मैं अब तक जो कुछ भी लिखती रही हूं वह उस विषय की मेरी समझ , जानकारी , तथ्यों का विश्लेषण और उस विश्लेषण से बनी मेरी सोच की प्रस्तुति थी ; परन्तु आज जो मैं लिखने जा रही हूं वह मेरा स्वयं का भोगा ऐसा यथार्थ है जो व्यक्ति को आसन्न मृत्यु का आभास तक करा जाता है ।
उम्र ने भी क्या ख़ूब मेहरबानियां की हैं मुझ पर। सीनियर सिटीज़न की दहलीज पर खड़ी मैं, पांच वर्षों से किडनी का इलाज करा रही हूं। हाई ब्लड प्रेशर, आर्थोराईटिस और स्लिपडिस्क का साथ भी पुराना है। मुझे एहसास है कि पिछले कुछ वर्षों में बीमारियों ने मेरी प्राण शक्ति को बहुत क्षीण किया है।
आज मेरी स्थिति समुद्र के किनारे खड़े उस वृक्ष की तरह है, जिसने पूर्व में समुद्री हवाओं के कितने भी थपेड़े आराम से झेले हों पर अब वेग से उठी ज्वार भाटे की एक लहर भी उसके अस्तित्व को मिटा देने के लिए काफी है। कोरोना मेरे लिए ज्वार भाटे की ऐसी ही लहर की तरह है।
इसी चेतना के साथ कोरोना के इस दौर में अलग थलग और बहुत बच के रह रही थी मैं ।
मेरा और मेरी बेटी का घर पास पास ही है । 700 मीटर की दूरी पर। मेरे बेटी -दामाद सुहानी और ऋषि लॉकडाउन लगने के बाद बड़े आग्रह से हमें अपने घर ले गए थे ताकि हम दूसरों के संपर्क में न आए और कोरोना से सुरक्षित रह सकें। कहीं आना जाना नहीं। किसी बाहरी व्यक्ति से मुलाकात नहीं। घर के कामों के लिए पूरे समय की हेल्पर। कोई मेकैनिक घर में किसी काम से आता तो मैं एक कमरे में बंद हो जाती। डॉक्टर से कंसल्टेशन भी ऑनलाइन ही होता था। इतनी सावधानी के बाद भी मेरी तबियत ख़राब हो गई।
वह 1 सितम्बर की रात थी। दिन में छाती में भारीपन था। एसीडिटी भी थी। लगा गैस के कारण समस्या है। गैस की दवा खाने से कुछ आराम भी हुआ, लेकिन जैसे - जैसे रात बढ़ती गयी मेरी तकलीफ़ भी बढ़ती गयी। सांस लेने में दिक्कत होने लगी। सो पाना तो दूर बिस्तर पर लेट कर रहना भी मुश्किल हो गया। सुबह होते होते यह साफ हो गया था कि मैं किसी गम्भीर बीमारी के चंगुल में फंस चुकी हूं। जल्द इलाज की जरूरत थी।
सुबह होते ही, मैं किडनी के लिए जिन डॉक्टर के इलाज में रहती हूँ , उनसे वीडियो कॉल के द्वारा सम्पर्क किया गया। मेरी हालत देख उन्होंने तुरंत अस्पताल आने की सलाह दी। स्थिति की गंभीरता को समझते हुए हमलोग बिना समय गंवाए अस्पताल के लिए निकल पड़े।
मेरी हालत तेजी से बिगड़ने लगी थी। अस्पताल पहुंचने में 45 मिनट लगे होगें। घर से निकले थे तो लिफ्ट तक चल कर गए थे। बेसमेंट में भी कार तक चल कर गए थे परन्तु रास्ते में मुझे लगने लगा था कि मैं अस्पताल नहीं पहुंच पाऊंगी। बेहद लंबा लग रहा रास्ता किसी तरह तय हुआ। तब तक मेरी सांस और आवाज़ दोनो डूबने लगी थी। मेरी हालत ऐसी हो गई थी कि सामने अस्पताल की इमारत दिखाई दे रही है और मैं डूबती आवाज़ में ऋषि से पूछ रही हूँ कि "ऋषि और कितनी देर?" उन्होंने दिखाया कि "मम्मी जी हमलोग पहुंच गए हैं ।वह देखिए सामने अस्पताल है बस दो मिनट और" वह दो मिनट जिसमें मुझे अपनी सांसों को थाम कर रखने के लिये अपनें आप से संघर्ष करना था।
