पर शराब देते हुए

शिकन न डाल जबीं पर शराब देते हुए

ये मुस्कुराती हुई चीज मुस्कुरा के पिला

अब्दुल हमीद अदम

आलमारी के पीछे बहुत पहले की बनाई हुई मेरी कुछ कलाकृतियां रखी थीं जिस में दो बिल्कुल खराब हो गई थीं। एक कुछ बची रही लेकिन इसका फ्रेम बिल्कुल खराबहो गया है।

# अलग-अलग समय का अलग-अलग फितूर

सुखमनी

सुखमनी

आज श्रीका की चुकमनी दीदी को गए हुए एक महीना हो गया। ऐसा लग रहा था जैसे हमने बेटी को शादी के बाद विदा किया हो। उसके गाँव की एक बुआ यहाँ है जिसके साथ उसे जाना था। अपनी शादी के नाम पर उसने उत्साह में काफी कुछ खरीदारी भी कर ली थी। पैकिंग चल ही रही थी उसकी। जाने के दिन जब सारा सामान कपड़ा वगैरह पैक कर लिया तो रह रह कर उसकी आँखें भर आतीं। सुहानी उसे उसकी बुआ के घर पहुंचाने जाने वाली थी। "दीदी कैसा तो लग रहा है " घर छोड़ते समय रह रह कर उसकी जुबान पर यह बात आती रही। हमारा भी मन काफी भारी हो चला था। पाँच सालों का रिश्ता था उसका इस घर से और हमसे। इन पाँच सालों में वह सिर्फ़ दो बार अपने गाँव गई थी। सुहानी को तो लग रहा था कि उसकी पसंद की हर चीज के साथ क्या कुछ नहीं उसको दे कर विदा करे। रास्ते में खाने पीने के लिए मिठाई नमकीन के अलावा मैंने अंचार के साथ ढ़ेर सारी सत्तु की लिट्टी तल कर दे दी थी, इस हिदायत के साथ कि रास्ते में कुछ भी बाहर से न ले कर खाए। दो-तीन गहनों के अलावा काफी नकद और सामान था उसके पास। मन थोड़ा इसलिए निश्चिंत था कि उसकी बुआ का परिवार भी उसके साथ जा रहा था।

वह आई तो थी श्रीका की देखभाल के लिए लेकिन धीरे धीरे उसने घर के हर छोटे बड़े काम के साथ अपने को जोड़ लिया। श्रीका के साथ दिन भर वह मेरे घर में मेरे ही पास रहती। गज़ब की इच्छाशक्ति थी उसकी। कभी भी किसी चीज के लिए उसके व्यवहार से कोई उतावलापन नहीं झलका। इस कम उम्र में भी बेहद सुलझा हुआ व्यक्तित्व । हमेशा शांत, संयत , विनम्र। फुर्ति तो इतनी थी कि जरूरत पड़ने पर कोई काम शांतिपूर्वक इतना चटपट निपटा लेती कि दूसरे को पता नहीं चलता। किसी चीज के लिए कोई लालच नहीं। इस बात का उसे बहुत ध्यान रहता कि घर में उसके कारण किसी को कोई परेशानी न हो। थोड़ा आदिवासी नाकनक्श थे उसके और उस कारण बहुत फिक्र में रहती कि चेहरा सामान्य दिखे तो सुहानी नें उसे दांत में ब्रीसेस लगवा दिया था और हर महीने उसकी देखरेख के लिए डेन्टिस के पास ले जाती। धीरे धीरे उसका चेहरा ठीक हो गया।

बहुत प्यार से श्रीका को सम्हालती। घर वालों ने दो साल पहले उसका ब्याह कहीं तय कर रखा था। उसके भाई- भाभी का परिवार मेरे घर के पास ही यहां रहता था। पिछले दो महीने से उसकी ट्रेन का टिकट कटा हुआ था। घर में हर दिन उसके जाने की बातें होतीं। कोविड से पहले वह इसी सिलसिले में अपने गाँव गई थी और लाॅकडाउन लगने से एक हफ्ता पहले संयोग से वापस आ भी गई, वह भी तीन दिन का सफर तय कर के अकेली। हम भी तब लाॅकडाउन में सुहानी के पास ही थे । सोसाईटी में बाहर से लोगों का आना बंद हो चुका था। तब कहती " दीदी हम नहीं आते तो आपको कितना दिक्कत हो जाता" ।