45 मिनट बाद अस्पताल में कार से उतर कर चलने की ताकत नहीं बची थी। मुझे एक- एक सांस के लिए संघर्ष करना पड़ रहा था। दिल डूबता महसूस हो रहा था। मानसिक रूप से मैं पूरी चैतन्य थी , परन्तु शरीर पर से पकड़ ढीली होती जा रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे मेरी चेतना और मेरे शरीर के बीच की दूरी बढ़ती जा रही है। ऐसी स्थिति में मेरे साथ मेरे दामाद और मेरे पति थे जो बहुत हिम्मत देने वाली बात थी ; क्योंकि मैं ऐसी स्थिति में भी आश्वस्त थी कि चाहे जिस भी हालत में होंऊ पर सब ठीक हो जायेगा।
अब मैं बिल्कुल चल नहीं पा रही थी । डॉक्टर के चैम्बर तक जाने के लिए व्हीलचेयर का सहारा लेना पड़ा। यहां तक तो फिर भी ठीक था। मेरा मन तब बैठने लगा जब डॉक्टर ने कोरोना की आशंका जताई और कोविड टेस्ट के लिए रेसपिरेटरी एमरजेंसी में भेज दिया। एक अटेंडेंट व्हीलचेयर को रेसपिरेटरी एमरजेंसी की ओर ले जाने लगा। मन अनजानी आशंकाओं से घिर गया। लगा यह व्हीलचेयर नहीं , मेरी ज़िन्दगी है जो उल्टी दिशा में चल पड़ी है।
खैर , हम रेसपिरेटरी एमरजेंसी में पहुंचे। यह एक हॉल था जिसमें आठ बेड लगे थे। एक पर मुझे लिटा दिया गया। अन्य सात बेड पर दुसरे मरीज़ कोरोना टेस्ट के लिए लेटे थे। मुझे आक्सीजन लगा दिया गया जिससे बहुत राहत महसूस हुई। मेरी उखड़ती सांस वापस स्थिर होने लगी थी। हम आठों लोगों का एन्टीजेन टेस्ट हुआ और अब परिणाम का इंतजार था।
बेड पर लेटे मेरी कल्पना में मुझे सामने दीवार पर दो दरवाजे दिख रहे थे। एक के परे ज़िन्दगी थी तो दुसरे के परे अंधेरे से भरी सुरंग। इन दो दरवाजों में से किसी एक दरवाजे की ओर मुझे बढ़ना था ।
पर किस दरवाजे की ओर ? यह कोरोना टेस्ट के परिणाम से तय होना था। ज़िन्दगी या ज़िन्दगी के लिए भीषण संघर्ष। मेरे भाग्य में क्या था ? दिमाग सजग था पर जीवन अनिश्चित।
ऐसे में मैं और मेरे अपनें टेस्ट रिपोर्ट का इंतजार कर रहे थे। उसी तरह जैसे बिना किसी गुनाह के कोर्ट केस में फंसे मुलजिम को केस की सुनवाई पूरी होने पर जज के फैसले का इंतजार होता है। सज़ा या बाइज्ज़त बरी वाली मानसिक स्थिति थी ।
टेस्ट रिपोर्ट आया । आठ में से छह लोग कोरोना पोज़िटिव निकले । मैं उन दो लोगों में थीं जिनका रिपोर्ट निगेटिव था । यह मेरे और मेरे अपनों के लिए बहुत राहत वाली ख़बर थी।
जितनी सावधानी और बचा - बचा कर सुहानी और ऋषि ने हमें अपने घर में इस कोरोना काल में रखा था यह उसी का परिणाम था कि मैं कोरोना से बची रही थी। उन लोगों ने हमेशा यह ध्यान रखा कि मैं किसी भी ऐसे व्यक्ति के सम्पर्क में कतई न आ जाऊं जिससे कोरोना लगने की जरा भी सम्भावना हो।
जिन्दगी की आस फिर लौट गयी थी , परन्तु अपनी सांस को वापस पाने का संघर्ष अभी बाकी था। मैं आक्सीजन के बिना एक मिनट भी नहीं रह पा रही थी। अगर वह कोरोना नहीं था तो फिर क्या था ? क्यों रात भर में मेरी ऐसी हालत हो गई थी और कोरोना का संदेह पैदा करने वाले लक्षण आ गये थे ?