अभी भी मन के किसी कोने में था कि शायद वह फिर ऐसे ही किसी दिन अचानक चली आएगी। लेकिन मेरा मन इतना भी स्वार्थी नहीं था। जाते समय मैंने उससे यही कहा कि अच्छे से जाओ...खुशी खुशी शादी ब्याह कर के फोटो भेजना और फोन करना।

उड़ीसा के किसी सुदूर गाँव से वह सच कहूँ तो ईश्वर की नेमत बन कर कर बीस बरस की उम्र में हमारे घर आ गई थी। तीन बहनों और चार भाईयों के परिवार में यह सबसे छोटी थी। उसके घर में थोड़ी बहुत खेती बाड़ी भी थी जिससे खाने पीने की व्यवस्था ठीक ठाक हो जाती।

छल प्रपंच से रहित निष्कपट व्यवहार उसका। घर में हर किसी के लिए जिम्मेदार और फिक्रमंद, कभी भी मेरे या सुहानी के घर को अलग नहीं समझा। हम भी बिल्कुल निश्चिंत हो गए थे। सिर्फ अकेली मैं, एक रोटी खाने में खाती। उसको कितना भी कहती कि तुम बना कर रख दो,, एक रोटी बनाने के लिए क्यों बैठी हो लेकिन उसे गरम रोटी ही सेकना होता। क्यों कि उसे पता था मुझे गरम रोटी पसंद है।

मेरे घर में आती तो श्रीका को देखने के अलावा उसका कोई और काम नहीं था। श्रीका जब प्ले स्कूल जाती तो उसके खाली समय में उसे मैं कुछ भी दूसरा काम बता देती जिसे वह बहुत मन लगा कर खुशी खुशी करती। मसलन कुछ सिलना है, कुछ पेंट करना है, बड़ी-तिलौड़ी डालनी हो, तो हो जाता। कुछ भी नया सीखने की लगन थी उसे।

श्रीका अपनी तोतली जुबान में उसे "चुकमनी दीदी" बुलाती। देखते देखते चार साल बीते और फिर आरिश आ गया जिसकी देखभाल की जिम्मेदारी उसने ख़ुद ब ख़ुद अपने उपर ले ली। आरिश भी बहुत ही घुलमिल गया उससे । इसी बीच सुहानी को कोविड हुआ। उसे उसके घर में अलग छोड़ कर हम सभी अपने घर में लौट आए। अपने बच्चे की तरह उसने श्रीका और आरिश की देखभाल की। उसके साथ रहने से बहुत आसान हुआ दोनों बच्चों को सम्हालना। आरिश तो उसे बिल्कुल छोड़ता ही नहीं था।

सुखमनी

इसी के साथ श्रीका के लिए एक दूसरी नैनी भी आई। लेकिन अब भी दोनों बच्चे उसी के पीछे रहते।

हमारे घर को और हम सभी को उसकी इतनी आदत पड़ चुकी थी कि उसके जाने के बाद एक अजीब सा खालीपन भर गया था माहौल में। सुखमनी के जाने के बाद उसकी जगह पर एक दूसरी नैनी भी फिर आ गई है। हर काम वैसे ही चल रहा है लेकिन उसकी कमी बहुत दिनों तक खलती रही।

हाँ जाने से पहले उसके गाँव से उसकी चाची के गुज़र जाने की ख़बर आई और सुनने में आया कि इस कारण उसकी शादी शायद होली तक के लिए टल जाएगी। सुन कर लगा कि चलो इसी बहाने से अपने परिवार के संग कुछ दिन रह लेगी। कह दिया हमने कि जब भी तुम्हारा दिल आना चाहे कुछ दिन के लिए भी आ जाना। अपनी आँखों में खुशहाल भविष्य के साथ अपनी ज़मीन, अपना आसमान तलाशने के सपने संजोए भारी मन से वह चली गई।

मालूम है मुझे कि किसी एक के भरोसे जीवन नहीं चलता और यह भी जानती हूँ अच्छी तरह, कि काम के लिए तो लोग आते जाते रहेंगे ही लेकिन सुखमनी जैसी लड़की शायद अब नहीं मिलेगी। किसी दूसरी ही मिट्टी की बनी हुई थी वह। उसके लिए यही दुआ है कि जहाँ भी रहे वह खुश रहे।

माला सिन्हा