कई तरह के टेस्ट , स्कैन, एक्स-रे इत्यादि का सिलसिला शुरू हुआ । यह सब होने के बाद अब कारण पता था। निमोनिया (Bilateral Pheumonia) का भयंकर अटैक तथा उसके कारण कुछ और काॅम्पलीकेशन। हार्ट भी प्रभावित था। ठीक से खून पम्प नहीं कर पा रहा था
जल्द इलाज की सख्त जरूरत थी पर अस्पताल में एक भी बेड खाली नहीं था। एडमिशन हो ही नहीं पा रहा था। बेड की कमी के कारण मरीज लौटा दिए जा रहे थे। मेरे डॉक्टर भी परेशान थे। एडमिशन हो तब तो कायदे से इलाज शुरू हो सके।
बेड उपलब्ध होने का इंतजार करती मैं रेसपिरेटरी एमरजेंसी में ही कोविड मरीजों के बीच करीब दस घंटे पड़ी रही। इस बीच वहां कितने ही मरीज कोरोना टेस्ट के लिए आते जाते रहे। मेरे जैसा एक कोरोना नेगेटिव मरीज का उस माहौल में इस तरह घंटो पड़े रहना बहुत ख़तरनाक और पीड़ादायक था।
यह शहर के एक बड़े और नामी अस्पताल का हाल था तो सामान्य अस्पतालों में मरीजों का क्या हाल होता होगा यह विचार अचानक दिमाग में कौंध गया और मन अवसाद से भर गया। यहां गम्भीर हालत के मरीज भी बेड के अभाव में लौट रहे थे। कोरोना फेज़-2 के कारण मरीजों की संख्या में हुई अप्रत्याशित वृद्धि ने जो स्थिति पैदा की उसकी मैं भुक्तभोगी थी। अस्पताल की भी अपनी मजबूरी थी। उनकी भी अपनी क्षमता और सीमाएं हैं , यह मैं समझ रही थी ।
साढ़े नौ बजे रात में बेड खाली हुआ और एक कमरा मिला तब मेरा एडमिशन अस्पताल में हो सका। 2 सितम्बर को एडमिट हुई थी और अपनों की दुआओं से 8 सितम्बर की रात को डिस्चार्ज हो कर घर आ गई।
अस्पताल में जिस तरह से मेडिसिन , नेफ्रोलॉजी तथा कार्डियोलॉजी विभाग के डॉक्टरों की टीम ने मेरा इलाज किया और मेरा हौसला बढ़ाया वह निश्चित ही प्रभावित करने वाला था जिसने मेरे मन में उनके प्रति और ज्यादा सम्मान और विश्वास बढ़ाया।
मेरे दामाद ऋषि जिस तरह मेरी जान बचाने के लिए अपनी जान की फ़िक्र किये बगैर अस्पताल में मेरे पास कोरोना मरीजों के बीच घंटों खड़े रहे और मेरे इलाज की राह सहज करते रहे वह किसी के लिए भी आज के माहौल में आसान नहीं था। खाना पानी भी भूलकर जिस तरह दिन भर ऋषि जूझते रहे वह कभी भुलाया नहीँ जा सकता । मुझे बाद में पता चला कि उस दिन जब तक मुझे बेड नहीं मिला तब तक ऋषि ने खाना तो दूर एक बूंद पानी भी नहीं पिया था। इतनी शिद्दत से जब आप के लिए आपका दामाद इस तरह खड़ा होता है तो बेटा और दामाद के बीच की लकीर का अस्तित्व मिट जाता है और लगता है मेरे सामने मेरा दामाद नहीं एक बेटा खड़ा है ।
ऋषि मुझसे उम्र और रिश्ते में छोटा होने के बावजूद अपने कर्मों की वजह से उस दिन मुझसे बड़े बन गए थे ।आज जब मैं यह लिख रही हूं मेरी आंखों में खुशी के आंसू हैं और मन में संतुष्टि के भाव। मै विश्वास के साथ कह सकती हूं कि ऋषि की किसी बात से अनजाने में भी कभी मुझे कोई क्लेश हुआ होगा तो वह उस दिन पूरी तरह से धुल गया था ।
यह संस्कारों की बात है और इस वक़्त मैं अपने समधी साहब और समधन जी को याद कर रही हूं जिन्होंने ऐसे संस्कार अपने बच्चों को दिए। ऋषि के बड़े भाई और भाभी, धीरज और दीपाली के लिए मैं क्या कहूं जिन्हें मैंने परिवार में कभी भी, किसी के लिए भी ज़रूरत पर खड़े होते और परिवार को जोड़ते, सम्हालते, ऐसे संस्कारों को सींचते और आगे बढ़ाते ही देखा है।
इस मुश्किल वक़्त में मेरे पति हमेशा की तरह मेरे साथ थे और अपने हिस्से का कर्तव्य पूरा करने में हर संभव कोशिश के साथ लगे थे।
बेटी के लिए भावनात्मक तथा व्यवहारिक तौर पर यह बहुत कठिन वक़्त था। वह अगले हीं महीने माँ बनने वाली है । फिर भी वह अपनी जिम्मेदारी ऐसे निभा रही थी जैसे मेरी मां हो और अभी भी जी जान से लगी है ।
मेरा बेटा अमेरिका में है और वहां से वह जो कुछ कर सकता था , कर रहा था ।
मैं यह सब इसलिए लिख रही हूं ताकि विश्वास के साथ बता सकूं कि जब आपका परिवार आप के साथ मजबूती से खड़ा हो तो फिर बड़ी समस्या भी छोटी बन जाती है ।
आज की पीढ़ी अगर परिवार में अंतर्निहित असीम ताकत को समझ कर चले तो शायद उनके लिए जीवन की चुनौतियों से निपटना आसान होगा ।
चलते समय अस्पताल की तरफ़ से मुझे दिया गया एक प्यारा सा मेरा मनपसंद तोहफ़ा। माहौल को खुशनुमा बना कर अस्पताल द्वारा इस तरह विदा करना भी बीमारी के अवसादों को दूर कर गया ।